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कैसे-कैसे पुलाव चुनाव के अलाव में?

दो ‘अकेले’ एक-दूसरे का हाथ बँटाने एकजुट हो गये!

क़मर वहीद नक़वी
चुनाव का अलाव जल चुका है। हाथ तापे जा रहे हैं। तपाये जा रहे हैं। हम ताप रहे हैं। आप भी ताप लें। मजमा लगा है। कुछ ताप पायेंगे। बाक़ी सब तापने के भरम में कब झुलस चुके होंगे, पता भी न चलेगा! कुछ खेलेंगे, कुछ से कोई दूसरा खेलेगा! खेल का मज़ा यह है कि अकसर पता ही नहीं चलता कि खिलाड़ी कौन है? जो खेल रहा है, या जो खेलवा रहा है, या जिसे खेलाया जा रहा है, या जिसके साथ खेला जा रहा है? खिलाड़ी का मुहरा मरा या मुहरे ने ही खिलाड़ी को मार दिया, अकसर लोग बस क़यास ही लगाते रह जाते हैं। और जनता की तो बात ही मत कीजिए। वह तो शाश्वत फ़ुटबाल है,  कभी इस पैर से लात खाती, कभी उस पैर से पिटती, कभी इस टीम के गोल के जाल में अटकती, कभी उस गोल में फँसती है!
वैसे जनता अकसर सोचती है कि चुनाव के अलाव उसके लिए ही जलाये जाते हैं! कि चलो पाँच साल के ठंडे मौसम के बाद एक बार भी जो कुछ तापने को मिल जाय, वही सही! उसे ख़ुश होने का बहाना चाहिए। ठगे जा कर भी ख़ुशी महसूस होती हो, तो हो। शहर की दुकानों में डिस्काउंट सेल हो या चुनाव की मुफ़्तिया घोषणाएँ, जनता तुरन्त जेब कटा लेती है और वोट लुटा देती है। बिना यह सोचे कि वह किसकी क्या क़ीमत चुका रही है!
अटकते-लटकते आख़िर तेलंगाना का बिल पास हो ही गया! देखा आपने चुनाव के अलाव का चमत्कार! सुनते हैं, नमो जी ने अपनी पार्टी पर बहुत ज़ोर डाल रखा था कि यह मामला चुनाव से पहले निपट जाय! ताकि वह प्रधानमंत्री बनें तो यह बला उनके गले न पड़े। बीजेपी ने अपनी बला टाली और काँग्रेस ने तेलंगाना में अपने वोट पक्के किये। सीमांध्र से वैसे भी उसका पत्ता साफ़ होना था, सो उसने तेलंगाना सेक लिया! पहले लोकपाल, फिर तेलंगाना, दोनों पार्टियों ने क्या ग़ज़ब का एका दिखाया!
उधर, तमिलनाडु में अम्मा ने सुप्रीम कोर्ट के एक फ़ैसले को हाथोंहाथ लपक लिया। राजीव गाँधी के हत्यारों की फाँसी की सज़ा जैसे ही कोर्ट ने उम्र क़ैद में बदली, अगले ही दिन अम्मा की ममता हिलोरें मारने लगी। उन्होंने आनन-फ़ानन उन सभी की रिहाई का एलान कर दिया। अम्मा ने एक तीर से दो शिकार कर लिये! एक, अम्मा की वोटों वाली रोटियाँ अच्छी पक जायेंगी, दूसरे यह कि काँग्रेस और डीएमके चाहें भी तो चुनावी गठबन्धन न कर पायें। काँग्रेस रिहाई का समर्थन नहीं कर सकती और डीएमके रिहाई का विरोध नहीं कर सकती! वैसे, लोग इन्तज़ार करते रहे कि नमो जी का कोई दहाड़ता-हुँकारता बयान आयेगा इस पर। आख़िर आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई का मुद्दा था यह। उनका प्रिय विषय! लेकिन चुनाव बाद अगर नमो को अम्मा के समर्थन की ज़रूरत पड़ गयी तो? अक़्लमंद लोग कहते हैं कि हर मौक़े पर बोलना अच्छा नहीं होता!
राजीव गाँधी के हत्यारों की रिहाई के एलान के बाद अफ़ज़ल गुरू का मामला उठना ही था। उसकी दया याचिका भी राजीव के हत्यारों की तरह बरसों तक लटकी रही। काँग्रेस पर बार-बार सवाल उठते रहे कि अफ़ज़ल गुरू का मामला वह क्यों लटकाये हुए है। जैसे ही चुनाव नज़दीक़ आने को हुए, फ़ैसला हो गया, फाँसी हो गयी। काँग्रेस के ख़िलाफ़ बीजेपी का एक मुद्दा ख़त्म हो गया! अफ़ज़ल गुरू के मामले पर बीजेपी बड़ा शोर मचाती थी, लेकिन देविन्दरपाल सिंह भुल्लर के मामले पर हमेशा मिमियाती रही। क्योंकि पंजाब में उसका सहयोगी अकाली दल भुल्लर की फाँसी के ख़िलाफ़ है! अफ़ज़ल गुरू, भुल्लर और राजीव के हत्यारों पर अलग-अलग पैमाने क्यों? फिर इनकी दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति का फ़ैसला इतने दिनों तक क्यों लटका रहा? इसीलिए न कि फ़ैसला न लेने के राजनीतिक फ़ायदे या मजबूरियाँ हमेशा भारी पड़ीं!
