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कुछ समय और साथ रहना चाहिए था अस्थाना जी। इतनी जल्दी मैं अलविदा बोलने के लिए तैयार नहीं

संजय तिवारी
मैं आज भी उसी जगह बैठा हूं जहां आखिरी बार उनसे मुलाकात हुई थी कोई साल भर पहले। हाथ में एक ब्रीफकेस लिए वे लखनऊ से दिल्ली आये थे। किसी मानहानि के मुकदमें में हाजिरी लगाने। बताया था कि एक स्टोरी में उन्होंने किसी की “ले ली” थी। जिसके बाद उसने मानहानि का मुकदमा कर दिया था। वकील कह रहा था, माफी मांग लो तो मामला रफा दफा हो जाएगा लेकिन अस्थाना जी ऐसे इंसान थे कहां कि माफी मांग लेते?
हो सकता है आप S.a. Asthana को न जानते हों। जानने की जरूरत भी नहीं है। दुनिया इतनी बड़ी है। किसको किसको जानते फिरेंगे। मैं भी कहां उनको जानना चाहता था। यह तो अस्थाना जी की पत्रकारिता थी कि उन्हें जानने की जरूरत पड़ी। कोई चार पांच साल पहले उनसे पहली बार जब फोन पर बात हुई तो होती ही चली गई। आखिरी बार तीन दिन पहले तब बात हुई जब उन्होंने भतीजी की शादी का न्यौता दिया था।
लेकिन यह आखिरी बातचीत फोन पर नहीं इसी जगह फेसबुक चैटबॉक्स के जरिए हुई थी। वे बहुत नीक से तकनीक को जानते नहीं थे। लेकिन मेरी सहूलियत का इतना ख्याल रखते थे कि आखिरकार करते वही थे जो मैं चाहता था। उन्हें मालूम था कि फोन पर बहुत बात करने से कतराता हूं इसलिए उन्होंने चैटिग करना शुरू कर दिया था।
लेकिन मुझे क्या मालूम था कि सुबह पांच बजकर पचपन मिनट पर आया अस्थाना जी का मिस काल बड़ी मनहूस सूचना लेकर आयेगा। अभी मैं पलटकर उन्हें फोन कर पाता कि पता चला वे चले गये। सदा- सदा के लिए। कल ही उनका जटिल दिमाग न जाने कैसे अपने में इतना उलझ गया कि अस्थाना जी जिन्दगी की जंग हार गये।
अपना भी दिमाग काम नहीं कर रहा है कि क्या कहें। अस्थाना जी की विरोधाभासी और अक्खड़ छवि थी। इसलिए लखनऊ की पत्रकार बिरादरी उन्हें “महान” पत्रकारों की दर्जेदारी में शायद ही शुमार करे। लेकिन उनका जंगी स्वभाव और बेफिक्री से सुलगाई गई सिगरेट का धुंआ लखनऊ की फिजा से इतनी जल्दी ओझल न होगी। आपको कुछ समय और साथ रहना चाहिए था अस्थाना जी। इतनी जल्दी मैं अलविदा बोलने के लिए तैयार नहीं था…!!!

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संजय तिवारी, लेखक visfot.com के संपादक-मॉडरेटर हैं।

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