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चक्रव्यूह तोड़कर अगर हिन्दू ह्रदयसम्राट नमो राष्ट्र बनाते हैं, तो इसमें “आप” का भारी योगदान होगा

कॉरपोरेट इंडिया, भारतीय राजनीति को नियंत्रित करती है तो वैश्विक संस्थानों ने कर दिया राजनीति का एनजीओकरण

पलाश विश्वास
मित्र एके पंकज ने सही लिखा है।

आप रख सकते हैं विश्वास इस झूठे लोकतंत्र और उसके विकास पर
हमने हर रंग, हर चेहरा, हर नारा, हर नेता, हर पार्टी देखी है
हमारी लड़ाई जारी है … कम से कम पिछले ढाई हजार सालों से

लेकिन हजारों सालों की यह लड़ाई और उसकी विरासत कहीं खो गयी लगता है।  वजह यह है कि जो लड़ाई जमीनी स्तर पर आम जनता को लड़नी है, वह लड़ाई अब संस्थागत कुलीनतंत्र के कब्जे में है।
वैश्विक संस्थाओं का सीधा हस्तक्षेप है समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था, माध्यमों और संस्कृति से लेकर भाषा और बोलियों में। कॉरपोरेट इंडिया, भारतीय राजनीति को नियंत्रित करती है तो वैश्विक संस्थानों ने राजनीति का एनजीओकरण कर दिया है।
आम आदमी पार्टी को हम समझ रहे थे कि कांग्रेस और भाजपा के दो दलीय भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ कॉरपोरेट विरुद्धे ऐलानिया जिहाद के साथ यह तीसरा विकल्प देश की उत्पादक शक्तियों और सामाजिक शक्तियों को गोलबंद करेगी।
अब आधे भारत की किस्मत ईवीएम में बंद हो जाने के बाद साफ जाहिर है कि जनांदोलनों के छलावा और प्रपंच प्रोजेक्ट वाले तमाम चमकदार उजले चेहरे दरअसल परिवर्तन राजनीति के बहाने वैश्विक पूँजी की कॉरपोरेट लाबिइंग का ही बंदोबस्त करने में लगी है। वे किसी अंबानी, अडानी या टाटा के नुमाइंदे नहीं हैं यकीनन। लेकिन करीब दो सौ करोड़पतियों को चुनाव मैदान में उतारने वाली पार्टी किस आम आदमी की नुमाइंदगी कर रही है, यह अनसुलझी पहेली भी नहीं है। जो एनजीओ संप्रदाय के लोग हैं, उनकी सारी गतिविधियां वातानुकूलित हैं, हवाई मार्ग से देश विदेश वे पूरी तरह ग्लोबल है और क्रयशक्ति उनकी महमहाती है। जमीन की कोई खुशबू कहीं नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्वबैंक, यूनेस्को, यूरोपीय संगठन, डब्लूटीओ, गैट,एडीए से जिनके तार जुड़े हैं, जिनके तमाम कामकाज इन्हीं संगठनों के प्रोजेक्ट है जो उन्हीं से वित्त पोषित हैं, वे आखिर किस किस्म का परिवर्तन ला पायेंगे।
वैश्विक जायनवादी शैतानी व्यवस्था के ये चमकदार नुमाइंदे कैसे मुक्तबाजारी जनसंहारी अर्थव्यवस्था और राजनीति के खिलाफ प्रतिरोध की ताकतों को गोलबंद करेंगे अपने अपने आकाओं के खिलाफ, यह गौरतलब है।
नमोमयभागवत पुराण रच दिया गया है, जहां सब कुछ संस्थागत कुलीनतंत्र है। क्रयशक्ति सापेक्ष। किसी नागपुर में बैठे कुछ विचारधाराप्रतिबद्ध लोग पूरे देश और देश के सारे नागरिकों के लिए नीति रणनीति बनायेंगे, बाकी सबको उन्हीं को अमल में लाना है।
