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घोषणाओं से बाहर शिक्षा

कौशलेन्द्र प्रपन्न
चुनावी माहौल में हर पार्टी घोषणाओं से जनता को लुभाने में लगी रही। यही वक्त था कि पीछे वर्षों में किए गए वायदों को परखा जाए और देखा जाए कि जो घोषणाएं पिछले चुनाव के दौरान किए गए थे क्या उन्हें पूरा किया गया। क्या सरकार उन घोषणाओं को अमलीजामा पहना पाई। आज़ादी के इतने वर्षों के बाद भी यदि सरकारी स्कूल और देश के बच्चे स्कूली शिक्षा से महरूम हैं तो हमें सरकार के प्रयासों और उसकी वचनबद्धता को जांचने-परखने का अवसर है। यदि भारत ने 1990 में विश्व मंच पर वायदा किया था कि 2000 तक सभी बच्चों को स्कूली यानी बुनियादी शिक्षा मुहैया करा देगा तो उस घोषणा को क्या हुआ। क्या सभी बच्चे बुनियादी शिक्षा प्राप्त कर चुके तो सरकार स्वयं ही स्वीकारती है कि अभी भी 80 लाख बच्चे प्राथमिक शिक्षा पाने में विफल हैं। अंतरराष्टीय मंच पर स्वीकारी गई प्रतिबद्धताएं ही हैं कि हमने 2002 में भारतीय संविधान की धारा 21 में संशोधन कर के 21 अ जोड़ा और कहा कि 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है। जिसे 2009 में कानूनन अधिकार बनाने से सरकार पीछे नहीं हट सकती थी।

2002 में ही हमने अपनी घोषणाओं को पूरा करने की गरज से ही सर्व शिक्षा अभियान को जन्म दिया। ताकि बच्चे भोजन, कपड़े, किताबों, वजिफे के ही प्रलोभन में ही सही किन्तु स्कूल तक आएं। और सरकार की यह कोशिश रंग लाई और स्कूलों में नामांकन दर में तो उछाल देखे गए लेकिन यह महज नामांकन में बढ़त देखी गई थी। उन बच्चों को किस तरह की शिक्षा दी जा रही थी जब इस पर नजर डाला तो पाया कि 5 वीं 6 हीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को तो कक्षा 2 री की भी समझ नहीं है। बच्चे महज वर्णों की समझ ले रहे हैं यानी साक्षर हुए हैं। उन्हें न तो भाषा की समझ है और न ही सामान्य जोड़ घटाव आते हैं। यही चिंता थी सब के लिए शिक्षा यानी ‘इएफए’ का न केवल प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण हमारा लक्ष्य था बल्कि हमारा लक्ष्य तो यह भी था कि हम सभी बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा 2000 तक उपलब्ध कराएंगे। यह वचन हमने 1990 में सेनेगल में दी थी। डकार में जब 2000 में मिले तो हमने खुद को टटोला कि हम अपने वायदों में कहां तक सफल हुए। पाया कि अभी भी लाखों बच्चे स्कूल तक ही नहीं आ पाए हैं। एक बार फिर हमने लक्ष्य वर्ष तय किया कि 2015 तक इस लक्ष्य को हासिल कर लेंगे।

लोकसभा चुनाव अभी-अभी सम्पन्न हुआ है। चारों ओर घोषणाओं की बारीश की गई। आर्थिक सुधार, सामाजिक सुरक्षा, भूख, विकास के सब्जबाग दिखाए गए। यदि राजनैतिक दलों की घोषणाओं में झांक सकें तो हम देख सकते हैं कि इनकी घोषणाओं में ऐसी कोई योजना नहीं है कि हम किस प्रकार से 2015 तक ‘सब के लिए शिक्षा’ के लक्ष्य को पाने का उपाय करेंगे। कैसे हम स्कूल से बाहर खड़े बच्चों को स्कूल में दाखिल करेंगे। न केवल स्कूल में प्रवेश देंगे बल्कि उन बच्चों को प्राथमिक शिक्षा वह भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो सके इसके लिए हमारी सरकार क्या प्रयास करेगी आदि योजनाएं एक सिरे से नदारत हैं। जिस इच्छा शक्ति के साथ हमारे प्रयास इएफए के लक्ष्यों को हासिल करने का है उससे ऐसी कोई मुकम्मल उम्मींद की रोशनी नहीं मिलती। संभव है जब 2015 हमारे सामने होगा तो एक बार फिर अपनी असमर्थता दिखाते हुए और समय की मांग करें और अपनी अन्य प्राथमिकताओं को गिनाते हुए बच्चें इस बार फिर राजनैतिक अनिच्छा का शिकार न हो जाएं।

