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खुदरा कारोबार में विदेशी कंपनियों की बहार

वालमार्ट, गुची, एलवीएमएच, एपिल जैसी कंपनियों के लिए भारतीय बाजार में शत प्रतिशत एफडीआई!
पलाश विश्वास
इकोनॉमिक टाइम्स की खबर है कि-

The department of Industrial policy and promotion (DIPP) is considering a move to scrap the 30% domestic sourcing clause, which could result in higher foreign direct investment (FDI) inflows.

इकोनॉमिक टाइम्स ने खुलासा किया है-

The government may completely unshackle foreign investment in singlebrand retail, a sector that has seen growing interest from the world’s biggest brands that have been lobbying for the scrapping of a condition they regard as a deal breaker.

डिपार्टमेंट ऑफ इंडस्ट्रियल पॉलिसी एंड प्रमोशन (डीआईपीपी) इस शर्त को खत्म करने पर विचार कर रहा है, जिससे देश में फॉरेन डायरेक्ट इनवेस्टमेंट में इजाफा हो सकता है। एलवीएमएच और गुची जैसी कई बड़ी लग्जरी फर्म्स का मानना है कि हाई-एंड गुड्स को भारत से सोर्स करना मुश्किल है।
गौरतलब है कि एकल (सिंगल) ब्रांड खुदरा में विदेशी निवेश की अनुमति सर्वप्रथम 51 प्रतिशत की सीमा तक फरवरी 2006 में प्रदान की गई। बहु (मल्टी) ब्रांड में विदेशी निवेश देश में व्यापक विरोध के कारण अभी भी प्रतिबंधित है। फिर 2011 को उद्योग एवं वाणिज्य मंत्रालय ने सिंगल ब्रांड खुदरा कारोबार में 100 फीसदी विदेशी निवेश के फैसले को अधिसूचित कर दिया।
इकोनॉमिक्स टाइम्स के मुताबिक डीआईपीपी के एक अधिकारी ने भी कहा कि लग्जरी ब्रांड्स भारत से 30 पर्सेंट माल कैसे खरीद सकते हैं? यह तो मुमकिन ही नहीं है। उन्होंने कहा कि सिंगल-ब्रांड रिटेल पॉलिसी में नरमी की जरूरत है ताकि विदेशी ब्रांड्स यहां निवेश कर सकें। हम इस दिशा में काम कर रहे हैं। पिछले दो वर्षों में इस सेगमेंट में विदेश से 300 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम आई है और इससे यहां रोजगार के मौके बने हैं।
पिछली यूपीए सरकार ने सिंगल-ब्रांड रिटेल में 100 पर्सेंट एफडीआई की इजाजत साल 2011 में दी थी। तब इसमें शर्त जोड़ी गई थी कि ग्लोबल ब्रांड्स को भारत की स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज से 30 पर्सेंट माल अनिवार्य रूप से खरीदना होगा। हालांकि, सितंबर 2012 में सरकार ने स्वीडन की फर्नीचर कंपनी आइकिया की राह आसान करने के लिए 30 पर्सेंट वाले नियम में बदलाव कर दिया और अनिवार्य शर्त के बजाय कहा कि ऐसी सोर्सिंग हो तो बेहतर होगा।
जाहिर है कि सिंगल ब्रांड में विदेशी निवेश शत प्रितशत करने के फैसले के साथ 30 पर्सेंट घरेलू स्रोत की शर्त जो यूपीए ने लगायी, खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष निवेश की प्रबल विरोधी भाजपा की सरकार ने अब वह शर्त हटाकर दुनिया की सबसे बड़ी अमेरिकी कंपनी वालमार्ट को खुश कर दिया है, जिसके खिलाफ सत्ता में आने से पहले तक मोर्चा जमाये हुए थे भाजपाई। आखिरकार अमेरिका ने भी तो अबतक अमेरिका में अवांछित नरेंद्र मोदी के स्वागत के लिए पलक पांवड़े बिछा दिये हैं। जाहिर है कि सरकार सिंगल-ब्रैंड रिटेल में विदेशी निवेश के फुल-स्पीड फर्राटे का इंतजाम कर रही है। दुनिया के कई बड़े ब्रैंड्स ने इस सेक्टर में दिलचस्पी दिखाई है और वे इस सेक्टर में निवेश के लिए 30 पर्सेंट माल भारतीय वेंडर्स से सोर्स करने की शर्त हटवाने के लिए लॉबीइंग कर रहे थे। अब उनकी यह मुराद जल्द पूरी की जा रही है।
