Home » गांधीजी कहते थे- असली स्वराज कुछ लोगों द्वारा सत्ता हासिल कर लेने से नहीं आयेगा

गांधीजी कहते थे- असली स्वराज कुछ लोगों द्वारा सत्ता हासिल कर लेने से नहीं आयेगा

१९७७ में कांग्रेस की नीतियों का विकल्प चाहते थे; लेकिन उसके गर्भ से निकली भाजपा

भारतीय राजनीति में बुनियादी बदलाव
अनुराग मोदी  
जब हमारे शरीर में बार-बार फोड़े होते रहे, तो फिर हर-एक फोड़ों पर थोड़ी बहुत मलहम लगाने से बीमारी नहीं जड़ से नहीं जायेगी; हमे पूरे खून की सफाई करना होती है, जिससे दुबारा फोड़े न हो। भगतसिंह और गांधी मानते थे- देश में बुनियादी सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन लाये बिना देश की दो तिहाई जनता के लिये सत्ता परिवर्तन बेमानी है; यह काम १९४७ और १९७७ में अधूरा रह गया, अब उसे पूरा करने की जवाबदारी हमारी है।
सादगी और ईमानदारी- असल में, सत्ता का वीआईपी कल्चर उसकी बाहरी बुराई है, उसकी मूल बुराई उसकी अथाह शक्ति; जिसका हमेशा से दुरूपयोग होता आया है। इसलिये वीआईपी कल्चर बदलने से सत्ता का मुखौटा भर बदलेगा, मूल चरित्र नहीं। गांधीजी कहते थे: “असली स्वराज कुछ लोगों द्वारा उस सत्ता को हासिल कर लेने से नहीं आयेगा, बल्कि जनता को इस लायक बनाने से आयेगा कि जब भी सत्ता अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करे, जनता उसका प्रतिकार कर सके””।
       सादगी, ईमानदारी सदियों से हमारे जीने का तरीका रहा है। अंग्रेज अपने दो सौ साल के शासन-काल में इसे कुछ हद-तक ही तोड़ पाये; आदिवासी तो आज भी सम्पत्ति का मोल नहीं समझ पाया। भारतीय समज हमेशा से किफायती रहा है; हम आज भी किसी चीज़ को फेकने के पहले उसके पुनरुपयोग के बारे में दस बार सोचते हैं। इसी अनुरूप, राजनीती में ईमानदारी और सादगी की अपेक्षा करना हमारे लिये हमेशा स्वाभाविक रहा है।
 १९४७ और १९७७ के समय अधिकाँश नेता ईमानदार थे और सादगी भरा जीवन बिताते थे। इसलिये, जब दो-तिहाई लोगों के 20 रुपए रोज़ से कम आमदनी में जीवन जीने की ज़ो मुद्दा आज उठा है, और जिस आधार पर सत्ता पलट हुआ, उस मुद्दे को लोहिया ने ‘तीन आना कमाई’ और प्रधानमंत्री नेहरु पर २५००० हजार रुपए रोज़ खर्च के के नाम से १९६3 में भी उठाया था। इस मुद्दे ने उस समय की राजनीति में भूचाल ला दिया था, और उसके बाद के चुनावो में ९ राज्यों में कांग्रेस हारी थी और ‘संयुक्त विधायक दल’ की सरकार बनी थी। ।
बदलाव के देशज तरीकों के प्रतिकार की परम्परा- गांधी देश के इस मानस और स्वाभाविक जरूरत को समझते थे; वो, मात्र उनकी कोरी वैचारिक कल्पना शक्ति नहीं थी। इसलिये उन्होंने जीवन में सादगी की बात की, और उसी अनुरूप अपने विकास और शासन व्यवस्था के तरीके अपनाने पर जोर दिया।
असल में, जब भी लम्बे समय तक विचार मंथन और जमीनी समझ और संघर्ष से शासन व्यवस्था के जो देशज तरीके निकलते हैं, उस-पर, हमेशा हम पर बाज़ार के तरीके हावी हो जाते हैं। हमें यह एहसास कराया जाता है कि हमारे तरीके से भारत का विकास नहीं हो सकता- हमें आयातित, पश्चिमी तरीके अपनाना ही होगा; और हम पश्चिम की अंधी-नक़ल करने लगते हैं।  इस तरह, एक लम्बे समय की कुर्बानी और विकास और शासन के हमारे अपने तरीके विकसित करने का अवसर जाया चला जाता है। जिससे हमारी अपनी क्षमताओं का निर्माण और असली विकास नहीं होता है
