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क्या डाइवर्सिटीका मुद्दा भाजपा के घोषणापत्र में बरक़रार रहेगा!

एच एल दुसाध
  जो हिन्दू धर्म-संस्कृति दलित-पिछड़े और महिलाओं के शोषण-उत्पीड़न का कारण रही है, उसका उत्तोलक होने के नाते संघ परिवार अम्बेडकरवादी और प्रगतिशीलों की नज़रों में इतना बदनाम रहा है कि जो ही उससे जुड़ा इनकी नज़रों में गिर गया. लोगों ने इनके सारे अवदानों को ही ख़ारिज करने करने का प्रयास किया. हिन्दुत्ववादी संघ से जुड़ने का जिन्हें बड़ी कीमत अदा करनी पड़ी उनमें नामदेव ढसाल, हिंदी पट्टी के आंबेडकरवादियों के बीच लोककथाओं के नायकों जैसा आदर पाने वाले बीपी मौर्य, संघप्रिय गौतम, शैलेश मटियानी जैसे महान दलित साहित्यकार तक रहे. किन्तु अतीत के अवदानों के नकारे जाने खतरे के बावजूद संघ से वंचित वर्गों की प्रतिभाओं के जुड़ने की धारा लम्बे समय से प्रवाहमान है जिसमें बी पी मौर्य, शैलेश मटियानी,ढसाल इत्यादि जैसी विरल प्रतिभाएं जुड़ी हीं और आगे भी जुड़ती रहेंगी. वर्तमान में जिनके इस धारा से जुड़ने से लोग स्तंभित हैं वे हैं डॉ.उदित राज, उपेन्द्र कुशवाहा, राम कृपाल यादव, राम विलास पासवान, अनुप्रिया पटेल जैसी राजनीतिक प्रतिभाएं.
   इसमें कोई शक नहीं कि दलित-पिछड़े समाज के इन  मुखर नेताओं के सवर्णवादी भाजपा के साथ जुड़ने से स्वतंत्र बहुजन राजनीति हासिये पर चली गयी है. यह नेता सत्ता से दूर रहकर भी समय-समय पर जिस तरह बहुजनों के हको-हुकुक की आवाज़ बुलंद करते रहते थे, वह दबे कुचले समाज का मनोबल बढ़ाने में बड़ा सहायक होता था. किन्तु अब वह हालात नहीं रहे. अब सारे एजेंडे कांग्रेस, भाजपा और आप जैसे सवर्णवादी तय करेंगे और उनमें शामिल दलित-पिछड़े नेता हां में हां मिलाने के लिए बाध्य होंगे. जहाँ तक भाजपा का सवाल है दलित-पिछड़े समाज के इन प्रखर नेताओं के उससे जुड़ने से सबसे बड़ा लाभ उसे यह मिला है कि उसकी राजनीतिक अस्पृश्यता दूर हो गयी है. पहले लगता था कि चुनाव में मेजोरिटी नहीं पाने पर भाजपा नरेंद्र मोदी के कारण सत्ता से वंचित हो जाएगी. किन्तु अब वह अस्पृश्यता से पूरी तरह मुक्त हो चुकी है. अब सारे  राजनीतिक हालात पूरी तरह उसके पक्ष में हो गए हैं. अब अगली सरकार गठन की सारी अनिश्चयता ख़त्म हो चुकी है. दावे के साथ कहा जा सकता कि अगली सरकार मोदी के नेतृत्व में भाजपा गठबंधन की सरकार बनेगी.
    किन्तु इस बदले हालात में एक बात का खतरा पैदा हो गया है, वह यह कि कहीं आत्मविश्वास से लबरेज भाजपा ‘डाइवर्सिटी’ से जुड़ा वह खास एजेंडा तो नहीं भुला देगी जो वह 2009 से लगातार अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से उठाती रही है. स्मरण रहे पिछले एक दशक से डाइवर्सिटी दलित-पिछड़े समुदाय की सबसे बड़ी मांग बन गयी है और तमाम दलों में यह भाजपा है जो पिछले पांच –छः सालों से खुलकर इस मांग का समर्थन करती रही है.सबसे पहले उसने लोकसभा चुनाव-2009 के अपने घोषणा पत्र के पृष्ठ 29 पर लिखा- ‘भाजपा सामाजिक न्याय तथा सामाजिक समरसता के प्रति प्रतिबद्ध है. पहचान की राजनीति, जो दलितों अन्य पिछड़े वर्गों और समाज के अन्य वंचित वर्गों को कोई फायदा नहीं पहुँचाती का अनुसरण करने के बजाय ठोस विकास एवं सशक्तिकरण पर ध्यान केन्द्रित करेगी.हमारे समाज के दलित, पिछड़े एवं वंचित वर्गों के लिए उद्यमशीलता एवं व्यवसाय के अवसरों को इस तरह बढ़ावा दिया जायेगा ताकि भारत की सामाजिक विविधता पर्याप्त रूप से आर्थिक विविधता में प्रतिबिम्बित हो.’
      2009 में भाजपा के घोषणापत्र का उपरोक्त अंश विशुद्ध क्रांतिकारी था. आप जानते हैं भूमंडलीकरण के दौर में बहुजन बुद्धिजीवियों की सबसे प्रमुख मांग यह रही कि पार्टियाँ/सरकारें बहुजनों को पारंपरिक आरक्षण(महज सरकारी नौकरियों) से परे हटकर उद्योग–व्यापार, में भागीदार बनाने पर विचार करें. सामाजिक विविधता को आर्थिक विविधता में प्रतिबिम्बन का मतलब यह हुआ कि समस्त आर्थिक गतिविधियों-सप्लाई, डीलरशिप, ठेकों, ट्रांसपोर्टेशन इत्यादि में जिसकी जीतनी संख्या भारी, उसकी उतनी भागीदारी. भाजपा ने अपने घोषणापत्र में सामाजिक विविधता को आर्थिक विविधता में प्रतिबिम्बित करने का एलान कर एक क्रांति की ही घोषणा कर दिया था. उसकी वह घोषणा सिर्फ लोकसभा चुनाव-2009 तक ही सीमित नहीं रही, उसने लगभग वही बातें बिहार विधानसभा चुनाव-2010 में दोहराते हुए कहा- ‘पहचान की राजनीति के बदले भागीदारी नीति का अनुसरण करते हुए समाज के दलित, पिछड़े,वंचित एवं कमजोर वर्गों के ठोस विकास एवं सशक्तिकरण पर ध्यान केन्द्रित किया जायेगा. समाज के इन वर्गों के लिए उद्यमशीलता और व्यवसाय के अवसरों को बढाया जायेगा.’ भाजपा ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव-2012 में फिर डाइवर्सिटी केंदित घोषणापत्र जारी करते हुए सामाजिक विविधता को आर्थिक विविधता में तब्दील करने की घोषणा किया.
यह अनायास नहीं है कि भाजपा के दलित मोर्चे के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ.संजय पासवान ने गत वर्ष अप्रैल में जो 20 पृष्ठीय ‘दलित दस्तावेज’ जारी किया उसमें उन्होंने खुलकर यह लिखा- ‘सरकारी नौकरियों में जगह मिलने से दलितों के बीच एक ऐसा पढ़ा लिखा वर्ग तैयार हुआ जो पढ़ा-लिखा था और अपने समुदाय का नेतृत्व  कर सकता था. इससे दलितों के बारे में शेष समाज का दृष्टिकोण बदला. बदलते समय में इसे बनाये रखने के लिए केवल सरकारी नौकरियों से काम नहीं चलेगा क्योंकि सरकारी नौकरियों की संख्या तेज़ी से कम हो रही है. दलितों को अब आर्थिक रूप से मजबूत बनाये जाने की जरुरत है. इसके लिए सरकारों को चाहिए कि उनमें  उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए कदम उठायें.’
डॉ.पासवान दलितों में उद्यमशीलता को बढ़ावा देने की बात लगातार उठाये जा रहे हैं तो उसके पीछे भाजपा का डाइवर्सिटी समर्थक रुझान है.
    अब जहाँ तक भाजपा की नई संगी ‘लोजपा’ का सवाल है उसने भी बिहार विधानसभा चुनाव-2010 में डाइवर्सिटी के पक्ष में बढ़ चढ़कर घोषणा किया. उस चुनाव में चूँकि उसका घोषणापत्र राजद के साथ संयुक्त रूप से जारी हुआ था इसलिए घोषणापत्र में तो नहीं किन्तु रेडियो और टीवी पर लोजपा को जितनी बार अपनी बात रखने का अवसर मिला, हर बार उसने यह दोहराया- ‘ठेकेदारी, सप्लाई, वितरण, फिल्म, मीडिया आदि धनोपार्जन के महत्वपूर्ण स्रोत हैं. सदियों से व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असमानता को ख़त्म करने के लिए राज्य सरकार नीतिगत फैसला नहीं कर सकी. धनोपार्जन के सभी स्रोतों और संसाधनों में सभी वर्गों को डाइवर्सिटी के आधार पर संख्यानुपात में समान भागीदारी और हिस्सेदारी की जरुरत है. लोजपा इसका समर्थन करती है.’
लोजपा से भी बहुत पहले डॉ.उदित राज ने अमेरिका में लागू डाइवर्सिटी नीति का हवाला देते हुए भारत के दलित-वंचितों के लिए उद्योग-व्यापार में हिस्सेदारी की लड़ाई लड़ते हुए कितनी रैलियां निकालीं; कितना धरना –प्रदर्शन किये उसकी कोई गिनती नहीं है. कहने का आशय यह है कि भाजपा के साथ ऐसे नेता जुड़कर उसकी राजनीतिक अस्पृश्यता दूर किये हैं जो अपने समाज के लिए लम्बे समय से सरकारी नौकरियों से आगे बढ़कर उद्योग-व्यापार में भागीदारी की मांग उठाते रहे हैं. ताज्जुब नहीं कि भाजपा का डाइवर्सिटी समर्थक चेहरा उन्हें उससे जुड़ने के लिए खास तौर से प्रेरित किया हो. पर वर्तमान में बहुजन बुद्धिजीवियों के जेहन में यह सवाल उठ रहा है कि जिस तरह दलित-पिछड़े समाज के मुखर नेताओं के भाजपा से जुड़ने के बाद आगामी लोकसभा चुनाव में उसकी जीत पक्की होती दिख रही है, कहीं ऐसा न हो कि जीत पक्की मानकर वह दलित-पिछड़ों को लुभाने वाली डाइवर्सिटी की बात भूल जाएँ.  अगर भाजपा ऐसा करती है तो उसकी जिम्मेवारी निश्चय ही उसमें शामिल नए बहुजन नेताओं पर जायेगी. उन्हें वंचित बहुजन समाज के सामने जवाबदेह बनना पड़ेगा.
                

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एच एल दुसाध, लेखक बहुजन चितक, स्वतंत्र टिप्पणीकार एवं बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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