इकोनॉमिक्स टाइम्स के मुताबिक हालांकि, अब भी कई कंपनियों के लिए पॉलिसी के मोर्चे पर तस्वीर साफ नहीं है और उनके आवेदन महीनों से डीआईपीपी के पास अटके पड़े हैं। 30 पर्सेंट की शर्त हटाने से स्वारोव्स्की जैसे ब्रांड्स की भारत में एंट्री आसान हो जाएगी। ऐसे कई ब्रैंड्स के आवेदन इसलिए खारिज हो गए थे क्योंकि वे कैश ऐंड कैरी और सिंगल-ब्रांड रिटेल, दोनों फॉर्मेट में काम करना चाहते थे।
गौरतलब है कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी वालमार्ट ने यूपीए सरकार की ओर से खुदरा बहु-ब्रांड क्षेत्र में 51 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की अनुमति के भारत के फैसले को महत्वपूर्ण कदम बताया था। मल्टीब्रांड में नहीं, सिंगल ब्रांड के जरिये ही विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय कारोबार को बाट लगा रही है बिजनेस फ्रेंडली केसरिया कारपोरेट सरकार।
याद करें कि संसद में कारपोरेट वकील वित्त प्रतिरक्षा मंत्री के बजट पेश करने के ठीक एक दिन पहले भारतीय मुक्त बाजार के लिए एक बुरी खबर आई थी कि फ्रांस के सबसे बड़ी रिटेल कंपनी कैरफोर इस साल सितंबर में भारत से अपना कारोबार समेटने की तैयार कर चुकी है। उस वक्त जो खबर आई, उसके बाद भारत की चिंताएं और बढ़ने लगीं कि भारत में हो रहे घाटे के बाद अब कंपनी पड़ोसी मुल्‍क चीन और ब्राजील के बाजार में निवेश करने की पूरी तैयारी कर चुकी है। चीन और ब्राजील के बाजारों का हौआ खड़ा करके स्वदेशीकरण के बहाने देशी कृषि की तरह देशी कारोबार का भी सत्यानाश का इंतजाम हो गया।
बनिया पार्टी के वोट बैंक के मद्देनजर केंद्र में आई नई एनडीए सरकार भी स्थानीय दुकानदारों का हित देखते हुए खुदरा क्षेत्रों में विदेशी निवेश के पक्ष में नहीं है। इस पर बजट से एक दिन पहले खुदरा क्षेत्र की सलाहकार एजेंसी थर्ड आई के मुख्य कार्यकारी अधिकारी देवांगशु दत्ता ने कहा है कि, ‘जो कंपनियां बाजार में नुकसान नहीं उठाना चाहती, वे या तो अपना कारोबार रोक दें या बोरिया बिस्तर बांध लें। ‘
धुआंधार सुधारों का मुसलाधार से सांढ़ संस्कृति के बल्ले बल्ले और सेनसंक्स में अविराम उछाल।
जाहिर है कि मनमोहन सिंह ने देश में अमरीकी कंपनी वालमार्ट से लेकर वहां के नाभिकीय संयंत्रों के लिये बाजार उपलब्ध करवाने की भरसक कोशिश की थी। वे नीतिगत विकलांगता और राजनीतिक बाध्यताओं के भंवर में डूब गये। जनादेश नमोसुनामी से बना तो वालमार्ट की भी बल्ले, अमेरिकी युद्ध अर्थव्यवस्था भी जमानत पर और भारतीय अर्थव्वस्था में बभरे सावन की  बेशुमार प्राकृतिक आपदाओं के मध्य वसंत बहार। जाहिर है कि ऐसे में अमरीका, भारत के प्रधानमंत्री को निमंत्रण देकर अपनी भलाई की ही सोच रहा है उस भवाई के पद्मप्रलय की बहार भी कम नहीं है।
मीडिया में राजनीति और अपराध के सिवाय कोई खबर नहीं है। स्पेक्ट्रम शेयर करने की बात की जा रही है जो दरअसल स्पेक्ट्रम डीकंट्रोल है। वैसे ही जैसे कि आधिकारिक तौर पर भारत में अभी खुदरा बाजार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश है नहीं, लेकिन खुदरा बाजार विदेशी कंपनियों के हवाले है। हमने डिजिटल देश के बायोमेट्रिक नागरिकों के लिए ईकॉमर्स के बिजनेस टु होम के फंडे की पहले ही चर्चा की है।
खबरें लार्ड्स पर अट्ठाइस साल के जीत के जश्न पर फोकस है लेकिन भारतीय बाजार पर तेईस साल के जनसंहारी नवउदारजमाने में अमेरिकी मुकम्मल जीत के बारे में कोई खुलासा नहीं है।
प्रतिरक्षा और बीमा में एफडीआई के बाद सिंगल ब्रांड रिटेल में एफडीआई का फैसला भी हो गया। यानी बिना मल्टी ब्रांड एफडीआई भारतीय बाजारों में विदेशी और खासकर अमेरिकी कंपनियों की हर संवेदनशील सेक्टर में अबाध घुसपैठ का स्वदेशीकरण है तो डिजिटल नागरिकता के जरिये बहुसंख्य आबादी का हीरक बुलेट चतुर्भुज तैयार है। बेदखली के लिए नागरिकता छीनकर विदेशी बना देने का खेल भी तेज हो गया है।
अमेरिकी मांग के मुताबिक बीमा और प्रतिरक्षा में एफडीआई के बाद दक्षिण एशिया का हथियार बाजार पर अमेरिकी वर्चस्व कायम है तो बीमा क्षेत्र में भी अबाध निरंकुश छिनाल पूंजी के खातिर शर्म कानूनों के सफाये के साथ एकमुश्त सुधार।
स्पेक्ट्रम घोटाले पर फोकस है और स्पेक्ट्रम शेयरिंग से स्पेक्ट्रम डीकंट्रोल। नीलामी का किस्सा खत्म तो सरकारी हस्तक्षेप का भी निषेध।
कोयला ब्लाकों के आवंटन का घोटाला पर बहुत हो हल्ला है तो कोल इंडिया की हत्या दिनदहाड़े है। कोल इंडिया का एकाधिकार तोड़ने के लिए निजी कंपनियों को खनन की इजाजत।
अब समझ लीजिये कि भूमि अधिग्रहण कानून, खनन अधिनियम, पर्यावरण कानून और श्रम कानून क्यों बदले जा रहे हैं।
आउटलुक में पी साईनाथ के टैक्स फोरगन से संबंधित आलेख की हम चर्चा पहले की कर चुके हैं तो आज बजट में योजना गैरयोजना व्यय के खुलासे के लिए जनसत्ता के संपादकीय पेज पर आलेख भी है। इसी के मध्य पावर सेक्टर की निजी कंपनियों को राहत देने की खबरे हैं। तो विनिवेश की भी खबरें हैं।
केसरिया कारपोरेट सरकार ने कारपोरेट कंपनियों का कर्ज रफा दफा करने का फैसला भी कर लिया है।
कल रात से मेरे पीसी के नेट सेटिंग उड़ी हुई थी। सारी चीजे तुरंत समेट नहीं सकते, आज इंजीनियर के आने के बाद फिर आनलाइन हो जाने के बावजूद। तथ्यों के अध्ययन और विश्लेषण में वक्त लगेगा। लेकिन इस सुधार नरमेध यज्ञ का आंखों देखा हाल देर सवेर आप तक पहुंचाने की कोशिशें जारी रहेंगी।
केसरिया कारपोरेट सरकार का स्वदेशीकरण और भारतीयकरण का वेग बुलेट ट्रेन से भी ज्यादा भयंकर है। हमारी उगलियों में उतना दम नहीं है कि सारी बातों का तुंरत खुलासा किया जा सके। पर सारे मुद्दे संबोधित करने की कोशिश जरूर होगी और प्रचलित मीडिया के मुकाबले हमारा फोकस आर्थिक मुद्दों पर ही ही रहेगा।
फिलहाल रिटेल एफडीआई का किस्सा हरिकथाअनंत।