शिक्षा का अधिकर अधिनियम बनाना इस सरकार की राजनैतिक मजबूरी थी। जिसकी वजह से 2009 में यह शिक्षा का अधिकार यानी आरटीई बन सका और 2010 में पूरे देश में लागू हुआ। राजनैतिक मजबूरी के साथ ही अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी महसूस कर सकते हैं क्योंकि 2002 से सर्व शिक्षा अभियान के तहत मिलने वाले आर्थिक मददगारों को दिखाना था कि हम प्रयास कर रहे हैं। लेकिन यही पर्याप्त कदम नहीं था। इसलिए हमने प्रथमतः 2002 में संविधान में संशोधन किया और 2009 में शिक्षा को कानूनी अधिकार के तौर पर स्वीकार किया। अब आरटीई की अंतिम तारीख हमारे सामने है 2015 तक आरटीई के अनुसार 6-14 आयु वर्ग के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना हमारी कानूनन प्रतिबद्धता है। 31 मार्च 2013 को आरटीई को लागू करने की तारीख खत्म हो चुकी है। तीन साल पूरे होने के बाद जब हमने समस्त राज्यों का जायजा लिया तो पाया कि अभी सरकारी अनुमान और आंकड़ों की दृष्टि से 80 लाख बच्चे तो स्कूल ही नहीं जाते। जो बच्चे स्कूल जाते हैं उनमें भी बीच में ही स्कूल छोड़ने वालों की संख्या भी लाखों में है। साथ ही यह भी सरकार स्वीकारती है कि जो बच्चे कक्षा 1 से 8 वीं पढ़ रहे हैं उनमें अपने स्तर की शिक्षायी समझ ही पैदा नहीं हो पाई है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करें तो स्वयं सरकारी आंकड़े भी स्वीकार चुके हैं कि हमारे बच्चों को कक्षा 8 वीं में तो पढ़ते हैं लेकिन उन्हें कक्षा 1 के स्तर की शिक्षा यानी भाषा, गणित और विज्ञान की समझ हम नहीं दे पाए हैं। ऐसे लाखों बच्चे हैं जिन्हें सिर्फ वर्णों की पहचान भर है। ऐसे बच्चे वर्ण तो बोल लेते हैं, कुछ बच्चे लिख भी लेते हैं लेकिन समझ की बात करें तो उन्हें लिखे हुए गद्य को पढ़कर समझने की क्षमता नहीं है। नेशनल काउंसिल आफ एजूकेशन रिसर्च एंड टेनिंग ‘एनसीइआरटी’ की ओर बच्चों में खासकर प्रारम्भिक कक्षाओं में भाषा को पढ़ने और शब्दों की पहचान के साथ समझने के स्तर को लेकर सर्वे आयोजित किया जिसमें पाया गया कि 86 फीसदी बच्चे शब्दों को पहचानने में सक्षम थे। वहीं 65 फीसदी बच्चे सुने हुए गद्यांश को समझने में सक्षम थे और 59 फीसदी बच्चे पढ़े हुए गद्यांश को समझने में सक्षम हैं। वहीं एक और दूसरी गैर सरकारी संस्था की ओर से हुए अध्ययन रिपोर्ट पर नजर डालें तो चित्र कुछ और उभरती है एएसइआर की ओर से प्रारम्भिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों में पढ़ने के स्तर को लेकर एक सर्वे किया गया। इस सर्वे की मानें तो 52 फीसदी बच्चे जो कक्षा 5 वीं में पढ़ते हैं, लेकिन उनमें कक्षा दो के पाठ पढ़ने की क्षमता नहीं होती। यहां तक कि तकरीबन एक तिहाई बच्चे बुनियादी जोड़ घटाव भी नहीं कर सकते। एएसइआर की ओर की गए सर्वे की मानें तो 2010 में जहां कक्षा 5 वीं के 50.7 फीसदी बच्चे कक्षा 2 री स्तर के पाठ पढ़ सकते थे वहीं यह प्रतिशत 2012 में घटकर 41.7 फीसदी पर गिर चुका है।

