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गंदी हो चली है संसदीय लोकतंत्र की पोशाक, जरूरत है इसे धो कर नया करने की #NOTA

आंबेडकर नगर का सवाल
‘सखा’ ( #NOTA ) दबाना वोट न डालना नहीं है बल्कि अस्वीकार की आवाज उठाते हुए वोट डालना है…
कुमार प्रशांत
सारे देश में चुनाव की तेज हलचल है और एक-एक बीतते दिन के साथ-साथ कई-कई जगहों, कई-कई व्यक्तियों की किस्मत उन मशीनों में बंद हो गई है जिस पर राजनीतिक दलों का भरोसा कम होता जा रहा है। अपने-अपने वोट डाल कर मतदाताओं ने मुंह मोड़ लिया है। ये जानते हैं कि अब जब तक अगला चुनाव नहीं आता है, इस लोकतंत्र से, इससे बननेवाली लोकसभा से और उस लोकसभा में बैठने वाले सदस्यों से इनका कोई वास्ता होगा नहीं। भागते भूत की लंगोटी ही सही वाली मानसिकता से जिसे जिसके वोट की जो कीमत मिली ( या वह वसूल सका ! ) उसे लेकर या पी कर या खा कर वह  विमुख हो चुका है। लेकिन  उत्तरप्रदेश  का आंबेडकर नगर ? वह न सोया है, न शांत है ! उसने अस्वीकृति में अपना हाथ उठाया है और एक सवाल बन कर खड़ा हो गया है जिसका जवाब भारतीय संविधान में नहीं है। भारतीय संविधान की कोख से पैदा हुई न्यायपालिका, विधायिका और चुनावों के सर्वेसर्वा चुनाव आयोग के सामने यह चुनौती भी है और कर्तव्य भी कि वह बाबा साहेब आंबेडकर द्वारा लिपिबद्ध  संविधान के पन्ने पलटे और आंबेडकर नगर के सवालों का जवाब दे ! अगर किसी ने ऐसा सोचा कि लोकतंत्र में वह बाध्य नहीं है कि इस या उस नगर से पूछे जाने वाले सवाल का जवाब दे ही तो आंबेडकर नगर का जो होगा सो तो होगा, भारतीय संविधान की कोख से पैदा हुए ये सारे संस्थान और डॉ. आंबेडकर का संविधान बांझ साबित हो जाएगा। और प्रकृति का नियम है कि जो सर्जन न करता हो, वह काल के गाल में समा जाता है। इसलिए नरेंद्र मोदी कैसे प्रधानमंत्री बनते व चलते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण है यह देखना कि चुनाव आयोग अब कैसे चलता है।
आंबेडकर नगर सिर्फ इतना पूछ रहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से वोटिंग मशीन के अंत में जो एक नया बटन दिया गया है, उसका मतलब क्या है ? मैं जब भी वोट डालने जाता हूं, मुझे अपनी वोटिंग मशीन देख कर खिन्नता होती है। मुझे लगता है कि लोकतंत्र की सर्जक इस मशीन को मशीन कम और दोस्त ज्यादा लगना चाहिए। कुछ ऐसा किया जा सकता है कि यह मशीन हमारी कला व संस्कृति की भी थोड़ी झलक देती हो ! कुछ ज्यादा कल्पनाशीलता से इसका रूप-स्वरूप तय करना चाहिए। भारतीय संविधान की मूल प्रति के पन्नों का अलंकरण जब कलागुरु नंदलाल बोस से करवाया गया था, तब हमें होश था कि यह किताब मशीन से नहीं बनी है, भारतीय संस्कार व कला का स्पर्श इसे मिलना ही चाहिए। हमारी वह सावधान सोच कहां खो गई ? मुझे सबसे अखरता है इसका वह आखिरी बटन जिसका नाम सोचने में भी आयोग ने लोकतंत्र का विचार नहीं किया ! कुर्सी पर बैठे किसी सरोकारविहीन नौकरशाह ने इसे ‘नोटा‘ कह दिया जो सुनते ही एक गहरी नकारात्मकता का भाव पैदा करता है। नन ऑफ द एबव – तो मतलब यह कि राजनीतिक दलों ने जितने उम्मीदवार चुने और चुनाव आयोग ने जिन्हें तकनीकी मान्यता दी, मतदाता को यदि वे सभी अयोग्य लगते हैं तब उसकी मदद में आने वाला बटन ! मदद के लिए तो दोस्त ही आगे आता है न ! फिर क्यों न इसे ‘सखा‘ ( सभी खारिज ! ) कहें और राजनीतिक दलों को यह सीधा संदेश दें कि यदि वे ऐसा उम्मीदवार नहीं चुनते हैं कि जिसे मतदाता अपना दोस्त समझ सके तो आप मतदाता को लाचार व बेसहारा मत समझो। उसकी मदद में आने वाला एक ‘सखा‘ हमने उसे दे दिया है ! लेकिन ऐसी लोकतांत्रिक संस्कृति हमारे मन में उगती ही नहीं है। एक रेगिस्तान है जो बंजर को ही विस्तार देता है।
