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क्या #भाजपा के खिलाफ वोट देने वाले #पाकिस्तानी हैं, #राष्ट्रद्रोही हैं जो #पाकिस्तान खुश होगा, गुजरात नरसंहार के इतिहास से पूछें जवाब!

क्या भाजपा के खिलाफ वोट देने वाले पाकिस्तानी हैं,  राष्ट्रद्रोही हैं जो पाकिस्तान खुश होगा, गुजरात नरसंहार के इतिहास से पूछें जवाब!

हीराभाभी को सलाम कि उनने कारपोरेट लिटरेचर फेस्टिवल के दिये गिरदा को मरणोपरांत लाइव टाइम एचिवमेंट ठुकरा दिया। कहा, जिसने लिया, वे रख लें। गिरदा के सरोकारों से इसका मतलब नहीं।

सिंगुर के किसानों को एक इंच जमीन वापस मिली नहीं है और न उन्हें मुआवजा लेने की इजाजत दी गयी है और वे राज्यसरकार से परिवर्तन के साढ़े चार साल बाद मुआवजा की मांग कर रहे हैं और परिवर्तन के सारे सिपाहसालार खामोश फासीवाद के हक में हैं।

Threat calls haunted temple saviour and the Muslim returns Kabeer Samman to Save India!

Rahul Gandhi Joins Sanitary Workers’ Strike

पलाश विश्वास

दिल्ली कूड़ा कूड़ा है और न दिल्ली सरकार और न राज्य सरकार को परवाह है सफाई कर्चारियों की। न दलित नेता , एमपी एमएलए,  राजनीति को परवाह है। अरविंद केजरीवाल मौन है और दिल्ली का दम घुट रहा है। न दिल्ली और दिल्लीवालों की परवाह किसी को है।

1972 से कंसावती नदी किनारे एक आम आदमी जो संजोग से मुसलमान भी है, यासिन पठान चौतीस प्राचीन हिंदू मंदिरों की रक्षा जान पर खेलते हुए कर रहे हैं।

यासीन पठान को 1994 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने आपातकाल से पहले जेपी आंदोलन के आगे पीछे कबीर सम्मान से सम्मानित किया था और बाबरी विध्वंस के बाद 2002 में वे इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर थे, अपने हिंदुत्व के लिए।

उन्होंने फासीवादी असहिष्णुता के खिलाफ बंगाल की कवयित्री मंदाक्रांता सेन, फिल्मकार दिवाकर बंदोपाध्याय और इंद्रनील लाहिड़ी के बाद यह पुरस्कार लौटाने की प्रक्रिया शुरु कर दी है।

उनका बयान हुबहू वही है जो हमारे राष्ट्र का विवेक है, जो बयान दुनिया भर के वैज्ञानिकों,  कवियों,  लेखकों,  कलाकारों,  समाजशास्त्रियों, इतिहासकारों का फासीवादी असहिष्णुता और धर्मोन्मादी मजहबी मुक्तबाजारी फासीवादी राजकाज के बारे में है।

वे बेहद मामूली इंसान हैं और कबीर सम्मान माननीय अशोक वाजपेयी को भी मिला है। जिनने संजोग से साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटा दिये हैं। उन्हें, यासीन पठान को मैं जानता हूं।

मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि होक कलरव का आखिर क्या मतलब है अगर वह इस दुस्समय में खामोश है?

मेरी समझ में नहीं आता कि वाममोर्चे के खिलाफ परिवर्तन के आवाहन का आखिर क्या मतलब है?

क्यो मतलब है नंदीग्राम नरसंहार के विरोध का जबकि हरिपुरा में परमाणु संयंत्र लगाने का बंगाल में अब कोई विरोध नहीं है और जनवरी, 1779 में हुए मरिचझांपी नरसंहार के खिलाफ पिछले 36 सालों में कोई आवाज बुलंद हुई नहीं है?

