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कुछ तो दाल में काला है

शैलेन्द्र चौहान
झाड़ू लेकर घूमने वाले केजरीवाल और उनके साथियों को इस बात की कोई उम्मीद ही नहीं थी कि वह पहले ही चुनाव में दिल्ली में सत्ता पर काबिज हो जाएंगे। आम आदमी पार्टी अभी मात्र एक वर्ष पहले ही अस्तित्व में आई है। भले ही यह भाजपा और काँग्रेस की सोची समझी रणनीति रही हो कि आप को दिल्ली के तख़्त पर बिठाकर चारों ओर से घेर लिया जाये और आप अभिमन्यु की तरह इस चक्रव्यूह में फंस तो जाये पर निकले परास्त होकर ही। इस नई पार्टी ने काँग्रेस और भाजपा से लेकर सभी क्षेत्रीय दलों तक में एक बेचैनी सी पैदा कर दी। आम आदमी पार्टी आगामी चुनाव में क्या भूमिका निभाएगी, लेकिन इतना ज़रूर है कि शुरुआत में पार्टी ने एक भी नेता और उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे बिना ही भारत का राजनीतिक परिदृश्य बदल दिया।  भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार डॉ. हर्षवर्धन मुख्यामंत्री न बन पाने के कारण बुरी तरह बौखलाए हुये हैं। वे लगातार हर दिन कुछ भी ऊल जलूल प्रतिक्रिया देते पाये जाते हैं। अभी तक सभी पार्टियों के बड़े नेता ‘आप’ से बहुत कुछ सीखने के लिये उतावले थे। अब सिर्फ एक महीने के कार्यकाल में केजरीवाल सरकार को हर वक्त बहुत बुरी तरह से उनकी असफलताओं का आभास कराते हैं लेकिन आजादी के छियासठ साल तक भारतीय राजनीति को, गन्दगी के इस मुकाम तक पहुँचाने में अपनी भूमिका नहीं देख पाते। केजरीवाल और उनके मंत्रियों को तो कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है,  इन्हें तो लम्बा अनुभव है लेकिन इन्होंने तो आम आदमी को पहले ही रसातल में पहुँचा दिया है फिर भी सीना चौड़ा करके घूम रहे हैं। न कहीं कानून है, न जीवन स्तर सुधारने की कोशिश, न सिविक सेंस विक्सित करने की कोई इच्छा। जो चल रहा है सब ठीक है क्योंकि इन्होने तो धन से अपने कोठार भर रखे है।  इन्हें जनता की क्या परवाह। इनकी कारगुजारियाँ संदेह से परे कतई नहीं हैं। उसका एक छोटा सा उदहारण है कि पिछले हफ़्ते दिल्ली में जब आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपने मंत्रिमंडल के मंत्रियों के साथ संसद के पास सड़क पर धरना दिया था तो उन्हें शुरुआत में मीडिया में ज़बर्दस्त कवरेज मिली और मीडिया का रवैया पूरी तरह सकारात्मक रहा लेकिन धरना जैसे ही दूसरे दिन में दाखिल हुआ लगभग सारे ही टीवी चैनल अचानक केजरीवाल और उनके धरने के विरोधी हो गये। दाल में कुछ काला तो है ही तभी तो मीडिया का विरोध इतना अचानक, सामूहिक और स्पष्ट था कि ख़ुद केजरीवाल ने संवाददाताओं से पूछा कि मीडिया को अचानक क्या हो गया।
अब केजरीवाल को, मीडिया हर तरफ से लपेट रहा है उनकी खिंचाई कर रहा है। मोदी के प्रति अब भारतीय मीडिया ने अपने तेवर बदल लिये हैं। आप के उभार से मोदी का प्रभामंडल आच्छादित हो गया था लेकिन घुटे हुये राजनीतिबाजों ने उसे पलटना शुरू कर दिया है। लगभग सभी कॉर्पोरेट घराने इसमे मोदी के साथ हैं। लगभग हरेक टीवी चैनल पर अचानक समाचारों और विश्लेषणों में मोदी की ओर झुकाव दिखने लगा है। सुना जाता है कि कई कॉर्पोरेट मालिकों ने अपने चैनलों को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया है कि वे मोदी के विरोध से बचें और मोदी विरोधी विश्लेषकों और विशेषज्ञों को चर्चा में कम शामिल करें। मोदी उन्हें एक खुली अर्थव्यवस्था के वाहक और सुधारवादी नेता नज़र आते हैं। देश की एक प्रमुख पत्रिका ने अपने एक लेख में लिखा है कि पिछले कुछ हफ़्तों में कम से कम पांच प्रमुख संपादकों को तटस्थ रहने या मोदी विरोधी विचारों के कारण उनके पदों से हटा दिया गया है। यही नहीं टीवी चैनलों पर अचानक ऐसे विश्लेषकों और पर्यवेक्षकों की संख्या बढ़ गयी है जिनकी विचारधारा भाजपा और मोदी की विचारधारा से मेल खाती है।
नरेंद्र मोदी तो अधिकांश अंग्रेजी मीडिया को गुजरात दंगों के सन्दर्भ में उनके रुख को लेकर शक की नज़र से देखते रहे हैं। मीडिया के प्रति उनका रवैया बेहद अहंकारपूर्ण रहा है। अभी तक तो वह पत्रकारों से बचते रहे हैं। मोदी केवल उसी पत्रकार को साक्षात्कार देते रहे हैं जिसे वे चाहते हैं। साक्षात्कार से पहले वह पत्रकार से सारे सवाल भी मांगते हैं और पत्रकार को यह भी समझा दिया जाता है कि इनमें कौन से सवाल पूछे जाएंगे और कौन से नहीं। भारत के एक प्रमुख पत्रकार ने कुछ साल पहले एक साक्षात्कार के दौरान जब मोदी से गुजरात दंगों के बारे में सवाल किया तो वे बेहद नाराज हो गये और उठकर चले गये। इसके बाद किसी भारतीय पत्रकार ने आमतौर पर उनसे दंगों के बारे सवाल करने का साहस नहीं किया। अब भी भारतीय मीडिया अपने इस रवैये पर कायम है। यह बात ध्यान देने की है कि शायद ही कभी भारत के किसी कॉरपोरेट हाउस ने धार्मिक नरसंहार, जातिवाद, जातीय भेदभाव या अन्य महत्वपूर्ण सामाजिक मुद्दे पर कभी कोई स्टैंड प्रभावित लोगों के पक्ष में लिया हो। वो इन मुद्दों पर हमेशा ही चुप्पी साधे रहते हैं। क्या इन घरानों की कोई नैतिक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं बनती, सिर्फ पैसा कामना ही इनका एक मात्र लक्ष्य है ? क्या ये भारत के नागरिक नहीं है। राष्ट्रवाद का जो हल्ला मचाया जाता है क्या ये उस परिधि में नहीं आते ? जाहिर है सब कुछ मैनेज हो गया है और इस देश की सियासत अब फिर उसी रास्ते पर चल निकली है जैसी पिछले छियासठ वर्षों से चल रही है।

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शैलेन्द्र चौहान, साहित्यकार व स्तंभकार हैं।

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