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गंजों की हजामत

बेनी प्रसाद बर्मा, दिग्गी राजा को मात देने अब मणिशंकर अय्यर अपनी नेक सलाह के साथ सामने आये हैं
देवेन्द्र कुमार
चार हिन्दी भाषा-भाषी राज्यों में मिली चुनावी शिकस्त से काँग्रेस निकल नहीं पा रही है,  झंझावात के दौर से गुजर रही है, कशमकश की स्थिति बरकरार है, दरअसल काँग्रेस की दिक्कत यह है कि वह तय नहीं कर पा रही है कि उसे उपचार किस वै़द्य से करवाना है पार्टी में दो विचारधाराओं की तकरार भी बरकरार है। पुराने, बड़बोले, सत्तालोलुप, कुलीनता के दर्प से चूर कब्र में लटके कांग्रेसियों को मीठी – मीठी गोलियाँ खाने की आदत पड़ गयी है, वे किसी भी संरचानात्मक सर्जरी के विरोधी है, जमीन की बदली हकीकत और फिजां में तैरती बगावत-बदलाव की बेचैनी को वे अपने दृष्टिहीन होते आँखों से देख नहीं पा रहे हैं। वे अब भी उसी भाव-भंगिमा और वाक्य- विन्यास के सहारे राजनीति करना चाह रहे हैं जो कांग्रेसी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है। यही कारण है कि सभी राहुल गांधी की जय-जयकार कर रहे हैं पर राहुल गांधी के द्वारा दिए जा रहे उपचार को नापंसद कर रहे हैं। उन्हे तो बस लगता है कि राहुल गांघी के हां कहते ही पूरा राष्ट्र राहुलमय हो जायेगा और सारे मुद्दे पीछे छूट जायेंगे, तब न तो कोई कॉमनवेल्थ घोटाले की बात करेगा और न ही कोयले के काली कमाई की, न ही टू जी स्पेक्ट्रम में हुयी बन्दरबाँट की चर्चा होगी और न ही लोकपाल के नाम पर ठगने – मनाने के खेल की। दरअसल व्यक्ति पूजा काँग्रेस की परम्परा रही है और चापलूसी इसकी संस्कृति।
कहने की जरुरत नहीं कि सोनिया- राहुल  के दिशार्निदेशन में बदलाव की दिशा में कानूनों की झड़ी लगा दी गयी। भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, रोजगार का अधिकार भू अधिग्रहण कानून में संशोधन आदि बदलाव की जमीनी जनाकाँक्षाओं को दृष्टिगत रख कर ही किये गये थे पर इन प्रयासों में पलीता तो यही घाघ, अनुभवी बड़बोले काँग्रेसी ही लगाते रहे हैं। बदलाव के साथ कदमताल मिला कर चलने से इन्हें अपमानबोध होता रहा है। फिजां में तैरते बदलाव के झोंकों को वे सहने को तैयार नहीं। उनके पर कतरने की फटफटाहट इनके आँखों की नींद हराम किये हुये हैं।
बेनी प्रसाद बर्मा, दिग्गी राजा को मात देने अब मणिशंकर अय्यर अपनी नेक सलाह के साथ सामने आये हैं, मोदी प्रधानमंत्री तो नहीं बन सकते पर काँग्रेस के अधिवेशन में चाय जरूर बेच सकते हैं। वे भूल रहे है कि मोदी का चाय बेचना मोदी की कमजोरी नहीं वरन वह ताकत है जो मोदी को आज मतदाताओं के ज्यादा निकट ले जा रही है। मोदी ने कभी अपने को विशिष्ट नहीं माना। चाय बेचने के अनुभव को बांच कर वे एक बृहत जनसमुदाय से भावनात्मक नाता जोड़ रहे होते हैं। बृहत जनसमुदाय से अपना नाता जोड़ने के लिये मोदी को किसी दलित के दरवाजे खटखटाने की जरूरत ही नहीं है। दरअसल मोदी के सबसे बड़े प्रचारक तो मोदी के ये कुंठाग्रस्त आलोचक ही है। जब भी ये मोदी का निम्नस्तरीय उपहास उड़ायेंगे, अपनी कथित कुलीनता का अभद्र प्रर्दशन करेंगे,  मोदी और भी ताकतवर होकर इनके शहजादे की बादशाहत का धज्जियाँ उड़ायेंगे। सच्चाई यह है कि आज देश को काँग्रेसमुक्त भारत की जरूरत हो या नहीं पर काँग्रेस को बड़बोले-अहंकारी, सत्तालोलुप चापलूसों से मुक्ति की बेहद जरूरत है। सीधी भाषा में कहें तो आज काँग्रेस को अपग्रेडेशन की जरूरत है और इसके लिये जरूरी है कि पुराने वर्जन के अहंकारी, सत्तालोलुप, वंशपूजक नेताओं से मुक्त होने की।
 राहुल ने अपग्रेडेशन की कॉपी तैयार भी की, पर घाघ राजनेताओं ने इसे इन्स्टॉल करने ही नहीं दिया। राहुल को पप्पू बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अब राहुल कह रहे हैं कि काँग्रेस शासित राज्यों में पचास फीसदी मुख्यमंत्री महिलाओं को बनाया जायेगा। बात टके की है, पर इसके लिये जरूरी शर्त है काँग्रेस की जीत जो अभी दूर की कौड़ी ही लगती है। फिर काँग्रेस आज महंगाई, भ्रष्टाचार और अहंकारी नेताओं के कारण ही जनसमुदाय के गुस्से का शिकार हैं। इसका उपचार तो वे बतला नहीं रहे हैं। महिला मुख्यमंत्री बनने से भ्रष्टाचार तो नहीं रुक जायेगा, महंगाई पर लगाम तो नहीं लग जायेगी और न ही इस देश को अहंकारी- बड़बोली कुलीनता के दर्प से चूर राजनेताओं से मुक्ति मिल पायेगी।
 रही बात हजामत बनाने की। राहुल घ्यान दें, यह कांग्रेस ही है जो  आज 67 -68 बरसों से महात्मा गांधी, सरदार पटेल सहित करोड़ों भारतीयों को नित्य प्रतिदिन हजामत बनाती आ रही है। भला,कांग्रेस से अच्छा हजामत और कौन बना सकता है। पर आज आपकी जरूरत तो काँग्रेस के अन्दर के अहंकारी, सत्तालोलुप, वंशपूजक, कुलीनता के दर्प से चूर महारथियों की हजामत बनाने की है। और यदि इसमें आपने देरी की तो काँग्रेस इस रोगशैया पर से उठ नहीं पायेगी। मुझे आज भी आपकी बातों में ईमानदारी की बू आती है पर सवाल यह है कि आपकी यह आकाशवाणी- देववाणी कब तक चलती रहेगी। हजामत की तैयारी करें, यह काँग्रेस के साथ ही इस मुल्क के लिये  बेहतर होगा।

About the author

देवेन्द्र कुमार, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। मगध विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एम.ए., एल एल बी, भारतीय विद्या भवन, मुम्बई से पत्रकारिता की डिग्री। क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों, पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर आलेखों का प्रकाशन, बेव मीडिया में सक्रिय व लेखन। छात्र जीवन से ही विभिन्न जनमुद्दों पर सक्रियता। विभिन्न सामाजिक संगठनों सें जुड़ाव।

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