नतीजा चाहे कुछ भी हो। हित-अहित संबंधी सारे प्रश्न अनुत्तरित नमो उपनिषद, नमो भागवत, नमो पुराण हैं। संस्था ही अब राजनीति है। संस्था ही अब अर्थव्यवस्था। राजनीति को संस्थागत बनाना है, इसीलिए जनसंघ और हिन्दू महासभा के बाद भाजपा की विष्णुअधिष्ठाने तिलांजलि है। सीधे संस्था ही कमान संभाल रही है। राजनीति दल की कमान संस्था को और देश की कमान भी संस्था को।
साफ जाहिर है कि कांग्रेस ने वाकओवर दे दिया है। जिनका वध किया जाना है, जन्मजात जो बहिष्कृत हैं और जिनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। जिनके लिए कहीं लागू नहीं है भारत का संविधान, महज आरक्षण प्रावधान लेकिन गणतंत्र की नागरिकता से जो उसी तरह बेदखल, जैसे जल जंगल जमीन नागरिक और मानवाधिकारों से।
न्यायप्रणाली में उनकी कोई सुनवाई नहीं है। कानून का राज उनके खिलाफ है। बुनियादी जरूरतों से वे वंचित हैं, उनके बारे में इस संस्थागत कुलीन सत्ता वर्ग की आखिर क्या राय है।
हफ्ते भर के लिए यात्रा पर था। भोपाल से वापसी के रास्ते वाया नागपुर कोलकाता की ट्रेन में मेरे दो सहयात्री रिटायर होने वाले दो बहुत बड़े अफसर थे। मेरे बारे में जाहिरा तौर पर उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। वे बेतकल्लुफ भारत की सारी समस्याओं का निदान खोज रहे थे। मजे की बात तो यह है कि वे नमोममय भी नहीं थे और न हिंदुत्व के समर्थक। उनके लिए भारत की सबसे बड़ी समस्या जनसंख्या है। हिंदुत्ववादियों के विपरीत वे इस समस्या के लिए मुसलमानों से ज्यादा जिम्मेदार हिंदुओं के पुत्रमोह और कन्याभ्रूण हत्यारा चरित्र को मानते हैं। जाहिर है कि दोनों सिरे से धर्म निरपेक्ष भी थे। उनका मानना है कि डीपोपुलशेसन यानी गैरजरूरी जनसंख्या का सफाया एकमात्र रास्ता है। वे हर तरह की सब्सिडी और हर तरह की लोककल्याणकारी प्रकल्प के विरुद्ध हैं। वे वाणिज्यिक मूल्यों के आधार पर बिना रियायत अर्थव्यवस्था को नियंत्रित करने की बात करते हैं और हर तरह के आरक्षण के विरुद्ध है।
यह ऐसा ही है जैसे हमारे अनेक अंग्रेजी मीडियाकर्मियों का अभिमत है कि विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए, इसके रास्ते जो भी अवरोधक बनें, उनको उड़ा दिया जाये।
 और चूंकि इस देश के आदिवासी ही विकास के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है और माओवादी जैसी चुनौतियों के भी वे जिम्मेदार है, तो उनके एकतरफा सफाये के बिना भारत महाशक्ति बन ही नहीं सकता। उनके मुताबिक इस एजंडा को मैनेजरी दक्षता और सर्जिकल विशेषज्ञता से अंजाम देना है।
जाहिर है कि राजनीति को केंद्रीकृत संस्थागत बनाने का मकसद भी वही है। इसीलिए नागपुर में संस्था सीमाबद्ध थी और परदे के पीछे थी, वह सर्वजनसमक्षे हैं मुख्य कार्यकारी और सर्वजनसमक्षे जो मुख मूकाभिनय था, उसका बिना आडंबर यह पटाक्षेप, जैसा भाजपा त्रिमूर्ति को जलांजलि।
राहुल गांधी भी व्यवस्था को संस्थागत बनाने का प्रवचन दे रहे हैं। व्यवस्था का संस्थागत जो स्वरुप है, वह सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ और सर्वत्र विराजमान सर्ववर्चस्वी जन्मजात कुलीनतंत्र है। वहां नागरिकता अप्रासंगिक है। वहां लोकतंत्र अवांछित है। वह सीधे तौर पर गेस्टापो पद्धति का गिलोटिन है जहां सर कटाने के लिए आम जनता को बिना शोर शराबे कतारबद्ध कर दिया जाये।
जो सत्तावर्ग है, जिसमें कांग्रेस, भाजपा, रंग बिरंगे क्षत्रप और अस्मिता झंडावरदार हैं तो गांधीवादी, समाजवादी,साम्यवादी और अंबेडकरी विचारधाराओं के झंडेवरदार भी, वे भी इस संस्थागत कुलीन तंत्र के अभिमुख देश और देश की जनता को हाँक रहे हैं।
अब मजा यह है कि लड़ाई देशज सर्ववर्चस्वी कलीन तंत्र और शैतानी जायनवादी वैश्विक कॉरपोरेट पूँजीवर्चस्वी मुक्तबाजारी कुलीनतंत्र के मध्य है और दोनों के बीच का समन्वय और समझौता भी डीटो भारतीय राजनीति है।
 कोई किसी के अधिकारक्षेत्रे अतिक्रमण कर नहीं रहा है। कोई किसी के हितविरुद्धे आचरण नहीं कर रहा है।
दोनों पक्ष जनादेश युद्ध मार्फत ऐसी संस्थागत महाविनाश का निर्माण कर रहे हैं, जिसमें अवांछित गैर जरूरी जनता का संस्थागत सफाया संभव कर दिया जाये।
यही दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों का एजंडा है। कांग्रेस ने वाकओवर दिया है और भाजपा के खिलाप सिर्फ जुबानी जंग में निष्णात इसलिए है कि इस अश्वमेधी राजकाज में वह अपने वंशीय आनुवांशिकी साम्राज्य को दांव पर लगाना नहीं चाहती।
जाहिर है कि यह संस्थागत महाविनाश प्रकल्प भी कांग्रेस भाजपा और देशज म और अंतर्राष्ट्रीय आवारा जायनवादी कॉरपोरेट पूँजी का साझा शापिंग माल है, जहां सबकुछ खरीदा बेचा जा सकता है। इस संस्थागत महाविनाश को सतजुग स्वराज और हिन्दू राष्ट्र जैसे अनेक अवधारणाओं से व्याख्यायित किया जा सकता है। जिसके लिए देवमंडलमध्ये कल्किअवतार का नया भागवत पुराण है।
सतजुग के लिए वध्यजनसमूहसकलमध्ये कल्कि अवतारस्वरुप ओबीसी नमो का संस्थागत प्रारुप और प्रकल्प हमारके सामने है। लठैत और कारिंदे, पुरोहित और यजमान लामबंद हैं। चूं भी किया तो एक बालिश्त छोटा कर देने का फरमान।
 पिछले बीस साल के सुधार महाकाव्य में गीता का उपदेश ही दे रहे थे श्रीकृष्ण, बाकी काम तो पक्ष विपक्ष के रथी महारथी तीरंदाज कर रहे थे। अब तो कृष्ण का कुनबा ही धनुर्धारी अर्जुन है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन नहीं, अब सीधे कृष्ण जनगण विरुद्धे हैं और मारे जाने वाले लोग तमाम निमित्तमात्र हैं और जन्मजात कर्मफलसिद्धांत अनुयायी मारे जाने को नियतिवद्ध है जबकि कल्कि अवतार सतयुग लाने को अवतरित हो चुके हैं और मनुअनुशासन अक्षरशः लागू होने वाला है।
सारे शंबूक जो तपस्यारत हैं, सारे एकलव्य जो दक्षता का उत्कर्ष छूने लगे हैं लोकगणराज्य के मार्फत, लोकगणराज्य अवसाने मनुसाम्राज्ये उनकी नियति शंबूक समान है।
हर सीता अब भी अग्निपरीक्षाउपरांते परित्यक्ता अंत्यज है अपवादबिना।