    हमारी विडंबना यह है, सत्ता मिलने पर विचारों को अड़ंगा बताने की हमारी परम्परा, पुरानी है- १९४७ में, आज़ादी के बाद गांधीजी के स्वराज के मुद्दे को भुला दिया गया था; जनता को बताया गया गांधी इस देश के लिये व्यवहारिक नहीं है, और वो आज-तक इसी भ्रम में विश्वास करते आ रही है। १९७७ के बाद, जनता पार्टी कि सरकार ने जय प्रकाश नारायण को भुला दिया था; वैसे ही आज ‘आप’ पार्टी की सरकार ने सत्ता मिलने पर, न सिर्फ किशन पटनायक की ‘वैकल्पिक राजनीति, के सूत्रों को भुला दिया। बल्कि, जिस भगतसिंह और गांधी के सामाजिक- आर्थिक बदलाव की सोच को ही सिरे से नकार दिया।
किशन पटनायक बिहार आन्दोलन के मुख्य नीतिकारों में शुमार रहने के बाद भी १९७७ में सत्ता में जाने से इंकार कर देश को “वैकल्पिक पार्टी”’ नहीं ‘“वैकल्पिक राजनीति’ की जरुरत है का नारा देने वाले देश के पहले नेता थे। उनका कहना था, यह राजनीति जनांदोलनो के गर्भ से निकलेगी। वैकल्पिक राजनीति की जो परिकल्पना उन्होंने की थी, जिसमें: एक, वैकल्पिक विकास; दूसरा, वैश्वीकरण, निजीकरण और मुक्त व्यापार का विरोध; तीसरा, समता आधारित समाज; और चौथा, जनता की वैचारिक तैयारी को जो मुख्य बातें, थी उसे ही तिलांजलि दे दी।
        सत्ता का अपना एक स्वभाव होता है, वो किसी भी बदलाव का प्रतिकार करती है, और, उसमें अन्दरूनी और बाहरी ताकतें अपनी पूरी शक्ति लगा देती है; कई तरीके अपनाती है। जब भी देश की जनता व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की ओर बढ़ने की कोशिश करती है, उसे उसके नजदीक जाने से रोका जाता है। हमेशा, सता से जुड़ा एक ऐसा वर्ग जो एक रानी-मक्खी की तरह जनता (९९% लोग) की मेहनत की कमाई को चूसता रहता है; वो ही यह सुनिश्चित करता है कि जनता के गुस्से से उपजी ऊर्जा बुनियादी बदलाव में ना लग पाये। यह वर्ग जनता के गुस्से को सिर्फ एक रोज़मर्रा की समस्या से जुड़ा भर बताने का काम कर, उसे फ़ँसाये रखता है; वो जनता की समझ को रोजी-रोटी के झंझटों से ऊपर का नहीं मानता! इस काम में वैश्वीय ताकतें भी अपनी भूमिका निभाती हैं, इसके लिये कई तरह के पैतरे खेले जाते हैं। विचारों को अजूबा बताकर आम-जनता को उससे काटकर रखने का काम उसका हितैषी बनाकर भी किया जाता है; कभी दमन के जरिए करता है; और कभी थोड़ी बहुत राहत देकर।
विचारों की प्रेरणा- इस समय चारो तरफ क्रांति की बात हो रही है। इसलिये, मैं आपको, क्रांति के बारे में दो बातें स्पष्ट कर दूँ : एक, वो विचारहीन नहीं हो सकती; दूसरा, व्यस्था में आमूल-चूल परिवर्तन हुये बिना वो क्रांति नहीं कहलायेगी। देश में चुनाव के बाद स्थापित पार्टियों को पटकनी देने का काम इस देश में अनेको बार हो चुका है, इसे क्रांति कहना, ना सिर्फ, गांधी-भगतसिंह से लेकर देश और दुनिया में आज-तक जन्मे उन हजारों विचारको का अपमान होगा, जिन्होंने आज-तक क्रांति के लिये अपनी जान दी, बल्कि क्रांति को लेकर भ्रम फ़ैलाने जैसा होगा।
हमारी वैचारिक स्पष्टता जरूरी है, जरूरी नहीं है वो परम्परागत खाँचे में बैठी विचारधारा हो। क्योंकि, वैचारिक उथल-पुथल से प्रेरित होकर ही, युवा देश बदलाव के काम में अपना सर्वस्व न्यौछावर करता आया है। आजादी के आन्दोलन से जन्मी वैचारिक ऊष्मा से प्रेरणा लेकर मार्क्स, लोहिया, गांधी, भगतसिंह, आम्बेडकर और दुनिया के अनेक विचारकों की विचारधाराओ से प्रभावित हजारो युवक देश को बेहतर बनाने के लिये अपना सर्वस्व न्यौछावर कर जमीनी-स्तर का काम करते रहे। इसमें से कुछ ने बन्दूक थामी, तो कुछ लोकतान्त्रिक मार्ग पर चले। सबकी विचारधारा अलग-अलग थी, मगर उद्देश्य एक ही था- देश के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को देश में बारबरी का दर्जा दिलाना; उन्होंने, मजदूर, डाली, आदिवासी, किसानों और देश की दो तिहाई से उपर जनता के साथ हो रहे सामाजिक गैर बराबरी के मुद्दे के खिलाफ संघर्ष खड़ा किया। विचारधारा की हिम्मत से ही वो: जेल; प्रताड़ना; जानलेवा हमले; आर्थिक तंगी; मीडिया की उपेक्षा सहने और खुद परिवार को उपेक्षित करने के बाद भी डिगे नहीं। इन लोगों ने देश में सामजिक बदलाव के जरिए बुनियादी बदलाव के काम को जिंदा रखा।
       इसके बाद १९७४ -१९७७ के बीच हुये देश में हुयी समाजवादी और मार्क्सवादी आन्दोलन की वैचारिक उथल-पुथल से एक बार फिर देश में युवाओं की नई पौध बुनियादी बदलाव के इस कम में कूदी। यह ऊष्मा लम्बे-समय तक बरक़रार रही; मैं इस काम में १९८९ में अपनी सिविल इंजीनियर की नौकरी छोड़ कूदा, और मेरी पत्नी 1990 में। लेकिन, पिछले १५ सालों से अपना केरियर छोड़ सामाजिक बदलाव के काम में आने वाले युवाओं की संख्या चिंताजनक रूप से घट गयी है। अब 2013 में। इस उथल-पुथल में एक बार फिर मौका है, जब युवा अपना कैरियर छोड़ सामाजिक बदलाव के जमीनी स्तर के कम से जुड़े।
    लेकिन, इस लड़ाई में वहीं लोग लम्बा टिकते हैं, जिनकी वैचारिक तैयारी सही होती है। जब हमारे संगठन ने आदिवासी गाँव में व्यापत सबसे निचले स्तर के भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़ा होने और जंगल पर अपना हक़ बिना रिश्वत लेने का फैसला लिया, तब समझ आया व्यवस्था के खिलाफ लड़ाई कितनी कठिन है। हमने इसके लिये लोगों की वैचारिक तैयारी शुरू की। इसलिये, जिस आदिवासी गाँव में लोग हर बाहरी आदमी से डरते थे, वहाँ जब रिश्वत ना देने पर लोगों पर दर्जनों झूठे केस लगे; महीनो जेल में रहना पड़ा; गाँव के गाँव जला दी गये; मारपीट हुयी- भुखमरी के बावजूद लोग पिछले दस साल से आज भी इन झूठे केसों को भुगत रहे हैं। लोगों की वैचारिक तैयारी होने के कारण इस सबके बावजूद लोग विचलित नहीं हुये।
वैकल्पिक विकास नीति- बदलाव को सिर्फ सत्ता उल्ट-फेर भर से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, वर्ना फिर कुछ सालों में फिर वैसी ही स्थीति हो जाती है। हम हमेशा उस समय कि स्थापित पार्टियों कि नीतियों का विकल्प चाहते है, लेकिन हमे मिलती है, नई बोतल में वही पुरानी शराब, बस थोडा स्वाद और उसे परोसने का तरीका बदल जाता है। जैसे १९७७ में कांग्रेस की नीतियों का विकल्प चाहते थे; लेकिन उसके गर्भ से निकली भाजपा।
जब देश में पिछले 20 सालों में आम आदमी के रोज़मर्रा का नमक- २५ पैसे प्रति किलो से २५ रुपए प्रति किलो हो गया; १०० गुना बढ़ गया। वो नमक जिसे गांधी ने अंग्रेजो के जख्म पर रगड़कर, उनकी सत्ता हिला दे थी। लाखों किसान आत्महत्या करने को मजबूर हुये हों; विकास के नाम पर करोड़ों मजदूर या तो अपने काम से बेदखल हो गये हों, या आधे वेतन पर काम कर हो; शिक्षा बिकने लगे, जो जैसा पैसा देगा वैसी शिक्षा मिलेगी, स्वास्थ्य, पानी, बिजली सब बाज़ार के मुनाफे की वस्तु बन जाये; देश के खदान, जंगल सब पर कम्पनियों का कब्ज़ा हो जाये। ऐसे में, वैचारिक दबाव में नही, मगर अन्य कारणों से वैश्वीकरण और निजीकरण की कांग्रेस और भाजपा की नीतियों के बारे में सोचना होगा।
ऐसे में हम कहे, कांग्रेस और भाजप के बेईमानी के चलते यह औजार बोथरे हो गये, और हमारे पास प्रबंधकीय कार्यकर्ताओं द्वारा ईमानदारी का नया औजार, हम उससे कचरा से निकाल देंगे, तो गाड़ी फिर वैसे ही चलने लगेगी, तो इसे हमें बुनियादी बदलाव कैसे कहेंगे?
हवा में ना टंगी हो ईमानदारी- विचारों को मारने की कोशिश हर काल में होती रहती है, सिर्फ उसके तरीके बदलते रहते हैं। आजादी के दौरान भी भगतसिंह और उनके साथियों को फांसी लगा दी गयी; सुकरात, गेलिलियो से लेकर गांधी सबके साथ यहीं हुआ। लेकिन, विचार कभी हारते नहीं है, पूरी सत्ता कहती रही कि पृथ्वी चपटी है, लेकिन गेलिलियो अपनी बात पर अडिग रहा कि पृथ्वी गोल है, और अंतत: वो सही साबित हुआ।
आज ऐसा कहा जा रहा है- सारा देश बदलने का एक ऐसा प्रबंधकीय खाका कुछ लोगों के पास तैयार है, जो आजतक गांधी से लेकर भगतसिंह और मार्क्स से लेकर लोहिया और आम्बेडकर किसी राजनैतिक कार्यकर्त्ता और विचारक के पास नहीं था! इसे व्यवहारवाद के सिद्दांत पर बनाया गया, इसमें विचार की जगह नहीं है; इसलिये उनके विचारों को तिलांजलि देने का समय आ गया है- सामाजिक गैरबराबरी को दूर करने के जनांदोलनो के काम से जनता वर्गों में बंट जाती है। जबकि, आज-तक, मैंने यहीं समझा, सीखा और जाना है कि बदलाव के काम में विचारधारा सबसे महत्वपूर्ण होती है! वो ही आपकी ईमानदारी की दिशा तय करती है।
    हवा में टँगी ईमानदारी खतरनाक होकर गलत दिशा में जा सकती है; उसे एक वैचारिक नींव की जरूरत होती है। अक्सर ईमानदार व्यक्ति तानाशाह हो जाता है, वो इस भ्रम में रहता है की वो जो सोचता है वहीं परमसत्य है, और वहीं असली विचारधारा है; जैसे हिटलर और मुसोलीनी जैसे अनेक मामले में हुआ। कोई परम्परगत वैचारिक खाँचा ना सही, लेकिन सारे ईन्सान सामान है, ऐसी समता आधारित एक न्यूनतम वैचारिक आधार की जरूर तो होती है।
      जब जनता सत्ता से विमोहित हो जाती है, यही वो आदर्श समय समय होता है, जब सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्त्ता के साथ मिलकर द्वारा व्यवस्था के प्रति इस गुस्से को वैचारिक आधार देकरव्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन में लाया जाये। लोगों की बैचनी को वैचारिक जामा पहना देश निर्माण के काम से जोड़ने के कम को अपनी मूल जवाबदारी मान उस काल और समय के विचारक और राजनैतिक-सामजिक कार्यकर्ताओ करते रहते हैं।
जनता और जनांदोलनो से अपील- आप अपने रोज़मर्रा के अनुभव से जानते हैं कि अच्छे विचार एक बच्चे के विकास के लिये कितने जरूरी होते हैं, दुनिया के विचारकों ने अपने लम्बे अनुभव के बाद आम-जनता के मुद्दों के बारे में अपने विचार और विश्लेष्ण रखे; वो कोई बुद्धिजीवी-वर्ग के पढ़ने का किताबी ज्ञान भर नहीं है। हमें इन विचारों से डरना नहीं है, इसे समझना है और अपनी ऊर्जा को हर-बार बदल-बदल कर एक वर्ग विशेष को सत्ता दिलाने में ना लगाकर, उसे देश के बुनियादी बदलाव में लगाना है। वर्ना एक बार फिर हमारे साथ धोखा हो जायेगा। हमें अपनी क्षमताओं पर विकास और शासन के अपने तरीके विकसित करने होंगे, इसमें हम पश्चिम से और पूर्व से दोनों की जो बातें हमें सही लगें उसे अपनाए भी, लेकिन हमारी अपनी सोच स्पष्ट हो। वर्ना, इस बार फिर, १९४७ और १९७७ की गलतियों की पुनरावृत्ति हो जायेगी।
 

About the author

जाने-माने सामाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ता अनुराग मोदी समाजवादी जन परिषद् के राष्ट्रीय कार्यकारणी सदस्य हैं।

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: