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क्या ये सांप्रदायिकता के खिलाफ दिया गया वोट है?

राजेश कुमार
10 अप्रैल को दिल्ली में लोकसभा के लिए मतदान हुआ। कांग्रेस, बीजेपी और आम आदमी पार्टी के साथ कई दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों की किस्मत ईवीएम में क़ैद हो गई। लेकिन यह चुनाव हमारे जैसे कुछ लोगों के जेहन में कई गंभीर सवाल छोड़ गया है। इन सवालों का जवाब तलाशना होगा वरना देश की राजनीति को बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है।
बात करते हैं पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र की जहां शुरुआती रूझान बता रहे हैं कि मुस्लिम मतदाताओं ने ज्यादातर आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार राजमोहन गांधी को वोट दिया है। लेकिन सवाल है कि क्या यह सांप्रदायिकता के खिलाफ दिया गया वोट है? जैसा कि वोट देने वाले दावा कर रहे हैं।
 पूर्वी दिल्ली के मुस्लिम समेत सभी धर्मनिरपेक्षतावादी मतदाताओं के पास सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार डॉ प्रेम सिंह के रूप में एक सही धर्मनिरपेक्ष और संघर्षशील उम्मीदवार मौजूद था उन्हें सीपीआई और जदयू का समर्थन प्राप्त था। सीपीआईएम और सपा ने यहां उम्मीदवार नहीं दिया था।
डॉ प्रेम सिंह उन गिने चुने लोगों में हैं जिन्होंने धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा के लिए लगातार वैचारिक और सक्रिय संघर्ष किया है। 1984 के सिख विरोधी दंगे हों, 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस का मामला हो, 2002 में गुजरात की सांप्रदायिक हिंसा हो, असम की सांप्रदायिक हिंसा हो या हाल में मुजफ्फरनगर का दंगा हो, वे लगातार सांप्रदासिक ताकतों के खिलाफ मोर्चा लेते रहे हैं। आरएसएस के सांप्रदायिक चरित्र की उन्होंने गहरी पड़ताल की है। उनकी पुस्तिकाएं ‘गुजरात के सबक’, मिलिए योग्य प्रधानमंत्री से’, ‘संविधान पर
भारी सांप्रदायिकता’, पुस्ततक ‘कटटरता जीतेगी या उदारता’ तथा अनेक लेख इस लिहाज से खासे चर्चित रहे हैं।
इस चुनाव में डॉ. प्रेम सिंह को मुसलमानों के ‘मसीहा’ राजेन्द्र सच्चर का समर्थन हासिल था। उन्होंने बाकायदा अपील जारी करके डॉ. प्रेम सिंह के लिए समर्थन मांगा था। वह अपील चुनाव प्रचार में वितरित भी की गई। जस्टिस राजेन्द्र सच्चर अल्प संख्यकों के साथ सभी वंचित तबकों के हकों की लड़ाई लड़ते रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर झुकी हुई कमर के साथ उन्होंने पूर्वी दिल्ली की गलियों में निकल कर डॉ. प्रेम सिंह के लिए वोट मांगे। हमने मुस्लिम बुद्धिजीवियों और सामाजिक धार्मिक हस्तियों को अक्सर कहते सुना है कि जस्टिस राजेन्द्र सच्चर का दर्जा उनके लिए बहुत बड़ा है। तो फिर क्या वजह रही कि मुस्लिम मतदाताओं ने अपने मसीहा की अपील अनदेखी कर दी। उनका यह फैसला देश के मुस्लिम नेताओं, बुद्धिजीवियों और पत्रकारों पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।
जहां तक आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार राजमोहन गांधी का सवाल है तो अपने चुनाव प्रचार के दौरान सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार डॉ. प्रेम सिंह ने उनसे 10 सवाल पूछे थे। इन सवालों का परचा छपवाकर पूरे लोकसभा क्षेत्र में बंटवाया गया। उनमें से मैं शुरुआती दो सवालों का जिक्र करना चाहूंगा जिनका जवाब आज तक नहीं मिला है और राजमोहन गांधी और उन्हें वोट देने वालों के पास इन सवालों का जवाब है भी नहीं ।
“1. अमरेकी खुफिया एजेंसी सीआईए समेत अमरेकी सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा चलाई जानेवाली ‘मोरल रीआरमामेंट’ (एमआरए) संस्था की नवउपनिवेशवादी-नवसम्राज्यवादी मुहिम में अहम भूमिका रही है। इस संस्था से आप कबसे और किस हैसियत से संबद्ध रहे हैं?”
2. क्या जनसंघ/भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने आपको 1980 में जबलपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाया था?
आप किन पार्टियों से कितनी बार लोकसभा चुनाव लड़ चुके हैं ?”
ये दो ऐसे सवाल हैं जो किसी उम्मीदवार के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को उजागर करने के लिए काफी हैं। राजमोहन गांधी का सीआईए से जुड़ी ‘मोरल रीआरमामेंट’ (एमआरए) संस्था से लंबा ताल्लुक रहा हैं। जाहिर है, वे अमेरिका की नवसाम्राज्‍यवादी मुहिम में भागीदार हैं।
भाजपा की स्थापना दिसंबर 1980 में की गई। 1980 का लोकसभा चुनाव जनसंघ ने वाजपेयी के नेत़त्व में जनता पार्टी के नाम से लड़ा। जाहिर है, जीतने पर राजमोहन गांधी को भाजपा के साथ जाने में कोई विचारधारात्मक दिक्कत नहीं होगी। वैसे भी जिस आम आदमी पार्टी के वे उम्मीनदवार बन कर चुनाव लडे उसकी संविधान समेत किसी विचारधारा में आस्था नहीं है। अपने चुनाव प्रचार के दौरान प्रेम सिंह ने एक लेख छपवाकर बंटवाया जिसका शीर्षक था “‘आप’ की स्ट्रेटजी – ताकि मुस्लमानों का वोट भी मिल जाए और मोदी भी जीत जाए”। इस लेख का भी मुस्लिम मतदाताओं और धर्मनिरपेक्षतावादियों पर कोई असर नहीं पड़ा। पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र का रूझान इस लेख की मूल स्था्पना की तरफ ही जाता लग रहा है। यानी मुसलमानों की एक बड़ी आबादी को सांप्रदायिक ताक़तों को रोकने के नाम पर सांप्रदायिक ताकतों को मजबूत करने की तरफ धकेला जा रहा है। इसके दूरगामी नतीज़े धर्मनिरपेक्षता के संवैधानिक मूल्यों और हिन्दुस्तान की तहजीब को भुगतने पड़ सकते हैं ।
और अंत में एक और महत्वपूर्ण बात कि पूर्वी दिल्ली के चुनाव में दुनिया के कमजोरों की आवाज़ और मानवता की विभूति गांधी का चुनावी लाभ के लिए निर्लज्जतापूर्वक इस्तेमाल किया गया। ‘गांधी के पौत्र राजमोहन गांधी’ लिख कर पोस्टर पर गांधी की तस्वीर लगाई गई। डॉ. प्रेम सिंह ने 10 सवालों के अंत में अफसोस के साथ पूछा है, ‘’क्या यह वाजिब है?’’ लेकिन कहीं से कोई जवाब नहीं है, लेकिन इन सवालों का जवाब ढूंढे बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकता।

About the author

राजेश कुमार, लेखक टीवी पत्रकार हैं

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