हाल में नरेंद्र मोदी के रैली प्रवचन और आर्थिक नीतियों संबंधी उनके उदात्त घोषणाओं का नोट लिया जाना चाहिए। अर्थव्यवस्था में बुनियादी परिवर्तन के संकल्पमध्ये वे देशज पूँजी और विदेशी छिनाल पूँजी दोनों को आश्वस्त कर रहे हैं कि आर्थिक नीतियों की निरंतरता बहाल रहेगी।
वे बेहिचक कह रहे हैं कि पार्टी उनकी भले ही खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के विरुद्ध है,लेकिन बतौर भारत के भावी प्रधानमंत्री वे अबाध पूँजी प्रवाह और हर क्षेत्र में एफडीआई लागू करेंगे।
वे विकास के नाम पर नीतिगत विकलांगकता और राजनीतिक बाध्यताओं के पार मजबूत सरकार और मजबूत भारत का स्वप्न सार्थक करेंगे। निवेश को सहज बनायेंगे। पूँजी को करमुक्त करेंगे। वाणिज्य और व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप खत्म कर देंगे। निजीकरण के गुजरात मॉडल को पूरा देश बनायेंगे। नीतिगत विकलांगकता और राजनीतिक बाध्यता वैश्विक पूँजी तरफे कांग्रेस के दसवर्षीय जनसंहारी सुधारविरुद्धे महाभियोग है।
अब जो पूरी कवायद है वह यही है कि मजबूत देश और मजबूत सरकार के मार्फत पूरे तंत्र और पूरी व्यवस्था को संस्थागत कर दिया जाये, जिसकी कमान जन्मजात वर्णवर्चस्वी कुलानतंत्र के हाथों में हो और जहां जनसुनवाई, जनहिस्सेदारी या जनहस्तक्षेप की किसी लोकतांत्रिक वारदात की गुंजाइश ही नहीं हो। चलो बुलावा आया है, के थीम सांग पर नाचते गाते झुंड के झुंड आम लोग अपना सर कटाने खुद ब खुद उछलते फांदते तंत्र मंत्र यंत्र मार्फत संस्थागत तौर पर अपनी मौत का जश्न मना लें।
इस अनिवार्य कार्यभार में कोई संस्थागत चूक न हो, इसके लिए वैश्विक पूँजी संस्थाओं ने अपने नुमाइंदों की भी अलग पार्टी बना दी है। सीटें दो चार मिले या नहीं, वोटकाटू भूमिका से घनघोर उनका वास्तविक एजंडा है। चार प्रतिशत वोट मिला तो बतौर राष्ट्रीय पार्यी वह एक तरफ वाम भूमिका खत्म करेगी तो दूसरी तरफ देशज पूँजी के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय ग्लोबल छिनाल पूँजी के लिए कॉरपोरेट लाबिइंग भी।
 मसलन यह गौरतलब है कि वाराणसी से अरविंद केजरीवाल की नरेंद्र मोदी को चुनौती का कुल जमा नतीजा क्या है। मोदी के खिलाफ, हिन्दू राष्ट्र के खिलाफ वाराणसी और भारत की उदार धर्मनिरपेक्ष गंगा जमुनी तहजीब और विरासत की हिफाजत के लिए जो साझा मोर्चा बनना था, उसे अकेले अरविंद केजरीवाल ने खंडित कर दिया है।
बाकी चुनावक्षेत्रों में जन भ्रष्ट लोगों के खिलाफ युद्धघोषणा के एजंडे के साथ हम सबको नयी दिशा का भान करा रही थी आप, आप की ही वजह से सर्वत्र उनकी जीत आसान हो रही है। चक्रव्यूह तोड़कर अगर मर्यादा पुरुषोत्तम हिन्दू ह्रदयसम्राट भारत भाग्यविधात बनकर नमो राष्ट्र बनाते हैं, तो इसमें आप का भारी योगदान होगा, शायद सबसे बड़ा।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं। आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना।

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