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किसान आत्महत्या करते रहेंगे और बनती रहेंगी कमेटियाँ

लागू हो स्वामिनाथन कमेटी की रिपोर्ट
सुनील कुमार
13 फरवरी, 2014 को भारतीय किसान यूनियन, एकता (दाकौन्दा) के बैनर तले पंजाब से आये हजारों किसानों ने संसद मार्ग पर प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारी किसान 12 फरवरी की रात से ही बंगला साहिब गुरूद्वारा में पहुँचना शुरू हो गये थे। किसान जिस तहर आधा पेट खाकर भी अनाज की पैदावार करता है कि आने वाला साल खुशियाँ लायेगा, उसी तरह इन प्रदर्शनकारी किसानों ने बंगला साहेब गुरूद्वारे के खुले आसमान के नीचे रात बितायी कि सुबह में वो अपनी आवाज़ अपनी माँग को सरकार के सामने रखेंगे। प्रदर्शनकारी नारे लगाते हुये 100 गज के गलियारे जन्तर मन्तर पहुँचे जहाँ भारत का ‘लोकतन्त्र’ दिखता है। जन्तर मन्तर से लोकतन्त्र का मन्दिर मात्र 500 मीटर दूरी पर है लेकिन इन किसानों के हाल जानने वाला भगवान उस मन्दिर से निकल कर नहीं आया। प्रदर्शनकारी किसान 3.30 बजे तक इंतजार किये जब कोई मिलने नहीं आया और न ही उनके लिये कोई संदेशा आया तो किसान खुद ही उस मन्दिर की ओर बढ़ चले। संसद मार्ग थाने के पास अन्न दाता किसानों को बैरिकेटिंग कर भारी पुसिल फोर्स लगाकर रोक लिया गया। किसान वहीं डट गये तब मन्दिर से बुलाहट आई कि ठीक है डेलिगेश्न से मिल लेंगे।
पंजाब जो कि हरित प्रदेश के नाम से जाना जाता है वहाँ किसान कर्ज में गर्दन तक डूबे हैं और आत्महत्या कर रहे हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा किये गये एक सर्वे के अनुसार पिछले 15 सालों के दौरान करीब 20 हजार किसानों एवम् कृषि से जुड़े ग्रामीण मजदूरों ने आत्महत्यायें की हैं। ये सभी पंजीकृत आत्महत्यायें हैं, जबकि सैकड़ों अन्य ऐसे मामलों को पुलिस ने पंजीकृत नहीं किया है। इस तरह की घटनायें लगातार बढ़ रही हैं।
पिछले सालों में केन्द्र सरकार ने सार्वजनिक बैंकों के कर्जों में डूबे किसान परिवारों के लिये 71 हजार करोड़ रु. की पैकेज की घोषणा की थी, लेकिन पंजाब के किसानों को इस रकम का दो प्रतिशत से भी कम हिस्सा प्राप्त हुआ। सरकार झूठे आश्वासन के सिवा किसानों के  लिये कुछ नहीं कर रही है। किसान सरकारी बैंकों के से कई गुना ज्यादा कर्ज कमीशन एजेन्टों से लेते हैं। कमीशन एजेन्टों द्वारा किसानों को सरकारी दर से ऊँची दरों पर कर्ज दिये जाते हैं जिसके कारण किसान हमेशा ही कर्ज के बोझ के तले दबा होता है। भारतीय किसान यूनियन, एकता (दाकौन्दा) की माँग थी कि केन्द्र सरकार को सार्वजनिक क्षेत्र, सहकारी बैंकों एवम् कमीशन एजेन्टों व साहूकारों से लिये गये किसानों के कर्जों को माफ/रद्द करने की जिम्मेवारी लेनी चाहिए। सरकार को सभी पंजीकृत और गैर पंजीकृत वैसे रूक्कों (प्रोनोटों), रेहनों व बैनामों को रद्द करना चाहिए, जिन पर किसानों द्वारा मजबूरी में दस्तखत बनाया गया है।
18 नवम्बर 2004 को स्वामीनाथन कमेटी की स्थापना की गयी जो कि अपना रिपोर्ट दिसम्बर 2004, अगस्त 2005, दिसम्बर 2005 और अप्रैल 2006 में रखी पाँचवी और आन्तिम रिपोर्ट 4 अक्टूबर 2006 को कमेटी ने सरकार को सौंप दी, जिसको आज तक लागू नहीं किया गया है। स्वामिनाथन कमेटी के अनुसार गेहूँ की कीमत 2400 रु. प्रति क्विंटल, धान की 2100 रु. प्रति क्विंटल, बासमती धान की 2400 रु. प्रति क्विंटल, अमेरिकन काटन की 7000 रु. प्रति क्विंटल और गन्ना की 450 रु. प्रति क्विंटल तय होनी चाहिये। इस कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की माँग किसान संगठन ने किया और साथ में सुझाव दिया कि कृषि उपजों की कीमतें, उनकी आगत-लागतों के साथ 50 प्रतिशत मुनाफे को जोड़कर तय की जायें, जैसा कि इस रिपोर्ट ने सुझाया था।
जहाँ खाद, बीज, कीटनाशक दवा, कृषि उपकरणों की कीमत खुद कम्पनियाँ तय करती हैं और अपने मन मुताबिक मुनाफे पर बेचती हैं वहीं किसानों की उपजों के दाम संसद में तय होते हैं और कमीशन एजेन्टों के द्वारा मिलता है। यूनियन का कहना है कि कृषि उपज का मूल्य केन्द्रीय एवम् राज्य खरीद ऐजेन्सियों द्वारा सीधे तौर पर दिये जायें। साहूकारों-कमीशन एजेन्टों द्वारा किसानों को लूटा जाता रहा है। इस प्रकार के लूट के खिलाफ किसान यूनियन द्वारा पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में एक अरजी भी दायर की गयी है। ‘कैग’ ने भी खरीद एजेन्सियों की सीधे किसानों को भुगतान करने का निर्देश दिया है, लेकिन साहूकार-लाॅबी के दबाव में पंजाब सरकार ने इसे लागू नहीं कर रही है।

किसान यूनियन की माँग है: –

–    रेलवे बजट की तरह कृषि क्षेत्र के लिये भी ससंद एवम् प्रान्तीय एसेम्बलियों में अलग से बजट पेश की जाये।

–    पंजाब विगत चार दशकों से केन्द्रीय पूल में 60 प्रतिशत से अधिक खाद्यान्नों का योगदान करता रहा है, इसलिये सरकार को मुआवजा के बतौर यह रिलीफ पैकेज देना चाहिए।

–    स्वामिनाथन कमेटी की रिपोर्ट को तत्काल लागू किया जाये।

–    आत्महत्या करने वाले किसानों के सम्बन्धियों को 10 लाख रु. की मदद दी जाये और उनके परिवार के एक सदस्य को नौकरी दी जाये या प्रभावित परिवार को प्रति माह 10 हजार रू. की पेंशन दी जाये। इस पेंशन स्कीम को संयुक्त रूप से केन्द्र एवम् राज्य सरकार द्वारा लागू किया जाये।

–    बासमती, सूर्यमूखी, आलू, टमाटर और दूसरी सब्जियों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तय किये जायें और सरकारी व निजी एजेन्सियों को इन फसलों को खरीदने हेतु पाबन्द किया जाये।
यूनियन ने नये भूमि अधिग्रहण कानून एवम् नई जल नीति को भी वापस लेने की माँग की। उन्होंने माँग की कि कृषि क्षेत्र को एक कुशल उद्यम का दर्जा दिया जाये, और जिन्होंने दशकों के कठिन परिश्रम से खेतों को उपजाऊ बनाया है, उन्हें उन पर मालिकाना हक दिया जाये।

किसानों की इन वाजिब माँगों को सुनने के लिये ‘जनता के सेवकों’ के पास समय नहीं है। जब यह किसान कहने लगे कि हम बैरियर तोड़ कर जायेंगे तब उनके पाँच प्रतिनिधि मंडल को ले जाया गया जहाँ पर राज्य कृषि मंत्री से मुलाकत हुयी। राज्य कृषि मंत्री से जब यूनियन के पदाधिकारी ने अपनी माँग रखी और स्वामिनाथन कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की बात की तो मंत्री महोदय ने उन्हें बताया कि एक नई कमेटी बनायी गयी है जो किसानों की समस्या सुनेगी। सात साल पुरानी कमेटी के सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया गया, लेकिन फिर से किसानों को छलावा देने के लिये 1 अप्रैल 2013 को एक और कमेटी की स्थापना की गयी है। इस कमेटी में किसान यूनियन के प्रतिनिधि के रूप में बीकेयू टिकैत ग्रुप के लोगों (राकेश टिकैत, यद्धुविर सिंह) को ही लिया गया है और देश के कोई किसान यूनियन इसमें शामिल नहीं है। टिकैत परिवार का किसान संगठनों में अब किस तरह की भूमिका रही है, अब टिकैत परिवार को किसान नेता से ज्यादा राजनेता बनने की महत्वाकांक्षा है। किसानों में टिकैत ग्रुप की शक्ति कम ही हुयी है। अब देखना है कि यह कमेटी कितने वर्षों में अपनी रिपोर्ट सौंपती है और उसको कब तक लागू किया जायेगा? या इसके बाद एक और कमेटी बना दी जायेगी? अन्न दाता किसान आत्महत्या करते रहेंगे और राजेनताओं और अफसरशाहों की इसी तरह चाँदी रहेगी?

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सुनील कुमार, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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