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कैशलेस अर्थव्यवस्था का नारा दरअसल ग़रीबों के ख़िलाफ़ युद्ध का नारा है

कैशलेस अर्थव्यवस्था का नारा दरअसल ग़रीबों के ख़िलाफ़ युद्ध का नारा है
नोटबंदी का कॉकटेल, काला धन और भारतीय अर्थव्यवस्था 
शारिक़ अंसर

8 नवम्बर को रात 8 बजे भारतीय मुद्रा की रीढ़ कहे जाने वाली 500 और 1000 के नोट को अचानक बंद कर दिया गया।
 प्रधानमंत्री के नोट बंदी के ऐलान के बाद पूरे देश में अफरातफरी मच गई और उसके बाद से ही पुराने नोट को बदलवाने और नए नोट हासिल करने की जद्दोज़हद के लिए बैंकों और एटीएम के बाहर लंबी लंबी  लाइनें लग गयीं। 
भारत के 500 और 1000 रुपये के नोटों के विमुद्रीकरण, जिसे मीडिया में छोटे रूप में नोटबंदी कहा गया के, इस कॉकटेल को समझना और समझाना शायद थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि इसकी पेचीदगियां बहुत है।  
मुम्बई मिरर की एक खबर के मुताबिक़ सामाजिक कार्यकर्ता अनिक बोकिल जो कि‘अर्थक्रांति’ नाम के संगठन के संस्थापक हैं और काला धन पर काम किये हैं, ने दावा किया कि उन्होंने ही सरकार को नोटबंदी का सुझाव दिया था। लेकिन सरकार ने इसके लिए उचित तैयारी नहीं की जिसके कारण लोगों को परेशानी उठानी पड़ रही है। 
भारतीय मुद्रा के प्रचलन में मौजूद कुल नोटों का 86 प्रतिशत हिस्सा का अचानक बंद कर दिए जाने से लोग जहाँ आम जनता को परेशान हैं वहीँ विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार की तीव्र आलोचना की और लोकसभा और राज्यसभा कई दिनों तक बाधित चल रही है।
सरकार जहाँ काले धन, नकली नोटों की रोकथाम और आतंकवाद व उग्रवाद के खात्मे के लिए इसे एक ऐतिहासिक क़दम बता रही है वहीँ विपक्ष सरकार की बिना तैयारी के उठाया गया एक गैरज़िम्मेदाराना क़दम कह रही है।

सरकार के इस फैसले और विपक्ष के विरोध के बीच जनता बुरी तरह से पिस रही है। 
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अब तक 74 से ज़्यादा लोगों की मौतें नोट बंदी की वजह से हो चुकी है। इस फैसले से सबसे ज़्यादा प्रभावित आम जनता,छोटे कारोबारी, किसान, दैनिक मज़दूर, रेहड़ी पटरी वाले कारोबारी, महिलाएं आदि हैं। क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था का 40 प्रतिशत हिस्सा गैर परंपरागत कारोबार का है और इसमें आम व्यक्ति और छोटे कारोबारी ज़्यादा हैं।
सरकार का तर्क है कि इस फैसले से जहाँ अर्थव्यवस्था में मज़बूती और बिज़नस में पारदर्शिता आएगी वहीँ काला धन पर भी लगाम लग जायेगा। 500 और 1000 रुपये के रूप में नकली नोटों का बड़ा कारोबार चल रहा था जिसपर नकेल कसना ज़रूरी था।  
सरकार इस फैसले पर प्रधानमंत्री का मास्टर स्ट्रोक बता कर फौरी तौर पर अपनी पीठ थपथपाने की कोशिश कर रही है लेकिन भविष्य में इसका प्रभाव क्या होगा इसको लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता।
भारतीय अर्थव्यस्था पर बारीक नज़र रखने वाले लोग इसको लेकर फिक्रमंद हैं। लोगों का तर्क है कि पैसों की आपूर्ति कम होने से कुल आय की वृद्धि दर में कमी हो जाएगी, जिसका असर कुल घरेलू उत्पाद पर पड़ेगा और जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को नुक्सान हो सकता है। 
इक्विटी पर रिसर्च करने वाले मुंबई की विश्वसनीय संस्था, अम्बित कैपिटल के अनुसार देश के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर जो कि लगभग सात प्रतिशत है, इसमें जल्द ही तीन प्रतिशत तक कमी हो सकती है। 
दी गार्जियन अख़बार ने अपने संपादकीय में लिखा है कि नोट बंदी से भारतीय अमीरों को कोई फर्क नहीं पड़ेगा बल्कि छोटे आम गरीब लोग इस से ज़्यादा प्रभावित होंगे।  

नोटबंदी के इतिहास पर एक नज़र..  
नोटबंदी पहले भी लागू की जा चुकी है, जिसका सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव देखने को मिला है। जनवरी 1946 में, 1000 और 10,000 रुपए के नोटों को वापस ले लिया गया था और 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नए नोट 1954 में पुनः शुरू किया गए थे।
16 जनवरी 1978 को जनता पार्टी की गठबंधन सरकार ने फिर से 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नोटों का विमुद्रिकरण किया था ताकि जालसाजी और काले धन पर अंकुश लगाया जा सके। 
1978 को भी नोटबंदी के  वक़्त भी देश ने इसे सहर्ष स्वीकार किया था लेकिन इतनी ज़्यादा परेशानी नहीं थी क्योंकि उस वक़्त इसकी घोषणा जल्दबाज़ी में अचानक नहीं की गई थी, बल्कि पूरी तैयार के साथ इसे लागू किया गया था।
दुनिया के अन्य देशों में भी नोटबंदी की गई है लेकिन उससे अर्थव्यवस्था में कोई सुधर हुआ हो ऐसा कोई आंकड़ा नहीं मिलता है। 
विश्व के आधुनिक इतिहास में नोटबेदी का कदम सबसे पहले अफ्रीकी देश घाना में उठाया गया था, जब वर्ष 1982 में टैक्स चोरी व भ्रष्टाचार रोकने के उद्देश्य से वहां 50 सेडी के नोटों को बंद कर दिया गया था। इस क़दम से ज़्यादा फर्क तो नहीं पड़ा लेकिन ग्रामीण अर्थव्यवस्था चौपट हो गयी थी।
नाइजीरिया में वर्ष 1984 में सैन्य सरकार ने भ्रष्टाचार से लड़ने के उद्देश्य से बैंक नोटों को अलग रंग में जारी किया था, और पुराने नोटों को नए नोटों से बदलने के लिए सीमित समय दिया था।
नाइजीरिया सरकार द्वारा उठाए गए कई कदमों में से एक यह कदम पूरी तरह नाकाम साबित हुआ था, और कर्ज़ में डूबी व महंगाई तले दबी अर्थव्यवस्था को राहत नहीं मिल पाई थी, सरकार को वहां सत्ता से बेदखल होना पड़ा था।  
नोटबंदी का भारत से मिलता-जुलता कदम वर्ष 1987 में पड़ोसी देश म्यांमार में भी उठाया गया था जिसपर जनता के साथ छात्र भी बड़ी तादाद में सड़कों पर निकल आये थे। 
मिखाइल गोर्बाचेव के नेतृत्व वाले सोवियत संघ ने अपने ‘अंतिम साल’ की शुरुआत में ‘काली अर्थव्यवस्था’ पर नियंत्रण के लिए 50 और 100 रूबल को वापस ले लिया था, लेकिन यह कदम न सिर्फ महंगाई पर काबू पाने में नाकाम रहा, बल्कि सरकार के प्रति लोगों को विश्वास भी काफी घट गया। 
उत्तर कोरिया में वर्ष 2010 में तत्कालीन तानाशाह किम जोंग-इल ने अर्थव्यवस्था पर काबू पाने और काला बाज़ारी पर नकेल डालने के लिए पुरानी करेंसी की कीमत में से दो शून्य हटा दिए, जिससे 100 का नोट 1 का रह गया।
उन सालों में देश की कृषि भी भारी संकट से गुज़र रही थी, सो, परिणामस्वरूप देश को भारी खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ा।
चावल की बढ़ती कीमतों जनता में गुस्सा इतना बढ़ गया कि आश्चर्यजनक रूप से किम को क्षमायाचना करनी पड़ी तथा उन दिनों मिली ख़बरों के मुताबिक इसी वजह से तत्कालीन वित्त प्रमुख को फांसी दे दी गई थी।  

