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गरीबों को अनपढ़ रखने की साजि़श- शिक्षा का अधिकार कानून

शिक्षा का अधिकार कानून समतामूलक गुणवत्ता की मुफ्त शिक्षा का अधिकार देता नहीं बल्कि छीनता है।
डॉ. एम.एल. परिहार
हाल ही में अदालत ने एक बार फिर अनिवार्य व निःशुल्क शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 की पालना नहीं होने पर सख्त नाराजगी जताई है। प्राइवेट पब्लिक स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें गरीब वर्ग के बच्चों को निःशुल्क देने के प्रावधान से संबंधित इस अधिनियम को लागू हुए चार साल हो गए है। इसे लागू करने के लिए इन स्कूलों को तीन साल का समय दिया था। यह समय सीमा एक साल पहले ही पूरी हो चुकी है लेकिन देश में कानून की पूरी तरह से पालना नहीं हो पा रही है। न्यायालयों के भारी दबाव तथा सरकारों द्वारा बार बार भर्ती संबंधी निर्देश जारी किए जाने के बावजूद पब्लिक स्कूलों के धन्ना सेठों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। सरकार की लाख कोशिशों का इन पर कोई असर नहीं हो रहा है। दरअसल पब्लिक स्कूलें अब पैसे कमाने के कारखानों में तब्दील हो चुकी है उन्हें गरीब वर्ग के बच्चों की जरा भी फिक्र नहीं है उनकी नियत में ही खोट है वे अपनी इच्छा से गरीब बच्चों को और वह भी फ्री में शिक्षा देने के लिए कतई तैयार नहीं है। शिक्षा को व्यापार बना कर पूरे शिक्षा तंत्र पर सांप की तरह कुंडली मारे बैठे साधन सम्पन्न वर्ग की गरीबों को अनपढ़ रखने की यह बड़ी साजिश है।
दरअसल देश में सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करके प्राइवेट कथित पब्लिक स्कूलों को बढ़ावा देने का खेल तो सन् 1970 के दशक में ही शुरू हो गया था। 1986 में नई शिक्षा नीति को लागू कर शिक्षा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र को मंडी बाजार का रूप दे दिया। प्राइवेट स्कूल खोलने वालों को इस शर्त पर मंजूरी मिली थी कि वे गरीब बच्चों को भी एडमिशन देंगे। शिक्षा का अधिनियम 2009 के तहत ऐसे बच्चों को फ्री एजुकेशन देना अनिवार्य कर दिया लेकिन चार साल बाद भी इन पब्लिक स्कूल वालों को न तो सरकार के दिशा निर्देशों की परवाह है और न ही न्यायालय के दबाव की। विचित्र बात तो यह है कि गरीब वर्ग में शिक्षा प्रचार के नाम पर भवन निर्माण हेतु सरकारों से कोडि़यों के भाव या निःशुल्क जमीन हड़प लेते है तथा स्कूल सत्रों के दौरान सरकारी महकमों से तरह तरह के करोड़ों रूपयों के अनुदान हर साल लेते है। सरकारी विभागों से ढेरों सहायता के साथ ही प्राइवेट सेक्टर से भी बेशुमार धन उगाह लेते हैं जिसका आम व्यक्ति को अंदाजा तक नहीं होता है। महंगे एडमिशन फार्म व तरह तरह की ऊंची फीसों से ये पहले ही अपनी तिजोरिया भर लेते हैं। शिक्षा विभागों के निर्देशों और शिक्षा के अधिनियम को धत्ता बताकर ये अपनी मनमानी चलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। पब्लिक स्कूल अब सिर्फ मोटा मुनाफा कमाने का जरिया हो गया है। शिक्षा, संस्कार, समाज सेवा जैसी बातें उनकी प्राथमिकता में दोयम दर्जे पर आती हैं और पूरे देश में कुकुरमुत्ते की तरह फैले इन पब्लिक स्कूलों की यही सोच है कि गरीब को पीछे धकेलना और शिक्षा के नाम पर मोटी रकम कमाना।
