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क्या कानून से ऊपर हैं सहारा प्रमुख ?

जाहिद खान
निवेशकों के चौबीस हजार करोड़ रुपए नहीं लौटाने के एक मामले में सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय को आखिरकार अदालत के सामने हाजिर होना ही पड़ा है। हाल ही में लखनऊ पुलिस के सामने उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। सुप्रीम कोर्ट से गैरजमानती वारंट जारी होने के बाद इससे बचने के लिए उनके पास कोई चारा भी नहीं था। बहरहाल अब राय को सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश किया जाएगा, जहां अदालत फैसला करेगी कि उनके खिलाफ आगे क्या कार्यवाही की जाए ? सहारा समूह के मालिक सुब्रत राय के खिलाफ अदालत का यह कड़ा रुख यूं ही नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे तमाम अदालती आदेशों की लगातार नाफरमानी है। जब पानी सिर से ऊपर हो गया, तब जाकर सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह के प्रति कड़ा रुख अख्तियार किया और उन्हें यह अहसास कराया कि कानून से ऊपर कोई नहीं है। कानून की नजर में सब बराबर हैं। कोई कानून से सिर्फ इसलिए नहीं बच सकता कि वह ऊंचे रसूख वाला है।
                गौरतलब है कि साल 2008 में सहारा समूह की दो कंपनियों-सहारा इंडिया रियल एस्टेट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एसआईईसीएल) और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचएसआईसीएल) ने देश में बिना डिबेंचर जारी कर तीन करोड़ निवेशकों से चौबीस हजार करोड़ रूपए की एक बड़ी रकम जुटाई थी। सबसे बड़ी बात कंपनी ने जब यह पैसा इकट्ठा किया, उस वक्त दोनों ही कंपनियां शेयर मार्केट में लिस्टेड नहीं थीं। दिसंबर, 2009 में प्रोफेशनल ग्रुप फॉर इन्वेस्टर प्रॉटेक्शन की ओर से सहारा ग्रुप के खिलाफ शिकायत मिली, जिसमें उसने एसआईआरईसीएल और एचएसआईसीएल के धन जुटाने में गैरकानूनी तरीके अपनाने का इल्जाम लगाया। आगे चलकर जनवरी, 2010 में पूंजी बाजार नियामक सेबी को इसी तरह की एक और शिकायत छोटे से निवेशक रोशन लाल से मिली। इसी शिकायत के आधार पर सेबी ने सहारा समूह की इन कंपनियों द्वारा निवेशकों से इकट्ठा 24,000 करोड़ रूपए से अधिक राशि के मामले में जांच शुरू की। जांच में सेबी को कई गड़बडि़यां मिलीं। मसलन सहारा समूह ने इतनी बड़ी रकम रजिस्ट्रार आफ कंपनीज के पास दाखिल आरएचपी (रेड हेरिंग प्रास्पेक्टस) पेश करने के बाद ओएफसीडी के जरिए जुटाई। जबकि नियमों के मुताबिक पचास या इससे अधिक निवेशकों से किसी भी तरह की प्रतिभूति जारी कर धन जुटाने के लिए सेबी की इजाजत जरूरी होती है। इस मामले में तो निवेशकों की संख्या करोड़ों में हैं। यानी गड़बडि़यां पहली ही नजर में साफ दिखलाई दे रही हैं। बहरहाल इन गड़बडि़यों के खिलाफ सेबी ने तुरंत कदम उठाते हुए, इन दोनों कंपनियों को शेयरों में पूर्ण परिवर्तनीय विकल्प वाले डिबेंचर (ओएफसीडी) के जरिए रकम जुटाने पर पाबंदी लगा दी।
सेबी की इस कार्यवाही के खिलाफ सहारा समूह दिसंबर, 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंच गया। जहां अदालत ने सेबी के आदेश पर स्थगन दे दिया। सहारा को अदालत से स्थगन मिलने के बाद सेबी चुपचाप नहीं बैठी और उसने अखबारों में एक विज्ञापन देकर निवेशकों को सावधानी बरतने को कहा। इसके बाद तो सेबी और सहारा के बीच एक अदालत से दूसरी अदालत में जाने का खेल शुरू हो गया। जून, 2011 में सेबी ने सहारा ग्रुप की दोनों कंपनियों को निवेशकों को पैसा लौटाने का आदेश दिया। इस आदेश के खिलाफ सहारा समूह ने एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। बहरहाल पूरे मामले की सुनवाई करते हुए अगस्त, 2012 में अदालत ने सेबी के हक में फैसला सुनाया और दोनों कंपनियों को सेबी के पास चौबीस हजार करोड़ रुपये जमा करने का निर्देश दिया, ताकि निवेशकों को पैसा वापस किया जा सके। लेकिन सहारा समूह इस निर्देश को भी टालता रहा।
