Home » हस्तक्षेप » आपकी नज़र » गुलाम गिरि मुबारक! बहुजन विमर्श कहां है गाली गलौज के अलावा, बतायें

गुलाम गिरि मुबारक! बहुजन विमर्श कहां है गाली गलौज के अलावा, बतायें

गुलाम गिरि मुबारक! बहुजन विमर्श कहां है गाली गलौज के अलावा, बतायें
ब्राह्मण भले विरोध, प्रतिरोध करें, शूद्रों, अछूतों और आदिवासियों को हर हाल में चाहिए मनुस्मृति शासन!
फासिज्म के राजकाज के पक्ष में खड़े होकर अपनी खाल मलाईदार करने के अलावा अब अंबेडकर मिशन का कोई दूसरा मतलब नहीं रह गया है।
पलाश विश्वास
कहना ही होगा, संघ परिवार के फासिज्म के राजकाज के खिलाफ पढ़े लिखे ब्राह्मण जितने मुखर हैं, उसके मुकाबले तमाम शूद्र, आदिवासी, आरक्षित पढ़े लिखे पिछड़े, दलित, आदिवासी और पढ़ी लिखी काबिल स्त्रियां मौन, मूक वधिर हैं।
ब्राह्मणों को गरियाने में समाज के प्रतिप्रतिबद्धता जगजाहिर करने वाले ज्यादातर लोग ब्राह्मण धर्म के हिंदुत्व पुनरूत्थान के साथ हैं और नरसंहारी अश्वमेध अभियान के तमाम सिपाहसालार, सूबेदार, मंसबदार, जिलेदार, तहसीलदार और पैदल सेनाएं भी उन्हीं बहुजनों शूद्रों अछूतों आदिवासियों की हैं।
बजरंगी भी वे ही हैं और दुर्गावाहिनी में भी वे ही हैं।
सलवा जुड़ुम के सिपाही, सिरपाहसालार भी वे ही हैं।
यह ब्राह्मणविरोधी अखंड पाखंड, पढ़े लिखों मलाईदारों का अंतहीन विश्वासघात ही ब्राहमणधर्म का पुनरूत्थान का रहस्य है।
अपने लोगों का साथ कभी नहीं देंगे तो ब्राह्मणों को गरियाकर अपने लोगों को खुश कर देंगे। मौका मिलते ही गला रेंत देंगे। बहुजनों का आत्समर्पण है। यही दरअसल बहुजनों की गुलामी का सबसे बड़ा आधार है और इसमें किसी ईश्वर या किसी ब्राह्मण का कोई हाथ नहीं है।
सोशल मीडिया पर अब लाखों बहुजन हैं।
करोड़ों फालोअर जिनके हैं।
कई तो बाकायदा कारपोरेट सुपरस्टार हैं।
कई दिग्गज संघी सिपाहसालार हैं।
सैकड़ों रंगे सियार कारपोरेट भी हैं।
बहुजन विमर्श कहां है गाली गलौज के अलावा, बतायें।
हमें वोट नहीं चाहिए। हमें हैसियत भी कभी नहीं चाहिये थी।
बुरा मानो या भला, अब सर से ऊपर पानी है। सच का सामना अनिवार्य है।
अब कहना ही होगा, बहुजनों की गद्दारी से ही यह हिंदुत्व का नरसंहारी साम्राज्य बहुजनों का नस्ली कत्लेआम कर रहा है निरंकुश। लेकिन पढ़ा लिखा न बोल रहा है और न कहीं लिख रहा है। सिर्फ अपनी अपनी खाल बचाने में लगे हैं बहुजन पढ़े लिखे।
 नागरिक और मानवाधिकारों के बारे में बहुजन खामोश हैं।
रोजगार और आजीविका के बारे में बहुजन चुपचाप हैं।
निजीकरण, उदारीकरण, ग्लोबीकरण, मेहनतकशों के कत्लेआम, किसानों की थोक आत्महत्या, खेती के बाद कामधंधों, व्यापार से आम जनता और बहुजनों की बेदखली,
विनिवेश, छंटनी, तालाबंदी, विदेशी पूंजी, मुक्तबाजार, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और अखंड कारपोरेट राज से बहुजनों के पेट में दर्द नहीं होता और ब्राह्मण धर्म के सारे कर्मकांड, सारे महोत्सव, सारे अवातार, भूत प्रेत, सारे कसाईबाड़ा उन्हीं के हैं और सूअरबाड़ा में सत्ता के साझेदार सबसे मजबूत वे ही हैं।
जल जंगल जमीन की लड़ाई में बहुजन कहीं नहीं हैं।
आदिवासी भूगोल में सिर्फ संघी हैं, बहुजन कहीं नहीं हैं।
पिछड़ों और दलितों के बीच अलग महाभारत है।
पिछड़ों का मूसलपर्व अलग है तो दलितों में अनंत मारामारी है।
सलवा जुड़ुम के सैन्यतंत्र के खिलाफ बहुजन मूक वधिर हैं।
नोटबंदी के बारे में बहुजन बुद्धिजीवी फासिज्म के राजकाज के पक्ष में हैं और हर मुद्दे पर डाइवर्ट कर रहे हैं, नोटबंदी के खिलाफ मोर्चे में बहुजन कहीं नहीं हैं।
फासिज्म के राजकाज के पक्ष में खड़े होकर अपनी खाल मलाईदार करने के अलावा अब अंबेडकर मिशन का कोई दूसरा मतलब नहीं रह गया है।
बहुजनों के तमाम राम बलराम कृष्ण कन्हैया पूरा का पूरा यदुवंश अब केसरिया कारपोरेट साम्राज्यवाद के हनुमान और वानरसनाएं हैं।
सीता मइया, लक्ष्मी, दुर्गा काली कामाख्या विंध्यवासिनी.चंडी के सारे अवतार और उनके सारे भैरव भी उन्हीं के साथ हैं। राधा भी उन्हीं की हैं।
मठों, मंदिरों और धर्मस्थलों के कर्मकांडी ब्राह्मणों के मुकाबले राम से बजरंगी बने बहुजन ब्राह्मणधर्म के सबसे बड़े समर्थक हो गये हैं। जिहादी हो गये हैं कारपोरेट हिंदुत्व के नरसंहारी कार्यक्रम के सारे दलित पिछड़े बहुजन, यही सच है।
ब्राह्मण भले विरोध, प्रतिरोध करें, शूद्रों, अछूतों और आदिवासियों को हर हाल में चाहिए मनुस्मृति शासन!
हड़ि! हुड़ हुड़! बलि, राजघराना भौते नाराज भयो!
राजघराना मतबल राजकाज का सिरमौर अपना देशभक्त आरएसएस!
बलि, आरएसएस बगुलाभगतों के कारपोरेट लाटरी आयोग से सख्त खफा है!
बलि, अश्वमेधी घोड़ों की जुबान फिसलने लगी है कि देश का बंटाधार करने लगे बगुला भगतों के कारपोरेट गिरोह!
बलि, आरएसएस बगुलाभगतों के कारपोरेट लाटरी आयोग से सख्त खफा है!
हड़ि! हुड़ हुड़! बलि, संघ परिवार के स्वदेशी जागरण मंच की नींद खुल गयी बताते हैं और बगुला भगतों के कब्जे में नीति आयोग की जनविरोधी भूमिका के खिलाफ 10 जनवरी को मंच एक सम्मेलन का आयोजन भी करने जा रहा है।
हड़ि! हुड़ हुड़! बलि, कल्कि महाराज के राजकाज से जनविद्रोह की भनक शायद नागपुर के पवित्रतम धर्मस्थल को लग गयी है और जैसे कि हम लगातार हिंदुत्व के एजंडे को कारपोरेट नस्ली नरसंहार बता लिख रहे हैं, आम जनता में भी यह धारणा प्रबल हो जाने से ब्राह्मणधर्म के मठों और महंतो में खलबली मच गयी है।
नोटबंदी से आम जनता जो भयानक नर्क रोजमर्रे की जिंदगी, बुनियादी सेवाओं और बुनियादी जरूरतों के लिए जीने को मजबूर है, जो सुरसामुखी बेरोजगारी और भुखमरी के हालात बनने लगे हैं, उस नर्क की आग में संघ परिवार को भी अपना मृत्यु संगीत सुनायी देने लगा है।
हड़ि! हुड़ हुड़! बलि, संघी सत्ता वर्चस्व और मनुस्मृति राजकाज के लिए दस दिगंत संकट गगन घटा घहरानी है। उनकी जान मगर बहुजन बजरंगी सयानी है।
हड़ि! हुड़ हुड़! बलि, बगुला भगतों ने संघ साम्राज्य की नींव में बारुदी सुरंगे बिछा दी हैं और स्वयंसेवकों को धमाके रोकने के लिए लगा दिया गया है। आगे पीछे बहुजन सिपाहसालारों की अगुवाई में पैदल केसरिया फौजों की किलेबंदी है।
बहुजन नेतृत्व चौसठ आसनों में पारंगत हैं। किस आसन से कौन सी कवायद, प्राणायम कि कपालभाति भांति भांति लिट्टी चोखा, नीतीश लालू, नायडु, मुलायम, अखिलेश-उत्तर से दक्खिन इनकी, सभी की जुबान कैसे-कैसे फिसलती जब तब है। कौन किस छिद्र से नाद ब्रह्म सिरजें, हमउ न जाने हैं।
वाह, उनकी दिलफरेब नादानी है।
हड़ि! हुड़ हुड़! बलि, यूपी, उत्तराखंड और पंजाब के विधानसभा चुनावों से अब जाहिर है कि संघ परिवार को बहुत डर लगने लगा है।
बहुजन बिखरे एक दूसरे से खूब लड़ रहे हैं, तो क्या हुआ। फिजां कयामत है।
नोटबंदी की कयामत भारी है कि ज्वालामुखी सुलग रहे हैं न जाने कहां कहां। पैंट गीली है तो निक्कर भी गीली है।
हिंदुत्व के कारपोरेट एजंडे के लिए आगे शनि दशा बहुत भारी है और वास्तुशास्त्र, यज्ञ होम, गृहशांति, ग्रहशांति का कोई कर्मकांड इसका खंडन नही कर सकता।
संघ परिवार और उनके कारपोरेट हिंदुत्व एजंडा के तरणहार समझ लीजिये कि इस महादेश का कोई ब्राह्मण करने की हालत में नहीं हैं। यह पुण्यकर्म ओबीसी, दलित और आदिवासी होनहार वीरवान अबेडकरी योद्धा सकल सहर्ष करेंगे। करते रहे हैं।
हड़ि! हुड़ हुड़! संसद में सत्ता के खिलाफ आस्था मत विभाजन का इतिहास देख लीजिये कि केंद्र की डगमगाती सत्ता को हर बार कैसे बहुजन क्षत्रपों ने किस खूबी से किस लिए बनाये रखकर बहुजनों का बंटाधार करते रहे हैं। सत्ता में जो भागेदारी है। करोड़पति, अरबपति, खरबपति गोलबंदी में बहुजन सिपाहसालार काबिल कारिंदे हैं।
मूक वधिर बहुजनों को संघ परिवार के लिए उस मृत्युसंगीत का शोर सुनायी नहीं पड़ रहा है तो समझ लीजिये कि अब भी वे गुलामगिरि की हैसियतें खोने के लिए कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। उन सबको गुलाम गरि मुबारक। आपको भी।
हड़ि! हुड़ हुड़! बलि, अब फासिज्म के राजकाज से पल्ला झाड़ने की तैयारी स्वदेशी जागरण मंच के हवाले है। कहा जा रहा है कि संघ परिवार की लाड़ली, दुलारी ग्लोबल हिंदुत्व की हुकूमत कतई नहीं, नहीं नहीं, बल्कि नीति आयोग के कारपोरेट बगुला भगतों के असर में राजकाज चल रहा है।
हड़ि! हुड़ हुड़! मजे की बात यह है हम भी यही कहत लिखत रहे हैं और अब गुड़ गोबर हुआ तो काफी हद तक मान लिया जा रहा है कि इस फासिज्म के राजकाज से हिंदुत्व के महान पवित्र एजंडा या संघ परिवार का कोई लेना देना नहीं है।
नोटबंदी से हालात सुधरने का इंतजार संघ परिवार अब जाहिर है, करने वाला नहीं है। अपना नस्ली सत्तावर्चस्व और मनुस्मृति शासन बहाल रखने के लिए अपनी ही सरकार के राजकाज के खिलाफ शेषनाग के अलग-अलग फन अलग अलग भाषा में बोलने लगे हैं।
झोला छाप बगुला भगतों पर अपनी सरकार के सारे पापों का बोझ लादकर संघ परिवार हिंदुत्व के कारपोरेट एजंडे को पाक साफ साबित करने में लगा है।
ताज्जुब की बात यह है कि इस कारपोरेट एजंडे के मनुस्मृति शासन से बहुजनों को कोई खास तकलीफ होती नहीं दिखायी दे रही है।
अंबेडकर मिशन इस मामले में खामोश है और बहुजन अपनी गुलामगिरि की जड़ें आत्ममुग्ध नरसिस महान की वंदना में मजबूत करने में जी तोड़ जोर लगा रहे हैं।
हर कोई राम बनकर हनुमान बनने की फिराक में हैं।
बजरंगी तो कोई भी बन जावे हैं।
पहले से राम से हनुमान बजरंगी वानर बनी बिरादरी की फजीहत उन्हें नजर नहीं आ रही है।
देश भर में कायस्थ, भूमिहार, त्यागी, पहाड़ की तमाम पिछड़ी जातियां जो नेपाल में मधेशी हैं, बंगाल के तमाम ओबीसी वगैरह वगैरह खुद को ब्राह्मण से कम नहीं समझते। आधी आबादी की जन्मजात गुलाम, दासी, शूद्र स्त्रियां पिता और पति की पहचान से अपनी अस्मिता जोड़कर अपने को दूसरी स्त्रियों से ऊंची जातियां साबित करते रहने में जिंदगी भर नर्क जीती हैं। रोजरोज मरती हैं। जीती हैं। भ्रूण हत्या से बच गयी तो आनर कीलिंग या दहेज हत्या, बलात्कार सुनामी में बच भी गयी तो घरेलू हिंसा, रोज रोज उत्पीड़न के मारे आत्महत्या, पग पग पर अग्निपरीक्षा, फिर भी सती सावित्री सीमता मइया हैं। पढ़ी लिखी काबिल हुई तो भी नर्क से निजात हरगिज नहीं। फिरभी दुर्गावाहिनी उनकी अंतिम शरणस्थली है। नियति फिर वही सतीदाह है।
मनुस्मृति विधान के मुताबिक ये तमाम जातियां और तमाम स्त्रियां, शूद्र ढोल गवांर और पशु ताड़न के अधिकारी शूद्र हैं।
आदिवासी और दलित भी ज्यादा हिंदू, ज्यादा ब्राह्मण हो गये हैं ब्राह्मणों के मुकाबले। कुछ तो जनेऊ भी धारण करते हैं।
साधु संत साध्वी बाबा बाबी बनकर ऋषि विश्वमित्र की तर्ज पर ब्राह्मणत्व हासिल करने का योगाभ्यास करते करते विशुध पतंजलि हैं। अभिज्ञान शाकुंतलम् का किस्सा है। महाभारत तो होइबे करै।
विडंबना है कि तथागत गौतम बुद्ध, बाबासाहेब और महात्मा ज्योतिबा फूले, हरिचांद ठाकुर, पेरियार और नारायण स्वामी के ब्रांड से, फिर अब वाम पक्ष के विद्वान भी अपनी-अपनी दुकान चलाने वाले तमाम दुकानदार सिर्फ ब्राह्मणों के गरियाकर ही देश में क्रांति कर देना चाहते हैं।
सामाजिक न्याय और समता के आधार पर समाज बनाने के लिए ब्राह्मण धर्म के मुताबिक मनुस्मृति शासन की पैदल सेना और सिपाहसालार बने तमाम लोगों की पूंजी फिर वही जातिव्यवस्था है। पूंजी ब्राह्मणों के खिलाफ गाली है।
ब्राह्मण इस देश में सिर्फ तीन फीसद हैं।
देश में ब्राह्मणों के वोट सिर्फ यूपी में निर्णायक हैं।
बाकी देश में ब्राह्मण अति अल्पसंख्यक हैं।
बाकी राज्यों में और देश भर में राजकाज बहुजनों के वोट से चलता है और उसमें आधी आबादी जाति धर्म नस्ल निर्विशेष शूद्र स्त्रियों की है तो लिंग निर्विशेष आधी से ज्यादा आाबादी शूद्रों की हैं, जिन्हें हम ओबीसी कहते हैं।
आरक्षण और ओबीसी के बाहर भी शूद्र हैं, जैसे स्त्रियां जाति या धर्म या नस्ल के मुताबिक जो भी हों , मनुस्मृति विधान के मुताबिक शूद्र हैं।
भूमिहार और त्यागी भले खुद को ब्राह्मण मानते हों, कायस्थ भले ही उनके समकक्ष हों और वे ओबीसी में नहीं आते हों, मनुस्मृति के मुताबिक वे वर्ण में नहीं आते।
वर्ण के बिना कोई सवर्ण नहीं होता।
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य के अलावा किसी जाति का कोई सवर्ण हो ही नहीं सकता।
फिरभी बहुत सी शूद्र जातियां खुद को सवर्ण मानती हैं और जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के वे सबसे बड़े समर्थक हैं।
ये तमाम लोग मनुस्मृति बहाल रखने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
यही फासिज्म के राजकाज का सबसे बड़ा आधार है।
बाबासाहेब डा. भीम राव अंबेडकर के शूद्रों की उत्पत्ति के बारे शोध की रोशनी में शूद्रों की सत्ता में साझेदारी की पहेली काफी हद तक समझ में आती है। लेकिन दलितों और आदिवासियों की भूमिका समझ से परे हैं।
गौरतलब है कि ‘शूद्रों की खोज’ डॉ अम्बेडकर द्वारा लिखी पुस्तक ‘Who Were Shudras?’ का हिंदी संस्करण है। 240 पृष्ठ की इस किताब में डॉ अम्बेडकर ने इतिहास के पन्नों से दो सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है, 1. शूद्र कौन थे? और 2. वे भारतीय आर्य समुदाय का चौथा वर्ण कैसे बने? संक्षेप में पूरी किताब और बाबा साहेब के शोध का निष्कर्ष इस प्रकार है-

शूद्र सूर्यवंशी आर्य समुदायों में से थे।
एक समय था जब आर्य समुदाय केवल तीन वर्णों अर्थात ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को मान्यता देता था।
शूद्र अलग वर्ण के सदस्य नहीं थे। भारतीय आर्य समुदाय में वे क्षत्रिय वर्ण के अंग थे।
शूद्र राजाओं और ब्राह्मणों में निरंतर झगड़ा रहता था जिसमें ब्राह्मणों को अनेक अत्याचार और अपमान झेलने पड़ते थे।
शूद्रों के अत्याचारों और दमन के कारण उनके प्रति उपजी घृणा के फलस्वरूप ब्राह्मणों नें शूद्रों का उपनयन करने से मना कर दिया।
जब ब्राह्मणों नें शूद्रों का उपनयन करने से मना कर दिया तो शूद्र, जो क्षत्रिय थे, सामाजिक स्तर पर अवनत हो गए, वैश्यों से नीचे की श्रेणी में आ गए और इस प्रकार चौथा वर्ण बन गया।

सत्ता और कमसकम सत्ता में साझेदारी के लिए शूद्रों की उत्कट आकांक्षा के बारे में बाबासाहेब के शोध की रोशनी में शूद्र क्षत्रपों की सौदेबाजी, मौकापरस्ती और दगाबाजी की परंपरा साफ उजागर होती है।
इसके विपरीत आदिवासी हड़प्पा मोहंजोदोड़ो समय से वर्चस्ववाद के खिलाफ लगातार जल जंगल जमीन की लड़ाई सामंती तत्वों और साम्राज्यवादी औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ लड़ते रहे हैं। द्रविड़ों और अनार्यों के आत्मसमर्पण के बावजूद, शूद्र शासकों और प्रजाजनों के सत्ता वर्ग के साथ हाथमिलाते रहने के बावजूदउनका प्रतिरोद, हक हकूक की उनकी लड़ाई में कोई अंतराल नहीं है।
आदिवासियों के इस मिजाज और तेवर के मद्देनजर भारत में कदम रखते ही ईसाई मिशनरियों ने विदेशी शासकों के हितों के लिए उनका धर्मांतरण की मुहिम चेड़ दी। जिससे आदिवासियों में शिक्षा का प्रसार हुआ और काफी हद तक उनकी आदिम जीवनशैली का कायाकल्प भी हुआ। लेकिन ईसाई मिसनरियों को आदिवासियों के धर्मांतरण के बावजूद आदिवासियों को सत्ता वर्ग के साथ नत्थी करने में कोई कामयाबी नहीं मिली।
आजादी के बाद संघियों ने आदिवासी इलाकों का हिंदुत्वकरण अभियान छेडा़ और आदिवासियों के सलवाजुड़ुम कार्यकर्म के तहत एक दूसरे के खिलाफ लामबंद कर दिया। आदिवासियों का जो तबका जल जगंल जमीन के हक हकूक के लिए लगातार प्रतिरोध कर रहे हैं, उनका सैन्य दमन हो रहा है। लेकिन आदिवासियों के शिक्षित तबके का बाहुबली क्षत्रिय जातियों और पढ़े लिखे दलितों की तरह बजरंगी बनाने की मुहिम में स्वयंसेवकों ने ईसाई मिशनरियों को मात दे दी है

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: