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क्या आजादी के साथ भारत के मुसलमान अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?

क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसरमिल सकते हैं?
पलाश विश्वास
उत्तर प्रदेश में निर्णायक चुनाव से पहले इस दौर में जिन पांच राज्यों बंगाल,  तमिलनाडु, असम, केरल और पुडुचेरी में चुनाव हो रहे हैं, उन सभी में मुसलमान मतदाता कम से कम कुल मतदाताओं की एक चौथाई हैं। इनमें से सबसे ज्यादा असम में चौतीस फीसद वोटर मुसलमान हैं।
कश्मीर और लक्षद्वीप के बाद भारत में कहीं भी मुसलमान वोटर असम में सबसे ज्यादा हैं तो बंगाल, केरल और तमिलनाडु के चुनावों में भी मुसलमान वोटरों के वोटों से सत्ता के खेल में बाजी उलट पुलट हो सकती है।

क्या भारत के मुसलमान आजादी के साथ अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं?
क्या अल्पसंख्यक समस्त समुदायों को उनकी आबादी के मुताबिक लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत प्रतिनिधित्व और समान अवसर मिल सकते हैं?
इस सवाल के जवाब में हां या न कहने की कोई जरूरत नहीं है। 1952 से लेकर अब तक विधानसभाओं और संसदीय चुनावों के नतीजे देख लीजिये।

इसी संसदीय प्रणाली में हिंदुत्व की राजनीति का भ्रूण है और धार्मिक ध्रुवीकरण के धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद की जड़ें भी वहीं हैं।
चूंकि बहुसंख्य का जनमत इतना निर्णायक है कि अल्पसंख्यकों का मतामत निमित्तमात्र है तो अल्पसंख्यक भी बहुमत के साथ सत्ता में भागेदारी की राजनीति के तहत अपने हक हकूक की लड़ाई लड़ने का इकलौता विकल्प चुनने को मजबूर है।
यह मुसलमानों की ही नहीं, सिखों, ईसाइयों,  बौद्धों से लेकर अछूतों और पिछड़ों की राजनीतिक मजबूरी है और इसीलिए मजहबी और जाति पहचान के तहत सारे समुदाय अलग-अलग गोलबंद हो रहे हैं। इसीलिए सियासत अब मजहबी है और इसी वजह से निरंतर मंडल कमंडल गृहयुद्ध है।
इसीलिए जाति उन्मूलन और धर्म निरपेक्षता पर लगातार लगातार विमर्श और आंदोलन के बावजूद हो उलट रहा है और वह इतना भयानक है कि राष्ट्रवाद अब मुकम्मल धर्मोन्माद है और जाति सत्ता की चाबी है।
स्वतंत्र मताधिकार चुनाव नतीजों में आता कही नहीं है।
आता तो जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व तय हो जाता।
अल्पसंख्यकों का वजूद ही सत्ता के रवैये पर निर्भर है।
इसीलिए धर्मोन्माद और जातिवाद के कैदगाह से मुक्ति का कोई रास्ता नजर नहीं आता है। क्योंकि सत्ता वर्ग के पास धर्मोन्माद और जातिवाद के तहत सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम कऱने का इकलौता विकल्प है और सत्ता पलट का जो ख्वाब देखते हैं, उनके पास भी कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
यही वजहहै कि सामाजिक आंदोलन में किसीकी कोई दिलचस्पी है ही नहीं और न हो सकती है और हर किसीकी कोशिश अंततः यही होती है कि सत्ता की राजनीति से नत्थी होकर अपने लिए और हद से हद अपने कुनबे के लिए अवसरों और संसाधनों का ज्यादा से ज्यादा हिस्सा बटोर लिया जाये। तमाम क्रांतियों और भ्रांतियों,  जनांदोलनों, प्रतिरोध और मसीहाई का अंतिम लक्ष्य यही है।
अब इस गुत्थी पर बहस करने के लिए भी किसी की कोई दिलचस्पी नहीं है क्योंकि मौजूदा सियासत शार्ट कट है कामयाबी का। सिर्फ अपने माफिक समीकरण भिड़ा लें।
मसलन अगर हमारे पास पूंजी नहीं है। आजीविका नहीं है और न रोजगार है। मसलन हमारा चरित्र अगर समाजविरोधी धर्मविरोधी घनघोर अनैतिक है और हम राजनीतिक विकल्प चुनते हैं और उसमें कामयाबी भी मिलती है तो हमारे लिए न सिर्फ सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा है, बल्कि तमाम अवसर और संसाधन हमारे हैं और हम सीधे अरबपतियों और करोड़पतियों की जमात में है।
ये तमाम अवसर जाति और मजहब के नाम, भाषा और क्षेत्र के नाम वोटरों की गोलबंदी या वोटबैंक से संभव है। लोग वही कर रहे हैं। सामाजिक आंदोलन में जो त्याग, समर्पण और प्रतिबद्धता की जरुरत है, जो बदलाव का जुनून चाहिए, वह जिंदगी को बेहद मुश्किल बना देती है और उसके नतीजे व्यक्ति और परिवार के लिए बेहद घातक हो सकते हैं।

सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सामाजिक आंदोलन के लिए अनिवार्य जन समर्थन जुटाना भी मुश्किल है।
सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में पूंजी अबाध है और सारा तंत्र ग्लोबल है, जिसका मुकाबला स्थानिक तौर तरीकों से करना असंभव है।
सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में जनमत बनाने की कोई राह नहीं है। अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ उस हद तक है, सहिष्णुता की बाड़ेबंदी सिर्फ उस हद तक है, जहां तक आप रंगभेदी मनुस्मृति बंदोबस्त की जमींदारियों और रियासतों को चुनौती नहीं देते।
व्यवस्था चूंकि राष्ट्र से जुड़ी है और राष्ट्र चूंकि विश्व व्यवस्था का उपनिवेश है और कानून का राज कहीं नहीं है तो संविधान के प्रावधान लागू होते ही नहीं है और भिन्नमत के विरुद्ध डिजिटल निगरानी, तकनीकी नियंत्रण और सैन्य दमन तंत्र है तो आप व्यवस्था परिवर्तन के लिए संवाद भी नहीं कर सकते, आंदोलन तो दूर की कौड़ी है।
सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में वंचितों,  पीड़ितों,  बहिष्कृतों और मारे जाने को नियतिबद्ध बहुसंख्य जनगण भी जाति और धर्म के तिलिस्म में कैद है और हर नागरिक के लिए अलहदा अलहदा चक्रव्यूह है। जिससे बच निकलने के लिए या जिसे तोड़ने का कोई मंत्र हमने सीखा नहीं है और हमारे सारे मंत्र ओ3म स्वाहा के समर्पण का स्थाईभाव है।
तो बचाव का रास्ता आम लोगों के लिए बहुत सरल है कि जीतने वालों का साथ दो और उनसे मौकों की उम्मीद करो और अच्छे दिनों की उम्मीद में जैसे तैसे चादर खींचखांचकर टल्लीदार चिथड़ा चिथड़ा जिंदगी जीने का विकल्प चुन लो।
चुनावों में यही होता है कि जो बदलाव कर सकते हैं, जैसे मुसलमान, जैसे सिख, जैसे आदिवासी, जैसे पिछड़े,  जैसे रंगबिरंगे शरणार्थी, जैसे जल जंगल जमीन से बेदखल लोग, जैसे दलित वे सारे के सारे अलग-अलग मोबाइल वोटबैंक है और वे जीतने वाली पार्टी का दमन पकड़कर किसी तरह नागरिक और मानवाधिकार के बिना जी लेने का समझौता कर लेने को मजबूर है।
यानी बालिग मताधिकार का वास्तव में इस्तेमाल हो ही नहीं सकता। होता तो हम भारतीय आजाद नागरिक चोरों, डकैतों, भ्रष्टों, हत्यारों, बलात्कारियों, गुंडों वगैरह-वगैरह को चुन नहीं रहे होते और वे ही लोग मंत्री से संतरी तक के पदों पर काबिज नहीं हो रहे होते। बाहुबलियों और धनपशुओं के हाथों लोकतंत्र, देश और समूचा कायनात बिक नहीं रहा होता।
सबसे मुश्किल बात तो यह है कि मौजूदा व्यवस्था के दायरे में सारे माध्यम, सारी विधायें और यहां तक कि सारे लोकरंग राजनीति से नत्थी है और एकाधिकार राजनीतिक हितों के खिलाफ जनता के पक्ष में,  पीड़ितों,  उत्पीड़ितों,  वंचितों,  गरीबों,  मेहनतकशों के पक्ष में, बच्चों और स्त्रियों के पक्ष में कुछ भी नहीं है और ये तमाम सामाजिक वर्ग और शक्तियां निःशस्त्र असहाय है और राष्ट्र, व्यवस्था और निरंकुश सत्ता की मार से बचने के लिए संरक्षक माई बाप मसीहा राजनेताओं का पक्ष चुनने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं है।
भारतीय संविधान में स्वतंत्र बालिग मताधिकार का प्रावधान है। दरअसल आजादी से पहले गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट 1919 और 1935 के  सिखों के स्वतंत्र मातधिकार समेत विभिन्न प्रावधानों के तहत संसदीय प्रणाली के तहत जनप्रतिनिधित्व की मौजूदा प्रणाली की नींव पड़ी। इससे पहले इंग्लैंड में समस्त बालिग नागरिकों को मताधिकार दे दिया गया। बाबासाहेब अंबेडकर ने अछूतों के लिए स्वतंत्र माताधिकार मांगे तो पुणे करार के तहत इस मांग का पटाक्षेप हो गया और नतीजतन भारतीय संविधान के तहत बाद में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के और फिर मंडल आयोग के मार्फत पिछड़ों को भी आरक्षण दे दिया गया।
गौरतलब है कि बालिग मताधिकार ने सभी नागरिकों को समानता और न्याय के लिए लोकतांत्रिक प्रणाली का विकल्प दिया और इसीके नतीजतन गवर्नमेंट आफ इंडिया एक्ट भारत में लागू होने से पहले अस्पृश्यता के तहत हजारों सालों से बहुसंख्य शूद्रों और अछूतों को मनुस्मृति अनुशासन के तहत हिंदुत्व की पहचान से जो वंचित रखा गया, उसे भारत के हिंदू नेताओं ने हिंदू समाज के लिए घातक माना और इसी के तहत हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे गांधीजी ने भी हिंदू समाज की बंटवारे की आशंका से अछूतों के लिए स्वतंत्र मताधिकार की मांग को खारिज कर दिया।
जाहिर है कि शूद्रों और अछूतों को पहली बार हिंदू समाज का अंग मान लिया गया क्योंकि इस्लामी राष्ट्रीयता का मुकाबला विशुद्ध हिंदुत्व के जरिये करना असंभव था। अगर अछूत और शूद्र हिंदू नहीं माने जाते तो सवर्ण हिंदू समाज मुसलमानों के मुकाबले अल्पसंख्यक ही होता और तब स्वतंत्र मताधिकार के तहत सत्ता पर सवर्णों का कोई दावा ही नहीं बनता।
बालिग मताधिकार का मुकाबला करने के लिए इस्लामी राष्ट्रीयता के मुकाबले विशुद्धतावादी ब्राहमणवादी हिंदुत्व ने अछूतों समेत तमाम शूद्रों को लेकर व्यापक हिंदू समाज की रचना करके हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना की, जिसमें बाद में आदिवासियों के हिंदूकरण का एजंडा भी शामिल हो गया और बिना मांगे आदिवासियों को आरक्षण दे दिया गया।
इसका नतीजा निरंकुश हिंदुत्व करण और हिंदू राष्ट्र है और आज देश के हालात, ये धर्मोन्मादी घृणा और हिंसा का माहौल, यह मुक्तबाजार, मंडल कमंडल गृहयुद्ध वगैरह वगैरह हैं।
इन सबको बदलने के लिए एक ही विकल्प समाजिक आंदोलन का है और हालात दिनोंदिन बिगड़ इसीलिए रहे हैं कि हमारे पास फिलहाल कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है। गिरोहबंद धर्मोन्मादी और अस्मितावादी राजनीति में हम लोकतंत्र का उत्सव मना रहे हैं। जिससे हम नर्क ही जी रहे हैं या जीवित सशरीर स्वर्गवास कर रहे हैं।

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