वैसे मजबूरियाँ किसी से कुछ भी करा देती हैं! अब अन्ना हज़ारे को ही लीजिए। कभी राजनीति से बड़ा मुँह बिचकाते थे, अब ख़ुद राजनीति के प्यादे बने घूम रहे हैं! विधानसभा चुनाव के बाद केजरीवाल से डरी काँग्रेस और बीजेपी को लगा कि लोकपाल ले आओ, वरना केजरीवाल निगल जायेगा। तब अन्ना जी प्रायोजित अनशन पर बैठाये गये! लोकपाल बिल पास हो गया। अन्ना जी ने माला पहन कर ख़ुद लोकपाल का श्रेय ओढ़ लिया! लेकिन लोकपाल के बाद क्या करते? अनशन का भी कोई मुद्दा बचा नहीं था। इसलिए अब ममता बनर्जी का प्रचार करेंगे। बक़ौल अन्ना, वह बहुत सादगी से रहने वाली मुख्यमंत्री हैं, हवाई चप्पल पहनती हैं। लेकिन उनके राज्य में लोकायुक्त अब तक नहीं बना है, यह कोई ख़ास बात नहीं है! पश्चिम बंगाल में मानव अधिकार नाम की चीज़ नहीं है, मुख्यमंत्री को एक कार्टून और एक बच्ची का मासूम-सा सवाल तक बर्दाश्त नहीं होता, तृणमूल काँग्रेस के कार्यकर्ताओं की दिनदहाड़े गुंडई की दिल दहला देनेवाली ख़बरें आम हैं, लेकिन हैरानी है कि अन्ना को यह सब नहीं दिखता!
अन्ना की मजबूरी है कि अपनी पुरानी टीम के टूट जाने के बाद वह अलग-थलग पड़ गये थे। उधर, ममता भी लेफ़्ट फ़्रंट के चलते तीसरे मोर्चे की राजनीति में जगह नहीं बना पायीं। इसलिए दो ‘अकेले’ एक-दूसरे का हाथ बँटाने एकजुट हो गये!
एक थ्योरी यह भी दी जा रही है कि इस खेल के पीछे बीजेपी है। मक़सद है केजरीवाल के वोट काटना। राजनाथ सिंह कह चुके हैं कि पश्चिम बंगाल को केन्द्रीय क़र्ज़ चुकाने से कुछ बरस की छूट मिलनी चाहिए। और ममता बनर्जी भी एलान कर चुकी हैं कि बंगाल का ‘स्वर्ण युग’ आनेवाला है, क्योंकि अगली सरकार उन्हें क़र्ज़ में छूट दे सकती है। ज़ाहिर-सी बात है कि थ्योरी में कुछ दम तो दिखता है! ममता फ़िलहाल चुनाव के पहले खुल कर बीजेपी के साथ नहीं आ सकतीं, लेकिन अन्ना के साथ मिल कर केजरीवाल के जितने वोट काट लें, बीजेपी की उतनी मदद तो हो ही गयी! फिर चुनाव के बाद जो होगा, देखा जायेगा। चुनाव के अलाव में कैसे-कैसे पुलाव पकते हैं!
(लोकमत समाचार, 22 फ़रवरी 2014)

About the author

क़मर वहीद नक़वी। वरिष्ठ पत्रकार व हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता के जनक में से एक हैं। हिंदी को गढ़ने में अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सही अर्थों में कहा जाए तो आधुनिक हिंदी को अखबारों ने ही गढ़ा (यह दीगर बात है कि वही अखबार अब हिंदी की चिंदियां बिखेर रहे हैं), और यह भी उतना ही सत्य है कि हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को भाषा की तमीज़ सिखाने का काम क़मर वहीद नक़वी ने किया है। उनका दिया गया वाक्य – यह थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक – निजी टीवी पत्रकारिता का सर्वाधिक पसंदीदा नारा रहा। रविवार, चौथी दुनिया, नवभारत टाइम्स और आज तक जैसे संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे नक़वी साहब आजकल इंडिया टीवी में संपादकीय निदेशक हैं। नागपुर से प्रकाशित लोकमत समाचार में हर हफ्ते उनका साप्ताहिक कॉलम राग देश प्रकाशित होता है।

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