कानपुर के बाहरी इलाके में आता है आंबेडकर नगर जिसे हम कानपुर का कूड़ाघर भी कह सकते हैं। विकास का गुजरात मॉडल हो कि अमेठी मॉडल, दोनों को बड़ा, बहुत बड़ा कूड़ाघर चाहिए होता है – डंपिंग ग्राउंड ! कानपुर के औद्योगिक विकास का, चर्म उद्योग का सारा कचरा जहां फेंका जाता है, उसे मायावती-सरकार ने नाम दिया आंबेडकर नगर ! यह आंबेडकरजी के नाम का वैसा ही राजनीतिक इस्तेमाल है जैसा नरेंद्र मोदी सरदार पटेल का करते हैं। डंपिंग ग्राउंड की हर कुरूपता से अटा पड़ा है आंबेडकर नगर। यहां पिछले ३० वर्षों से रह रहे ३०० से ज्यादा परिवारों के पास बिजली के खंभे हैं लेकिन बिजली नहीं है, नालियां खुली पड़ी हैं, सड़क जैसी कोई चीज नहीं है। १२% घरों में पीने का पानी कभी-कभार आता है- जब भी आता है, उसकी उम्र १५ मिनट होती है। शौचालय जैसी कोई अवधारणा भी यहां नहीं है। सर विद्या नायपाल साहब ने कभी सारे हिंदुस्तान के लिए जो कहा था, उसे उधार ले कर कहूं तो यह पूरा नगर ही एक बड़ा, खुला शौचालय है। १९९९ से वे श्रीप्रकाश जायसवाल यहां के प्रतिनिधि बन कर संसद में जाते हैं जो हमारे कोयला मंत्री रहे हैं और कहा जाता है कि कोयले की दलाली में जो होता है, वही उनके साथ भी हुआ है। इस बार आंबेडकर नगर के लोगों ने तै किया कि वे ‘सखा‘ या ‘नोटा‘ बटन दबाएंगे। वे उन सबको खारिज करना चाहते हैं जो इनका वोट तो चाहते हैं लेकिन इन्हें नहीं चाहते हैं। जो इनके प्रतिनिधित्व का दावा कर दिल्ली में अपने लिए सारी सुविधाएं जुटाते हैं लेकिन इनके लिए जीने भर का साधन भी नहीं जुटाते ! ‘सखा’ दबाना वोट न डालना नहीं है बल्कि अस्वीकार की आवाज उठाते हुए वोट डालना है।
चुनाव की प्रक्रिया में ही मतदाताओं के हाथ में ऐसा कोई हथियार दिया जाना चाहिए कि जिससे वे महसूस करें कि वे राजनीतिक दलों की आपसी जोड़-तोड़ के निरुपाय दर्शक भर नहीं हैं। राजनीतिक दल भी सावधान हों कि मतदाताओं के हाथ में एक ऐसा चाबुक है जिसे फटकार कर, वे कभी भी उनका खेल बिगाड़ सकते हैं। इस बटन की मांग के पीछे समझाव-मनाव-दबाव की लंबी कहानी है। अंतत: चुनाव आयोग की पहल से नहीं, अदालत के आदेश से, पिछले वर्ष नवंबर-दिसंबर में हुए विधानसभा के चुनावों में इस बटन को पहली बार जगह मिली। न अदालत ने और न आयोग ने ही इसकी जरूरत समझी कि मतदाताओं को ठीक से समझाया जाए कि यह नया बटन उन्हें क्या-क्या अधिकार देता है और इसे दबाना कैसे वोट न देना या अपना वोट रद्द करवाना नहीं है बल्कि बड़ी मजबूती से वोट देना है ! यह इसलिए भी हुआ कि अदालत व आयोग, दोनों का ही मन मजबूत नहीं था। वे वोटिंग मशीन में बटन तो किसी दवाब में लगा रहे थे लेकिन अपनी अक्ल का बटन नहीं दबा रहे थे कि इस बटन को दबाने का परिणाम क्या होगा, यह भी घोषित कर दिया जाए !
इस बटन के पैरोकारों ने इस बारे में खासी स्पष्टता रखी थी लेकिन उनकी बात का तकनीकी पक्ष स्वीकार करने से आगे न आयोग बढ़ा, न अदालत ! लेकिन आयोग के ही आंकड़े एक अजीब-सी कहानी कहते हैं। जिन चार राज्यों में, २०१३ में विधानसभा के चुनाव हुए, उनमें १५,०००० मतदाताओं ने यह बटन दबाया। राजधानी दिल्ली में, जहां आम आदमी पार्टी के रूप में उनके सामने एक नया विकल्प भी था, वहां भी ४९,७३० मतदाताओं ने ‘सखा‘ बटन दबाया। छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में, जहां भारतीय जनता पार्टी अपनी लगातार तीसरी जीत का जश्न मनाते नहीं थकती है, वहां क्रमश: ३.५६ लाख व ५.९ लाख मतदाताओं ने ‘सखा‘ बटन दबाया। राजस्थान में ५.६७ लाख मतदाताओं ने ऐसा ही किया। इसका मतलब क्या निकाला जाए ? यही न कि इस एक बटन पर हमारे मतदाताओं का भरोसा बन रहा है।
हर संवैधानिक व वैधानिक व्यवस्था की तरह प्रातिनिधिक लोकतंत्र भी कई आंतरिक विरोधों से घिरता गया है। यह कुछ वैसा ही है जैसे कितना भी बेहतरीन घर आप बना लें, अगर रोज झाड़-पोंछ न करें तो वह रहने लायक नहीं रह जाता है। चुनाव-प्रक्रिया की शुरुआत से ही एक सवाल खड़ा होने लगा था कि चुनावों को पैसा, डंडा, गुंडा, जाति, संप्रदाय आदि की पकड़ से कैसे बाहर लाया जाए और कैसे ऐसा हो कि हर स्तर पर चुना गया प्रतिनिधि अपने मतदाताओं के प्रति जवाबदेह हो। जयप्रकाश नारायण ने दो बातें रखी थीं : पार्टियों को उम्मीदवारों के चयन में मतदाताओं की राय लेनी चाहिए, और कोई ऐसी व्यवस्था भी बननी चाहिए कि जिससे चुनाव जीतने के बाद भी सांसदों / विधायकों पर मतदाता का अंकुश रहे। इसमें से ही यह परिकल्पना निकली कि चुनाव की मशीन में एक बटन ऐसा भी बनाएं हम कि जिसे दबा कर वोटर बता सके कि पार्टियों ने जितने भी उम्मीदवार खड़े किए हैं, हमें उनमें से कोई भी योग्य नहीं लगता है। वर्षों पहले एक चुनाव याचिका की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने भी स्वीकार किया कि उम्मीदवारों के चयन में ‘पॉप्यूलर कंसल्टेशन’ की जयप्रकाशजी की मांग बहुत सही थी। लेकिन हमें यह समझ लेना चाहिए कि इस परिकल्पना को आधा-अधूरा लागू करना, इसकी संभावनाओं को पूरी तरह खत्म करना है।
इस बटन की सार्थकता तभी बनेगी जब आयोग यह भी बताएगा कि जिस पार्टी के उम्मीदवार को एक निश्चित फीसदी से कम वोट मिलेंगे, उसका चुनाव रद्द हो जाएगा। आज भी ऐसा तो होता है कि आपको निश्चित फीसदी से कम वोट मिले तो आपकी जमानत जब्त हो जाती है। मतलब बात पैसों पर आ कर खत्म कर दी गई है। इससे पार्टियों पर या उम्मीदवारों पर कोई दवाब बनता नहीं है। इसलिए पार्टियां लोकतंत्र पर कुठाराघात करने वालों को विधानसभा या लोकसभा में भेजते हिचकती नहीं हैं; बाहुबलियों को जीत की गारंटी माना जाता है और वोट कटुआ या डमी उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं। स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि वोटिंग मशीन में जितने नाम दर्ज नहीं हो सकते हैं, उतने लोग एक निर्वाचन क्षेत्र से खड़े हो रहे हैं। बनारस लोकसभा क्षेत्र का क्रमांक है ७७ और यहां से खड़े हैं ७७ उम्मीदवार जबकि ९४ लोगों ने उम्मीदवारी का पर्चा खरीदा था। नामांकन के आखिरी दिन नरेंद्र मोदी समेत ३७ लोगों ने नामांकन किया। क्या यह लोकतंत्र के मजबूत होने का प्रमाण है ? या चुनाव-प्रक्रिया किस तरह बाजार में नीलामी के लिए खड़ी कर दी गई है, इसका प्रमाण है ? अगर दूसरी बात सही है तब चुनाव आयोग को कैसे नींद आ सकती है कि ३५०० करोड़ रुपयों के खर्च से, फौज-पुलिस के अंधाधुंध इस्तेमाल से वह जो चुनाव करवा रहा है, उसका आधार ही इतना खोखला है ! इसलिए ‘सखा’ बटन को तेज दांत देने की जरूरत है ताकि जरूरत पड़ने पर वह काट सके। करना यह होगा कि जिन्हें निश्चित फीसदी से कम वोट मिलेंगे, उनके चुनाव रद्द ही नहीं होंगे, उनकी जमानत जब्त ही नहीं होगी बल्कि अगले दो चुनावों तक वे फिर उम्मीदवार बन भी सकेंगे। तब पार्टियों को सावधान रहना होगा कि बेईमानी के इरादे से उम्मीदवार खड़ा किया तो उस पर आगे के लिए रोक लग जाएगी। ऐसी स्थिति बन सकती है कि पार्टियों के पास उम्मीदवारों का टोटा पड़ जाएगा। दूसरी तरफ यह व्यवस्था भी हो कि अगर लगातार दो चुनावों में, किसी निर्वाचन क्षेत्र से किसी पार्टी को निश्चित फीसदी से कम वोट मिले तो वह पार्टी, उस चुनाव क्षेत्र से तीसरे चुनाव में उम्मीदवार खड़ा नहीं कर सकेगी। अगर ऐसा हुआ तो पार्टियों को उम्मीदवारों के चयन में इसका ध्यान रखना ही होगा कि उसकी अपने मतदाताओं पर इतनी पकड़ तो हो ही कि वह अल्पतम वोट के शिकंजे में न फंस जाएं क्योंकि इससे उम्मीदवार भी मारा जाएगा और पार्टी भी !
तीसरी स्थिति यह बनेगी कि अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में ‘सखा’ बटन ही सबसे ज्यादा दबाया गया तो वहां का चुनाव रद्द हो जाएगा और दोबारा चुनाव होंगे। तब सारी पार्टियों को नये उम्मीदवारों के साथ चुनाव में उतरना होगा, क्योंकि पुराने सारे उम्मीदवारों को मतदाता ने खारिज कर दिया था। आज भी ऐसा होता है लेकिन तभी जब बोगस वोटिंग का व्यापक आरोप सिद्ध हुआ हो अथवा जहां उम्मीदवार की मृत्यु हो जाए। हम कह रहे हैं कि उम्मीदवार की ही नहीं, लोकतंत्र की मृत्यु भी होती हो तो चुनाव रद्द होने चाहिए। मुझे लगता है कि आज की चुनावी व्यवस्था में इतना जोड़ दिया जाए तो दलों को मर्यादित करने, चुनाव-खर्च पर अंकुश रखने और मतदाता की भूमिका को सशक्त करने में काफी मदद मिलेगी।
यहां तक आयोग पहुंचे तो इसके आगे के दो जरूरी कदमों के लिए समाज को तैयार करने का काम शुरू करना होगा – प्रतिनिधि वापसी का अधिकार और लोक-उम्मीदवार की दिशा में जाने की तैयारी ! संसदीय लोकतंत्र की पोशाक गंदी हो चली है। इसे धो कर नया करने की जरूरत है। ‘सखा’ इतनी संभावनाओं के साथ हमारी मशीन पर आ गया है। अब जरूरत है कि आयोग इन संभावनाओं को सिद्ध करने का प्रारंभ करे। आंबेडकर नगर के सवालों का जवाब यहां से शुरू होता है।

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कुमार प्रशांत, लेखक प्रख्यात गांदीवादी चिंतक व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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