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कोई तुलना नहीं केजरीवाल और मोदी में

मोहम्मद ज़फर
हाल ही में फेसबुक पर मेरे एक मित्र ने मेरे केजरीवाल की स्वराज नीति और जन आंदोलनकारियों (जैसे उदयकुमार, मेधा पाटकर) को मौका देने पर और मोदी मार्का विकास विरोधी पोस्ट पर लिखा था कि “केजरीवाल और मोदी में कोई तुलना है ही नहीं” और एक मित्र ने लिखा कि केजरीवाल अपनी औकात तो देख ले पहले. दोनों ने ही इसलिए लिखा था क्योंकि वे मोदी और मोदी मार्का विकास के समर्थक हैं और संघ के लोगों जैसे देशभक्त भी हैं. एक मित्र ने केजरीवाल के बंगले के आग्रह वाले, उनके पिता पर आरोप से लेकर तमाम आरोपों को मेरे फेसबुक वाल पर शेयर तक किया जिसमें केजरीवाल के दोगले होने की बात उसने कही और कहने कुछ और करने कुछ वाले मुद्दे को उठाया.
यहाँ मैं भी ये ही कहता हूँ कि सच में केजरीवाल और मोदी में कोई तुलना नहीं हो सकती है. मेरा उस मित्र से यही सवाल रहा कि मोदी के झूठ और कहने कुछ और करने कुछ के उदाहरण तुम्हें केजरीवाल से अनगिनत मात्रा में अधिक मिल जाएंगे. इसका एक ताज़ा उदाहरण है दूरदर्शन के इंटरव्यू के बाद मोदी का कहना था कि स्वतन्त्रता होनी चाहिए मीडिया को. जबकि दंगों में मोदी सरकार की नाकामी की असली बात दिखाते ही कुछ साल पहले आई. बी. एन. 7 के ऑफिस में मोदी समर्थकों ने तोड़ फोड़ कर दी थी और दो दिन तक चैनल बंद रहा था वहाँ, आमिर खान की फना को सिर्फ इसलिए विरोध किया गया और सिनेमा घरों से उतारा गया क्योंकि आमिर ने मेधा पाटकर के पक्ष में बयान दे दिया था. तो अब ये दोगला बयान या hypocrisy  नहीं तो क्या है जो कि मोदी समर्थकों को नहीं दिखेगी. दूसरी बात चलो मान लिया कि केजरीवाल ने कहा कुछ और किया कुछ, अपनी आम आदमी की इमेज बनाकर छलावा किया लेकिन फिर भी यह ऐसा कोई अपराध नहीं था जिससे किसी जाती, धर्म विशेष या आम जन को कोई प्रत्यक्ष और घातक हानि हो. जबकि गुजरात दंगों में महकमे के बड़े बड़े अधिकारीयों का शामिल होना और मोदी सरकार की नाकामी एक खतरनाक और चिंता का मुद्दा है.

सोमनाथ भारती पर सवाल और कोडनानी पर चुप्पी  
सोमनाथ भारती पर केजरीवाल के एक्शन ना लेने का मोदी समर्थक उदाहरण दे रहे हैं पर वो उदाहरण देते समय दंगों में लिप्त माया कोडनानी को जानते हुए भी मंत्रिमंडल में रखने में मोदी से प्रश्न करना भूल जाते हैं. यही नहीं डी जी वंजारा के मुद्दे और सोहराबुद्दीन फर्ज़ी मुठभेड़ एवं कौसर बी के साथ हुए अत्याचार मामले पर भी नहीं बोलते. वैसे मैं एक की गलतियों के बदले में दूसरे के पाप गिनाने वाली बात का समर्थक नहीं हूँ लेकिन जब पूरी राजनीति ही खुद के कर्म ना देखकर दूसरों के पाप गिनाने की हो रही है तो ऐसा करने में कोई दिक्कत नहीं है. जैसे वी के सिंह ने कहा कि “दंगे किसके राज में नहीं हुए” कांग्रेस समर्थक येदयुरप्पा पर भाजपा का उदाहरण देंगे कि भ्रष्टाचार किस सरकार में नहीं है तो ऐसी स्थिति में मैं भी सोमनाथ और माया का उदाहरण दे रहा हूँ. कि सोमनाथ के बारे में न कदम उठाकर निश्चित ही केजरीवाल ने ठीक नहीं किया परन्तु इसको इंगित करने का हक़ मोदी समर्थकों को नहीं है क्योंकि वो माया कोडनानी को मंत्रिमंडल में लेने पर चुप थे और सिर्फ केजरीवाल या सोनिया गाँधी पर उंगली उठाते रहे.

आर टी आई में भूमिका
एक ने (केजरीवाल) जनता को आर टी आई जैसा हथियार दिलाने में अपने बहुमूल्य समय का भरपूर योगदान दिया और वो भी तब जब उसे किसी वोट का लालच नहीं था, ना सिर्फ आर टी आई एक्ट को पास कराने में बल्कि उसे जन जन को सिखाने में शहर शर, गाँव गाँव का दौरा भी किया. इसी जागरूकता अभियान के तहत कानपुर में 2007 में मैं केजरीवाल से मिला था. वह आर टी आई को जन जन तक पहुँचाने और उसके तरीके समझाने का कार्यक्रम था जिसका नाम था “घूस को घूसा अभियान”. अब दूसरे (नरेंद्र मोदी) की बात करें तो लोगों को ऐसे सशक्तिकरण वाले एक्ट के बारे में जागरूक करना तो दूर, आर टी आई एक्टिविस्ट तृप्ति शाह के आर टी आई का मोदी सरकार ने कोई जवाब नहीं दिया जिसमें तृप्ति ने उनकी विभिन्न महिला कार्यक्रमों में शिरकत करने के लिए हुए यात्रा खर्चों के बारे में जानकारी मांगी थी. पांच साल के बाद भी कोई जवाब ना मिला. यह लिंक देखें http://www.ndtv.com/article/india/gujarat-government-has-not-given-information-on-narendra-modi-s-travel-rti-activist-274830 

फ़ॉरेस्ट राइट एक्ट का गुजरात में हाल
केजरीवाल फ़ॉरेस्ट राइट एक्ट के समर्थकों में से एक हैं और आदिवासियों के संसाधनों को उनके काम में आने देने के पक्षधर हैं. जबकि नरेंद्र मोदी की सरकार फ़ॉरेस्ट राइट एक्ट से जुड़े मामलों को सुलझाने और उस पर ठीक से अमल कर पाने के मामले में बाकी राज्यों से अंत में है जबकि आदिवासी गुजरात की जनसंखया के 15 प्रतिशत से अधिक हैं. देखें यह लिंक http://www.thehindu.com/news/national/other-states/in-gujarat-tribal-people-get-a-raw-deal/article5873973.ece

प्राकृतिक संसाधनों पर वहाँ के लोगों और ग्रामीणों के हक की बात
केजरीवाल जिस स्वराज की बात करते हैं उसमें उनका यह भी तर्क है कि अधिक से अधिक लोगों की  अपने गांवों के संसाधनों के बारे में निर्णय लेने में भागीदारी हो और प्राकृतिक संसाधनों पर समुदाय और ग्रामीणों का हक़ हो तथा उसके व्यावसायिक निर्णय भी लोग ही मिल कर लें जबकि मोदी ने इसके उल्ट अदानी, अम्बानी, फोर्ड, टाटा जैसे बड़े बड़े उद्योगिक समूहों को किसानों कि ज़मीने सस्ते दामों पर दी हैं (सी ए जी की रिपोर्ट में यह देखा जा सकता है नेट पर). असली सशक्तीकरण क्या होगा? लोगों का अपने आस पास के प्राकृतिक संसाधनों के बारे में मिलकर व्यावसायिक निर्णय लेना या उद्योगपतियों का उन पर कब्जा हो जाना. छत्तीसगढ़ में आदिवासी भी ऐसी ही लड़ाई लड़ रहे हैं कि जल जंगल और ज़मीन पे उनका हक हो.
चलो मान लेते हैं कि वे (केजरीवाल) सिर्फ बड़ी बड़ी बातें कर रहे हैं पर सवाल ये है कि मोदी और राहुल ने तो ऐसी बातें और वायदे भी नहीं किये कभी जिनसे लोग और समुदाय खुद सशक्त हों और लोकतंत्र में सक्रिय भागिदार बनें. केजरीवाल पारदर्शिता और सरकारी कामों में लोगों के प्रति जवाबदेही की बात करते हैं. यही नहीं लोगों को सरकारी कामों और विभागों के प्रति जागरूक करने में भी परिवर्तन संस्था ने दिल्ली में काम पहले ही कर के दिखाया है. लोगों को विभिन्न सरकारी दस्तावेजों की जानकारी हो और सरकारी अधिकारी नौकरशाह और अफसरशाही न दिखा सकें इसकी बात भी केजरीवाल ने “स्वराज” में की है. अब अगर कोई कहे कि स्वराज अजय पाल नागर की किताब है तो एक बार संजीव सबलोक का ब्लॉग देख लें नेट पर जिससे अजय पाल नगर के दावे संदेह में आ जाते हैं. खैर जो भी हो अंत में एक बार और कि जिन सामाजिक कार्यकर्ताओं और जन आंदोलनों के सिपाहियों को कांग्रेस और बी जे पी विघटनकारी, माओवादी और जाने क्या क्या कहते थे उन्हें आम आदमी पार्टी ने अपने पार्टी-टिकट से खड़ा कराने का साहस किया (जैसे सोनी सोरी, मेधा पाटकर, उदयकुमार) जो कि लोगों के असली लोकतंत्र की बात करने को कर के दिखाने का ही उदाहरण है.
अंत में यही कहूँगा कि मैं केजरीवाल का कोई बड़ा भक्त नहीं हूँ पर (मोदी और उनकी नीतियों का विरोधी ज़रूर हूँ) और जिस तरह की लोगों और समुदायों को स्वयं में सशक्त करने की राजनीति की वे (अरविन्द) बात करते हैं (कम से कम बात तो करते हैं जो कि मोदी और राहुल ने कभी नहीं की है, सिवाय खुद को नेता और जनता को भिक्षु समान ये दिलाने वो दिलाने का दावा करने के) अगर वैसा तरीका सच में लोकतंत्र में कोई सरकार भविष्य में लाती हैं तो अपने आप में एक बड़ी बात होगी और शायद सच्चे लोकतंत्र (जिसका गाँधी के स्वराज और भगत सिंह का मजदूरों और किसानों को सशक्त करने कि बात करना उदाहरण हैं) की तरफ एक कदम होगा.
Mohammad Zafar, Junior resource person at Azim Premji foundation of learning and development, uttarkashi

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