Home » समाचार » क्या यह हिंदू राष्ट्र फिर सिखों का नरसंहार दोहराने पर आमादा है?

क्या यह हिंदू राष्ट्र फिर सिखों का नरसंहार दोहराने पर आमादा है?

Paradise Lost!
हेइया हो, गोड़ उठाइके मूं पर मारो!
के हग दें, सगरे जुलमी ससुरो!
আরদেব না আর দেব না রক্তে বোনা ধান মোদের প্রাণ হো!
आर देबो ना, आर देबो नारक्ते बोना धान, देबो ना , हेइया हो!

Hei Samaalo – Salil Chowdhury
Swaraj : Rapidly growing Ayurvedic and Herbal Pie with religious Flavour!
फिल्म हैदर के जरिये हमने कश्मीर को देखा है।
पंजाब पर फिल्म देखने की जरूरत नहीं है।
अस्सी का दशक है, जहां फिर हम लौट रहे हैं।

Are we losing Punjab because of intolerance?Paradise Lost?
सवाल यह है कि क्या हम फिर आपरेशन ब्लू स्टार का विकल्प चुनने की राह पर है?
सवाल यह भी है कि क्या यह हिंदू राष्ट्र फिर सिखों का नरसंहार दोहराने पर आमादा है?
सैफई का जश्न समाजवाद नहीं!
और न क्षत्रप वंश वर्चस्व जनादेश!
बंगाल में भयंकर राजनीतिक हिंसा,
फासीवादी गठजोड़ फिर
महागठबंधन का चेहरा!
महागठबंधन का महाजिन्न भी विकल्प नहीं!
जिसका चेहरा फिर वही बिररिंची बाबा!
परिपक्व जनतंत्र में सरबत खालसा भी!
न अलगाववाद है और न राष्ट्रद्रोह!
आत्मनिर्णय का अधिकार भी
लोकतांत्रिक मानवाधिकार!

मसलों को संबोधित करना सबसे जरूरी तो सैन्य दमन तंत्र सबसे बड़ा, सबसे खतरनाक आतंकवाद,  मनुस्मृति राष्ट्र!

पलाश विश्वास
हेइया हो, गोड़ उठाइके मूं पर मारो!
के हग दें, सगरे जुलमी ससुरो!
धान देबो ना, रक्ते बोना धान, देबो ना , हेइया हो!
”হে ই সামালো ধান হো,  কাস্তেটা দাও শান হো,  জান কবুল আর মান কবুল—আরদেব না আর দেব না রক্তে বোনা ধান মোদের প্রাণ হো!
” সলীল চৌধুরীর সুরারোপিত এ গানটি প্রথম গাওয়া হয়েছিল তখন,  যখন বাংলা জুড়ে চলছিল রক্তে দোলা লাগা ‘তেভাগা আন্দোলন’।  ‘
कोस दर कोस बोली बदल जाई, यहींच हिंदुस्तान। देहात के लोग जो बतावत रहे, हमउ दाग दिहिस। संस्कृत हमारी मातृभाषा नहीं।
शासकों का विमर्श हमारा विमर्श नहीं और न उनका व्याकरण हमारा व्याकरण ह। न उनकी विधा हमारी विधा। माध्यम भी वैकल्पिक चाहि, हर हाल मा चाहि कि जनसुनवाई जारी रहे।
उनका रंगबरंगा समाचार बेमतलब। हम चीखों को दर्ज करै हो।
हमारे पुरख भूले रहिले के वेद पाठ से वंचित हुए तो नइका वेद रचना चाहि। मनुस्मृति का जबाव बहुजनस्मृति बा।
हमारे पुरख भूले रहिले के जाति व्यवस्था का जवाब जाति उन्मूलन ह। वर्गीय राजकाज का जवाब वर्गहीन शोषणा विहीन समता और न्याय। यहींच हमारा लक्ष्य।
यहींच हमारी मुक्ति। मोक्ष।
हमारी आजादी सहिष्णुता बहुलता।
यहींच पंचशील बुद्धमय भारत की विरासत।
यहींच आमाची मातृभाषा। आमाची संस्कृति। आत्मसम्मान।
कुलो संकट यहींच कि म्हारा देशमा जो प्रचंड शोर शराबा, भूत प्रेत ब्रिगेड का रंगीला तांडव दंगाई है, उसकी वजह कुछो आउर नइखे
मतबल कि गोआ के चुनांचे कि अपढ़ अधपढ़ राजकाज वर्ग जाति वंश वर्चस्व का एकाधिकारवादी अविराम आक्रमण से लहूलुहान बेजुबान जनता की चीखें कहीं दर्ज नहीं होतीं आउर जौण जां बइठलन ऐंठके तमामो मठाधीश, लूटतंत्र मा वे सारे महामहिम,  महामहिमा ढेरो ढेर पादे ह।
पण ज्ञान विज्ञान खातिरे इस कटकटेला अंधियारे के कारोबार मा कोई स्पेस नइखे। यही कुलो असहिष्णुता बा।
यही कुलो नरसंहार ह बहुलता का।
सुन लो, बूझ लो मूक वधिर, भारतीय जन गण, भारतीय धर्म और संस्कृति, सभ्यता और मनुष्यता का कुलो बेड़ा गर्क यहींच।
का कहि, पकड़कर कलबुर्गी बना दें, खतरा यहीं त बुद्धिमान चतुर सुजान जीभ लपेट कर गाफला ह। टट्टी पेशाबो बंद ह।
हिंदू धर्म और भारतवर्ष दुनो इसी खातिर खतरे में बा के सबसे खतरनाक ब्रुटस ह आउर उ ब्रुटस ढेरो ढेर पादे ह।
मतलब के बाहरो से खतरा जेतना, भीतरे खतरा उससे कहीं जियादा।
ब्रुटस पर भरोसा खतरनाक ह, संभर जइयो!देश खतरे में। संभर जइयो!
नदीनारे न जइयो!
कि किस्सा यही जुलियस सीजर से लेकर कैनेडी लिंकन, इंदिरा राजीव मुजीब बेनजीर ह, जेम्सवा ने अंखवा मा उंगली किये रहे।
बाकीर किस्सा ससुरे कर्मचारी नौकरी पर नहीं होंगे तो कैसा वेतन और कैसी वेतनवृद्धि?
सावन के अंधे के लिए हरियाली ही हरियाली, लेकिन मौसम बदल गयो रे।
सरकार के लिए जनादेश अब बड़ा सरदर्द है, अर्थव्यवस्था को ठिकाने लगा दिया गया है।
आर्थिक अखबारों ने भी दावा कर दिया कि एकदम करीना कपूर की तरह केकवाक कैटवाक राइड है। सरकार अडिग है।

ब्रुटस पर भरोसा खतरनाक ह, संभर जइयो!
कि किस्सा यही जुलियस सीजर से लेकर कैनेडी लिंकन, इंदिरा राजीव मुजीब बेनजीर ह, जेम्सवा ने अंखवा मा उंगली किये रहे!
भौते भौत पादै ह खतरनाक बाहुबलि दंगाई ब्रुटस!
यह अंध राष्ट्रवाद विश्वास घाती ब्रुटस का लूटतंत्र है। समझ लो।
अधर्म असहिष्णुता की यह सुनामी पितृसत्ता की बलात्कार सुनामी। समझ लो कि हाजतरफा बंद। मनुष्यता दफा रफा।
मातृसत्ता का आवाहन मूर्तिपूजा और मातृजाति दासी।
मनस्मृति का कुलो सार यहीं कि नागरिक मनवाधिकार निषिद्ध।
विमर्श की भाषा विधिसम्मत होनी चीहिए। विधि लेकिन प्राविधि यानी भाषिक तकनीक या विशुद्ध तकनीक नहीं है।
यह विधा ऐसी है,  जिसके विकास के लिए शिक्षा दीक्षा पाठ उच्च शिक्षा और शोध की स्वायत्तता उतनी ही जरूरी है, जितनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीयता का अधिकार।
राष्ट्रीयता का अधिकार लोकतंत्र में संघीय शासन प्रणाली है जो संसदीय व्यवस्था भी है।
हमारे संविधान निर्माताओं ने गहन विचार विनिमय के बाद संघीय लोकतंत्र का विकल्प अपनाया है, एकाधिकारवादी आक्रामक एकात्म केंद्र का कतई नहीं।
हम इस सिलसिले में संघीयढांचे के बारे में बाबासाहेब का संविधान सभा में पहिला भाषण कोट किये रहे। फिर करब कोट।
समझ लो कि कयामत अभी बाकी है। रौरव नर्क बाकी ह।
जब हम पत्रकारिता में दाखिल हुए 1980 में तो शायद तूफान मेल से नई दिल्ली से मुगलसराय उतरकर अलस्सुबह धनबाद के मास्टरपाड़ा में जिन मदन कश्यप के डेरे पर हम पहुंचे, उनने उन दिनों लघुपत्रिका अंतर्गत प्रकाशित किया था और हम लोगों ने झारखंड आंदोलन के संदर्भ और प्रसंग में राष्ट्रीयता पर एक विशेषांक निकाला था।
जिसका फोकस आत्मनिर्णय का अधिकार था।
अब वस्तुनिष्ठ विमर्श के लिए ये संदर्भ और प्रसंग बेहद जरूरी है। बिना संदर्भ और प्रसंग के कोई भी व्याख्या अनर्थ है।  संदर्भ और प्रसंग के मुताबिक सटीक व्याख्या ही तमसोमाज्योतिर्गमय है।
किसी शाखा की पाठशाला में इस वैज्ञानिक पाठ का चलन नहीं है। सारी व्याख्याएं, सारे प्रवचन इसीलिए अवैज्ञानिक और इतिहास के खिलाफ अंध राष्ट्रवाद का आवाहन। देश काल पात्र का अज्ञान।
इसीलिए पौराणिक, मिथक हवाले से यह मिथ्या वैदिकी उत्सव,  गायत्री मंत्र जाप, योगाभ्यास, मूर्ति पूजा, तंत्र मंत्र ताबीज और तिलिस्म अंधियारा का कटकटेला अंधियारे का कारोबार। तमामो पासवर्ड आखिरकार खुल जा खुल जा सिमसिम है और कुलो जनता कासिम ह, अलीबाबा कोई नहीं। लाश के चालीस टुकड़े जरुर।
धर्म का अवैज्ञानिक पाठ और प्रवचन अधर्म का कार्निवाल यह। मुक्त बाजार और अबाध पूंजी को महोत्सव यह।
दिक्कत है कि बिना इतिहास के पाठ, बिना वैज्ञानिक दृष्टि, बिना लोक और परंपरा की समझ के जो संस्कृति के अपढ़ और अधपढ़ प्रवचन अनंत है, वही अंध राष्ट्रवाद है।
जो दरअसल राष्ट्रीयताओं की हत्या पर तुला है और उसी मुताबिक सैन्य दमनतंत्र में तब्दील राष्ट्र।
इसीलिए लोकतंत्र में अनिवार्यजनता की भागेदारी की बजाय सत्ता में भागीदारी के बहाने हर सूबे में वंश वर्चस्व।
नस्ली वंश वर्चस्व की मनुस्मृति ग्लोबल आर्डर का एजंडा यहींच नरसंहार।
बार बार भगवान का अवतार नहीं है अधर्म नाशे। अधर्म खातिरे अपदेवताओं और अपदेवियों का अधर्म अबहुं राजकाज हुई रहा।
हमउ बड़भाग लिये जनमे हो के कुलो पंद्रह साल की नाबालिग उम्र मा हाईस्कूल परीक्षा में मेरिट की खातिर जीआईसी नैनीताल में दाखिला हुआ रहा आउर वहींच अतल नीली नैनीझील की गहराइयों से निकरै ब्रह्मराक्षस का थान रहे जो जीआईसी मा पहली छमाही की हमारी परीक्षा कापी जांचे रहे आउर फटाक से गरदन पकड़कर धर लियो। उन्हींकी अग्निदीक्षा है कि नाही भय। भय नाई।
हमारे गुरुजी ने कहा हुआ है कि जरूरी नहीं कि सबकुछ पढ़ लिया जाये। बल्कि जरूरी यह ठैरा कि हर जरूरी चीज जरुर पढ़ ली जाये।  
भाषाओं विधाओं के आर पार। सुकरात प्लेटो अरस्तू कोपरनिक्स के नक्शेकदम। वे ही हमारी पाठ तय किये रहे तमाम क्लासिक आउर कालजयी। वेहीं अंग्रेजी मा हमें धकेले रहे आउर हमेशा ख्याल रखा कि पांव वहींच मुंबईकर कि क्रीज से हिले नहीं एको इंच। गोबर पानी कीचड़ में धंसकर चाहे जेतना उड़ि सकै, उड़ो। अबहुं उनकी नजर है।
हमारे डैने दरअसल हमारे तमामो शिक्षकों और शिक्षिकाओं के डैने हैं आउर हम दरअसल उन्हींकी परिकथा जी रहे हैं।
उन्हीं के ख्वाब दरअसल हमारे ख्वाब हैं।
उन्हीं के मंत्र दरअसल चक्रव्यूह के तोड़।
कत्थक के तोड़।
पूरा नाच पूरा ताल पूरा कत्थक अभी बाकी।
हमारे गुरुजी ने कहा हुआ है कि जरूरी नहीं कि सब कुछ देख लिया जाये। बल्कि जरूरी यह ठैरा कि हर जरूरी चीज जरूर देख ली जाये।
हमारे गुरुजी ने कहा हुआ है कि जरूरी नहीं कि सबकुछ सुन लिया जाये। बल्कि जरूरी यह ठैरा कि हर जरूरी चीज जरुर सुन ली जाये।
संयम और पंचशील की यह परंपरा भारतवर्ष की बहुलता और सहिष्णुता है। जिसे हमने अधर्म और असहिष्णुता बना दिया है।
इसलिए विज्ञान निषिद्ध है और पूंजी प्रवाह अबाध, देश मुक्त बाजार। इसीलिए कारपोरेट योगाभ्यास, कारपोरेट प्रायोजित पूजा.जहां आस्था का कोई उत्सव नहीं है। लोक नहीं है।
मातृभाषा विलुप्तप्राय है।
व्यक्ति, परिवार और समाज का अवक्षय है।
संदर्भहीन प्रसंगविहीन प्रलाप का अविराम प्रवचन धर्मोन्मादी ध्रूवीकरण का यह मुक्तबाजारी उत्सव कार्निवाल बलात्कार सुनामी प्रलयंकर है। ईश्वर का मिथ्या मिथक। मिथकीय धर्म मुक्तबाजारी।
अंतर्गत के उस अंक में हमने एक चमार के बेटे का लिखा छापा था आत्मनिर्णय के अधिकार पर। उस चमार के बेटे को दुनिया जोसेफ स्टालिन कहती है। साम्यवादियों का वह मसीहा लेकिन अबाध पूंजी आउर एफोडीआई, निजीकरण और विनिवेश के मुक्तबाजार के लिए तानाशाह प्रचारित है।
चमार के उस बेटे स्टालिन ने रूस का सोवियत संघ बना दिया,  तमाम राष्ट्रीयताओं को जोड़कर। राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देकर।
गौरतलब है कि 1917 में जो ऱूसी  अक्टूबर क्रांति हुई और जो  सोवियत संघ बना, दोनों का विघटन हो गया है।  हालांकि,  बोल्शेविक विचार क्रांति और सोवियत संघ के विश्व बंधुत्व के सोवियत संघीय गणराज्य में स्टालिन के नेतृत्व में आत्मनिर्णय के अधिकार को मान्यता देकर जारतंत्र के बदले एकीकरण की प्रक्रिया के तहत जो सोवियत संघ का गठन हुआ, वह अब इतिहास है।
जिसके तहत राष्ट्रीय नीति बोल्शेविक।  सोवियत की राष्ट्रीय नीति के तहत राष्ट्रीयताओं का विकास और इसी के तहत योगदान केंद्रीय सरकार में लेकिन संघीय ढांचा गणराज्यों का।
यह समानता के सिद्धांत पर आधारित।
राष्ट्रीय नीति बोल्शेविक और राष्ट्रों और नागरिकों  और घोषणा पत्र में निहित आत्म-निर्णय के लिए राष्ट्रों के अधिकार (2 नवम्बर 1917) रूस के लोगों के नागरिक मौलिक अधिकारों और काम करने के अधिकारों की घोषणा हुई इसी बोल्शेविक नीति के तहत, जिसे स्टालिन ने अंजाम दिया।
संदर्भ शोषित लोगों (जनवरी 1918)।
नि: शुल्क और अनुल्लंघनीय घोषित मान्यताओं,  सीमा शुल्क,  लोगों की राष्ट्रीय और सांस्कृतिक संस्थाओं विकास इन्हीं नीतियों के तहत सोवियत राष्ट्र बना।  वोल्गा और Crimea,  साइबेरिया और Turkestan,  काकेशस और Transcaucasia,  न केवल रूस के अंग बने आत्मनिर्णय के इसअधिकार के तहत बल्कि विदेशियों की आस्था में तब्दील हुई सोवियत सरकार।
