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क्या हम वाकई एक वयस्क देश हैं

सुनील दत्ता
क्या वर्तमान समाज व्यवस्था में देश को एक देश कहा जा सकता है ? देश का बंटवारा निरंतर बढ़ता जा रहा है। यहां हम देश के इलाकाई या क्षेत्रीय बंटवारे की या कश्मीर व पूर्वोत्तर राज्यों के अलगाव की मांग के रूप में खड़े होते रहे बंटवारे की बात नही कर रहे हैं। इन विवादों, बंट्वारो के समर्थन व विरोध की चर्चायें तो आये दिन होती ही रहती हैं। निश्चित रूप से ये विवाद और झगड़े देश के लिए गंभीर खतरा हैं। लेकिन हम यहां देश में बढ़ते जा रहे उस आर्थिक व सामाजिक बंटवारे पर चर्चा कर रहे हैं, जो देश के एक या कुछ क्षेत्रो में ही सीमित नही हैं। बल्कि यह बंटवारा देशव्यापी हैं। देश के हर क्षेत्र व हर समुदाय में फैलता व बढ़ता जा रहा है। यह बंटवारा है, थोड़े से अमीर और व्यापक रूप से गरीब भारत का। यह बंटवारा है,छोटे से स्वच्छ व चमकदार और बड़े से लेकिन अँधेरे में रह रहे भारत का। छोटे से स्वस्थ तथा व्यापक रूप से बीमार भारत का। यह बंटवारा है अरबपति, खरबपति बन रहे थोड़े से लोगों और समाज के व्यापक गरीब व निम्न माध्यम वर्गीय हिस्सों का। यह बंटवारा है कुल आबादी के 75 – 80 प्रतिशत जनसाधारण लोगों तथा 20 – 25 प्रतिशत धनाढ्य एवं उच्च मध्यमवर्गियों का। इस बंटवारे में एक तरफ साधारण मजदूरों, किसानों, दस्तकारों, बुनकरों, छोटे-मोटे कारोबारियों, छोटे दुकानदारों तथा औसत रूप से पढ़ाई- लिखाई कर काम- धंधे में लगे लोगों की विशाल आबादी है तो दूसरी तरफ देश की धनाढ्य कम्पनियों, पद -प्रतिष्ठा प्राप्त राजनेताओं, अफसरशाहों, उच्च स्तरीय प्रचार माध्यमी सज्जनों, नामी गिरामी सांस्कृतिक कर्मियों, फिल्म स्टारों, माडलों, फैशनबाजों  तथा आम समाज में भी विभिन्न पेशों के जरिये अधिकाधिक कमाई कर रहे यह मध्यम वर्गियों आदि की छोटी आबादी हैं। यह देश और समाज का भारत, पाक, बांग्ला देश जैसा भौगोलिक व राजनैतिक बंटवारा नही हैं। अपितु यह बंटवारा है देश के आर्थिक- सामाजिक हिस्सों का।
बिडम्बना यह है कि, देश के भौगोलिक व राजनैतिक बंटवारे की या कश्मीर व पूर्वोत्तर राज्यों के अलगाव बंटवारे की आंशकाओ व संभावनाओं पर तो बड़ी चर्चाये होती हैं, लेकिन राष्ट्र के निरंतर बढ़ते जा रहे आर्थिक व सामाजिक विभाजन पर कोई चर्चा नही होती। दूसरी बिडम्बना यह भी है कि भारत, पाक, बांग्लादेश में तो एकजुटता संभव है और वह किसी हद तक टूटती और फिर बनती बढती भी रही हैं। लेकिन राष्ट्र व समाज के निरंतर बढ़ते आर्थिक व सामाजिक विभाजन में एकता बनने व बढ़ने की कोई गुंजाइश नजर नहीं आती। क्योंकि समाज का धनाढ्य व उच्च हिस्सा निचले समाज के शारीरिक व मानसिक श्रम को कम से कम मूल्य देकर हडपते रहने, छोटी- छोटी सम्मतियों का हिस्सा बनाते रहने और दूसरो को गरीबी बेकारी की तरफ धकेलते रहने की व्यवस्थागत प्रक्रिया को नही छोड़ सकता।  क्योंकि देश- दुनिया व समाज में धनी- धनाढ्य बनने का कोई रास्ता न तो है और न ही हो सकता है।
इस कड़वी और तथ्यगत सच्चाई के वावजूद सबसे बड़ी बिडम्बना यह है कि इस परस्पर विरोधी प्रक्रिया से समाज में बढ़ते जा रहे आर्थिक, सामाजिक बंटवारे के वावजूद उसमे एकजुटता बनी हुयी है। खासकर वर्तमान दौर में गहराती जन समस्याओं के वावजूद अवाछित शान्ति बनी हुयी है। इसे लेकर जन- विरोध, जन विद्रोह की लहर उठती दिखाई नही पड़ रही हैं। इसी का परिणाम है कि आर्थिक, सामाजिक रूप से बढ़ते जा रहे बंटवारे के वावजूद इस देश का धनाढ्य व उच्च हिस्सों के देश तथा गरीब व निम्नवर्गियों के देश के रूप में बंटवारे को अनदेखा किया जाता रहा है। साफ़ बात है कि देश- दुनिया का धनाढ्य व उच्च हिस्सा राष्ट्र (व विश्व के ) इस आर्थिक सामाजिक बंटवारे को, उसमें कभी भी एकजुटता न खड़ी हो सकने की वास्तविकताओं को कभी नहीं कबूलेगा। क्योंकि अभी तक बनी रही इसी एकजुटता से व धनी से धनाढ्य और अब धनाढ्यतम बनता रहा है। क्योंकि सत्ता सरकार में फिर समाज के विभिन्न क्षेत्रो में चढ़- बढ़ रहा उच्च वर्गीय हिस्सा इस धनाढ्य वर्ग का सेवक समर्थक बना हुआ है। लेकिन क्या यही काम समाज के जनसाधारण को भी करते रहना चाहिए ? क्या उन्हें परस्पर विरोधी दो राष्ट्रों की मौजूदगी को समझना व स्वीकारना नही चाहिए ?
अब यह जन – साधारण का ही दायित्व है कि वह धनाढ्य हिस्सों से राष्ट्र का संचालन, नियंत्रण अपने हाथ में लेकर राष्ट्र के इस बढ़ते बंटवारे को रोके और घटाए ? राष्ट्र को कमोवेश एक जैसा अखण्ड राष्ट्र बनाये। क्या राष्ट्र की वास्तविक एकता का रास्ता इसी प्रयास और उसके लिए अपरिहार्य जन-संघर्ष से नहीं गुजरेगा ?…इसे भी सोचें इस पर मंथन करें ……………

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सुनील दत्ता, रंगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार हैं। हस्तक्षेप.कॉम की टीम का अंग हैं।

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