आर्थिक सुधार की बयार और पूंजीपतियों का बहार 
इस वक़्त हमारे देश में कई आर्थिक सुधार हो रहे हैं जिस पर नज़र दौड़ाना ज़रूरी है।
केंद्रीय बजट अपने तय समय से पहले आ रहा है। एक देश-एक कर के रूप में  जीएसटी लागू हो रही है तो  रेलवे बजट को आम बजट के साथ जोड़ दिया गया है और अब यह नोटबंदी का फैसला भी इसी आर्थिक सुधार की एक कड़ी है।
आर्थिक सुधार के लिए ये तमाम बदलाव का स्वागत किया जा सकता है लेकिन सवाल ये है कि क्या 70 प्रतिशत से अधिक गांव में बसने वाली आबादी को इसका फ़ायदा मिल पायेगा या यह सुधार सिर्फ उद्योगपतियों, पूंजीपतियों की हितों की पूर्ति के लिए होगी।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि अगर गरीब किसान या छोटा कारोबारी बैंकों से क़र्ज़ लेता है तो बैंक उससे सख्ती के साथ क़र्ज़ वसूलती है लेकिन बड़े पूंजीपति बच जाते हैं उन्हें कोई कुछ नहीं करता। 
हज़ारों किसान बैंको के क़र्ज़ अदा नहीं किये जाने और प्रताड़ना से तंग आकर ख़ुदकुशी कर चुके हैं, इसके कई आंकड़े आपको मिल जायेंगे । लेकिन बड़े बड़े पूंजीपति बैंक डिफाल्टर होने के बावजूद बच जाते हैं उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता।
आरबीआई ने ऐसे 100 बड़ी कंपनियों के डिफॉल्टर्स की लिस्ट जारी की जिसके अनुसार 24 दिसम्बर 2015 तक लगभग 5 लाख करोड़ रुपये विभिन्न बैंकों में इनके बकाया हैं। उसमे अकेला विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइंस पर 17 बैंकों का कुल 6993 करोड़ रुपये बकाया है। 
डीएनए अख़बार की एक रिपोर्ट के अनुसार देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया ने 63 बड़े डिफॉल्टर्स के क़रीब 7,016 करोड़ रुपये (राईट ऑफ़) माफ़ किये हैं।

लिस्ट संलग्न है….  
जिन लोगों का कर्ज माफ़ किया गया है उनमें किंगफिशर एयरलाइंस (करीब 1201 करोड़ रुपये), केएस ऑयल (596 करोड़ रुपये), सूर्या फार्मास्यूटिकल (526 करोड़ रुपये), जीईटी पावर (400 करोड़ रुपये) और साई इंफो सिस्टम (376 करोड़ रुपये), वीएमसी सिस्टम (370) करोड़ रुपये, अग्निट एजुकेशन लिमिटेड 315 करोड़ रुपये आदि शामिल हैं।
कहा जा रहा है कि इस क़र्ज़ माफ़ी से उबरने के लिए भी नोट बंदी का शिगूफा छोड़ा गया ताकि बैंक में पर्याप्त धन आ जाये और बैंक अपने दिवालियेपन से उबार जाएं। लेकिन इसमें कोई मज़बूत तथ्य अब तक सामने नहीं आये हैं।
ऐसी कई कहानियां हैं, जिनमें सरकार के द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पूंजीपतियों की कर्जमाफी या टैक्स में छूट दी गई है।  
नोट बंदी और काले धन की जुगलबंदी 
2012 में केंद्रीय आयकर विभाग ने अपने बयान में कहा था कि नोट बंदी काला धन की समाप्ति का कोई विकल्प नहीं है, ये बेनामी संपत्ति के रूप में होता है जो विदेशी खातों, आभूषणों और प्रोपर्टीज के रूप में होते हैं। नगदी के रूप में केवल 6 प्रतिशत रूपए ही काला धन हो सकता है।
2006 की स्विस बैंक संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक स्विस बैंक में भारत का काला धन क़रीब 1456 बिलियन डॉलर थी जो कई देशों की कुल जमा पूंजी के बराबर है।

