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क्या होगा असर मोदी मिसाइलों का

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास
बंगाल में न भाजपा की सरकार है और न सत्तादल से उसका कोई गठबंधन है। संगठन के लिहाज से भी बंगाल में भाजपा की ताकत नगण्य है। बुधवार को कोलकाता में पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी की ब्रिगेड रैली की भीड़ की तुलना निश्चय ही हाल में 31 जनवरी को ममता बनर्जी की रैली से कतई नहीं की जा सकती, न की जानी चाहिए। लेकिन बंगाल में अपनी ताकत के हिसाब से यह ऐतिहासिक रैली है, जिसमें सड़कों से बसें हटाये बिना टाटा सुमो, मैटाडोर से दूर-दूर से लोग सिर्फ नरेद्र मोदी को सुनने हाजिर हो गये। ऐसा भी नहीं है कि बाहरी राज्यों से लोग ट्रेनों में भरकर लाये गये हैं।
कोलकाता ब्रिगेड रैली को प्रतिमान मानें तो बाकी देश में जहां नमोमय माहौल है, सत्ता है, सहयोग है और संगठन भी वहां नमो सुनामी का असर क्या होने वाला है, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
गुजरात के मुख्यमंत्री ने आर्थिक तौर पर खस्ताहाल बंगाल में गुजरात मॉडल की बहुत अच्छी मार्केटिंग की, परिवर्तन का हिसाब माँगा तो बंगाली राष्ट्रीयता का आवाहन भी खूब कायदे से कर डाला। दिल्ली की गतिविधियों पर तीखी नजर रखने वाले मोदी ने बाकी दलों से, गठबंधनों से एकदम अलग खड़ी ममता बनर्जी के प्रति बंगाल के भाजपा नेताओं की तरह आक्रामक रवैया न अपनाकर बेहद रणनीतिक भाषण दिया है। तृणमूल से टकराने के बजाय तृणमूल समर्थकों के परिवर्तन के हक में तारीफों के पुल बांधते हुये, वाम व धर्म निरपेक्ष ताकतों पर पुरजोर प्रहार करते हुये बंगाल को वंचित करने के सबूत बतौर राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्रित्व से दूर रखने के लिये सीधे तौर पर कांग्रेस को जिम्मदार ठहराने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी। इससे भाजपा को कोई फायदा हो या न हो, कांग्रेस के लिये भारी मुश्किल हो गयी है।
दीदी को मुख्यमंत्री बनाये रखते हुये अपने प्रधानमंत्रित्व में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के अभिभावकत्व में बंगाल के विकास का जो त्रिभुज नरेंद्र मोदी ने रच दिया, उसके दूरगामी नतीजे होने हैं। आम तृणमूल मतदाताओं को संदेस गया कि केंद्र में कांग्रेस के सफाये के लिये मोदी ही एकमात्र विकल्प हैं। वहीं इसी फार्मूला के जरिये उन्होंने लोकसभा के आगामी चुनावों में एकमुश्त ममता बनर्जी और प्रणव मुखर्जी दोनों की भूमिका संदिग्ध बना दी है। वामपक्ष और धर्मनिरपेक्षता पर खुल्ला हमले से उन्होंने विपक्ष को यह मौका दे दिया है कि ममता दीदी की नीति और रणनीति दोनों की आलोचना कर सकें और खासतौर परअल्पसंखकों में दीदी की साख पर सवाल उठा सकें। इसके साथ ही उन्होंने केंद्र की राजनीति में भी प्रणव मुखर्जी की सम्भावित भूमिका को लेकर भूचाल खड़ा कर दिया है।
बंगाल पर लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा के अतीत के महिमामंडन से उन्होंने वामशासन की जहाँ धुलाई कर दी, वहाँ दीदी के परिवर्तन के औचित्य पर भी सवालिया निशान खड़े कर दिये। वे बांग्ला में गुजराती उच्चारण से खूब बोले और बांगाल राष्ट्रीयता को वंचना के सवाल पर केंद्र में परिवर्तन के लिए खूब उकसाया। विवेकानंद, टैगोर और नेताजी के साथ श्यामाप्रसाद मुखर्जी के अवदान की चर्चा भी उन्होंने निश्चित रणनीति के साथ की।
मोदी ने बंगाल पर केंद्रित भाषण के मार्फत दिल्ली की सत्ता पर मिसाइली निशाने साधे, जो बंगाली मतदाताओं के लोकप्रिय मुद्दे हैं। गाय पट्टी के ध्रुवीकरण समीकरण के विपरीत अपनी धर्मनिरपेक्षता बतौर राष्ट्रहित के देश भक्त एजंडा पेश किया और उसकी पुष्टि के लिये कविगुरु की चित्त जेथा भयहीन का पाट भी किया।

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