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गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश जेएस पारदीवाला के विरुद्ध महाअभियोग की कार्यवाही की मांग

नई दिल्ली। हक रक्षक दल के अध्यक्ष डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, ने कहा है कि संविधान की शपथ लेकर, संविधान की रक्षा करने को वेतन लेने वाले गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश जेएस पारदीवाला आरक्षण की तुलना भ्रष्टाचार से करके क्या आरक्षण और अनार्यों के विरुद्ध देश में माहौल तैयार करने में आर्यों के पक्ष में माहौल बना रहे हैं। आखिर इससे वे क्या सिद्ध करना करना चाहते हैं?

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, ने एक खुला खत लिखकर गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश जेएस पारदीवाला के विरुद्ध महाअभियोग की कार्यवाही की मांग की है।

आइए देखते हैं खुला खत ….

गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश जेएस पारदीवाला के विरुद्ध महाअभियोग की कार्यवाही

प्रेषक : डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख

हक रक्षक दल (HRD) सामाजिक संगठन

राष्ट्रीय कार्यालय : 7, तॅंवर कॉलोनी,

खातीपुरा रोड, जयपुर—302006 (राजस्थान)

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दिनांक : 03 दिसम्बर, 2015

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खुला—खत

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प्रतिष्ठा में,

1.राष्ट्रपति भारत सरकार, नयी दिल्ली।

2.प्रधानमंत्री भारत सरकार, नयी दिल्ली।

3.मुख्य न्यायाधीश-सर्वोच्च न्यायालय, नयी दिल्ली।

4.सभापति राज्यसभा, नयी दिल्ली।

5.अध्यक्ष-लोक सभा, नयी दिल्ली।

6.अजा, अजजा, ओबीसी के समस्त संसद सदस्य (राज्यसभा एवं लोग सभा), नयी दिल्ली।

 

विषय : सामाजिक न्याय की संवैधानिक व्यवस्था का मजाक उड़ाने वाले गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश जेएस पारदीवाला के विरुद्ध महाअभियोग की कार्यवाही अमल में लायी जावे।

 

आप सभी की जानकारी में लाया जाता है कि 3 दिसम्बर, 2015 के समाचार—पत्रों और न्यूज पोर्टल्स से प्राप्त जानकारी/खबरों के अनुसार बुधवार 2 दिसम्बर, 2015 को गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति श्री जेएस पारदीवाला ने उच्च न्यायालय की कुर्सी पर बैठकर देश की 90 फीसदी अनार्य वंचित आबादी को सरेआम गाली दी है। देश के 90 फीसदी वंचित लोगों का सार्वजनिक रूप से अपमान किया है। जिसके कारण देश के 90 फीसदी अनार्य आहत, अपमानित और असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं।

 

सर्व—विदित है केि देश की दमित, दलित, वंचित, पिछड़ी, आदिवासी, शोषित 90 फीसदी अनार्य आबादी को हाजारों सालों से आर्यों द्वारा जन्मजातीय विभेद के आधार पर सत्ता और प्रशासन से जानबूझकर वंचित रखा गया। हजारों सालों तक जिनकी पीढियों के साथ गुलामों जैसा अमानवीय व्यवहार किया गया। उनको सरकार, सत्ता और प्रशासन में सम्मान एवं समान भागीदारी प्रदान करने के लिये संविधान में सामाजिक न्याय की मूल अधिकार के रूप में व्यवस्था की गयी है। संविधान के अनुच्छेद 32 और 226 में न्यायपालिका के जरिये सामाजिक न्याय के क्रियान्वयन की गारण्टी का प्रावधान किया गया है।

इसके विपरीत संविधान की शपथ लेकर, संविधान की रक्षा करने को वेतन लेने वाले गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश श्री जेएस पारदीवाला आरक्षण की तुलना भ्रष्टाचार से करके क्या आरक्षण और अनार्यों के विरुद्ध देश में माहौल तैयार करने में आर्यों के पक्ष में माहौल बना रहे हैं। आखिर इससे वे क्या सिद्ध करना करना चाहते हैं? न्यायाधीश श्री जेएस पारदीवाला के न्यायिक आदेश/टिप्पणी के हवाले से समाचार—पत्रों में निम्न बातें प्रकाशित हुई हैं———

1. ‘‘यदि कोई मुझसे पूछे कि दो ऐसी चीजों के नाम बताओ जिन्होंने इस देश को तबाह किया है या देश को सही दिशा में तरक्की करने से रोका है तो यह है आरक्षण और भ्रष्टाचार।’’

2. ‘‘बरसों की आजादी के बाद भी आरक्षण की मांग करना इस देश के किसी भी नागरिक के लिए बेहद शर्मनाक है। जब हमारा संविधान बनाया गया था, तो यह समझा गया था कि आरक्षण दस साल के लिए रहेगा, लेकिन दुर्भाग्य से यह आजादी के 65 साल बाद भी जारी है।’’

3. ‘‘आरक्षण केवल एक सुरसा की तरह अपना मुंह फैलाकर लोगों के बीच वैमनस्य के बीज बो रहा है। किसी भी समाज में मैरिट के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। मैरिट एक सकारात्मक लक्ष्य के लिए होती है, जो उन्हें पुरस्कृत करने के लिए होती है जिन कार्यों को अच्छा माना जाता है।’’

4. ‘‘हास्यास्पद स्थिति यह है कि भारत ही केवल एक ऐसा देश होगा जहां कुछ नागरिक पिछड़ा कहलाए जाने की कामना करते हैं।’’

उपरोक्त सभी कथन किसी न्यायाधीश के नहीं होकर के एक मनुवादी आर्य की रुग्ण मानसिकता के प्रतीक हैं। इन कथनों को पढकर लगता ही नहीं कि इन न्यायाधीश महोदय को संविधान का तनिक भी ज्ञान और संविधान के प्रति इनके मन में सम्मान का भाव है। देश के 90 फीसदी अनार्य आज भी, आर्यों की मनुवादी व्यवस्था के कारण जन्मजातीय विभेद, शोषण, जातिपांत, छुआछूत, तिरस्कार और अन्याय के शिकार हैं। 10 फीसदी मनुवादी एवं मनुवाद के समर्थक सम्पूर्ण राज्य सत्ता पर काबिज हैं और हाई कोर्ट की कुर्सी पर बिराजमान होकर एक व्यक्ति जो खुद को न्यायाधीश बतलाते हैं, 90 फीसदी लोगों के हितों को देश के हितों के विरुद्ध करार देते हैं। सवाल यह है कि आखिर राष्ट्र और देश का मतलब क्या है? क्या 10 फीसदी मनुवादी—आर्य ही भारत हैं। राष्ट्र का मतलब केवल 10 फीसदी आर्यों के हितों की रक्षा करना ही है?

अत: आप सभी से अनुरोध है कि गुजरात हाई कोर्ट के न्यायाधीश श्री जेएस पारदीवाला के उक्त असंवैधानिक और मनमाने आदेश/टिप्पणी को युक्तियुक्त प्रकिया के द्वारा तत्काल निरस्त/निष्प्रभावी किया/करवाया जावे और इनको इनके पद से बर्खास्त करने के लिये संसद में महाअभियोग की कार्यवाही अमल में लायी जावे। क्योंकि इनके इस आदेश के कारण देश के 90 फीसदी वंचित आरक्षित अनार्य वर्गों का सार्वजनिक रूप से अपमान हुआ है। जिसके कारण देश के 90 फीसदी अनार्य आरक्षित वर्ग के लोग आहत, अपमानित और असुरक्षित अनुभव कर रहे हैं। यदि इनके विरुद्ध तत्काल कार्यवाही अमल में नहीं लायी जाती है तो इस प्रकार के न्यायाधीशों के ऐसे बयानों/निर्णयों के कारण न्याय और न्यायपालिक के प्रति वंचित लोगों का विश्वास ही समाप्त हो जायेगा। अनार्य वंचित वर्गों को न्याय प्राप्ति के लिये सड़कों पर उतरना होगा।

प्रतिलिपि : संविधान और इंसाफ में विश्वास रखने वाले प्रत्येक भारतीय नागरिक को सम्बोधित है। सभी तत्काल उठ खड़े हों, जिससे संविधान की, न्यायपालिका द्वारा की जा रही हत्या को तुरन्त रोका जा सके।

भवदीय

डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय प्रमुख, हक रक्षक दल सामाजिक संगठन

राष्ट्रीय कार्यालय : 7, तॅंवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर—302006 राजस्थान

मो./वाट्स एप नं. 9875066111/दिनांक​ : 03.12.2015/10.11 बजे प्रात:

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