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खुफिया एजेंसियों की जवाबदेही से डर क्यों?

हरे राम मिश्र
देश में इन दिनों सोलहवीं लोकसभा के लिए आम चुनाव चल रहे हैं और सभी राजनैतिक दलों ने अपने चुनावी घोषणापत्र भी जारी कर दिए हैं। इन चुनावी घोषणापत्रों में आतंकवाद, नक्सलवाद, आंतरिक सुरक्षा समेत कई समस्याओं से निपटने की रणनीति अपनी-अपनी तरह से दलों द्वारा घोषित की गई है। लेकिन, देश की खुफिया एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाने के सवाल पर लगभग सभी दलों के घोषणापत्र में एक अजीब सी चुप्पी दिखती है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि अगर वह सत्ता में आई तो खुफिया एजेंसियों को और ज्यादा स्वायत्तता देगी और राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त करेगी ताकि आतंकवाद जैसी समस्याओं से निपटा जा सके।
गौरतलब है कि खुफिया एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाने की मांग काफी दिनों से चल रही है, लेकिन इस दिशा में राजनैतिक दल, सरकारें और यहां तक कि अदालतें भी कुछ बोलने से कतराती रही हैं। अभी कुछ दिनों पहले ही, अधिवक्ता प्रशांत भूषण द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें देश की खुफिया एजेंसियों को दिए जा रहे अकूत धन के ऑडिट की मांग की गई थी। अभी खुफिया एजेंसियों द्वारा खर्च किए गए धन का कोई ऑडिट नहीं होता है। इन दिनों खुफिया एजेंसियों की संसद के प्रति जवाबदेही का सवाल देश भर में चल रहे लोकतांत्रिक और मानवाधिकार आंदोलनों के केन्द्र में है। ऐसे ही मुद्दों पर लड़ने वाले संगठन ’रिहाई मंच’ द्वारा देश के समस्त राजनैतिक दलों को भेजे गए मांग पत्र में कहा गया है कि देश के बहुसंख्यक तबके से जुड़ी समस्याओं का निदान बहुत हद तक संसद द्वारा कानूनी प्रावधानों और संविधान संसोधनों के जरिए संभव है। ऐसे में खुफिया एजेंसियां, जो देश के संभवतः एक मात्र ऐसे संगठन है जो किसी के प्रति सीधे तौर पर जवाबदेह नही हैं को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाए। इस मांग पत्र में खुफिया एजेंसियों को देश की सर्वोच्च संस्था संसद के प्रति जवाबदेह बनाने की मांग की गई है।
अगर इनकी इस मांग का गंभीरता से विश्लेषण किया जाए तो उनकी मांगे गैर वाजिब नही दिखतीं। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद ही सर्वोच्च होती है, जो कि देश की आवाम का प्रतिनिधित्व करती है। इस लिहाज से कोई भी संगठन संसद से ऊपर नहीं हो सकता। वह संसद के प्रति जवाबदेह होता है। हालिया दिनों में जिस तरह से खुफिया एजेंसियों की कार्यप्रणाली गंभीर सवालों के घेरे में आयी है, को देखते हुए यह जरूरी हो गया है कि खुफिया एजेंसियों की कार्यपद्धति की एक माॅनीटरिंग हो। इन दिनों खुफिया एजेंसियों की निरंकुशता के कई मामले सार्वजनिक हुए हैं, जो गंभीर सवालों को जन्म देते है। उदाहरण के लिए अगर दरभंगा बिहार निवासी फसीह महमूद के मामले को ही देखें तो कई चीजें साफ हो जाती हैं। फसीह महमूद को 13 मई 2012 को सुरक्षा व खुफिया एजेंसियों द्वारा सउदी अरब से उठाया गया था और उसकी पत्नी द्वारा 24 मई 2012 को हैबियस काॅर्पस करने के बावजूद 48 घंटे की समय सीमा का उल्लंघन करते हुए, दो महीने बीत जाने के बाद 11 जुलाई 2012 को भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया था कि फसीह महमूद सउदी सरकार की हिरासत में है। लगभग पांच महीने की अवैध हिरासत के बाद अक्टूबर 2012 में फसीह महमूद के सउदी से भारत प्रत्यर्पण के बाद, यह बात स्पष्ट नहीं हो सकी कि किसके कहने पर उसे हिरासत में लिया गया था, क्योंकि सउदी सरकार ने स्पष्ट कहा था कि उनके यहां महमूद के खिलाफ कोई मामला नहीं है। यही नहीं, 16 जुलाई को दिल्ली और कर्नाटक पुलिस ने गृह मंत्रालय से कहा कि फसीह के खिलाफ किसी कोर्ट में चार्जशीट नहीं है। ऐसे में यह घटना इस बात को स्थापित करती है कि भारतीय खुफिया एजेंसियां किसी स्तर पर अपनी सरकार के प्रति भी कोई जवाबदेही नही रखतीं। ऐसे सैकड़ों मामले है जिन पर अगर गंभीरता से पड़ताल की जाए तो खुफिया एजेंसियों की निरंकुशता साफ दिखाई पड़ने लगती है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर निवासी नासिर को जहां सुरक्षा एजेंसियों ने आतंकवादी बता कर देहरादून से पकड़ लिया था, को अपनी बेगुनाही साबित करने में सात साल जेल में बिताने पड़े। यही नहीं, मालेगांव ब्लास्ट में फर्जी तरीके से फंसाए गए हिमायत बेग का जीवन खफिया एजेंसियों ने ही बर्बाद किया। आखिर इन बेगुनाहों का जीवन चैपट करने की जिम्मेदारी किस पर डाली जाएगी? सादिक जमाल मेहतर, सोहराबुद्दीन शेख, तुलसीराम प्रजापति समेत कई ऐसी फर्जी हत्याएं हैं जिनमें खुफिया एजेंसियों की ज्यादतियां खुल चुकी हैं। आईबी के रिटायर्ड अफसर राजेन्द्र कुमार के गुजरात में अंजाम दिए गए काले कारनामे कौन भूल सकता है? नरेन्द्र मोदी की फर्जी फिजा बनाने के लिए, गुजरात के मुसलमानों के खिलाफ फर्जी एनकाउंटरों की जो श्रृंखला 2002 के गुजरात दंगों के बाद चलाई गई थी, उसमें खुफिया विभाग की कारस्तानी को कौन नजरंदाज कर सकता है।
