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गरीब, मजदूर, किसान और दलित परिवारों से आने वाले ये बच्चे देशद्रोही हो गए !!!

फासीवाद राष्ट्रवाद की भट्टी पर पकता है, लाशें उसके लिए ईंधन का काम करती हैं
[button-red url=”#” target=”_self” position=”left”]महेंद्र मिश्रा[/button-red] जेएनयू के जिन लोगों से देश को खतरा है। उनका परिचय बहुत जरूरी है।
जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार एक गरीब परिवार से हैं। बाप अपाहिज हैं। मां आंगनबाड़ी में काम करती हैं। उनके कमाए तीन हजार रुपये से परिवार का पेट पलता है।
राम नागा छात्रसंघ के महासचिव हैं। गरीब दलित परिवार से हैं। और भारत में भुखमरी के इलाके के रूप में कुख्यात कालाहाड़ी से आते हैं।
चिंटू कुमारी छात्रसंघ की पूर्व महासचिव हैं। वह बिहार के भोजपुर से हैं और दलित हैं। उनकी मां सरोजनी देवी चूड़ियां बेचने का काम करती हैं। सरोजनी जी को बेटी से अपने लिए घर नहीं चाहिए। वह चाहती हैं कि बेटी गरीब-गुरबों की मुक्ति की लड़ाई लड़े।
अनंत प्रकाश नारायण जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व उपाध्यक्ष हैं। यूपी के चंदौली से हैं और दलित परिवार से आते हैं। उनके परिजनों के पास दिल्ली आने भर तक का किराया नहीं है।
सबसे चर्चित चेहरा उमर खालिद का है। उमर नास्तिक हैं। उन्होंने येल विश्वविद्यालय की फेलोशिप के प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उन्हें दलितों और आदिवासियों के लिए काम करना था।
इनमें से किसी के खिलाफ अभी तक दिल्ली पुलिस एक भी सबूत नहीं पेश कर सकी है। सबूत के नाम से जितनी चीजें सामने आयीं हैं या तो वो नकली साबित हो गयीं या फिर झूठी निकलीं। बावजूद इसके उन्हें देशद्रोही करार देकर पूरे देश में बदनाम कर दिया गया।
गरीब, मजदूर, किसान और दलित परिवारों से आने वाले ये बच्चे देशद्रोही हो गए हैं। लाखों करोड़ जनता का पैसा लूटकर विदेशी बैंकों में जमा करने वाले सबसे बड़े देशभक्त। सरकार ने उन्हीं देशभक्त कारोबारी घरानों के एक हिस्से के 1 लाख 14 हजार करोड़ रुपये माफ कर दिए। न कहीं चूं हुई और न ही उस पर चर्चा।
दरअसल बीजेपी ब्राह्मणवाद की कोख से पैदा हुई है। लिहाजा इसका बुनियादी चरित्र ही दलित, महिला और मुस्लिम विरोधी है। कारपोरेट

परस्त होने के नाते मजदूरों, किसानों और नौजवानों से इसका 36 का रिश्ता है। केंद्र सरकार समस्याएं हल करने की जगह उसकी स्रोत बन गई है। समस्याओं को हल करने का उसका तरीका भी नायाब है। वह यह कि छोटी समस्या की जगह एक बड़ी समस्या खड़ी कर दो। सारे मोर्चों पर नाकाम मोदी को अब राष्ट्रवाद का ही सहारा है। इसकी आड़ में कारपोरेट की लूट भी चलती रहेगी और गरीबों, दलितों और मुसलमानों का दमन भी होता रहेगा। अनायास ही नहीं मोदी के निशाने पर सबसे पहले देश के उच्च शिक्षण संस्थान हैं। क्योंकि सबसे पहले, सबसे ज्यादा और सबसे तगड़ी चुनौती इन्हीं किलों से मिलने वाली है। इसलिए सरकार सबसे पहले इनको ही रौंद देना चाहती है। ऐसे ही नहीं हैदराबाद से लेकर जेएनयू और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से लेकर मद्रास आईआईटी तक सब इसके निशाने पर हैं।
दरअसल फासीवाद राष्ट्रवाद की भट्टी पर पकता है। लाशें उसके लिए ईंधन का काम करती हैं। हिंसा उसकी पहली शर्त है। लिहाजा देशभर में न केवल हिंसा हो रही है बल्कि उसके लिए पूरा माहौल भी बनाया जा रहा है। देखते ही देखते हरियाणा में तीन दिनों के भीतर 19 घरों के चिराग बुझ गए। विरोध करो तो देशद्रोह सड़क पर उतरो तो गोली। यह अब सरकार की घोषित नीति हो गई है। क्या ऐसा नहीं लग रहा है कि हम जियाउलहक के दौर के पाकिस्तान में पहुंच गए हैं? और हिंदू पाकिस्तान हमारा लक्ष्य हो गया है।
लोकतांत्रिक संस्थाओं का वजूद संकट में है। सुप्रीम कोर्ट तक के निर्देशों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पुलिस मूक दर्शक है और सक्रिय है तो गोली चला रही है। विधायक सड़क पर उतर कर जनता पर हमले कर रहा है। पत्रकारों को सरेआम पीटा जा रहा है। लोकतंत्र लोकतांत्रिक संस्थाओं के माध्यम से चलता है। सस्थाएं उसका हाथ पैर होती हैं, उन्हें अपाहिज बनाकर लोकतंत्र को मौत के रास्ते पर ढकेला जा रहा है और पूरी व्यवस्था को गुंडों और दंगाइयों के हवाले करने की साजिश हो रही है।
लेकिन यह काम इतना आसान नहीं है। देश में 67 सालों से फला-फूला लोकतंत्र और उसके नागरिक इतने जल्दी घुटने नहीं टेकेंगे। इस देश ने अगर अंग्रेजों को भगाया है और इंदिरा के आपातकाल को नहीं बर्दाश्त किया, तो यह किसी तानाशाही को भी नहीं सहेगा। उसकी जगह इतिहास के कूड़ेदान में है। और देश की जनता उसे दिखा कर रहेगी।
नरेंद्र मोदी जी अंधराष्ट्रवाद की जिस भट्टी में आप पूरे देश को झोंक रहे हैं। ऐसा मत सोचिए कि आप उसमें महफूज रहेंगे। एक दिन ऐसा आएगा जब उसकी आंच आपको भी लगेगी। लेकिन तब तक शायद बहुत देर हो चुकी हो। सब कुछ समाप्त हो गया रहा होगा। यही है फासीवाद जैसी प्रवृत्तियों का इतिहास। इसलिए भारत में इसको मत दोहराइये।

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