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क्या थम जाएंगी अब किसानों की आत्महत्याएं

मनोहर गौर
तीन साल से भी अधिक समय से लंबित साहूकारी बिल पर आखिर पिछले हफ्ते राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद महाराष्ट्र में अवैध साहूकारों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुल गया है। सब जानते हैं कि विदर्भ में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं के पीछे एक कारण अवैध साहूकारी भी रहा है। कुछ साल पहले महाराष्ट्र सरकार ने विदर्भ में जारी किसानों की आत्महत्याओं के वास्तविक कारणों की खोज और उसके लिए उपाय की दृष्टि से डॉ. नरेंद्र जाधव की अध्यक्षता में एक अध्ययन दल का गठन किया था। इस दल ने अपनी सिफारिशों में अवैध साहूकारी को किसानों की आत्महत्याओं के लिए एक प्रमुख कारण माना था। हालाँकि किसानों की आत्महत्याओं के लिए यही एकमात्र कारण नहीं बताया गया था। बल्कि खेती में बढ़ती लागत, फसलों को उचित और पर्याप्त भाव नहीं मिलना, बढ़ता कर्ज तथा सरकारी उदासीनता भी इसका कारण रही है।
राजनीतिक हाथ
यह छिपी बात नहीं है कि गांव से लेकर शहरों तक अवैध साहूकारी सिर्फ इसलिए फल-फूल रही है, क्योंकि इसके सिर पर हमेशा राजनीतिक हाथ रहा है। बल्कि राजनीतिक लोग खुद यही काम करते रहे हैं। कुछ साल पहले विदर्भ के विधायक दिलीप सानंदा के पिता के खिलाफ भी साहूकारी के आरोप लगे थे और मामले को दबाने की कोशिश करने का आरोप तत्कालीन मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख पर आया था। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार पर दस लाख का जुर्माना भी लगाया था।
गांवों में खेती-बाड़ी के कागजात के अलावा सोने-चांदी के जेवरों को गिरवी रख 36 से 48 प्रतिशत वार्षिक ब्याज वसूला जाता है। शहरों में भी आभूषण-व्यवसायी जेवरात गिरवी रख प्रतिमाह 4 प्रतिशत की दर से ब्याज वसूलते हैं। पहले महीने का ब्याज शुरुआत में ही वसूल लिया जाता है और गरीब तथा मध्यवर्ग इसकी बलि चढ़ता रहता है। चूंकि यह कभी भी सबसे आसान और बिना किसी गारंटी के मिलने वाला कर्ज होता है, इसलिए शहरों में भी लोग कभी न कभी इस दौर से गुजरते ही हैं। प्रशासन से लेकर सरकार तक सबको इसकी जानकारी होने के बावजूद कभी इनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाती। इसलिए कहा जाता है कि साहूकारी प्रथा के खिलाफ चाहे जितने कानून बन जाएं इसे खत्म करना आसान नहीं है। साहूकारी से राजनीति तक का सफर ही इस प्रथा को फलने-फूलने में मदद करता है।
किसानों की आत्महत्याओं में कमी
विदर्भ में पिछले दो-तीन सालों में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़ों में उल्लेखनीय कमी आई है। इस दौरान कुदरत भी विदर्भ पर काफी मेहरबान रही है। अच्छी बारिश के अलावा खुले बाजार में किसानों को अच्छा भाव मिलना भी इसके पीछे एक बड़ा कारण रहा है। आंकड़े बताते हैं कि विदर्भ में जहां वर्ष 2006 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 1449 थी, वहीं वर्ष 2013 में वह घटकर 752 पर रह गई है। इसमें धान उत्पादक किसानों का आंकड़ा भी जोड़ दिया जाए तो यह संख्या बढ़कर 824 हो जाती है। विशेषज्ञों का दावा है कि खुले बाजार में बेहतर भाव मिलने के साथ ही अगर सरकार ने भी फसलों को बेहतर भाव दिया तो इन आंकड़ों को शून्य पर लाया जा सकता है।
विदर्भ में मुख्यत: वर्धा, यवतमाल, अमरावती, अकोला, वाशिम और बुलढाणा जैसे कपास तथा सोयाबीन उत्पादक जिलों में ही किसानों की आत्महत्याएं अधिक होती रही हैं। बुलढाणा जिले में जहां वर्ष 2006 में 320 किसानों ने आत्महत्या की थी, वहीं वर्ष 2013 में यह संख्या घटकर 120 पर आ गई है। उसी तरह वाशिम में 185 से घटकर 56, अमरावती जिले में 270 से 159, यवतमाल जिले में 359 से 219 और अकोला जिले में किसानों की आत्महत्या की घटनाएं 174 से घटकर 128 रह गई हैं। सरकार का दावा है कि किसान-आत्महत्या की घटनाओं में कमी का कारण इन क्षेत्रों में 10 हजार करोड़ की निधि का आना तथा प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के सहायता पैकेजों का उचित तरीके से क्रियान्वयन ही रहा है। किसानों की आत्महत्याओं का कारण कर्ज का बढ़ता बोझ, सिंचाई के अभाव में फसलों का गिरता उत्पादन और पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर किसानों में घर करती निराशा रहा है। इसमें विभिन्न कारणों से कुछ कमी आई है तो इसे बरकरार रखने की जरूरत आज सबसे अधिक है।
लंबित विधेयक
महाराष्ट्र सावकारी नियंत्रण विधेयक 2010 से केंद्र के पास लंबित था। राज्य सरकार को बार-बार यह विधेयक दुरुस्ती के लिए वापस भेजा गया। अभी दिसंबर में ही नागपुर में संपन्न महाराष्ट्र विधानमंडल के शीतकालीन अधिवेशन में विपक्ष ने नारेबाजी कर वाकआउट कर दिया था। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इस कानून के बाद राज्य में साहूकारी पर रोक लग जाएगी? या यह कानून भी बाकी कानूनों की तरह केवल एक कानून बनकर रह जाएगा? इस विधेयक में चक्रवृद्धि दर से ब्याज की वसूली पर रोक लगाई गई है। अलावा इसके ब्याज की राशि मूल धन से अधिक नहीं होनी चाहिए। बिना लाइसेंस के साहूकारी करने वालों को 5 साल की कैद और 50 हजार रुपए जुर्माने का प्रावधान विधेयक में किया गया है। मल्टीस्टेट को-ऑपरेटिव बैंकों के लिए भी यह कानून लागू होगा।

तरीका बदला
ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत बैंकों का काम करने का अपना तरीका और दस्तूर है। बैंक उस वक्त तक किसानों को कर्ज नहीं देते जब तक कि पहले का कर्ज चुकता न कर दिया जाए। फसल के बरबाद होने पर किसान के लिए पहले के कर्ज को चुकता करना मुश्किल होता है। बैंकों से मिलने वाला कर्ज भी बहुत कम होता है। ऐसे में साहूकार ही किसानों के काम आता है। दूसरे, साहूकारी विरोधी कानून बनाने की मांग के उठने के बाद से ही साहूकारों ने अपने धंधे का तरीका ही बदल लिया है। उन्होंने खेती-किसानी के काम आने वाली सामग्री की दुकान लगा ली है और तीन से चार फीसदी माहवारी की दर पर बीज और खाद जैसी चीजें देने लगे हैं। गांवों में बिना कागज-पत्र के बरसों से साहूकारी का धंधा चल रहा है और तय है कि इस कानून के बाद भी यह ऐसे ही चलता रहेगा। सरकार को साहूकारी पर रोक लगाने के साथ ही बैंकों की व्यवस्था में सुधार करना चाहिए था, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है। ऐसे में पिसेगा किसान ही। साफ है कि उसकी स्थिति और खराब ही होगी।

About the author

मनोहर गौर, लेखक नागपुर (महाराष्ट्र) स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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