मल्टी ब्रांड में एफडीआई की घोषणा यूपीए दो सरकारी कर चुकी थी और ममता बनर्जी के समर्थन वापस लेने से इस फैसले को अंजाम तक पहुंचाया नहीं जा सका। भाजपा ने भी विपक्ष में रहते हुए सबसे ज्यादा शोर शराबा खुदरा कारोबार में एफडीआई के खिलाफ मचाया है। सत्ता में आने के बाद भी भाजपा बिजनेस फ्रेंडली होने के बावजूद, प्रधानमंत्री सीईओ के अनोखे बिजनेस मैनेजमेंट के जरिये मल्टी ब्रांड एफडीआई की इजाजत दिये बिना डिजिटल देश में ईकामर्स के जरिये क्या गुल खिला रही है, इस पर हमने पहले ही विस्तार से लिखा है।
 ताजा किस्सा सिंगल ब्रांड एफडीआई का है, जिसका कभी राजनीतिक विरोध हुआ या नहीं, निरंतर मीडिया में होने के बावजूद हमें जानकारी नहीं है।
खुदरा कारोबार में इसी सिंगल ब्रांड के विन्डो से विदेशी कंपनियों की अबाध घुसपैठ का स्थाई बंदोबस्त कर दिया गया है।
मजे की बात है कि मल्टी ब्रांड एफडीआई के लिए जिस वालमार्ट का प्रबल विरोध होता रहा है, सिंगल ब्रांड में एफडीआई शत प्रतिशत करने के बाद कैश एंड कैरी में उसने तुरंत 623 करोड़ की पूंजी और भारतीय बाजार में झोंक दी है। लेकिन सन्नाटा इतना घनघर है कि कहीं सुई तक गिरने की आवाज नहीं है।
याद करें 23 सितंबर, 2012 को केसरिया लौहपुरुष का लिखा ब्लॉग।
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रविवार को कहा कि जहां एक ओर भारत में वालमार्ट का स्वागत किया जा रहा है, उसी वालमार्ट के खिलाफ अमेरिका में प्रदर्शन हो रहे हैं और न्यूयार्क से उसका बोरिया-बिस्तर बांध दिया गया है।
आडवाणी ने रविवार को अपने ब्लॉग में लिखा है,प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जिस शुक्रवार (14 सितम्बर) को वालमार्ट के लिए लाल गलीचे बिछाए, उसी दिन अमेरिका के सबसे बड़े शहर न्यूयार्क ने वालमार्ट के बोरिया-बिस्तर बांध दिए।
आडवाणी ने यह भी लिखा है कि जिस दिन संप्रग सरकार ने वालमार्ट को एफडीआई का तोहफा सौंपा और लॉबिस्टों ने भरोसा दिलाया कि छोटे खुदरा व्यापारी सुरक्षित हैं, उसी दिन वेब समाचार पत्र, अटलांटिकसिटीज ने विदेशी मामलों की प्रसिद्ध पत्रिका से एक विनाशकारी हेडलाइन दी थी- `रेडिएटिंग डेथ : हाउ वालमार्ट डिस्प्लेसेस नियरबाइ स्माल बिजनेसेस`।
आडवाणी ने लिखा है, पहली जून को सैकड़ों की संख्या में प्रदर्शनकारियों ने वालमार्ट के खिलाफ वाशिंगटन डीसी में प्रदर्शन किया। पूरे अमेरिका में `से-नो-टू-वालमार्ट` आंदोलन लगातार जारी है।
यही नहीं आडवाणी ने राजग सरकार के दौरान घटी एक घटना का भी जिक्र किया है। कांग्रेस सदस्य प्रियरंजन दासमुंशी ने तत्कालीन केंद्रीय वाणिज्य मंत्री अरुण शौरी से खुदरा में एफडीआई को अनुमति देने की योजना पर स्पष्टीकरण मांगा था।
आडवाणी ने लिखा है, राजग सरकार के दौरान खुदरा में एफडीआई के मुद्दे पर एक बार भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी नोक-झोंक हुई थी। यह घटना 16 दिसम्बर, 2002 की है।
जाहिर है कि हाथी के दांत खाने के और,दिखाने के और होते हैं।

About the author

पलाश विश्वास।लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना। पलाश जी हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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