सोवियतसंघ का वजूद नहीं है लेकिन यह इतिहास का सबक है, सोवियत राष्ट्र का गठन और विघटन दोनों जबकि हमने विघटन के खिलाफ लड़ाई अभी शुरु नहीं की है और धर्मोन्मादी फासीवादी, जातिवादी विघटन के हम तेजी से शिकार हो रहे हैं।
इसी तरह महाबलि अमेरिका में कानून सर्वत्र एक सा नहीं है और न पैनल कोड एक सा है। अमेरिका हमारी वैशाली के गणराज्यों का उत्तरआधुनिक पाठ है, जहां पचास गणराज्यों का महासंघ है।
युनाइटेड स्टेट्स है वह पचास राज्यों का जिनका अलग अलग कानून है, उनके आत्मनिर्णय का अधिकार वहीं है, जो स्टालिन ने आजमाया हुआ है।
पंजाब में, कश्मीर में या मणिपुर में आत्मनिर्णय की मांग को आतंकवाद कहकर, अलगाववाद कहकर दमन की भाषा के तहत सैन्यतंत्र का विकल्प आजमाना लोकतांत्रिक भारत के लिए आत्मघाती है।
यह भारत के संविधान के तहत भारतीय लोकगण राज्य के संघीय ढांचे पर निर्मम कुठाराघात है।
इसी खातिर हमने जाने अनजाने खस्मीर, पंजाब और पूर्वोत्तर को आग के हवाले कर दिया है और वहां जन सुनवाई की कोई गुंजाइश बाकी देस की तरह वहां भी नहीं है। कानून का राज नहीं है।
मेरे देश के लोगों, पंजाब में फिर अस्सी के दशक की भारी दस्तक है। मैकबैथ राजा हैं। राजकाज मैकबैथ का है।
फिल्म हैदर के जरिये हमने कश्मीर को देखा है।
पंजाब पर फिल्म देखने की जरुरत नहीं है।
क्योंकि फिर अस्सी का दशक है, जहां फिर हम लौट रहे हैं।
सवाल यह है कि क्या हम फिर आपरेशन ब्लू स्टार का विकल्प चुनने की राह पर है?
सवाल यह भी है कि क्या यह हिंदू राष्ट्र फिर सिखों का नरसंहार दोहराने पर आमादा है?
पंजाब में हुए हालिया शरबत खालसा पर राजनीतिक विवाद का स्वर लेकिन हमें ये ही संकेत दे रहा है कि हम पंजाब और पूरे देश को फिर आग के हवाले करने की तैयारी में हैं। सावधान।
हम जानते हैं कि मार्क्स और एंगेल्स ने औद्योगिक पश्चिमी यूरोप की उत्पादन प्रणाली के मद्देनजर कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो की रचना की थी जिसके मुताबिक क्रांति अमेरिका और इंग्लैंड या फ्रांस जर्मनी और स्पेन इटली में होनी थी।
लेकिन क्रांति हो गयी कृषिजीवी रूस में किसान मजदूर मेहनतकश गोलबंदी से। लेनिन उसके शिल्पी रहे क्रांति हुई चीन में माओ के लंग मार्च के बाद, जहां महाप्राचीर अब खुली हुई है, बयार मुक्तबाजार।
सोवियत संघ नहीं रहा। तो वो चीन भी चीन नहीं रहा।
दुनिया पर फिर पूंजी और साम्राज्यवाद का विजय पताका फहराया।
विचारधारा की मृत्युघोषणा हुई रहे।
इतिहास की मृत्यु घोषणा हुई रहे।
मातृभाषा की मृत्यघोषणा हुई रहे।
विधाओं की मृत्युघोषणा हुई रहे।
आउर हमउ ग्लोबल आर्डर, शैतानी दुश्चक्र के मातहत उपनिवेश बानी। स्वर्ग से रसातल हुई रहा इंसानियत का यह मुल्क।
कवि मिल्टन अपने सूरदास की तरह नेत्रहीन इसी पीड़ा को आवाज देत रहे अपने पैराडाइज लास्ट में। कालजयी का मतलब यही कि सुकरात, प्लेटो, अरस्तू शेक्सपीअर, कालिदास, रवीद्रनाथ अब भी प्रासंगिक हैं।

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: