Home » समाचार » चमड़िया ने की यूएनआई में पीसीआई के हस्तक्षेप की माँग

चमड़िया ने की यूएनआई में पीसीआई के हस्तक्षेप की माँग

वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने भारतीय प्रेस परिषद् (पीसीआई) के अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू को पत्र लिखकर संसद से प्राप्त अधिदेश का इस्तेमाल कर समाचार एजेंसी यू एन आई के मामले में कारगर हस्तक्षेप की अपील की है। श्री चमड़िया ने अन्य पत्रकारों से भी अनुरोध किया है कि वे भी इस सम्बंध में पत्र लिखें। पत्र इस प्रकार है –

प्रति

अध्यक्ष,

भारतीय प्रेस परिषद नई दिल्ली

विषय- देश की समाचार एजेंसी यू एन आई ( यूनीवार्ता और उर्दू सेवा समेत) की पत्रकारिता की स्वतंत्रता में बाधा जारी रखने में परिषद के हस्तक्षेप की मांग।

प्रिय न्यायाधीश श्री मार्कंडेय काटजू,

मैंने भारतीय प्रेस परिषद की बेवसाईट पर आज एक सूचना देखी। उसके एक अंश को यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। “भारतीय प्रेस परिषद को पत्रकारिता स्तरों में सुधार करने और इसकी स्वतंत्रता बनाये रखने के लिए संसद से अधिदेश प्राप्त है। परिषद विशिष्ट मुद्दों पर अपने अधिनिर्णयों के साथ साथ रिपोर्टों और निर्णयों के माध्यम से यह कार्य, करती रही है। उक्ति दायित्व के साथ स्वतंत्रता के अनुसरण में मीडिया को कर्तव्यों का पालन करने हेतु प्रोत्साहित करने के लिए, ऐसे अनुदेश प्राप्त एकमात्र सांविधिक प्राधिकरण के रूप में भारतीय प्रेस परिषद ने विभिन्न क्षेत्रों में प्रिंट पत्रकारिता में उत्कृष्टता प्राप्त पत्रकारों/ फोटो-पत्रकारों को सम्मानित करने के लिए प्रति वर्ष राष्ट्रीय प्रेस दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय पुरस्कार देने प्रारंभ किये हैं।”

मैं ये समझता हूं कि पत्रकारिता के स्तरों में सुधार करने और इसकी स्वतंत्रता को बनाये रखने के लिए प्राप्त अधिकार की व्याख्या करते हुए आपने यह पुरस्कार कार्यक्रम शुरू किया है। व्याख्या के बारे में मैं ये कहता हूं कि समाज में वहीं वर्ग और संस्कृति अपना राज बरकरार रख सकती है जिसे व्याख्या करने का अधिकार प्राप्त हो। व्याख्या का अधिकार का इस्तेमाल अपने सामाजिक सरोकारों के मुताबिक किया जाता है, ये आमतौर पर देखने को मिलता है। वह चाहें व्यक्ति करें या फिर कोई संस्था करें। पत्रकारिता के स्तरों में सुधार और पत्रकारिता की स्वतंत्रता की व्याख्य़ा केवल पुरस्कारों के संदर्भ में ही नहीं किया जा सकता है। मैं आपसे निवेदन ये करना चाहता हूं कि देश की समाचार एजेंसी यू एन आई के अंदर पिछले लगभग आठ वर्षों से जो घटित हो रहा है, उससे न केवल पत्रकारिता का स्तर प्रभावित हुआ है बल्कि पत्रकारिता में पत्रकारों की स्वतंत्रता बाधित हुई है। और हैरान करने वाली स्थिति तो ये हैं कि संसद और संसद से अधिदेश प्राप्त किसी संस्था ने इसे न तो रोकने की कोशिश की है और ना ही उस दिशा में उसकी कोई चिंता दिखाई दे रही हैं।

