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क्या सच में हालात हमारे पक्ष में हैं?

 जो मीडिया कर्मी मोदी सुनामी बनाने के लिये एढ़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं, मजीठिया के हश्र को देखकर भी वे होश में नहीं है। वैसे मीडिया में स्थाई नौकरियां अब हैं ही नहीं।
एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
आज हम इस भ्रम में जी रहे है कि हम आजाद हैं। क्या हम सच में आजाद है? हम कमा तो रहे हैं मगर दूसरों के लिये मजदूर बनके। मजदूरी की औकात के सिवाय इस मुक्त बाजारु अर्थव्यवस्था में आम आदमी आम औरत के हिस्से में कुछ नहीं है। कांग्रेस और भाजपा आगामी लोकसभा चुनाव में युद्धरत प्रतिपक्ष है। पूरा देश नमोमय बनने को तैयार है और अब भारत उदय के बाद ब्राण्ड इण्डिया की बारी है। जनादेश चाहे कुछ हो, सरकार चाहे किसी की हो, खूनी आर्थिक एजंडा ही सार्वभौम संकल्पपत्र है जो कॉरपोरेट राज में सत्ता का पारपत्र है।
हिंदू राष्ट्र की बुनियादी अवधारणा गैरहिंदुओं के लिये नागरिक अधिकारों का निषेध है।गैर हिंदू महज विधर्मी नहीं है। यह समझने वाली बात है। गैर हिन्दू में शमिल वे तमाम लोग हैं जो इस वक्त हिंदू राष्ट्र के सिपाहसालार और पैदल सेना हैं। ग्रहांतरवासी देवों देवियों के हाथों बेदखल है देश और पूरी अर्थव्यवस्था उन्हीं के नियंत्रण में है। वे छिनाल पूँजी काला धन के कारोबारी है और शेयर बाजार में सांढ़ों की दौड़ से जाहिर है कि वित्तीय पूँजी, विदेशी पूँजी और विदेशी निवेशकों के हाथ में हमारा रिमोट कंट्रोल है। दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों के प्रति प्रतिबद्ध हैं हमारे चुनकर संसदीय लोकतंत्र चलाने वाले तमाम भावी जनप्रतिनिधि।
विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों को तरजीह, खुदरा कारोबार से लेकर रक्षा क्षेत्र तक में अबाध विदेशी प्रत्यक्ष निवेश, अंधाधुंध विनवेश, ठेका मजदूरी के मार्फत पढ़े लिखे कुशल और दक्ष नागरिक बहुराष्ट्रीय पूँजी और कॉरपोरेट इण्डिया के बंधुआ मजदूरों में तब्दील है तो ब्राण्ड इण्डिया के देश बेचो अभियान के तहत जल जंगल जमीन से बेदखल विस्थापन के शिकार लोग भी तमाम तरह की रंग बिरंगी कॉरपोरेट जिम्मेदारी और सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं के ताम झाम के बावजूद बाजार में अपना वजूद कायम रखने के महज बंधुआ मजदूर हैं।
वोट डालने के अलावा मतदान समय से पहले और बाद भारतीय नागरिकों के हक हूक सिरे से लापता हैं। भारत सरकार न संसद और जनता के प्रति जवाबदेह हैं। नीति निर्धारण कॉरपोरेट है तोकॉरपोरेट लाबिइंग से राजकाज। आम जनता का किसी बिंदू पर कोई हस्तक्षेप नहीं है। वोट डालने के बाद लोकतांत्रिक प्रक्रिया से फारिग नागरिकों के मौलिक अधिकार तक खतरे में हैं। नागरिकों के सशक्तीकरण के लिये जो कॉरपोरेट प्रकल्प असंवैधानिक आधार है, उसके तहत हम अपनी पुतलियां और आंखों की छाप कॉरपोरेट साम्राज्यवादी तंत्र को खुली निगरानी के लिये सौंप ही चुके हैं। आप को चूँ तक करने की इजाजत नहीं है।
कर प्रणाली बदलकर वित्तीय घाटा राजस्व घाटा का सारा बोझ आम लोगों पर डालने की तैयारी है। निजी कंपनियों को बैंकिंग लाइसेंस देने के मार्फत अब पूँजी जुटाने के लिये कॉरपोरेट इण्डिया को पब्लिक इश्यु भी जारी करने की जरुरत नहीं है। जो शेयर बेचे जायेंगे वे सरकारी क्षेत्र के बचे हुये उपक्रम ही होंगे तो खरीददार भी भारतीय जीवन बीमा निगम और स्टेट बैंक आफ इण्डिया जैसे संस्थान, जिन्हें तबाह किया जाना है। बीमा, पेंशन, भविष्य निधि तक बेदखल है और अब जमा पूँजी भी सीधे बाजार में आपकी इजाजत के बिना। ऊपर से प्रत्यक्ष कर संहिता और जीएसटी की तैयारी है। एफडीआई तो खुलेआम है।
इस अर्थ तंत्र में बंधुआ बने आम नागरिकों के हकहकूक मारने के लिये एक तरफ तो संवैधानिक रक्षाकवच तोड़े जा रहे हैं, पांचवीं और छठीं अनुसूचियां लागू नहीं है। प्रकृति और पर्यावरण पर कुठाराघात है और अंधाधुंध निजीकरण से सरकारी नियुक्तियां खत्म हो जाने की वजह से आरक्षण की कोई प्रासंगिकता ही नहीं है। रोजगार दफ्तरों को कैरियर काउंसिलिंग सेंटर बनाकर आम जनता को किसी भी तरह की नौकरी से वंचित करने का खुला एजेंडा है। कैम्पस रिक्रूटिंग से हायर और फायर होना है बंधुआ मजदूरों का और नियोक्ता का सारा उत्तरदायित्व सिर से खत्म है।
जो मीडिया कर्मी मोदी सुनामी बनाने के लिये एढ़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं, मजीठिया के हश्र को देखकर भी वे होश में नहीं है। वैसे मीडिया में स्थाई नौकरियां अब हैं ही नहीं। वेतनमान लागू होता ही नहीं है। श्रम कानून कहीं लागू है ही नहीं। न किसी कस्म की आजादी है। पेड न्यूज तंत्र में लगे इन बंधुआ मजदूरों की छंटनी भी आम है। नौकरी बनी रही तो कूकूरगति है। अब पूरे देश के अर्थ तंत्र का, उत्पादन इकाइयों का यही हश्र हो, इसकी हवा और लहर बनाने में मीडिया के लोग जान तक कुर्बान करने को तैयार हैं।
नवउदारवादी जमाने में किसान और खेत, देहात और जनपदों का सफाया है। विस्थापन और मृत्यु जुलूस रोजमर्रे की जिंदगी है। कल कारखाने कब्रिस्तान बन गये है। शैतानी औद्योगिक गलियारो और हाईवे बुलेट ट्रेन नेटवर्क में देहात भारत की सफाये की पूरी तैयारी है और कहीं से कोई प्रतिवाद प्रतिरोध नहीं है।
फिर भी हम आजाद हैं। आजादी का जश्न मना रहे हैं हम।
क्या हालात सच में हमारे पक्ष में हैं?
आज हम इस भ्रम में जी रहे है कि हम आजाद हैं। क्या हम सच में आजाद है?

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