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चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल

अमलेन्दु उपाध्याय
क्या चुनाव आयोग ने एक समुदाय विशेष को “कुत्ते का बच्चा” कहने की अनुमति प्रदान कर दी है ? ऐसा घोषित तौर पर है नहीं, लेकिन यदि आप ऐसा करते हैं तो आयोग को कोई परेशानी नहीं होगी ? ऐसा भी घोषित तौर पर है नहीं लेकिन चुनाव आयोग के हालिया निर्णयों को देखकर ऐसा भावार्थ निकाला जा सकता है।
दरअसल चुनाव अभियान के दौरान जनसभाओं में कथित भड़काऊ भाषणों की शिकायत पर चुनाव आयोग ने भाजपा नेता अमित शाह और समाजवादी पार्टी के नेता व कैबिनेट मंत्री मौहम्मद आजम खान को चुनावी जनसभाएं और रोड शो करने से मना कर दिया था और उन पर प्रतिबंध लगा दिया था। बाद में आयोग ने अमित शाह के इस लिखित आश्वासन के बाद कि वे आगे से भड़काऊ व आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग नहीं करेंगे जिससे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन होता हो, उनके ऊपर लगी पाबंदी हटा ली जबकि आजम खां पर पाबंदी जारी है।
बस आयोग के इस फैसले पर ही आपत्तियां उठ रही हैं कि अगर अमित शाह के ऊपर लगी पाबंदी उठ सकती है तो आजम खां के ऊपर लगी पाबंदी क्यों नहीं उठाई गई। आयोग के निर्णय पर स्वयं अमित शाह के उस बयान से भी सवालिया निशान लगा जिसमें उन्होंने कहा कि उन पर तो पाबंदी आजम खां का मामला बैलेंस करने के लिए लगी थी।
यहां प्रकरण को समझने के लिए आजम और अमित शाह दोनों के बयानों को एक बार पुनः देख लेना उचित होगा। आजम के जिस बयान पर आयोग ने पाबंदी लगाई वह यह था- ‘कारगिल की पहाड़ियों को फतह करने वाला कोई हिंदू नहीं था, बल्कि कारगिल की पहाड़ियों को अल्लाह-हो-अकबर की आवाज बुलंद करते हुए फतह करने वाले मुसलमान फौजी थे। आप हमें कुत्ते का बच्चा मत कहिए, हम पर विश्वास कीजिए।’ जबकि अमित शाह के इस बयान से विवाद पैदा हुआ था जिसमें उन्होंने कहा कि आम चुनाव विशेष तौर पर उत्तर प्रदेश में चुनाव सम्मान के लिए हैं। यह चुनाव अपमान का बदला लेने का है। यह चुनाव उनको सबक सिखाने का है जिन्होंने अन्याय किया है।
यहां अमित शाह साफ तौर पर बदला लेने का आव्हान कर रहे हैं जबकि आजम खां कह रहे हैं कि हम पर भरोसा कीजिए, वह बदला लेने की बात नहीं कर रहे। फिर आजम और शाह के बयानों को एक तराजू में कैसे तोला जा सकता है? …और इसीलिए चुनाव आयोग के फैसले पर प्रश्नचिन्ह लग रहे हैं। एक आदमी साफ तौर पर एक समुदाय का दूसरे समुदाय से बदला लेने के लिए आव्हान कर रहा है जबकि एक आदमी दूसरे समुदाय से कह रहा है हम पर भरोसा कीजिए, हमें कुत्ता का बच्चा न कहिए (जो कि प्रधानमंत्रित्व का एक उम्मीदवार कह रहा है।)
अमित शाह खुद भागकर उच्च न्यायालय की शरण में गए थे। वे गुजरात से तड़ीपार हैं पर चुनाव आयोग के लिए राजा बेटा हैं। उनका माफीनामा खुद इस बात का सुबूत है कि उन्होंने आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया था। सवाल चुनाव आयोग पर है कि उसने अमित शाह की स्वीकारोक्ति के बाद भी उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की ?
अगर यह तर्क मान भी लिया जाए कि अमित शाह ने चुनाव आयोग को लिखित रूप से आश्वासन दिया है कि वे आगे से ऐसा नहीं करेंगे जबकि आजम अपनी बात पर कायम हैं, तो भी चुनाव आयोग को स्पष्ट तो करना ही चाहिए कि आजम के बयान में क्या आपत्तिजनक है ?
आजम ने जो कहा उसके प्रमाण मौजूद हैं। कारगिल युद्ध के बाद एनडटीवी पर एक फौजी जनरल का इंटरव्यू इंटरनेट पर मौजूद है जिसे http://www.ndtv.com/video/player/ndtv-india-documentary/kargil-journey-of-victory/92950 लिंक पर देखा जा सकता है जबकि इंडियन एक्सप्रेस की भी एक रिपोर्ट अभी भी इंटरनेट पर मौजूद है, जो बताती है कि किस तरह मुस्लिम ग्रेनेडियर्स ने कुर्बानी देकर कारगिल की चोटी फतह की। रिपोर्ट को इस लिंक पर देखा जा सकता है http://expressindia.indianexpress.com/ie/daily/19990710/ige10063p.html । चुनाव आयोग की मंशा पर सवाल उठने के और भी कारण हैं। सहारनपुर से कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद का छह महीने पुराना वीडियो सामने आने पर तो मसूद की गिरफ्तारी हो गयी जबकि जिस वक्त का यह वीडियो था उस समय चुनाव आचार संहिता लागू नहीं थी। दूसरी तरफ अमित शाह के ठीक वैसे ही बयान पर शाह को केवल नोटिस जारी किया गया और उन्हें इतना समय दिया गया कि वे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकें। और जब अमित शाह ने अपनी याचिका वापिस ले ली तो आयोग ने अपनी बला टालने के लिए अमित शाह और आजम खां पर एक साथ पाबंदी लगा दी।