सरकार द्वारा जब इन स्कूलों को 25 फीसदी गरीब बच्चों को एडमिशन देना अनिवार्य कर दिया तो लम्बे समय तक तो इन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया और जब कोर्ट व सरकार का फरमान आने लगा तो इन्होंने गरीब को फिर शिक्षा से वंचित रखने का रास्ता निकाल लिया। एक पड़ताल में यह दुखद अमानवीय सच सामने आया कि मजबूरीवश ये स्कूल वाले गरीब बच्चों को एडमिशन तो दे रहे हैं लेकिन स्कूलों में ऐसे बच्चों के साथ भारी भेदभाव किया जाता है जिस कारण बच्चे बीच शैक्षणिक सत्र में ही स्कूल छोड़ देते हैं और स्कूल वालों का असली अमानवीय मकसद पूरा हो जाता है। यह बात सामने आई कि किस तरह प्राइवेट स्कूलों में एक वर्ग को श्रेष्ठता का बोध कराके गरीब वर्ग के बच्चों और अभिभावकों में हीनता का भाव भरने का काम किया जा रहा है। हीनता का बोध कराने का यह कृत्य एडमिशन प्रक्रिया से ही शुरू हो जाता है। पहले तो गरीब बच्चों को एडमिशन नहीं देने के कई तरह के बहाने बताये जाते है यदि दे भी देते है तो अलग अलग पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों के बीच व्यवहार व पढ़ाने में फर्क करके उनके मन में कुंठा पैदा करते हैं। इन बच्चों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं। उनके लिए अलग पालियों में स्कूल और अन्य सामान्य बच्चों से अलग भी बैठाया जाता है। इन स्कूलों के शिक्षा गुरू भी गरीब शिष्यों से जमकर भेदभाव करते हैं। वे उन्हें केवल औपचारिकता के लिए पढ़ाते हैं, उनके प्रदर्शन सुधार पर कोई ध्यान नहीं देते और अंततः फेल हो जाने पर स्कूल से बाहर धकेल देते हैं। ऐसे भी उदाहरण हैं जहां एक धार्मिक संगठन द्वारा चलाये जा रहे पब्लिक स्कूल में स्कूल प्रबंधन की ओर से अभिभावकों को बाकायदा यह हिदायत दी जाती है कि यदि दलित कमजोर गरीब वर्ग के बच्चों का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता है तो उनके अभिभावकों से इसका रोना नहीं रोया जाय और उन्हें फेल होने पर अगले सत्र में स्कूल से निकाल दिया जाय।
एडमिशन के समय ज्यादातर स्कूल वाले तो कोई बहाना बना कर गरीब वर्ग के अभिभावकों को टरका देते हैं। अदालत की सख्ती के बाद यदि इन्हें दाखिला देना भी पड़े तो एक तरफ उनके साथ भारी भेदभाव किया जाता है तो दूसरी ओर उन पर आर्थिक बोझ लाद दिया जाता है। स्कूल भले ही उनसे एडमिशन फीस नहीं ले लेकिन दूसरी कई तरह की फीस थोप कर वे अपना गणित सीधा कर देते हैं। गरीब माता पिता हाथा जोड़ी करते हैं और मोटी फीस देने में असमर्थता जाहिर करते हैं तो स्कूल वाले बच्चे के भविष्य की दुहाई देकर कहते हैं कि यह सब तो बच्चे के सामाजिक, सांस्कृतिक विकास व फर्राटेदार अंग्रेजी सिखाने के लिए जरूरी है वरना बच्चा तेज रफ्तार में कही भी नहीं टिक पायेगा। कुल मिला कर स्कूल प्रबंधन ऐसे हालात पैदा कर देता है कि अभिभावक के सामने बीच सत्र में बच्चे को स्कूल छुड़ाने के सिवाय कोई विकल्प ही नहीं बचता है। इतना ही नहीं इस कानून के लागू होने के बाद सभी प्राइवेट स्कूलों ने अपनी फीस में काफी बढ़ोतरी कर दी है जिससे गरीब बच्चों की पढ़ाई  और अधिक मुश्किल में पड़ गई है। जिन राज्यों में इन कानून की अधिसूचना निकाली है वहां की सरकारों के पास पिछले एक साल में इस कानून की पालना में हुई गड़बड़ियों और शिकायतों का अंबार लग गया है। पब्लिक स्कूल वाले पूरी मनमानी कर रहे हैं। एडमिशन से मना करते हैं। एडमिशन की समय सीमा तय नहीं की जाती है, लॉटरी नहीं निकाली जाती है यदि एडमिशन देते हैं तो गरीब बच्चों से तरह-तरह की फीस वसूल करते हैं। अलग बैठा कर भेदभाव करते हैं। हीनता पैदा कर उन्हें कुंठाग्रस्त बना दिया जाता है। ऐसे बच्चे एकाकीपन और अवसाद का शिकार हो जाते हैं। बात यहां तक ही खत्म नहीं होती बल्कि आगे चल कर उन्हें फेल कर स्कूल से बाहर निकालने का रास्ता भी साफ कर दिया जाता है।
