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किसलिये प्रधानमंत्री पद का दावेदार ?

शेष नारायण सिंह
सोनिया गांधी ने एक बार फिर अपने परिवार के सदस्यों के आसपास गणेश परिक्रमा करने वाले कांग्रेसी नेताओं को औकातबोध करा दिया है। उन्होने साफ़ कह दिया है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में उनकी पार्टी किसी को भी प्रधानमंत्री पद दावेदार नहीं बनायेगी जबकि कांग्रेस में राहुल गांधी के आसपास रहने वाले लोग उनको प्रधानमंत्री पद का दावेदार बनाकर 2014 का चुनाव लड़ने पर आमादा थे। उनकी कोशिश थी कि नरेंद्र मोदी की चुनौती को राहुल जी को सामने करके सम्भाला जा सकता है। अजीब बात है कि राहुल गांधी के इन भक्तों को पता नहीं है कि यह भाजपा और उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की योजना है। उन्होंने जाल बिछा रखा है और जैसे ही कांग्रेस अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती, वह तुरन्त उनके जाल में फँस जाती। लेकिन सोनिया गांधी ने एक ऐसे फैसले को रोक दिया है जिससे उनकी पार्टी की दुर्दशा तो होती ही, संसदीय लोकतंत्र की नेहरूवादी परंपरा का भी बहुत नुकसान होता।
प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने की भाजपा की योजना उनकी तीन साल पहले से चल रही रणनीति का हिस्सा है। पहले तो उन्होंने अन्ना हजारे के नेतृत्व में आन्दोलन चलवाकर कांग्रेस को भ्रष्टाचार का समानार्थी शब्द बनाने के प्रोजेक्ट पर गंभीरतापूर्वक काम किया। उनके इस काम में कांग्रेस ने भी उनकी मदद की। कामनवेल्थ खेल, टू जी और कोयला घोटाला जैसे हथियार कांग्रेस ने भाजपा के हाथ में थमा दिया। जब कांग्रेस भ्रष्टाचार के कीचड़ में बुरी तरह से लिपटी नज़र आने लगी तो भाजपा ने नरेंद्र मोदी को मुक्तिदाता के रूप में पेश कर दिया। मोदी के पक्षधर टी वी चैनलों ने हाहाकार मचा दिया कि अब भाजपा ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है, कांग्रेस को फ़ौरन राहुल गांधी को उम्मीदवार बना देना चाहिए। कांग्रेस में राजनीति को न समझने वालों का एक बड़ा वर्ग और राहुल गांधी की राजनीतिक रणनीति को कम्यूटरबंद करने वाले नौजवानों ने भी दिनरात काम शुरू कर दिया। उनको सही मायनों में विश्वास था कि राहुल गांधी को आगे करने से बात बन जायेगी या यह कि राहुल गांधी के नाम से चुनाव जीता जा सकता है। लेकिन इस बीच चार महत्वपूर्ण विधानसभाओं के चुनाव हुए और साफ़ हो गया कि राहुल गांधी का नाम चुनाव जीतने की गारंटी तो खैर बिलकुल नहीं है, उनके नाम से कोई लाभ भी नहीं होता। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के आसपास लगे लोगों ने फिर भी वही राग अलापना जारी रखा जिससे राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बना दिया जाए। जब कांग्रेस ने 17 जनवरी के लिए आल इण्डिया कांग्रेस कमेटी की बैठक का प्रस्ताव रखा तो राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नामज़द करने के नारे और तेज़ी से लगने लगे। लेकिन 16 जनवरी को कांग्रेस वर्किंग कमेटी की बैठक में जब इस ब्रिगेड ने तेज़ी से अपना राग अलापना शुरू किया तो कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने हस्तक्षेप किया और कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने की कोई ज़रूरत नहीं हैं। इसके पहले कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह इकलौते व्यक्ति थे जिन्होंने कांग्रेस पार्टी से बार-बार आग्रह किया था कि भाजपा की नक़ल करके कांग्रेस को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित नहीं करना चाहिए। जब सोनिया गांधी ने भी कांग्रेस वर्किंग कमेटी में यह बात कह दी तो सभी यही उनकी हाँ में हाँ मिलाने लगे और बैठक के बाद यह बात साफ़ कर दी गयी कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं बनाये जायेंगे, उनको कांग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार का मुखिया ज़रूर बनाया जाएगा। अपने इस एक फैसले से कांग्रेस ने संभावित गठबंधन के साथियों को यह सन्देश भी दे दिया है कि अभी प्रधानमंत्री पद किसी के पास जा सकता है। इस रणनीति का नतीजा यह हो सकता है कि मई 2014 में सहयोगी जुटाने में मदद मिलेगी।
कांग्रेस ने तय कर दिया है कि वह लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में किसी को नहीं पेश करेगी तो उन टी वी चैनलों के सामने खासी परेशानी पैदा हो गयी है जो नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी चुनाव के लिये कई महीने से नारा लगा रहे थे। भाजपा में भी भारी चिंता है क्योंकि राहुल गांधी को कमज़ोर वक्ता समझकर नरेंद्र मोदी को लगता था कि वे विजयी हो जायेंगे। लेकिन सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी और भाजपा को अपनी रणनीति पर फिर से सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। हालांकि सोनिया गांधी ने परंपरा के हवाले से दावा किया है कि कांग्रेस अपने उम्मीदवार नहीं घोषित करती लेकिन यह भी माना जा रहा है कि 2013 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को मिली हार भी इसका एक प्रमुख कारण है। कारण जो भी रहा हो, प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार न घोषित करके कांग्रेस ने भाजपा को अलग थलग करने की दिशा में एक अहम् पहल कर दी है। अब यह तय है कि 2014 के चुनावों में जो भी पार्टियां उतर रही हैं उनमें केवल भाजपा की तरफ से ही प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार मैदान में होगा। जब नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित किया गया था तो पार्टी को उम्मीद थी कि उनके नाम पर जिन राज्यों में पार्टी कमज़ोर है और जहां कांग्रेस बनाम भाजपा चुनाव होते हैं, वहां भाजपा को भारी बढ़त मिल जायेगी। 2013 के विधानसभा चुनावों से एक अलग तरह की तस्वीर सामने आ गयी है। जिन पांच राज्यों में चुनाव हुए उनमें छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में भाजपा के अपने मुख्यमंत्री रमन सिंह और शिवराज चौहान की लोकप्रियता ऐसी थी कि उन्होने पार्टी की जीत सुनिश्चित कर ली। इन राज्यों में नरेंद्र मोदी के नाम का कोई ख़ास इस्तेमाल नहीं हुआ। इन राज्यों के ग्रामीण इलाकों में लोगों को मोदी का नाम तक नहीं मालूम था। दिल्ली और राजस्थान के चुनावों में मोदी का असर दिखा। राजस्थान में पार्टी भारी बहुमत से विजयी हुयी जबकि दिल्ली में सरकार बनाने लायक बहुमत भी नहीं मिला। भाजपा के नेता और मोदी के समर्थक मीडिया विश्लेषक सब जानते हैं कि दिल्ली में मोदी का इतना भी असर नहीं था कि वे चुनाव जीत सकें लेकिन कोई कुछ कहता नहीं। दिल्ली में भाजपा का चुनाव शुद्ध रूप से नरेन्द्र मोदी का चुनाव था क्योंकि उन्होंने अपनी मर्जी का मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित किया था और दिल्ली जैसे छोटे राज्य में बहुत अधिक चुनावी सभाएं की थीं। लेकिन मुकाबला त्रिकोणीय हो गया था। अन्य तीन राज्यों की तरह कांग्रेस बनाम भाजपा नहीं रह गया था। आम आदमी पार्टी के चुनाव में प्रभावी तरीके से शामिल हो जाने के कारण सब कुछ बदल गया था। नतीजा यह हुआ कि भाजपा सत्ता से बाहर रह गयी।
कांग्रेस ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी पार्टी के उम्मीदवार की घोषणा न करके एक अच्छा उदाहरण पेश किया है। साथ-साथ भाजपा की उस कोशिश को भी रोक दिया है जिसके तहत वे संसदीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण परम्परा और भारतीय संविधान की मूल भावना पर प्रहार कर रहे हैं। संविधान के अनुसार बहुमत दल का नेता ही प्रधानमंत्री बन सकता है। इसलिए पहले से प्रधानमंत्री तय करना हालांकि गैरकानूनी नहीं है लेकिन संविधानसम्मत भी नहीं है। यह तो रहीं संविधान की बातें लेकिन राहुल गांधी या किसी और को