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कोई भी बदलाव इस कारपोरेट मीडिया को खंड-खंड तोड़े बिना असंभव है

चूंकि नरसंहार का सच नहीं जानते,  झूठ के खिलाफ खड़े नहीं हो सकते हम
कोई भी बदलाव इस कारपोरेट मीडिया को खंड-खंड तोड़े बिना असंभव है।
कोई राजनीतिक आर्थिक या सामाजिक परिवर्तन असंभव है, जब तक न हम बाजार और आभिजात तबकों के तमाम माध्यमों और सौंदर्यबोध से तामीर इस कारपोरेट केसरिया मीडिया साम्राज्य की धज्जियां न बिखेर दें।
जॉन पिल्गर का कहना है-

मेरा मानना है कि पांचवा स्तंभ संभव है,  जनआंदोलन के सहयोगी कारपोरेट मीडिया को खंड-खंड करेंगे,  जवाब देंगे तथा रास्ता दिखाएंगे। प्रत्येक विश्‍वविद्यालयों में,  मीडिया अध्ययन के हरेक कॉलेजों में,  हर समाचार कक्षों  में,  पत्रकारिता के शिक्षकों,  खुद पत्रकारों को वाहियात वस्तुनिष्ठता के नाम पर जारी खून ख़राबे के दौर में अपनी निभाई जा रही भूमिका के बारे में प्रश्‍न करने की ज़रूरत है। खुद मीडिया में इस तरह का आंदोलन एक  पेरोस्त्रोइका (खुलापन) का अग्रदूत होगा, जिसके बारे में हम कुछ नहीं जानते। यह सब संभव है। चुप्पियां तोड़ी जा सकती हैं।

हम हैरान हैं जनआंदोलनोंके साथियों, सामाजिक पर्यावरण कार्यकर्ताओं और वैकल्पिक जनपक्षधर राजनीति,  बहुजन बहुसंख्य समाज के जनपक्षधर साथियों के तटस्थ रवैये पर जो या तो कारपरेट मीडिया को सिरे से नजरअंदाज करते हैं या फिर उसी में नख से शिख तक निष्णात हैं और हमारी बार-बार की अपील को अनसुना करके वैकल्पिक मीडिया की लड़ाई को हाशिये पर डालकर दरअसल जनसुनवाई को ही खारिज कर रहे हैं और उन्हें यह बात समझ में नहीं आती कि क्यों झूठ के महातिलिस्म को तोड़े बिना सच का बोलबाला असंभव है। उनके लिए यह आलेख। ……जारी….आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें…..