वैसे भी, दुनिया की खुफिया एजेंसियां हमारे देश में कितना सक्रिय हैं, इसे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की जांच के लिए बनाए गए जस्टिस जैन कमीशन की रिपोर्ट में देखा जा सकता है। राजीव गांधी की हत्या एलटीटीई के जरिए मोसाद और सीआईए ने करवाई थी। इस षडयंत्र में भारतीय खुफिया एजेंसियों से जुड़े अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध थी। इसी तरह, खालिस्तानी आंदोलन में भारतीय एजेंसियों की संलिप्तता के भी कई तथ्य भी सामने आ चुके हैं। हिन्दू आतंकवादी संगठन अभिनव भारत के आतंकवादी इजराइली खुफिया एजेंसियों से मदद लेते थे, एटीएस की चार्जशीट में बकायदा इसका जिक्र है। जब खुफिया एजेंसियां किसी देश के प्रधानमंत्री की हत्या करा सकती हैं तो फिर इनके हाथ कितने लंबे होंगे, इसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती।
यही नहीं, आजकल आतंकवाद के आरोप में पकड़े गए कई बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों का जीवन बर्बाद करने में खुफिया अफसरों के नाम सामने आ रहे हैं। फर्जी एनकाउंटर, अवैध हिरासत, गलत तरीके से आतंकवादी घटनाओं में फंसाना आजकल देश की खुफिया एजेंसियों का चरित्र बनता जा रहा है। यह सब देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए बहुत खरनाक है। इशरतजहां की फर्जी मुठभेड़ कैसे भुलाया जा सकता है? सीबीआई ने अपनी जांच में आईबी के संयुक्त निदेशक रह चुके राजेन्द्र कुमार के खिलाफ इस मामले में इतने ज्यादा सबूत इकट्ठे किए थे कि, आईबी के निदेशक आसिफ इब्राहिम को राजेन्द्र कुमार को बचाने के लिए गृह मंत्रालय को धमकी देनी पड़ी कि अगर राजेन्द्र कुमार को हिरासत में लिया जाता है तो उनका विभाग सरकार को खुफिया सूचनाएं देना बंद कर देगा। इसके बाद तो हालात यहां तक बिगड़ गए कि गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे को मामले में हस्तक्षेप करते हुए आईबी के निदेशक आसिफ इब्राहिम और सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा के साथ एक संयुक्त बैठक तक करनी पड़ी। आखिर फर्जी एनकाउंटर जैसा जघन्य अपराध करने के बाद यह तर्क कि कानूनी कार्यवाई से आईबी के कर्मचारियों का मनोबल गिरेगा, इंसाफ की कौन सी परिभाषा में आता है?
उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए ब्लास्ट में जौनपुर के मौलाना खालिद और आजमगढ़ के तारिक कासमी को फर्जी तरीके से फंसाया गया और जब जस्टिस निमेष आयोग ने यह साफ कर दिया कि विस्फोटकों के साथ दिखाई गई इनकी गिरफ्तारी ही फर्जी है, तो खुफिया और पुलिस अफसरों के जेल जाने के डर से पेशी से लौटते वक्त खालिद की हत्या करा दी जाती है। यह साफ है कि मुसलमान ही इनकी निरंकुशता के आसान शिकार होते हैं।
अब, सबसे गंभीर सवाल यह है कि आखिर ऐसा कितने दिन चलेगा? इसे रोका कैसे जाए? क्या यह सब लोकतंत्र को कमजोर नहीं कर रहा है? आखिर इन सबका इलाज क्या है? आखिर खुफिया एजेंसियों की जवाबदेही क्यों न तय की जाए? क्योंकि आम लोग इनके जाल में फंसते हैं और उनका जीवन बर्बाद हो जाता है, जिससे समाज में तनाव फैलता है और विघटनकारी ताकतें मजबूत होती हैं।
कुल मिलाकर, आज यह बेहद जरूरी हो गया है कि खुफिया एजेंसियों की जिम्मेदारी एक लोकतांत्रिक समाज में तय की जाए। बेशक देश को आतंकवाद और आंतरिक सुरक्षा में  चुनौतियां मिल रही हैं, लेकिन अराजक ढंग से उनसे नहीं निपटा जा सकता। अगर खुफिया एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाता है तो इससे लोकतंत्र ही मजबूत होगा। जब इस मुल्क में हर संस्थान की जिम्मेदारी तय है तो फिर खुफिया एजेंसियां इससे मुक्त क्यों हैं? क्या हमारे राजनैतिक दल इस दिशा में पहल करेंगें? देश के उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भी अपने लंबे अनुभवों के आधार पर कहा है कि खुफिया एजेंसियों को संसद के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। संसदीय लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए यह जरूरी है कि हम वास्तव में संसद को सबसे शक्तिशाली रूप में देखें। आखिर जवाबदेही मुक्त ताकत निरंकुशता को जन्म देती है और यह लोकतंत्र में स्वीकार्य नही है। सवाल लोकतंत्र और उसके भविष्य का है।
 

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हरे राम मिश्र, लेखक साजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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