                निर्देश पर कोई अमल होता ना देख दिसंबर, 2012 में एक बार फिर अदालत ने इन कंपनियों को निवेशकों की 24,000 करोड़ रुपए की रकम ब्याज सहित लौटाने के लिए नौ हफ्ते का समय दिया। बहरहाल इसके लिए कंपनी को अग्रिम 5,120 करोड़ रुपए का भुगतान करना था, जिसमें शेष राशि सेबी के पास दो किस्तों में फरवरी, 2013 के शुरू में जमा कराई जानी थी। 10,000 करोड़ रुपए की पहली किस्त जनवरी, 2013 के पहले हफ्ते व शेष राशि फरवरी 2013 के पहले हफ्ते में दी जानी थी। लेकिन सहारा समूह, सेबी के पास सिर्फ 5,120 करोड़ रुपए का ही ड्राफ्ट जमा करा पाया। बकाया राशि का भुगतान अभी भी बाकी है। यही वजह है कि अदालत ने अपने एक अन्य आदेश में भारतीय प्रतिभूति व विनिमय बोर्ड नियामक (सेबी) को इन दोनों कंपनियों के खातों को जब्त करने और उनकी संपत्ति कुर्क करने की भी इजाजत दे दी। अदालत ने अपने फैसले में उस वक्त यह भी कहा था कि यदि ये कंपनियां इस राशि का भुगतान करने में विफल रहती हैं तो सेबी उनकी संपत्ति कुर्क और बैंक खातों को फ्रीज कर सकता है।
इन साफ-साफ आदेशों और निर्देशों के बाद भी सहारा समूह लगातार अदालती आदेशों की नाफरमानी करता रहा। हर आदेश के बाद वह अदालत में किसी न किसी प्रकार के स्थगन की अर्जी लगा देता, जिससे कि मामला कुछ समय के लिए टल जाए। यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय ने आखिर में सहारा समूह से साफ कह दिया कि वह अब इस कार्यवाही पर उसकी किसी भी प्रकार की स्थगन की अर्जी मंजूर नहीं करेगा। अपने आखिरी आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने सहारा प्रमुख सुब्रत राय और उनके तीन निदेशकों को अदालत में पेश होने को कहा था। लेकिन सुब्रत राय ने शीर्ष अदालत के आदेश का अनुपालन नहीं कर अदालत की एक बार फिर अवज्ञा की। आगे की कहानी अब सबको मालूम है। अदालत को उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी करना पड़ा, तब जाकर वे अदालत में हाजिर हुए।
इल्जाम साफ-साफ साबित होने के बाद भी सहारा समूह अपने आपको लगातार बेकसूरवार बतलाता रहा है। अपने बचाव में सहारा समूह यह दलील देता रहा है कि योजनाओं में कुछ गलत नहीं हुआ और उसने सभी नियमों का सही तरीके से पालन किया है। जबकि, जांच करने पर सेबी को इन दोंनो योजनाओं में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े के सबूत मिले थे। सेबी ने सहारा समूह से मिली सूचना के आधार पर जब इक्कीस हजार निवेशकों से संपर्क किया, तो इसमें से सिर्फ एक हजार ने ही जवाब दिया। यही नहीं सेबी ने जवाब देने वाले एक हजार निवेशकों में से जब चार सौ निवेशकों की गहन रूप से छानबीन की तो उसमे से सिर्फ बारह लोग ही सहारा इंडिया रियल इस्टेट कॉर्पोरेशन और सहारा इंडिया हाउसिंग इंवेस्टमेन्ट कॉर्पोरेशन में निवेश करने वाले निकले। नियामक को शक है कि सहारा ने उसे फर्जी निवेशकों के दस्तावेज सौंपे हैं। निवेशकों की सूची में करीब निन्यानबे फीसद नाम ऐसे हैं, जिनका अता-पता सेबी नहीं लगा पा रहा है। जब यह सारी बात सेबी ने अदालत को बतलाई, तो अदालत ने सेबी से कहा कि उसे ओएफसीडी के निवेशकों को ढूंढने की कोई जरूरत नहीं है। निवेशक न मिलने पर भी सेबी को ओएफसीडी डिपॉजिट जब्त करने का अधिकार है। वह अपनी कार्यवाही जारी रखे।
कुल मिलाकर निवेशकों को पैसा लौटाने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद भी बीते दो साल से सहारा समूह अदालत और निवेशकों दोनों को गुमराह कर रहा है। मीडिया में लगातार विज्ञापनों के जरिए वह यह बात साबित करने की कोशिश कर रहा है कि सेबी और अदालत उसके खिलाफ पूर्वाग्रह से कार्यवाही कर रही हैं। हद तो तब हो गई जब सुप्रीम कोर्ट के गैर जमानती वारंट के बाद भी देश के तमाम अखबारों में पूरे पेज के विज्ञापन प्रकाशित हुए और उसमें एक बार फिर अपनी बेगुनाही का रोना रोया गया। विज्ञापन की भाषा कुछ ऐसी थी कि सहारा प्रमुख के साथ सुप्रीम कोर्ट नाइंसाफी कर रही है। एक लिहाज से देखें, तो यह हमारी न्यायपालिका और उसके न्याय दोनों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश है। सहारा समूह की नजर में हमारे संविधान और कानून का कोई एहतराम नहीं। यदि उसकी नजर में कानून की इज्जत होती, तो वह अदालत में मामला विचाराधीन होने के बाद, मीडिया में गलतबयानी पर गलतबयानी नहीं करता।

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जाहिद खान, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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