सिंगुर के किसानों के हकहकूक के हक में, नंदीग्राम में नरसंहार के खिलाफ सारा बंगाल सड़कों पर था और मीडिया में सिर्फ सितारे सजे हुए थे।

हम भी उन जुलूसों में थे।

हम भी ममता बनर्जी के अनशन मंच के आसपास थे और हर रात डलहौजी में अपने दफ्तर से निकलते हुए धर्मतल्ला में उनके अनशनमंच में सबकुछ ठीकठाक देखकर ही घर लौटते थे।

हमारे जैसे तमाम लोग कैमरे के फोकस में नहीं थे।

सिंगुर और नंदीग्राम के किसानों को आज भी न्याय नहीं मिला।

वाम को बेदखल करके आंदोलनकारियों को सत्ता मिली है और टाटा मोटर्स को बंगाल छोड़ना पड़ा।

अब औद्योगीकरण जमीन की बेलगाम लूट है।

अब औद्योगीकरण नालेज, हेल्थ हब है और बहुमंजिली प्रोमोटर बिल्डर सिंडिकेट माफिया का सीमेंट का जंगल है।

सुंदरवन का विध्वंस है।

नदियों,  नालों और पोकरों को पाटने के बाद समुंदर भी प्रोमोटरों के कब्जे में है।

जो आंदोलन वाम के खिलाफ था, वह अब खामोश है और वही पुरस्कार लौटाने वालों पर हमला बोल रहा है। मतलब क्या है?

सिंगुर के किसानों को एक इंच जमीन वापस मिली नहीं है और न उन्हें मुआवजा लेने की इजाजत दी गयी है और वे राज्यसरकार से परिवर्तन के साढ़े चार साल बाद मुआवजा की मांग कर रहे हैं और परिवर्तन के सारे सिपाहसालार खामोश फासीवाद के हक में हैं।

फिल्म डिवीजन के लिए फिल्म बनाने वाले मित्रों के सौजन्य से, जिनके लिए मैंने पटकथा और संवाद लिखे हैं।

कानु गोपाल दास ने फिल्म डिवीजन के लिए कांडारी नाम से एक फिल्म हिंदुत्व के इस महायोद्धा पर बनायी थी। संपादन के दौरान हमने उसके रशेज और प्रीविउ देखी थी।

इस्लामी शासन ने रसखान की हत्या नहीं की, लेकिन मौलवियों और पंडितों ने मिलकर इब्राहीम लोदी से कबीर के लिए सजा-ए-मौत मांग ली।

फिर हम कबीर की हत्या कर रहे हैं क्योंकि हमने गांधी की हत्या की है।

संत तुकाराम की हत्या की है।

चैतन्य महाप्रभु की हत्या भी हमने की है और गुरु गोविंद सिंह को मरवाने वाले सत्ता में हैं।

आज मेरा मन बेहद कच्चा कच्चा है।

इच्छा होती है कि खूब रोउं।

नास्तिक जरूर हूं लेकिन जन्मजात हिंदू हूं।

न हमने धर्म परिवर्तन किया और न हिंदू धर्म से मुझे किसी ने खारिज किया। सनातन हिंदू धर्म के इस लोकतंत्र के कारण ही मैं मनुस्मृति का नर्क और नस्ली रंगभेद के दुधारी तलवार से पल छिन पल छिन लहुलूहान हूं।

और मैं हिंदू धर्म का इतिहास जानता हूं और भारत तीर्थ के तमाम साझा चूल्हों के साथ हूं।

हजारों साल से सनातन हिंदू धर्म विशुद्ध रक्त, वैदिकी हिंसा, अश्वमेध और राजसूय, धर्म कर्म,  बजरंगियों , किसी संस्थागत परिवार, उसके हिंदुत्व के विभाजनकारी आत्मध्वंसी महागठबंधन और नरसंहार के एजंडे की वजह से बहाल नहीं है, बल्कि इन म्लेच्छों, अछूतों और विधर्मियों के त्याग , बलिदान और सहिष्णुता और विविधता के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता और सभी संस्कृतियों, सभी मतों, उपासना पद्धतियों, देवदेवियों को आत्मसात करने की आंतरित शक्ति की वजह से बचा हुआ है हिंदू धर्म।