हमें उन बिंदुओं पर भी विचार करना होगा कि एक स्कूल में वो कौन सी बुनियादी चीजें होने ही चाहिए ताकि बच्चे सुरक्षित, समुचित और सहज तरीके से विकास कर सकें। इस लिहाज से आरटीई की स्थापना और सिफारिशों पर नजर डालना होगा जो बड़ी ही शिद्दत से दस बिंदुओं पर हमारा ध्यान खींचती है। एक स्कूल में कम से कम दस सुविधाएं हों ही जैसे- पीने का पानी, शौचालय, पुस्तकालय, कक्षा, प्रशिक्षित टीचर, स्कूल की चाहरदीवारी, लेब, भाषा शिक्षक, बिजली, आदि। पिछले साल जब आरटीई का 31 मार्च 2013 गुजर गया तब हमने देश के सरकारी स्कूलों का सरकारी स्तर पर और गैर सरकारी संस्थाओं ने एक सर्वे किया। उन सर्वे के रिपोर्ट पर नजर डालें तो जिस तरह की छवि स्कूलों की उभरती है वह निराशाजनक है। आरटीई ने सर्व शिक्षा अभियान के तहत 43,668 स्कूलों के निर्माण, 7,00,460 अतिरिक्त कक्षाओं, 5,46,513 शौचालयों और 34,671 पीने के पानी के इंतेजाम की सिफारिश की थी। किन्तु जब आज की तारीख में इन्हीं बुनियादी सुविधाओं को टटोलते हैं तो मंज़र कुछ और ही दिखाई देता है।

डिस्टिक इंफर्मेंशन आफ स्कूल एजूकेशन यानी डाईस की 2012-13 की रिपोर्ट स्वीकारती है कि अभी भी 8.28 फीसदी स्कूलों में आरटीई के बताए दस बिंदुओं पर खरे उतरते हैं। 95 प्रतिशत स्कूलों में पीने का पानी है वहीं 85 फीसदी स्कूलों में शौचालय की व्यवस्था है। यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि सरकारी स्कूलों में शौचालय 85 फीसदी तो हैं लेकिन वो प्रयोग मंे नहीं हैं।

स्कूलों में चाइल्ड फै्रंडली बनाने और प्राथमिक शिक्षा को आनंददायी बनाने के लिए भी आरटीई सिफारिश करती है। साथ ही विकलांग बच्चों को भी खासकर ध्यान में रखती है। लेकिन जब स्कूलों पर नजर डालते हैं तब न तो रैप मिलते हैं और न ही कक्षाओं में बच्चों की सुविधाजनक बैठने की व्यवस्था ही। सचपूछा जाए तो पाठन-पाठन बिना प्रशिक्षित शिक्षकों के संभव नहीं है। आरटीई ने जोर देकर कहा कि स्कूलों में प्रशिक्षित शिक्षक हों। कोई भी रिक्त पद न रहें। लेकिन अभी भी बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, झारखंड़ और दिल्ली पर नजर डालें तो वहां 2 से तीन लाख शिक्षकों के पद खाली हैं। ऐसे में किस प्रकार के पाठन-पठन होता होगा इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। कहां तो शिक्षक-बच्चे के अनुपात 30ः1 का माना गया है लेकिन हकीकत में देखें तो यह अनुपात 80/90ः1 का होता है। ऐसे में एक शिक्षक से किस प्रकार की उम्मींद बंधती है।

शिक्षा हमारी प्राथमिकता हो और वह महज घोषणा पत्रों में ही दर्ज न रहे बल्कि उस पर योजना निर्माण और कार्य करने की आवश्यकता है। तभी 2015 के इएफए के लक्ष्य और आरटीई के सपने को साकार कर सकते हैं।

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कौशलेन्द्र प्रपन्न, शिक्षा कंसल्टेंट एवं शिक्षक- प्रशिक्षक

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