एक अनुमान के अनुसार ये रक़म 45 करोड़ लोगों को अगर बांटी जाय तो हर व्यक्ति को एक लाख रुपये तक मिल सकता है। 
सर्वोच्च न्यायालय को एसआईटी द्वारा सौंपी रिपोर्ट के मुताबिक, कुल 628 लोगों के पास काला धन है। इनमें से 289 खातों में कोई राशि जमा नहीं पाई गई। 628 लोगों में से 201 या तो अप्रवासी हैं या उनकी पहचान नहीं हुई है, जबकि 427 मामले कार्रवाई करने योग्य हैं। फिर भी सरकार अबतक कोई कार्यवाई नहीं कर पाई है।
ये एक गंभीर बात है कि सरकार विदेशों में जमा काले धन को लाने में कोई ठोस क़दम नहीं उठा पा रही है लेकिन अपनी पीठ थपथपाने के लिए देश में आर्थिक अराजकता का माहौल पैदा कर दी है। 
कहा जा रहा है कि परंपरागत मुद्रा के चलन पर रोक लगा कर कैशलेस इकोनॉमी को ज़्यादा बढ़ावा देने से टैक्स चोरी, नकली नोट आदि की समस्या खत्म हो जाएगी।  
लेकिन सवाल ये भी है कि क्या विकसित देशों में ऐसे प्रैक्टिसेज से कर चोरी आदि में लगाम लगाया जा सका है। अमेरिका और अन्य देशों में तो अब तक ऐसा नहीं है।
अप्रैल 2016 में अमेरिका की इंटरनल रेवेन्यू सर्विस ने अपने रिपोर्ट में कई अरब डॉलर टैक्स चोरी का आंकड़ा प्रकाशित किया है।
दुनिया के कई देशों में टैक्स चोरी बड़ी कंपनियां करती हैं और बच जाती हैं।
भारत में भी स्थिति ऐसी ही है लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती।
आयकर विभाग चंद संस्थानों में रेड डाल कर बड़ी आसानी से बड़ी कंपनियों को बचा लेता है।
भारत जैसे गरीब देश, जहाँ की इकॉनमी छोटे और मंझले उद्योगों के सहारे चलती है, जहाँ 70 प्रतिशत से अधिक की जनता गाँव में रहती है और ग्रामीण हाट और बाज़ार से अपनी दिनचर्या की ज़रूरी सामान लेती है, उसको कैशलेस इकोनॉमी एटीएम, पेटीएम, बिग बाजार में धकेलना देश को आर्थिक रूप से कमज़ोर करना है। 
गार्डियन अखबार में ही कैशलेश अर्थव्यवस्था पर एक आलोचनात्मक लेख में कहा कि कैशलेस अर्थव्यवस्था का नारा दरअसल ग़रीबों के ख़िलाफ़ युद्ध का नारा है। ग़रीबी के ख़िलाफ़ नहीं। हमें इस नोट बंदी की फिलॉसफी को समझना होगा।
सवाल ये है कि आर्थिक सुधार के नाम पर क्यों बड़ी मछलियों को छोड़ दिया जाता है और गरीब जनता के ही मुंह से ही निवाला छीना जाता है।

क्या काला काला धन देश की गरीब जनता के पास है ?
गरीब जनता केनोट बदलने से देश का काला धन सफ़ेद हो जायेगा ?
राजनीतिक दलों को मिलना वाला कॉरपोरेट फण्ड पर सरकार खामोश क्यों है ? 
मेहनत से कमाया हुआ धन पर भी उसका अधिकार समाप्त कर सरकार ने असल लोगों के काले कारनामे को छुपा दिया है।

काला धन के इस काले कारोबार में कई सफेदपोश लोग छुपे होते हैं जिन पर हाथ डालना शायद मुश्किल है, इस लिए जनता को बेवक़ूफ़ बनाने और मुद्दों से भटकाने के लिए उन्हें लाइनों में खड़ा कर दिया गया है।

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