Home » समाचार » खतरे की घंटी बजनी शुरू हो चुकी है, लेखकों सावधान!

खतरे की घंटी बजनी शुरू हो चुकी है, लेखकों सावधान!

मैं दो दिन से सोच रहा था कि टीवी वालों को साहित्‍य से इतना अनुराग अचानक क्‍यों हो आया भला। अब समझ में आ रहा है।

देखिए, कैसे दो-तीन दिनों के भीतर ही सारी बहस ”साहित्‍यकार बनाम सरकार” की बना दी गई है।

इसका आशय क्‍या है? आशय यह है कि सत्‍ता का एक छोर सरकार है जिसके बरक्‍स सत्‍ता का दूसरा छोर साहित्‍यकार को बना दिया गया है। इस छोर पर सबसे मुखर कौन है? मुनव्‍वर राणा- वह शख्‍स जिसने पुरस्‍कार लौटाने वालों का विरोध करते-करते खुद लाइव शो में नाटकीय ढंग से पुरस्‍कार लौटाया और आज यहां तक कह डाला कि लेखकों को मोदी से जाकर मिलना चाहिए।

राणा बोले कि मोदी अगर आश्‍वस्‍त करते हैं कि देश में ”सबका साथ सबका विकास” होगा तो वे मोदी के हाथों पुरस्‍कार वापस ले लेंगे।

अराजनीतिक लोगों के हाथों में बहस चले जाने से यही सब होता है। अब आप देखते जाइए। जिन्‍हें हम राष्‍ट्रीय चैनल कहते हैं, उस पर अशोक वाजपेयी जैसे बड़े लेखक नदारद हैं क्‍योंकि सब जानते हैं कि वे कांग्रेस के लाभार्थी रहे हैं, इसलिए उनके आने से मामला फंस जाएगा।

उदय प्रकाश जैसे समझदार लेखक निजी चैनल पर आने से बचेंगे, राज्‍यसभा जैसे चैनल पर ही अपनी बात रखते रहेंगे। राजेश जोशी भोपाल से तो स्‍टूडियो आने से रहे। बचे मंगलेशजी, तो सुधांशु त्रिवेदी, राकेश सिन्‍हा और संबित पात्रा की तिकड़ी के सामने उनकी आवाज़ ही नहीं निकल रही है। दू

सरी भाषाओं के लेखक राष्‍ट्रीय चैनल पर आएंगे नहीं। कुल मिलाकर मुनव्‍वर राणा ही वह शै हैं जो दोनों ओर से खेलेंगे- बल्कि खेलाए जाएंगे।

पॉपुलर माध्‍यम पर पॉपुलर चीजें ही चलती हैं। पॉपुलर चीजें बहस को डाइल्‍यूट करती हैं।

दिक्‍कत यह है कि गंभीर लोग इस माध्‍यम से डील करना नहीं जानते। नतीजा यह होगा कि दो दिन के भीतर चैनल वाले सब लीप-पोत कर बराबर कर देंगे और लेखकों की बची-खुची इज्‍जत भी जाती रहेगी।

यह बहस सत्‍ता के दो ध्रुवों के बीच की बहस में तब्‍दील कर दी जाए और अराजनीतिक लेखक मदारी एंकरों की धुन पर नाचने लगें, उससे पहले लेखकों को सड़क पर आना होगा। नहीं आए, तो अगली बार इन कमज़ोर लेखकों के नाम पर कोई खड़ा नहीं होगा।

खतरे की घंटी बजनी शुरू हो चुकी है। सावधान!

अभिषेक श्रीवास्तव

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: