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घर के साथ-साथ उम्मीदें भी जल गयीं

वसीम अकरम त्यागी
मुजफ्फरनगर। मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना से लगभग छःह किलो मीटर की दूरी पर बसे जौला गाँव के राहत शिविर में लगभग डेढ़ दर्जन बच्चे ऐसे हैं जिनके वर्तामान के साथ-साथ भविष्य भी खतरे में नजर आ रहा है। ये वे बच्चे हैं जो अपने गाँव या उसके पास बने इन्टर कॉलेज में कक्षा 10 और बारहवीं में पढ़ा करते थे। लेकिन सात सितम्बर को फैली सांप्रदायिक हिंसा ने इनसे इनका स्कूल और गाँव दोनों छीन लिये तभी से ये बच्चे विभिन्न शिविरों में हैं, जहाँ पर इनके माथे पर पढ़ाई छूट जाने के दर्द को आसानी से समझा जा सकता है। हालाँकि प्रशासन ने यह आश्वासन दिया था कि जो बच्चे पढ़ाई छोड़कर शिविरों में आये हैं उनके एडमिशन नजदीकी कॉलेजों में करा दिये जायेंगे, लेकिन जब ये छात्र नजदीकी स्कूलों में अखबारों की कटिंग के साथ पढ़ने के उद्देश्य से गये तो उनको यह कहकर निकाल दिया गया कि कॉलेज प्रशासन के पास कोई लिखित आदेश नहीं आया है।
प्रशासन की इस गाल बजाई में इन बच्चों का भविष्य तो खतरे में पड़ गया है। इससे भी दुख भरी दास्ताँ यह है कि इन शिविरों में जो लड़कियाँ हैं, उनका कॉलेज जाना पूरी तरह बन्द हो गया है जिनमें से अधिकतर की या तो शादी हो चुकी है या फिर वो इन्हीं तम्बुओं में झालर बनाकर अपने परिवार के लिये आर्थिक सहारा लगा रही हैं। हमने वहाँ पर बोर्ड परीक्षा की तैयारी में जुटे बच्चों से बात की, यहाँ पर फिलहाल मोहम्मद शाहरुख का साक्षात्कार प्रकाशित किया जा रहा है जो तस्वीर में दिखाया गया है।
जौला में कब से रह रहे हो ?
–    चार महीने से
क्या आपको कोई सरकारी मदद मिली, जिसमें आपको स्कूल जाने को लेकर प्रेरित किया गया हो ?
–    नहीं बिल्कुल नहीं, अधिकारी आते हैं हमारा नाम लिख कर ले जाते हैं, साथ ही कुछ गैरसरकारी आदमी और संस्थाऐं भी हमारा नाम लिखकर ले गईं हैं, लेकिन किसी की ओर से कोई जवाब नहीं आया जिससे हम संतुष्ट हो सकें, हाँ कुछ लोग क्यूश्चन बैंक जरूर देकर गये हैं जिनसे हम तैयारी कर रहे हैं।
क्या आपका कहीं पर एडमिशन है ?
–    पहले था जी अब तो नहीं रहा क्योंकि पिछले तीन महीनों से हम शिविरों में हैं। हमने कभी डर की वजह से स्कूल जाने की कोशिश ही नहीं की, कुछ डीएम साहब आश्वासन देते रहे कि वे हमारा एडमिशन करा देंगे लेकिन उनकी और से सिवाय आश्वासन के अभी तक कुछ नहीं मिला है।
तो फिर परीक्षा दोगे ?
–    यही तो डर हमको सता रहा है कि हमारी साल भर की मेहनत बेकार चली जायेगी, हमारा साल खराब हो जायेगा, फिलहाल तो हम इस उम्मीद के साथ परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं कि प्रशासन कोई न कोई हल जरूर निकाल देगा।
क्या आपको प्रशासन से उम्मीद है ?
–    पूरी उम्मीद है जी, आखिर हमारी खता क्या है ? हम तो जाति विशेष के खौफ की वजह से यहाँ शिविर में आये हैं, वर्ना हमारी तो किसी से कोई भी लड़ाई नहीं थी, क्या प्रशासन का फर्ज नहीं बनता कि वह हमारे प्रवेश नजदीकी कॉलेज में कराये ?
क्या आपके पास किताबे हैं ?
–    पहले तो नहीं थीं घर में आग लगा दी गयी थी इसलिये किताबें के साथ साथ हमारा सामान भी जलकर राख हो गया था। मगर पिछले महीने से कुछ लोग यहाँ आये थे जो हमको किताबें देकर गये थे, वे कह रहे थे कि दिल्ली स्थित एक प्राईवेट इंस्टिट्यूट में वे हमें कोचिंग करायेंगे जिससे हम परीक्षा की तैयारी कर सकें और अच्छे नम्बरों से परीक्षा उत्तीर्ण कर सकें।
और क्या कहा था उन्होंने ?
–    बस जी इतना ही कहा था बाकी नाम लिखकर लेकर गये थे जैसे आप लिख रहे हो। लेकिन मैं पढ़ना चाहता हूँ और पढ़कर सेना में जाना चाहता हूँ, जिसके लिये मैं रोजाना तैयारी भी कर रहा हूँ लेकिन अगर मैं परीक्षा नहीं दे पाया तो इससे मेरा मन पढ़ाई से उचट जायेगा और फिर मजबूरन कोई काम सीखना शुरु कर दूँगा या मेहनत मजदूरी करके वही मजदूर के घर पैदा हुआ मजदूर ही रह जाऊँगा।
यह कहना है जौला राहत शिविर में रह रहे मोहम्मद शाहरूख का जिसकी आँखों में स्कूलों और सेना में जाने की उम्मीदों को देखा जा सकता है। मगर एक जरा सी प्रशासनिक लापरवाही इसके भविष्य को अंधेरे में ले जा रही है। क्या प्रशासन इन जैसे बच्चों की परीक्षा के लिये अलग से किसी परीक्षा केंद्र का निर्माण नहीं कर सकता ? जबकि ऐसे बच्चों की संख्या 100 के करीब है, और अगर शामली जनपद के राहत शिविरों के बच्चों को भी मिला लिया जाये तो यह संख्या और भी अधिक हो जायेगी। शाहरूख जैसे डेढ़ दर्जन छात्र जौला के राहत शिविर में हैं जिनके वर्तमान के साथ साथ भविष्य भी अंधेरा में है। अगर प्रशासन पर इनकी ओर से दबाव बनाया जाये तो हो सकता है गूँगी बहरी सरकार इनके भविष्य का कोई हल निकाल दे।

About the author

वसीम अकरम त्यागी, लेखक साहसी युवा पत्रकार हैं।

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