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क्या विधर्मियों के सफाये से किसी देश के तमाम बुनियादी मसले हल हो जाते हैं

अब सवाल है कि क्या विधर्मियों के सफाये से किसी देश के तमाम बुनियादी मसले हल हो जाते हैं जबकि तेल पीज जानेवालों के हवाले देश है।दुनिया है।
पलाश विश्वास
अकबका गये तो कुछ दोष नाहिं गुसाई। दिमाग का फलुदा हो गया।
बिहारे नीतीश कुमार फेर, जनादेश पुराना भी नहीं हुआ रहा कि मिठाई पर लक्जरी टैक्स लगा दिया।
अब जी का जंजाल हुआ जाये बिहारियों की भैंसोलाजी कि जबतक समोसे में रहेगा लालू,राज करेगा लालू।
लालू की भैंस तो गई पानी में।
बहरहाल लालू का जलवा ते वहींच ह। राजद सुप्रीमों लालू प्रसाद यादव ने एक बार फिर बीजेपी और आरएसएस पर हमला बोला है. लालू प्रसाद यादव ने बीजेपी और आरएसएस पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि भाजपा और आरएसएस वाले खटमल हैं। ये लोग खटमल की तरह निकलकर लोगों को काटते रहते हैं. ।
जो हो सो हो, बिहार का जलेबी सिंघाढ़ा वाला नास्ता तो गया।
सामने बजट है।
होशियार हो जाओ भाया।
बजट से पहले सामाजिक न्याय का ई नजारा ह तो आगे आगे का होई।
निवेशक पहले से ही कच्चे तेल के अत्यधिक उत्पादन और रिफाइंड उत्पादों के बढ़ते भंडार से चिंतित थे, इसी बीच चीनी शेयर बाजारों में भारी गिरावट की वजह से तेल की कीमत गुरुवार को 33 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई। अप्रैल, 2004 के बाद यह तेल की न्यूनतम कीमत है।
विश्लेषकों का अनुमान है कि दुनिया भर में तेल के भंडार में बढ़ोतरी होने की उम्मीद है जिससे कीमतों पर दबाव और भी बढ़ सकता है।
सीधा हिसाब है कि जब कच्चा तेल 160  डालर बिक रहा था,तब आटा चावल दाल तेल सब्जी मछली मांस वगैरह बगैरह किचन की जरुरी चीजों का भाव किराने का बही खाता रखे हों, तो जोड़कर देख लें। अब का का भाव है, आप सगरे जानत हो।
घरेलू बजट की छो़ड़िये। रुपया डांवाडोल है। डॉलर के मुकाबले रुपये में आज भारी गिरावट आई है।
रुपया 28 महीने के निचले स्तर पर लुढ़क गया है। 1 डॉलर की कीमत 67.30 रुपये के करीब पहुंच गई है।
चिकित्सा और शिक्षा का बजटभी तनिको चेक कर लीजिये।
परिवहन बिजली वगैरह अलग से। घरेलू बजट में राहत कितनी मिली है, जबकि आंकड़े कुछ और कहते हैं। मसलन सरकार भले ही थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित मुद्रास्फीति को काबू कर शून्य से नीचे रखने में कामयाब रही हो लेकिन खाद्य वस्तुओं की बढ़ती महंगाई दर बड़ी चुनौती बनी हुई है।
देश की अर्थव्यवस्था का हाल बुलेट ट्रेनवा ह तो घरेलू बजट क्यों डांवाडोल होना चाहिए और अच्छे दिन का नजारा ई कि समोसे और मिठाई पर भी लक्जरी टैक्स।
कल अगर खुदा न खस्ता फिर हवा पानी खाने पीने और जीने पर भी टैक्स लग जाये तो अजब गजब न कहियेगा।
तेल युद्ध और अरब वसंत का नजारा है कि सारा तेल चूं चूं कर वाया आईसिस अमेरिका और इजराइल पहुंच रहा है और ओपेक देशों का तेल बाजार पर कोई नियंत्रण है ही नहीं।
तो कच्चा तेल का भाव हो गया तीस डालर प्रति बैरल।
जो कभी भी बीस डालर हो सकता है।
संभावना दस डालर प्रति बैरल हो जाने की है।
गौरतलब है कि बजट घाटा में योगदान सबसे ज्यादा कच्चे तेल के आयात की वजह से है।रही सही कसर बांग्लादेश विजय के बाद निरंतर हथियारों का सुरसा मुखी आयात है,जिससे अब परमाणु चूल्हा नत्थी हो गया।
रोजे रक्षा सौदा। दलाली की बात हम उठा नहीं रहे हैं। उठाते हुए कितने लोग उठ गये। अभी कुछो साबित नहीं हुआ है जैसे कि शारदा चिटफंडवा का मामला है।
फिर बाकी सारी सेवाओं और प्रतिष्ठानों की तरह, हर चीज मय भारत सरकार और राज्य सरकारों और समूची राजनीति से लेकर अपराध तक एफोडीआई ग्रीक त्रासदी है।
तेल पर खर्च अगर 160 डालर के पैमाने पर तीस डालर भी है तो इस हिसाब से अर्थव्यवस्था पर दबाव में कमी भी होनी चाहिए। महंगाई और मुद्रास्फीति की चर्चा होते ही अर्थशास्त्री कल तक कच्चा तेल का रोना रोते रहते थे।
अब सारे लोग इस मुद्दे पर चुप्पा मार गये कि तेल अगर सस्ता हुआ है तो मंहगाई और मुद्रास्फीति इतनी बेलगाम क्यों है जबकि अर्थव्यवस्था की सेहत बाबुलंद बतायी जा रही है।
इस हिसाब से चीजों और सेवाओं की कीमतें तो एक चौथाई रह जानी है। लेकिन हो इसका उलट रहा है कि लंगोट और लुंगी भी खतरे में हैं कि राष्ट्रहित के मुक्त बाजार में कब छीन जाई।
बजट बनाते हुए जनसुनवाई कभी हुई हो, ऐसा भारतीय इतिहास में कोई वाकया हो, तो हमें जरूर जानकारी दें।
जो फुक्का फाड़े रो चिंघाड़ रहे हैं कि कारोबार के लिए टैक्स बहुते जियादा है। अरुण जेटली उन्हें ढांढस दे रहे हैं कि थमके, टैक्स का इंतजाम कर देते हैं।
फिर वही सवाल कि तेल का बचत कहां गायब है। 160-30 यानी 150 डालर की बचत का हिसाब किताब क्या है। किस किसके जेब में यह खजाना गया है।
राजनीति यह सवाल नहीं पूछ रही है। सामाजिक न्याय के चितेरे भी राजस्व घाटा पाटने के लिए मुखर्जी चिदंबरम और जेटली के चरण चिन्हों को चूम-चूमकर आगे बढ़ते जा रहे हैं।
कारपोरेट टैक्स में लगातार कटौती होती रही है। अब उसका टंटा ही खत्म करने की तैयारी है।
टैक्स जो आखेर माफ होता है, कर्ज जो आखेर माफ होता है, कर्ज जो हजारों करोड़ का बकाया है, उसका कोई हिसाब किताब है नहीं।
विदेशी निवेशक के चेहरे हमेशा परदे के पीछे हैं।
मारीशस, दुबई और सिंगापुर से जो धुआंधार निवेश हो रहा है और शेयर बाजार से हमें नत्थी करके जो मुनाफावसूली का सांढ़ बनाम भालू खेल है, वह धर्मांध सुनामी में डिजिटल इंडिया के पढ़े लिखे नागरिकों को भी नजर नहीं आवै, तो तेल का हिसाब किताब पूछने के बजाये समोसे और मिठाई तक पर लक्जरी चैक्स लगाने के राजकाज पर बल्ले-बल्ले होना चाहिए।
अब टैक्स के मामले में तो समानता भरपूर है। जो अरबपति हैं, उनके मत्थ पर बोझ जाहिरे है कि सबसे जियादा है, तो उसे उतारने में केंद्र और राज्य सरकारों की सरदर्द कुछ जियादा ही है।
आम जनता तो जो टैक्स भर सकती है, उनकी फटीचर औकात के मुताबिक वह बहुतै कम है और देश की अर्थव्यवस्था उसे चल नहीं सकती। इसलिए वित्तीय प्रबंधकों और बगुलाभगत विशेषज्ञ निनानब्वे फीसद जनता का टैक्स बढ़ाकर राजस्व घाटा और वित्तीयघाटा दूर करना चाहते हैं तो उनसे अलग नहीं है समता और सामाजिक बदलाव के चितेरे भी।
हिंदुत्ववादियों के लिए खुशखबरी है कि मैडम हिलेरी को अब इजराइल का कोई समर्थन नहीं है और रिपब्लिकन ट्रंप के हक में डेमोक्रेट वोट बीस फीसद के करीब टूट जाने की खबर है।
ट्रंप भाया लगता है कि नागपुर से दीक्षा ली हुई है और उन्होंने अमेरिका को मुसलमानों से वैसे ही रिहा करने पर आमादा हैं जैसे हमारे भाग्यविधाता हिंदू राष्ट्र के लिए गैर हिंदुओं का सफाया करना चाहते हैं।
इसका आलम यह है कि अमेरिका के पड़ोसी देश यूरोप की तरह घबड़ा गया है कि जैसे अफ्रीका और मध्यपूर्व के शरमार्ती सैलाब ने उनका कबाड़ा कर दिया है वैसे ही अमेरिका से शरणार्थी सुनामी कनाडा का सूपड़ा साफ कर देगी।
नतीजतन कनाडा ने ऐहतियाती तौर पर अमेरिका से लगी सीमाओं पर फेस लगा दी है।
अमेरिका राष्ट्रपति ने जो अपने आखिरी भाषण में धर्म और नस्ल के प्रति विद्वेष और घृणा के खिलाफ मनुष्यता के लिए गुहार लगाई है,उसके बाद वे बिरंची बाबा टायटैनिक बाबा के कितने मित्र बने रहेंगे ,अब यह भी देखना है।
अब सवाल है कि क्या विधर्मियों के सफाये से किसी देश के तमाम बुनियादी मसले हल हो जाते हैं जबकि तेल पी जानेवालों के हवाले देश है। दुनिया है।

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