अपने साथी रियाज उल हक बहुत खामोशी से बहुत महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। सृजन का मायने हमारे लिए बहुत अलग है। हमारे प्रतिमान अलग हैं। हम नहीं मानते कि कल उदय प्रकाश को नोबेल मिल जाये तो वे प्रेमचंद और मुक्तिबोध से बड़े हो जायेंगे। हम नहीं मानते कि अंबेडकर और गांधी, लोहिया और न जाने कितनों को नोबेल नहीं मिला, तो वे नोबेल पाने वाले कैलाश सत्यार्थी के आगे बौने हैं। हम यह भी नहीं मानते कि प्रूफ रीडर मुक्तबोध से हर संपादक का कद बड़ा है। हम आस्कर पाने वाले सत्यजीत राय के माध्यम और सरोकार और उनकी फिल्मों को इस जमीन से जुड़ी चीजें नहीं मानते और न पथेर पांचाली को सर्वश्रेष्ठ रचाना मानते है। विभूति बाबू के ही उपन्यास आरण्यक को हम अब तक के सबसे आधुनिक उपन्यास मानते हैं। हम इस पूरे महादेश में अख्तरुज्जमान इलियस, मुक्तिबोध, प्रेमचंद, माणिक बंद्योपादध्याय के होने के बावजूद किन्हीं नवारुण भट्टाचार्य के हर्बट, फैताड़ु और कंगाल मालसाट को हमारे समय का प्रतिरोध मानते हैं। हम नहीं मानते कि साहित्य सिर्फ वही रच रहे हैं, जिन पर प्रकाशकों,  पाठ्यक्रम, संपादकों और आलोचकों की कृपा है।
रियाज भाई जो काम कर रहे हैं, वह किसी सृजनकर्म से कम नहीं है।
अरुंधति हो या आनंद तेलतुंबड़े, दुनिया भर का सारा महत्वपूर्ण लिखा रियाजुल हक बेहतरीन भाषा और अनुवाद के जरिये हाशिये पर सजा रहे हैं। यह खजाना इतना बड़ा है कि हम लूटते रहते हैं रोजाना, फिर भी खाली होताइच नहीं है।
साथियों, गोपनीयता के सरकारी पाठ के साथ जो कथित निष्पक्ष,  धर्मनिरपेक्ष,  आधिकारिक जनविरोधी युद्धक मिसाइलें हम सूचनाओं और खबरों के नाम पर कारपोरेट मीडिया मार्फत वर्ग वर्ण नस्ली हेजेमनी फासिस्ट राज्यतंत्र की सेहत के नाम रोजाना साझा करते हैं, प्रसारित करते हैं, उसके तिलिस्म को कृपया समझिये कि कैसे हम अपने स्वजनों के खून की नदियों में नहा रहे हैं, पल छिन-पल छिन।
कोई भी बदलाव इस कारपोरेट मीडिया को खंड-खंड तोड़े बिना असंभव है। कोई राजनीतिक आर्थिक या सामाजिक परिवर्तन असंभव है, जब तक न हम बाजार और आभिजात तबकों के तमाम माध्यमों और सौंदर्यबोध से तामीर इस कारपोरेट केसरिया मीडिया साम्राज्य की धज्जियां न बिखेर दें।
जॉन पिल्गर को पढ़ना इसलिए अनिवार्य है, क्योंकि वियतनाम, इराक, अफगानिस्तान, लातिन अमेरिका और अफ्रीका के साथ साथ दक्षिण एशिया के वधस्थल पर कारपोरेट युद्ध और कारपोरेट सिविल वार में जो करोड़ों लोग मारे गये, मारे जा रहे हैं, उनके जीने मरने का खेल यह कारपोरेट मीडिया के अनंत झूठ और आभिजात भाषा और सौंदर्यशास्त्र और फरेबी विचारधाराओं के फासीवाद के बिना असंभव है, यह समझना भारत में जनता और जनतंत्र के लिए सबसे बड़ा सच है।
क्योंकि हम नहीं जानते कि भोपाल गैस त्रासदी में मारे गये लोग कौन हैं और उस रासायनिक प्रयोग का सच क्या है।
क्योंकि हम नहीं जानते कि जो राम के नाम नरसंहार का अनंत केसरिया सिलसिला है और बजरंगियों के शत प्रतिशत हिंदू साम्राज्यवादी जिहादी अश्वमेध है, कहां-कहां, कैसे-कैसे लोग उसके शिकार बनाये जा रहे हैं।
क्योंकि हम नही जानते कि इस देश के कोने-कोने में जो दलित आदिवासी स्त्रियों का आखेट किया जाता है या उन्हें जो मांस के दरिया में झोंका जाता है, सत्ता समीकरण का ताना बाना वहां कितने गहरे पैठे हैं।
क्योंकि हम आज भी नहीं जानते कि सिखों के नरसंहार में मारे गये लोग कौन थे। कितने लोग मारे गये स्वर्ण मंदिर में आपरेशन ब्लू स्टार में और जो आतंकवादी कहकर मार गिराये गये, वे सचमुच आतंकवादी थे या नहीं। हम सचमुच नहीं जानते कि देश के कोने-कोने में सिखों को जिंदा जलाने वाले कौन लोग थे और कारपोरेट मीडिया ने उन्हें कभी बेनकाब नहीं किया।
हम कश्मीर घाटी में रोज-रोज क्या हो रहा है, नहीं जानते और हर कश्मीरी को भारत विरोधी मानते हैं और सेना के हर जुल्मो सितम को, आफसा को कश्मीर को भारत में बनाये रखने की अनिवार्य शर्त मानते हैं। हम कश्मीर के दिलोदिमाग को कहीं स्पर्श नहीं करते क्योंकि देशभक्ति के अखंड जाप में खश्मीर के बारे में लिखना पढ़ना अब राष्ट्रद्रोह है और मारे जाने वाले बेगुनाह कश्मीर के मुखातिब होने की हिम्मत किसी भारतीय नागरिक की है ही नहीं। हम नहीं जानते कि कश्मीर में कितने बेगुनाह मारे गये और कितने गुनाहगार।
हम नहीं जानते कि सलवा जुड़ुम कितना भारतमाता के खजाना लूटने के लिए है और कितना अमन चैन के लिए। हम नहीं जानते कि जो रोज-रोज माओवादी लेवल के साथ मारे जाते हैं वे कितने भारतीय हैं, कितने आदिवासी हैं और कितने माओवादी और कितने कारपोरेट बेदखली के शिकार।
हम देश भर के आदिवासी भूगोल में रोज मारे जाने वालों के आंकड़े नहीं जानते। नहीं जानते कि चांदमारी के सलवा जुड़ुम में रोज या अबतक कितने आदिवासी स्त्री पुरुष और बच्चे बेमौत मार दिये गये।
इसी तरह पूर्वोत्तर में आफसा भूगोल का सच हम नहीं जानते और राजधानी में शत्रु अनार्य नस्ल के पूर्वोत्तर के लोगों को पीट-पीटकर मारते हुए भी हम सभ्य और आजाद धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील हैं।
गुजरात का सच हम जान रहे होते तो कोई महाजिन्न का देश बेचो ब्रिगेड इतना निरंकुश नहीं है। अंबानी और अडानी का गुलाम इस महाजिन्न का जनसंहारी राजकाज बजरिये मीडिया है, इसे भी समझने से हम इंकार कर रहे हैं।
हम गायपट्टी हो या केसरिया मध्यभारत, शतरंजी बिहार या लाल नील हरा बंगाल, कहीं भी किसी भी नरसंहार का सच नहीं जानते।
हम आतंकवादी हमलों का सच नहीं जानते।
हम आपदाओं का सच नहीं जानते।
हम आपदाओं में मारे गये जनपदों का भूगोल नहीं जानते।
हम न जानते हैं हिमालय या समुंदर, न सुंदर वन और न हम जानते हैं अपने देस के महाश्मशान खेतखलिहानों और कल कारखानों, चायबागानों का सच।
हम रक्षा सौदों और घोटालों का सच नहीं जानते और हम कभी नहीं जान पायेंगे कि कितने महामहिमों के चरण चिन्ह है काजल की कोठरियों में।
हम सिर्फ बचाये जा रहे बेनकाब चेहरे देख रहे हैं, नकाबों के पीछे जो चेहरे हैं, जिन्हें बचाने के लिए बेनकाब और नंगों को बचाने की कवायद यह है, उसका सच हम कभी नहीं जान सकते।
हम फर्जी मुठभेड़ों, फर्जी मुकदमों और राजद्रोह के तमाम किस्सों में यकीन करने वाले बजरंगी है और सच छुपाना हमारी सनातन वैदिकी संस्कृति है।
पलाश विश्वास

mroz Rabbhi Khan

15 hrs · Edited ·

सरकार से निराश सपा समर्थको का कहना है नेता जी सत्ता अपने हाथ में ले वरना लुटिया डूब जएगी लेकिन अगर अन्दर की बात की जाए तो अखिलेश को अपने मंत्रियो के खिलाफ सख्त कार्यवाही से मना करने वाले नेता जी खुद है
मुख्यमंत्री के न चाहने के बावुजूद संजय सेठ को तरजीह देने वाले नेता जी खुद है …………..
नेता जी प्रदेश के सुपर सीएम बने हुए है ऐसे में सारा दोष पिता मोह में फसे अखिलेश पे देना सही नहीं है ,नेता स्याम भी सवालो के घेरे में है .

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