शिक्षा का अधिकार कानून बनने के चार साल बाद भी पालना नहीं करना दुखद है। प्राइवेट स्कूल वाले ऐसे मानने वाले नहीं है। सरकार को अब सख्ती से पेश आना पड़ेगा। कानून के तहत 25 फीसदी सीटें गरीब वर्ग के बच्चों को नहीं देने वाले प्राइवेट स्कूलों की मान्यता निलंबित या रद्द करने का फैसला करना पड़ेगा इससे पहले प्रवेश के लिए केन्द्रीकृत व्यवस्था हो और सरकार इसके लिए सूचना भी जारी करे। इन स्कूलों में गरीब बच्चों का प्रवेश लॉटरी के जरिए हो और प्रवेश की सूचना अखबारों में छपवाने की बाध्यता करी जाए। स्कूलों को निःशुल्क शिक्षा का सही अर्थ समझाया जाय यानी फीस के साथ कपड़े, ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी निःशुल्क मुहैया कराई जाय। इसके साथ ही इसके लिए भी पाबंद किया जाय कि स्कूलों में गरीब बच्चों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव नहीं हो।
शिक्षाविदों का मानना है कि वर्तमान शिक्षा का अधिकार कानून समतामूलक गुणवत्ता की मुफ्त शिक्षा का अधिकार देता नहीं बल्कि छीनता है। यह शिक्षा के बाजारीकरण की रफ्तार तेज करता है, प्राइवेट स्कूलों को मनमाने ढंग से फीसें बढ़ाने की इजाजत देता है। प्राइवेट स्कूलों में 25 फीसदी कोटे के बहाने सरकारी धन प्राइवेट स्कूलों को स्थानान्तरित करता है, भेदभावपूर्ण व गैर बराबरी पर टिकी बहुपरती स्कूली व्यवस्था को यह मजबूत करता है, शिक्षकों को कई कैडरों में बांटकर उनके साथ भेदभाव करता है। यह सरकारी शिक्षकों से गैर शिक्षक काम करवाने की इजाजत देता है जबकि निजी स्कूलों के शिक्षकों को इससे छूट देता है। शिक्षा प्रसार की ओट में यह कानून प्राइवेट स्कूलों को फलने फूलने की खुली छूट दे रहा है। यह कानून शिक्षा के अधिकार के सपनों को साकार करने का वादा तो करता प्रतीत होता है लेकिन सच्चाई यह है कि इस कानून के जरिए देश में शिक्षा के स्तरीकरण को संवैधानिक बना दिया गया है जो कि संविधान की मूल भावना के खिलाफ है। यह कानून समाज में पहले से मौजूद सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक गैरबराबरी की अमानवीय व्यवस्था को बढ़ावा देता है।
स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी बुनियादी चीजें भी जब सरकार के हाथ से निकल कर दुकानदारों व व्यापारियों के हाथों में पहुंच चुकी है तब आम आदमी के पास विकल्प क्या रह जाता है ? सरकार ने सरकारी स्कूलों को जानबूझ करके बर्बाद किया है। सरकार खुद ही विश्व बैंक में कार्यक्रमों के जरिये निजी हाथों में सरकारी स्कूलों को सौंपकर निश्चित हो जाना चाहती है। लोक कल्याणकारी राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा की जिम्मेदारी सरकार की होती है और इसकी अनदेखी करके भारत लोक कल्याणकारी राज्य नहीं बना रह सकता। मूल प्रश्न यह है कि यदि सरकार इसी तरह शिक्षा में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल लागू करती रही तो देश के सरकारी स्कूलों का सर्वनाश हो जाएगा। इसमें समाज के पिछड़े, दलित, आदिवासी वर्ग के बच्चे शिक्षा से महरूम हो जाएंगे।

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डॉ. एम. एल. परिहार। लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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