प्रधानमंत्री पद का दावेदार न बनाकर कांग्रेस ने एक बात तय कर दिया है कि कांग्रेस अगर सरकार बनाने में शामिल होगी तो उसकी तरफ से कोई भी प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं होगा। यह तय है कि 2014 के बाद भी गठबंधन सरकार बनेगी। उस स्थिति में कांग्रेस ने संकेत दे दिया कि वह किसी मायावती, शरद पवार, जयललिता, नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव या इसी तरह के किसी व्यक्ति को समर्थन दे सकती है। जबकि भाजपा के साथ जो भी शामिल होगा, उसे नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार स्वीकार करना पड़ेगा। ज़ाहिर है कांग्रेस की रणनीति राजनीतिक रूप से ज़्यादा सही नज़र आती है।
प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करने में भाजपा की सोच है कि 2014 के चुनावों देश एक मतदाताओं का एक बड़ा वर्ग नरेंद्र मोदी के नाम पर भाजपा के समर्थन में टूट पड़ेगा। इस सोच में तर्कदोष है और यह अनुभव से साबित भी हो चुका है कि ऐसा होना संभव नहीं है। 2013 के विधानसभा चुनावों में जिन राज्यों में भाजपा बनाम कांग्रेस मुकाबला था, वहां भाजपा की जीत हुयी है लेकिन दिल्ली में मुकाबला त्रिकोणीय था इसलिए भाजपा सत्ता से बाहर बैठ कर मौजूदा मुख्यमंत्री के कार्यों का विश्लेषण करती नज़र आ रही है। दिल्ली में भी कांग्रेस विरोधी लहर थी लेकिन उस लहर का फायदा आम आदमी पार्टी ले गयी और कांग्रेस को मजबूर कर दिया कि वह भाजपा के खिलाफ सरकार बनाने में उसकी मदद करे। भाजपा की पूरी कोशिश है कि वह आम आदमी पार्टी को यू पी ए का हिस्सा साबित कर दे लेकिन उसे अभी कोई सफलता नहीं मिल रही है। अलबत्ता उन राज्यों में जहां भाजपा मज़बूत है, वहां आम आदमी पार्टी मजबूती से संगठन बना रही है। 2014 की लगभग सभी सीटें भाजपा को गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार,कर्णाटक और महाराष्ट्र से आने की उम्मीद है। इन सभी राज्यों में आम आदमी पार्टी की उपस्थिति बहुत ही मज़बूत है। यहाँ तक कि गुजरात के सभी लोकसभा क्षेत्रों में आम आदमी पार्टी की सदस्य संख्या बढ़ रही है। इसका मतलब यह हुआ कि जिस गुजरात में कांग्रेस मोदी के सामने एक बहुत ही कमज़ोर पार्टी के रूप में मैदान में थी वहां अब भाजपा को एक ऐसी पार्टी का मुकाबला करना पड़ेगा जिसका पिछला कोई रिकार्ड नहीं है और जो दिल्ली में भाजपा को मिल रही निश्चित सत्ता से दूर रखने में सफल रही है।
अब तक के संकेतों से साफ़ है कि आम आदमी पार्टी भी किसी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार नहीं बनायेगी यानी वह भी नरेंद्र मोदी और भाजपा को कोई ऐसा व्यक्ति नहीं देने वाली है जिसके खिलाफ व्यक्तिगत स्तर पर अभियान चलाया जा सके। लोकसभा 2014 की एक ख़ास बात और यह है कि आम आदमी पार्टी की अपील उन राज्यों में तो है ही जहां भाजपा मज़बूत है लेकिन उसकी पहुंच हैदराबाद, चेन्नई, त्रिवेंद्रम, कोलकाता आदि बड़े शहरों के आसपास भी है। उत्तर प्रदेश, जहां लोकसभा चुनाव 2009 में भाजपा चौथे स्थान पर रही थी और अभी 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में तीसरे स्थान पर रही थी, वहां सभी 80 सीटों पर आम आदमी पार्टी की मौजूदगी प्रभावशाली तरीके से है और यह पक्का है कि समाजवादी पार्टी को होने वाले नुक्सान का सीधा लाभ भाजपा को नहीं मिलेगा। गठ्बंधन की राजनीति के ज़माने में अगर झाडू वाली पार्टी अपना दिल्ली वाला प्रदर्शन दोहरा सकी तो प्रधानमंत्री पद का दावेदार घोषित करना किसी भी पार्टी को भारी पड़ जाएगा।

About the author

शेष नारायण सिंह, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं। वह इतिहास के वैज्ञानिक विश्लेषण के एक्सपर्ट हैं। नये पत्रकार उन्हें पढ़ते हुये बहुत कुछ सीख सकते हैं। शेषजी हस्तक्षेप.कॉम के संरक्षक व देशबंधु के राजनीतिक संपादक हैं।

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