अब आजम ने चुनाव आयोग पर भड़कते हुए कहा है कि वह अपने आप को सुप्रीम कोर्ट से ऊपर समझ रहा है। आजम ने कहा कि चुनाव आयोग को इस बात की गलतफहमी है कि वह सुप्रीम कोर्ट से ज्यादा ताकतवर है। आजम अपने करगिल वाले बयान पर अभी भी टिके हुए हैं। मीडिया में आए आजम के बयान में कहा गया है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं कहा है और वह इसके लिए माफी नहीं मांगेंगे। आज़म खां ने कहा है कि चुनाव आयोग स्वयं को सुप्रीम कोर्ट से ऊपर न समझे।
हो सकता है आजम खां क्रोध में बोल रहे हों पर सत्यता यही है कि चुनाव आयोग स्वयं को सुप्रीम कोर्ट से ऊपर समझने लगा है। याद होगा कि सुप्रीम कोर्ट भी चुनाव आयोग को फटकार लगा चुका है कि वह अपनी सीमा का अतिक्रमण न करे। 2012 के विधानसभा चुनावों के समय चुनाव आयोग की पहल पर नकदी लेकर यात्रा करने वालों की तलाशी लेकर कई करोड़ रुपया बरामद होना दिखाया गया था, उसी पर चुनाव आयोग ने यह टिप्पणी की थी और उसके बाद यह तलाशी अभियान नहीं हुआ।
 न्यायमूर्ति डीके जैन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने 23 नवंबर 2012 को गुजरात उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ निर्वाचन आयोग की याचिका पर सुनवाई के दौरान सख्त टिप्पणी की थी कि निर्वाचन आयोग ने हाल के वर्षों में काफी अच्छा काम किया है, लेकिन कभी-कभी वह अति उत्साह में भी फैसले ले लेता है।
चुनाव आयोग संवैधानिक संस्था है लेकिन उसे संविधान बनाने या बदलने का अधिकार नहीं है, न ही वह अदालत है जो कोई भी फैसला सुना दे। यदि चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें आती हैं तो उसे उन शिकायतों पर एफआईआर कराने का अधिकार है लेकिन सजा देने का नहीं। सजा देना अदालत का काम है और जांच करना पुलिस का काम है। लेकिन आचार संहिता की आड़ में चुनाव आयोग, कार्यपालिका से लेकर विधायिका और अदालत के भी अधिकार हासिल करने की कुचेष्टा करता है।
करोड़ों रुपया मतदाता जागरुकता के नाम पर खर्च किया जा रहा है। खबरें आई थीं कि उत्तर प्रदेश के विगत विधानसभा चुनाव में 400 करोड़ रुपया चुनाव आयोग ने मतदाता जागरुकता के नाम पर वोट डालो अभियान पर खर्च कर दिया था। सवाल यह है कि संविधान के किस अनुच्छेद के तहत चुनाव आयोग को यह अधिकार प्राप्त है कि वह वोट डालने का आव्हान करके अभियान चलाए। मत डालना जिस तरीके से किसी मतदाता का अधिकार है उसी तरह मत न डालना भी एक मतदाता का अपना अधिकार है, उसे इसके लिए विवश नहीं किया जा सकता। फिर यह रुपया इस अभियान पर खर्च किया जा रहा है, यह धन किसका है? जाहिर है यह इस देश की जनता की गाढ़ी कमाई को ही खर्च किया जा रहा है और एनजीओ को कथित जागरुकता फैलाने के नाम पर दिया जा रहा है। मजे की बात यह है कि मतदाता जागरुकता पर हजारों करोड़ रुपया फूँकने वाला चुनाव आयोग मुजफ्फरनगर-शामली के राहत शिविरों में रह रहे शरणार्णियों के मत डलवाने की व्यवस्था नहीं कर पाया। शायद यह उसकी जिम्मेदारी में शामिल नहीं है ?
इसलिए यह उचित समय है कि चुनाव आयोग की सीमा पर बहस हो। बेहतर यही होगा कि आजम खां भी आयोग के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में जाएं ताकि यह प्रकरण भी साफ हो सके।

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अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक समीक्षक हैं। हस्तक्षेप डॉट कॉम के संपादक हैं।

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