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dr. ram puniyani
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गीता, भारत की राष्ट्रीय पुस्तक नहीं है और न हो सकती है। हां, वह एक पवित्र हिन्दू ग्रंथ है

क्या गीता भारत की राष्ट्रीय पुस्तक है ?

क्या गीता एक हिन्दू धर्मग्रंथ है? निःसंदेह!

हरियाणा सरकार ने हाल में कुरूक्षेत्र में ‘गीता उत्सव’ का आयोजन किया। भगवत गीता की शिक्षाओं पर केंद्रित इस आयोजन पर 100 करोड़ रूपए खर्च किए गए।

ऐसी मान्यता है कि कुरूक्षेत्र ही वह स्थान है, जहां भगवान कृष्ण ने वे उपदेश दिए थे, जो हिन्दू धर्म के एक संस्करण का मूल आधार हैं।

‘गीता उत्सव’ से संबंधित आयोजन हरियाणा के कई ज़िलों में किए गए और इनमें विचार गोष्ठियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम शामिल थे।

इस उत्सव में अन्यों के अतिरिक्त, योग गुरू बाबा रामदेव की पतंजलि योगपीठ, रामकृष्ण मिशन, विश्व हिन्दू परिषद और इस्कान (इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कोंशसनेस) ने भागीदारी की।

मोदी सरकार के सत्ता में आने से देश में जिस किस्म के परिवर्तन होने शुरू हो गए हैं, सरकारी खर्च पर आयोजित यह उत्सव उनका उदाहरण है।

मोदी लगातार दुनिया के विभिन्न देशों का दौरा करते रहते हैं और वे जहां भी जाते हैं, अपने मेज़बानों को गीता की प्रतियां अवश्य भेंट करते हैं।
मोदी सरकार की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने कुछ समय पूर्व कहा था कि गीता को भारत की राष्ट्रीय पुस्तक घोषित कर दिया जाना चाहिए। हम सबको पता है कि मध्यप्रदेश सहित कई भाजपा शासित राज्यों में गीता को स्कूली पाठ्यक्रमों में सम्मिलित कर दिया गया है। जब भाजपा कर्नाटक में सत्ता में थी तब उसने स्कूलों के पाठ्यक्रम में गीता को शामिल करने का प्रयास किया था। इसके अलावा, गीता को एक धार्मिक पुस्तक के स्थान पर भारतीय दर्शन के ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत किए जाने के प्रयास भी हो रहे हैं।

मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने जनवरी, 2012 में घोषित किया कि ‘‘गीता, मूलतः भारतीय दर्शन की पुस्तक है, भारतीय धर्म की नहीं’’। यह निर्णय राजनैतिक विचारधारा से प्रेरित लगता है और हिन्दू धर्मशास्त्र या भारतीय संविधान के सिद्धांतों की समझ पर आधारित नहीं है।

हम यह भी जानते हैं कि कुछ समय पूर्व तक अदालतों में हिन्दू गवाहों को गीता की शपथ दिलवाई जाती थी।

भगवत गीता या गीता, 700 श्लोकों की कविता है, जो महाभारत का हिस्सा है। चूंकि वह महाभारत पर आधारित है इसलिए उसे स्मृति ग्रंथ भी कहा जा सकता है।

कुछ हिन्दू पंथ, गीता को उपनिषद का दर्जा देते हैं, जिसका अर्थ यह है कि वह एक श्रुति ग्रंथ है।

यह भी माना जाता है कि गीता, उपनिषदों की शिक्षा का सार है और इसलिए उसे उपनिषदों का उपनिषद भी कहा जाता है। इस पवित्र ग्रंथ में भगवान कृष्ण, अर्जुन को एक क्षत्रिय राजकुमार बतौर उनके कर्तव्यों की शिक्षा देते हैं।

युद्ध क्षेत्र में अर्जुन दुविधा में हैं क्योंकि उन्हें लग रहा है कि यदि वे युद्ध करेंगे तो उन्हें अपने ही परिजनों का वध करना होगा।

भगवान कृष्ण, अर्जुन को बताते हैं कि युद्ध करना उनका पवित्र कर्तव्य है। गीता में कृष्ण, स्वयं को भगवान के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस पुस्तक को हिन्दू दर्शन का मूलाधार भी माना जाता है।

गीता, हिन्दू धर्मशास्त्र के एक केन्द्रीय तत्व, वर्णव्यवस्था, के उदय का वर्णन करती है।

पुरूष सूक्त हमें बताता है कि किस तरह भगवान ब्रह्मा ने विराट पुरूष के शरीर से चार वर्णों की सृष्टि की। इसी तरह, गीता में भी भगवान कृष्ण, वर्णों को दैवीय बताते हैं।

वे कहते हैं कि चातुर्यवर्ण व्यवस्था का निर्माण, गुण और कर्म के आधार पर उन्होंने किया।

बौद्ध धर्म, जैन धर्म, ईसाई धर्म और इस्लाम के विपरीत, हिन्दू धर्म किसी पैगम्बर पर आधारित नहीं है। हिन्दू धर्म समय के साथ विकसित हुआ है और गीता, हिन्दू धर्म का पवित्र ग्रंथ है।

इस तर्क में कोई दम नहीं है कि गीता धार्मिक नहीं वरन दार्शनिक पुस्तक है।

कई अन्य धार्मिक ग्रंथों में भी दर्शन है परंतु इससे वे धार्मिक ग्रंथ नहीं रह जाते, ऐसा मानना गलत होगा। पशुपालक आर्यों से लेकर आज तक हिन्दू धर्म की प्रथाओं और आचरण में बहुत परिवर्तन हुए हैं।

सांप्रदायिक शक्तियां, गीता को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा न केवल इसलिए बनाना चाहती हैं क्योंकि वे इस देश पर हिन्दू राष्ट्र थोपना चाहती हैं बल्कि इसलिए भी, क्योंकि वे वर्ण व्यवस्था-जो हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण के मूल सिद्धांतों में से एक है-को मजबूती देना चाहती हैं। गीता, वर्ण व्यवस्था को दैवीय बताकर इसे औचित्यपूर्ण ठहराती है।

यद्यपि इस पुस्तक में कई दार्शनिक सिद्धांत हैं परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि यह वर्ण और जाति की राजनीति की पोषक है।

गीता में जिस धर्म की बात कही गई है, वह मूलतः वर्णाश्रम धर्म अर्थात श्रेणीबद्ध पदक्रम है। समाज का इस तरह से विभाजन भारतीय संविधान की मूल आत्मा और स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों के विरूद्ध है।

गीता का वर्णाश्रम धर्म, समानता के सिद्धांत के खिलाफ है। इसमें काई संदेह नहीं कि गीता एक पवित्र हिन्दू ग्रंथ है।

हमारा देश धर्मनिरपेक्ष है जिसमें न तो राज्य का कोई धर्म है और ना ही राज्य अपने नागरिकों में धर्म के आधार पर भेदभाव कर सकता है।

अतः, एक धर्म विशेष के ग्रंथ पर केन्द्रित आयोजन पर सरकारी खजाने से धन खर्च करना, धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है।

गीता के बारे में अंबेडकर ने क्या कहा?

भारतीय संविधान की मसविदा समिति के अध्यक्ष अंबेडकर ने गीता के बारे में एक दिलचस्प टिप्पणी की थी।

अपनी पुस्तक ‘फिलॉसफी ऑफ हिन्दुज्म’ में अंबेडकर लिखते हैं कि

‘‘भगवत गीता, दरअसल, मनुस्मृति का संक्षिप्त संस्करण है’’।

मनुस्मृति दहन का समर्थन कर अंबेडकर ने ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व में निहित जातिगत पदक्रम का विरोध किया था। पिछली लगभग दो सदियों से हिन्दू धर्म मूलतः ब्राह्मणवादी बन गया है।

गीता, इसी ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व करती है और वह नाथ, तंत्र, सिद्ध, शैव, भक्ति व अन्य हिन्दू परंपराओं के विरूद्ध है। ये परंपराएं ब्राह्मणवादी पदक्रम में आस्था नहीं रखतीं। संघ और हिन्दुत्ववादियों ने ब्राह्मणवादी मूल्यों को अपनी राजनीति का आधार बनाया है।
जो लोग गीता को एक महान दार्शनिक ग्रंथ के रूप में देखते हैं, उनकी अज्ञानता क्षमा योग्य है परंतु आरएसएस और भाजपा यदि गीता को बढ़ावा दे रहे हैं तो वह अज्ञानतावश नहीं है। वे जातिगत और लैंगिक ऊँचनीच को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं।

गीता, भारत की राष्ट्रीय पुस्तक नहीं है और न हो सकती है। हां, निश्चय ही वह एक पवित्र हिन्दू ग्रंथ है।

भारतीय संविधान हमारी राष्ट्रीय पुस्तक है। गीता के संबंध में अदालतों के निर्णयों पर पुनर्विचार ज़रूरी है क्योंकि ये निर्णय उन करोड़ों हिन्दुओं के साथ न्याय नहीं करते, जो ब्राह्मणवादी हिन्दुत्व के सिद्धांतों में आस्था नहीं रखते।

राम पुनियानी

(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

(लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।)

Web title: The Gita is not and cannot be the national book of India. Yes, it is a holy Hindu scripture

About राम पुनियानी

Ram Puniyani was a professor in biomedical engineering at the Indian Institute of Technology Bombay, and took voluntary retirement in December 2004 to work full time for communal harmony in India. He is involved with human rights activities from last two decades.He is associated with various secular and democratic initiatives like All India Secular Forum, Center for Study of Society and Secularism and ANHAD. He is Our esteemed columnist

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