आपको ये बताने की जरूरत नहीं है कि यू एन आई के साथ एक स्लोगन चिपका रहता है। यह कि यह भारतीय भाषाओं की एक मात्र समाचार एजेंसी है। संदर्भ के तौर पर यह उल्लेख किया जाना चाहिए कि यू एन आई ( United News of India ) की स्थापना भारत के प्रथम प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू की पहल और प्रथम प्रेस आयोग की सिफारिश के बाद की गई थी। तब पी टी आई देश की एक मात्र एजेंसी थी और प्रधानमंत्री नेहरू नहीं चाहते थे कि किसी एक समाचार एजेंसी का एकाधिकार हो। यूएनआई की स्थापना के लिए 1958 में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री विधान चंद्र राय की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई थी। इस कमेटी ने पूरी दुनिया में समाचार एजेंसियों के ढांचे का अध्ययन किया था और समाचार एजेंसी ए पी के ढांचे को यू एन आई के लिए उपयुकत माना था। यह एक सहकारी संगठन के रूप में स्थापित हुआ और बाद में एक ट्रस्ट में परिवर्तित किया गया। बिना लाभ हानि के सिद्धांत पर शुरू किए गए यू एन आई की समाचार सेवा पर देश के लघु और मध्यम समाचार पत्र खासतौर से निर्भर रहे हैं। यू एन आई अपनी पूरी यात्रा में पत्रकारिता के स्तर में सुधार और स्वतंत्रता की कहानियां बुनती रही हैं। 2006 तक यह संस्था बेहद फायदे में चलती रही और इसके पास सुरक्षित कोष जमा थे। लेकिन इसे गैर कानूनी तरीके से बेचने की तैयारी इस रूप में शुरू हुई कि इसे जिन रास्तों से फायदे होते थे उन्हें घाटे में बदला जाने लगा। सुरक्षित कोष को पैट्रोल और पेशाब घर जैसे कामों में बहा दिया गया। इसके ब्यौरे बेहद दिलचस्प है।

मजे कि बात है कि यह संस्थान और उसके ढेर सारे पत्रकार और गैर पत्रकार साथी आर्थिक स्तर पर गरीब होते चले गए और कुछेक लोग बेहद मालामाल हो गए। उनके पास नई गाडियां आ गई। चूंकि इस पत्र की एक सीमा है वरना मैं पूरी कहानी आपको यहां सुनाना चाहता था। लेकिन मैं ये सार के तौर पर रखना चाहता हूं कि यू एन आई की मौजूदा स्थिति है कि पत्रकारों को लगातार बाहर निकलने के लिए मजबूर किया जा रहा है। यूएनआई का परिसर बिल्कुल उजड़ा हुआ चमन सा दिखने लगा है। मैं ये जो ब्यौरे दे रहा हूं उसके साथ ये खतरा हो सकता है कि आप उसकी व्याख्या प्रबंधन के संकट के रूप में करने लगे।

मैं ये कहना चाहता हूं कि ये प्रबंधन की कमजोरी, कर्मचारियों और प्रबंधन के विवाद और श्रम कानूनों का मामला नहीं है। अपने पूरे चरित्र में यू एन आई का पूरा मामला पत्रकारिता के स्तर में सुधार और पत्रकारिता की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। पत्रकारिता की स्वतंत्रता को बाधित करने के लिए कई गैर कानूनी काम हो रहे हैं। पत्रकारिता से सरोकार न रखने वालों के नियंत्रण में ये संस्थान जा रहा है।

यू एन आई को बचाने के लिए यहां के ईमानदार, कर्मठ कर्मचारियों व पत्रकारों ने लंबी लड़ाई लड़ी है लेकिन लगता है कि इस संस्थान के समय के साथ समाप्त होने का इंतजार किया जा रहा है। देश भर में फैले मध्यम और लघु समाचार पत्रों के सामने तो बड़ा संकट खड़ा होता जा रहा है। हजारों पत्रों के समाचार के स्रोतों को मिटाने की कोशिश और उसकी पूरी प्रक्रिया क्या स्तर और स्वतंत्रता को बनाए रखने में बाधा नहीं कही जाएगी? आप य़ू एन आई की पूरी स्थिति की व्याख्या लोकतंत्र में समाचार एजेंसी को बाधित करने के रूप में भी कर सकते हैं। मैं भारतीय प्रेस परिषद से उस व्याख्या की उम्मीद करता हूं जो लोकतंत्र और पत्रकारिता के हितों की सुरक्षा में मदद होगी।

आपसे उम्मीद करता हूं कि संसद से प्राप्त अधिदेश का इस्तेमाल आप यू एन आई के मामले में अपने कारगर हस्तक्षेप के रूप में करेंगे।

धन्यवाद।

 

निवेदक

अनिल चमड़िया

About हस्तक्षेप

Check Also

media

82 हजार अखबार व 300 चैनल फिर भी मीडिया से दलित गायब!

मीडिया के लिये भी बने कानून- उर्मिलेश 82 thousand newspapers and 300 channels, yet Dalit …

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: