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क्या मध्यमार्गीय बन गए हैं मोदी ?

इरफान इंजीनियर
दि इंडियन एक्सप्रेस में अपने लेख (मोदी द मोडरेट) में आशुतोष वासर वार्ष्णेय लिखते हैं, ‘‘मोदी की शैली भले ही वाजपेयी जैसी न हो परंतु कुल मिलाकर, पिछले कुछ महीनों में, उनके चुनाव अभियान के दौरान, वे वाजपेयी की लीक के नेता ही नजर आते हैं।’’ अपने दावे के समर्थन में वार्ष्णेय लिखते हैं कि मोदी ने अपने एक चुनावी भाषण में मौलाना आजाद को श्रृद्धांजलि अर्पित की, उन्होंने दलित पार्टियों के साथ गठबंधन किया, जिनमें वे व्यक्ति भी शामिल हैं जो उनके खिलाफ बोलते रहे हैं और उन्होंने अपने एक भाषण में कहा कि गुजरात का हज कोटा पूरा भर जाता है जबकि बिहार और उत्तरप्रदेश में ऐसा नहीं होता क्योंकि गुजरात के मुसलमानों की तुलना में, बिहार और उत्तरप्रदेश के मुसलमान पिछड़े हुए हैं। वार्ष्णेय का यह दावा है कि उक्त तीनों उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि मोदी पूरी तौर पर न सही, परंतु काफी हद तक, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से हट गए हैं। यहां पर दो प्रश्न हैं। पहला यह कि क्या उक्त तीनों उदाहरणों से ऐसा जाहिर होता है कि मोदी उग्र हिंदू राष्ट्रवादी नहीं रह गए हैं। और दूसरे, अगर ऐसा है, तो क्या यह केवल चुनावी रणनीति है या मोदी की विचारधारा में सचमुच परिवर्तन आया है।
उदारवादियों के एक तबके को उम्मीद है कि भारत जैसे विभिन्नताओं से भरे देश का शासन चलाने की जिम्मेदारी उठाने वाली किसी भी दक्षिणपंथी पार्टी के लिए अपने तेवर नरम करना आवश्यक होगा और उसे मजबूरी में मध्यमार्गी पार्टी बनना होगा। वार्ष्णेय के कहने का अर्थ यह है कि गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरियों के चलते, वाजपेयी और भाजपा को मध्यमार्गी नीतियां अपनानी पड़ीं और ऐसा ही मोदी को करना पड़ेगा। दूसरी ओर, कुछ अन्य लोगों का कहना है कि ऐसी आशा करना व्यर्थ है क्योंकि हिन्दू राष्ट्रवादी, राज्य को एक ऐसे उपकरण के रूप में देखते हैं जिसका इस्तेमाल भारत और हिन्दुओं को एकसार राष्ट्र के रूप में पुनर्गठित करने के लिए किया जा सकता है। शनैः शनैः देश की सांस्कृतिक विविधता को समाप्त कर दिया जाएगा, उदारवादी, प्रजातांत्रिक मूल्यों से किनारा कर लिया जायेगा और अंततः देश, हिन्दू राष्ट्र में बदल जाएगा जो कि एक एकाधिकारवादी-सांस्कृतिक राज्य होगा। भारतीय समाज, विविधताओं से परिपूर्ण है। जातिगत, धार्मिक, नस्लीय, भाषाई और क्षेत्रीय विविधताएं इतनी अधिक हैं कि समाज को पुनर्गठित करने के लिए यह आवश्यक होगा कि लोगों के दृष्टिकोण में परिवर्तन लाया जाए। इसके लिए, शैक्षणिक संस्थानों, संचार माध्यमों और नौकरशाही व सरकारी तंत्र, विशेषकर पुलिस, का इस्तेमाल किया जाए। जो भी दल सत्ता में रहता है उसका इन तीनों ही संस्थाओं पर जबरदस्त प्रभाव व नियंत्रण रहता है।
मीडिया और शैक्षणिक संस्थाओं का इस्तेमाल समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने के लिए किया जाता है। दूसरी ओर, विविधता के प्रति असहिष्णुता विकसित की जाती है व सुरक्षाबलों और गुंडा ब्रिगेडों का इस्तेमाल उन समूहों या समुदायों के विरूद्ध किया जाता है जो कि अपनी विविधता बरकरार रखने का साहस या इरादा प्रदर्षित करते हैं। जाहिर है कि इस रणनीति का सबसे बड़ा शिकार अल्पसंख्यक समुदाय बनता है। उसके विरूद्ध हिंसा में बढ़ोत्तरी होती है क्योंकि उसकी ओर से उसके विशिष्ट पारिवारिक कानूनों, खानपान की आदतों, त्योहार मनाने के तरीकों आदि में हस्तक्षेप का विरोध होता है। धार्मिक अल्पसंख्यकों की विविधता पर अलगाववादी मानसिकता का लेबल चस्पा कर दिया जाता है और यह कहा जाता है कि वे ‘हिन्दू राष्ट्र’ की सुरक्षा के लिए खतरा हैं। मृदु शक्ति (मीडिया व शैक्षणिक संस्थान) व कठोर शक्ति (सुरक्षाबल व नौकरशाही) का इस्तेमाल कर अल्पसंख्यकों का दानवीकरण किया जाता है। उन पर यह आरोप लगाया जाता है कि वे ढेर सारे बच्चे पैदा कर अपने संख्याबल में वृद्धि कर रहे हैं। यह कहा जाता है कि वे बंग्लादेशी घुसपैठिये हैं, आतंकवादी हैं, मंदिरों का ध्वंस करने वाले हैं और हिन्दू संस्कृति को नष्ट कर देना चाहते हैं। यह भी आरोप लगाया जाता है कि देश के मुस्लिम शासकों ने जबरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाया था। मृदु शक्ति व कठोर शक्ति के द्वारा अल्पसंख्यकों की वर्तमान पीढ़ी से, उसके पूर्वजों द्वारा किए गए कथित अपराधों का बदला लेने को औचित्यपूर्ण सिद्ध किया जाता है।
परंतु राज्य द्वारा पूरे समाज को सांस्कृतिक दृष्टि से एकसार बनाने का विरोध, अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ही नहीं होता। समाज के कई दूसरे वर्ग, जैसे निम्न व मध्यम जातियां, पिछड़े इलाकों के रहवासी, महिलाएं, आदिवासी, लैंगिक अल्पसंख्यक व अन्य कई वर्ग भी इसके विरोध करते हैं।
वाजपेयी की राजनैतिक मजबूरियां
गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरी के चलते, वाजपेयी के शासनकाल में भाजपा ने यह बेहतर समझा कि वह ऐसे मुद्दों को न उठाए जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रिय मुद्दे रहे हैं जैसे समान आचार संहिता, बाबरी मस्जिद के स्थान पर रामजन्मभूमि मंदिर का निर्माण और जम्मू कश्मीर को कुछ हद तक स्वायत्तता देने वाले संविधान के अनुच्छेद ३७० की समाप्ति। अगर भाजपा ने वाजपेयी शासन के दौरान अपने इस विघटनकारी एजेण्डे को लागू नहीं किया तो इसका कारण यह नहीं था कि उसकी राजनैतिक सोच में कुछ परिवर्तन आ गया था बल्कि इसका कारण यह था कि उसके पास इन कदमों को उठाने के लिए संसद में आवसश्यक बहुमत नहीं था। परंतु फिर भी, राज्य ने समाज को एकसार बनाने के अपनी परियोजना पर जमकर काम किया।
मानव संसाधन विकास मंत्री के रूप में मुरली मनोहर जोशी ने जे.एस. राजपूत को एनसीईआरटी का निदेशक नियुक्त किया। उन्होंने कई प्रतिष्ठित इतिहासविदों द्वारा लिखी पुस्तकों को स्कूली पाठ्यक्रमों से बाहर कर दिया और इतिहास की किताबों का साम्प्रदायिकीकरण किया, उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवादियों को विभिन्न पदों पर नियुक्त किया और अनुदान के मामले में भेदभाव किया। जोशी ने विश्वविद्यालय स्तर पर ज्योतिष को एक विषय के रूप में शामिल किया और हिन्दू पंडितों को प्रशिक्षित करने के लिए पाठ्यक्रम विकसित करवाए। गुजरात (व राजस्थान, जहां वसुन्धराराजे सिंधिया मुख्यमंत्री थीं) में पाठ्यपुस्तकों में हिटलर की सरकार का गुणगान किया जाने लगा। इन पुस्तकों में हिटलर द्वारा यहूदियों के कत्लेआम की चर्चा तक नहीं की गई। वाजपेयी की सरकार के दौरान ही २००२ के गुजरात दंगे हुए और वाजपेयी ने दंगों के लिए मोदी द्वारा दिये गये ‘‘क्रिया-प्रतिक्रिया’’ स्पष्टीकरण को अप्रत्यक्ष रूप से सही ठहराते हुए पूछा, ‘परंतु गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एस-६ कोच में आग किसने लगाई थी?’
वाजपेयी सरकार के दौरान ही सन् १९९८ में गुजरात के डांग और मध्यप्रदेश के झाबुआ जिलों में ईसाईयों पर हमले की घटनाओं में तेजी से बढोतरी हुई। इसकी प्रतिक्रिया में न तो सरकार ने पीड़ितों को मुआवजा दिया और ना ही दोषियों को सजा दिलवाने की कोशिश की। उलटे, वाजपेयी ने यह मांग की कि धर्मपरिवर्तन पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। जब भी भाजपा सत्ता में रहती है, हिन्दू राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं की हिम्मत बढ़ जाती है, उन्हें शासन से प्रोत्साहन मिलता है और राज्य के संसाधनों का इस्तेमाल करने की पूरी छूट भी। कानून उन्हें छू भी नहीं पाता। खण्डवा में प्रोफेसर एसएस ठाकुर पर कथित एबीव्हीपी कार्यकर्ताओं ने हमला किया। साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर की मालेगांव में सन् २००८ में हुए धमाकों में संलिप्तता सामने आई। इसी तरह की अनेक घटनाएं देश के विभिन्न भागों, विशेषकर भाजपा शासित प्रदेशों में हुईं। नौकरशाही में हिन्दू राष्ट्रवादियों की बडे पैमाने पर भर्ती की गई और उन्हें ऐसे पदों पर पदस्थ किया गया जिससे वे भाजपा के मूल एजेण्डे को लागू कर सकें।
हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूरी?
बंबई हाईकोर्ट के समक्ष कई चुनाव याचिकाएं दायर की गईं थीं जिनमें यह आरोप लगाया गया था कि शिवसेना और भाजपा उम्मीदवारों ने महाराष्ट्र विधानसभा के सन् १९९५ के चुनाव में धर्म के नाम पर वोट मांगे और विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच शत्रुता उत्पन्न करने के प्रयास किए। इन आरोपों को हाईकोर्ट ने सही ठहराया। इसके बाद, साम्प्रदायिक पार्टियों ने चुनाव के दौरान खुलकर धर्म के नाम पर वोट मांगना बंद कर दिया। परंतु किसी पार्टी के असली चरित्र को सिर्फ इस आधार पर आंकना उचित न होगा कि वह चुनाव प्रचार के दौरान किन मुद्दों का इस्तेमाल करती है। अब ये पार्टियां दबे-छुपे ढंग से अपने साम्प्रदायिक संदेश को लोगों तक पहुंचाती हैं। सार्वजनिक तौर पर इन पार्टियों के उम्मीदवार व पदाधिकारी, धर्मनिरपेक्षता की बात करते नजर आते हैं परंतु इन पार्टियों से जुड़े संगठन समाज को साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के अपने एजेण्डे पर काम करते रहते हैं। भाजपा के उत्तरप्रदेश प्रभारी अमित शाह, अयोध्या के रामजन्मभूमि मंदिर गए और मीडिया के जरिये उन्होंने लोगों तक यह बात पहुंचाई कि उन्होंने वहां प्रार्थना की कि उस स्थल पर एक भव्य रामजन्मभूमि मंदिर बने। विहिप ने उत्तरप्रदेश में धार्मिक ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से चैरासीकोसी परिक्रमा निकालने की कोशिश की। जब यह नहीं हो सका तब जाट महापंचायत का आयोजन किया गया और साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने की भरपूर कोशिश की गई। न तो मोदी और ना ही उनके दाहिने हाथ अमित शाह ने इन गतिविधियों की निंदा की। क्या फिर भी हम यह कह सकते हैं कि मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों से दूर हो गये हैं? मोदी ने इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्वयं कहा कि वे जन्म से हिन्दू हैं और राष्ट्रवादी हैं इस कारण वे हिन्दू राष्ट्रवादी हैं। अगर केवल हिन्दू राष्ट्रवाद के सहारे भाजपा सत्ता में आ सकती होती तो वह केवल इसी का इस्तेमाल करती। हिन्दू राष्ट्रवाद, भाजपा की मूल विचारधारा है और वह इसका इस्तेमाल उन लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए किया जाता है जो कि कट्टर हिन्दुत्ववादी हैं। इसके साथ-साथ, भाजपा और आरएसएस के अन्य अनुषांगिक संगठन अपने समर्थकों की संख्या बढ़ाने के लिए भी काम करते रहते हैं। चुनाव के दौरान केवल हिन्दू राष्ट्रवादी विचारधारा पर जोर देने से काम नहीं चलता। इसलिए इस विचारधारा को त्यागे बगैर, ये संगठन समाज के अन्य वर्गों को आकर्षित करने के लिए कांग्रेस-विरोध, पाकिस्तान के प्रति आक्रामक तेवर व ३५ प्रतिशत युवा उम्मीदवारों को आकर्षित करने के लिए विकास की बातें करते हैं।
भाजपा के कांग्रेस विरोध का उद्देश्य प्रजातंत्र व प्रजातांत्रिक संस्थाओं को मजबूती देना और राज्य को अधिक जवाबदेह बनाना नहीं है। भाजपा का कांग्रेस विरोध दो मुद्दों पर आधारित है: (१) पार्टी के अध्यक्ष के इटेलियन मूल का होने का मुद्दा (गांधी परिवार पर इसलिए हमला किया जाता है क्योंकि वह पार्टी को एक रखे हुए है) व उन कार्यक्रमों का विरोध, जो अल्पसंख्यकों की भलाई के लिए चलाए जाते हैं। इन कार्यक्रमों को पार्टी अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण बताती है। सच तो यह है कि भाजपा का कांग्रेस विरोध भी उसके हिन्दू राष्ट्रवादी चरित्र का उदाहरण है। पाकिस्तान के खिलाफ विषवमन भी भाजपा के हिन्दू राष्ट्रवादी राजनैतिक कार्यक्रम का हिस्सा है। पाकिस्तान को कटघरे में खड़ा कर हिन्दू राष्ट्रवादी, मुसलमानों को आईएसआई का एजेण्ट निरूपित करना चाहती है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गुजरात के मुख्यमंत्री बतौर जो पहला चुनाव मोदी ने लड़ा था वह ‘‘मियां मुशर्रफ’’ के खिलाफ था!
विज्ञापनों के जरिए भाजपा सरकारों द्वारा किए गए विकास कार्यों का ढोल बजाया जा रहा है। सच यह है कि इस तथाकथित विकास से केवल पूंजीपति और कारपोरेट संस्थान लाभांवित हुए हैं। उनके मुनाफे में आशातीत बढ़ोतरी हुई है। इस विकास से हाशिए पर पड़े समूहों विशेषकर किसानों, श्रमिकों, दलितों और आदिवासियों को कोई लाभ नहीं मिला है। विकास के फल का लाभ समाज के सभी वर्गों तक नहीं पहुंचा है। इसलिए अगर ये पार्टियां चुनाव के दौरान हिंदु राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे के अलावा अन्य मुद्दों पर भी बात करती हैं तो इसका अर्थ यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि उन्होंने हिन्दू राष्ट्रवाद के अपने एजेण्डे को त्याग दिया है। उनका मूल चरित्र वही है और वही रहेगा।
 आरएसएस व मोदी
भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मोदी के राजतिलक का भाजपा के सबसे सम्मानित नेता एलके आडवाणी ने विरोध किया था। सुषमा स्वराज, शत्रुध्न सिन्हा व यशवंत सिन्हा ने भी उस बैठक में भाग नहीं लिया था जिसमें मोदी को भाजपा का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का निर्णय लिया गया था। बाद में आडवाणी, राजनाथ सिंह व अन्य नागपुर स्थित आरएसएस के मुख्यालय गए और उन्हें मोदी को स्वीकार करना पड़ा। मोदी केवल भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। वे आरएसएस के भी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। आरएसएस, हिन्दू राष्ट्रवाद के प्रति पूर्णतः प्रतिबद्ध है। यह मानना भूल होगी कि आरएसएस ने मोदी की उम्मीदवारी का समर्थन इसलिए किया ताकि वे हिन्दू राष्ट्रवाद की राह से हट सकें। आरएसएस ने अपने हजारों कार्यकर्ताओं को मोदी के समर्थन में प्रचार अभियान में झोंक दिया है। अगर मोदी हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे से जरा भी हटेंगे तो आरएसएस तुरंत अपने समर्पित कार्यकर्ताओं को प्रचार अभियान से हटा लेगी। मोदी, हिन्दू राष्ट्रवाद के एजेण्डे पर कायम हैं, यह इस तथ्य से भी जाहिर है कि उन्होंने सन् २००२ के दंगों के लिए माफी मांगने से इंकार कर दिया है।
(मूल अंग्रेजी से अमरीश हरदेनिया द्वारा अनुदित)

About the author

इरफान इंजीनियर, लेखक इंस्टीट्यूट फॉर स्टडीज़ एण्ड कंफ्लिक्ट रिसॉल्यूशन (Institute for Peace Studies & Conflict Resolution) के निदेशक हैं।

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