हिंदू धर्म बचा हुआ है तो पठानों के राजकाज में अंतर्निहित सहिष्णुता की वजह से, जोधा अकबर की वजह से, अवध में रामलीला करनेवाले मुसलमानों की वजह से, कवि रसखान की वजह से और औरंगजेब की वजह से भी, जो बेहतरीन प्रशासक है और उनके खिलाफ भोपाल गैस त्रासदी, बाबरी विध्वंस, हरित क्रांति, आपरेशन ब्लू स्टार, सिख संहार, गुजारात नरसंहार वगैरह-वगैरह अपराध कर्म धर्म के नाम दर्ज हो तो कृपया दस्तावेज साझा करें।

हम तो अपढ़ हैं। गलती हो गयी तो तुरंत दुरुस्त कर दें।

उदार लोकतंत्र की यह धारा गौतम बुद्ध के बुद्धमय भारत में महायान से वज्रयान के तंत्र मंत्र कर्म कांड में सीमाबद्ध हो जाने के कारण बची नहीं और गौतम बुद्ध को भगवान बनाकर वैदिकी कर्मकांड अपनाकर हमारे ही पुरखों ने बौद्धमयभारत का अवसान करके फिर हिंदू धर्म का नर्क अपना लिया।

सनातन हिदू धर्म ने भी गौतम बुद्ध के पंचशील को अपनाने की हरसंभव कोशिश की।

सत्य और अहिंसा, समता और न्याय यह गौतम बुद्ध का पथ है।

गांधी दर्शन है।

रवीद्र साहित्य है और बाबासाहेब का जाति उन्मूलन का एजंडा भी बुद्धमय है।

गोरक्षा आंदोलन नहीं, जीवों के प्रति करुणा का स्थाई भाव और अंहिंसा की वजह से वैदिकी यज्ञों में पशुबलि और मांसाहार की हिंसा का परित्याग किया हिंदू धर्म ने।

वेदों, चार्वाक दर्शन के भौतिकवाद, जो साम्यवाद का प्राचीनतम आधार है और उपनिषदों की चर्चा होती नहीं है।

हम सिर्फ महाकाव्यों, पुराणों, स्मृतियों, मिथकों, शतपथ और ब्राह्मण तक हिंदू धर्म को सीमाबद्ध करके बौद्धमय भारत के इतिहास को दोहरा रहे हैं।

हमने कल जारी वीडियो में इसपर सिलसिलेवार चर्चा की है।

यह समय हिंदू धर्म के अवसान का समय़ है, ग्लोबल हिंदुत्व का नहीं और हिंदू धर्म के हत्यारे हैं हिंदुत्व के स्वयंभू झंडेवरदार जो इस भारत के हर विधर्मी, हर किसान, हर मेहनतकश, हर मजदूर, हर कर्मचारी, हर नागरिक के वध का उत्सव रचते हुए हर दूसरे इंसान को राष्ट्रद्रोही हिंदू विरोधी बता रहे हैं।

दरअसल वे ही, वे तमाम बजरंगी सबसे ज्यादा हिंदूविरोधी हैं।

आसमान के जगमगाते सितारों के बारे में हम अधपढ़ अपढ़ लोग कुछ खास कभी नहीं जानते।

हम जिनके पांव जमीन के अंदर कीचड़ पानी गोबर और आग में धंसे हैं, वे महान विभूतियों के कारनामों के बारे में कुछ भी नहीं जानते।

डा.अमर्त्य सेन ने कहा था कि वे गुजरात नरंसहार के बाद गुजरात के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना नहीं चाहते, अब दुनिया भर के कवि,  साहित्यकार,  इतिहासकार,  वैज्ञानिक,  कलाकार,  फिल्मकार, छात्र युवा फासीवाद के खिलाफ जनपक्षधर मोर्चे पर लामबंद हो रहे हैं तो क्यों खामोश हैं डा.अमर्त्य सेन और दूसरे तमाम अर्थशास्त्री , हमारी समझ से बाहर है।

इसी तरह निशांत, अंकुर, मंथन, चक्र जैसी फिल्मों के साथ नई लहर पैदा करने वाले फिल्म निर्देशक क्यों इस विरोध को बेमतलब समझते हैं, हमारी समझ में आने वाली बात कतई नहीं है।

Ek Anek Ekta (1974) – YouTube

www.youtube.com/watch?v=R-tTOJ1RvUY

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