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चुनौतियाँ फेसबुक की

फेसबुक की 10वीं सालगिरह पर विशेष

Special on Facebook’s 10th anniversary

हिन्दी फेसबुक पर बड़े पैमाने पर युवा लोग लिख रहे हैं। इनमें सुंदर साहित्य, अनुवाद, विमर्श आदि आ रहा है। इसमें आक्रामक और पैना लेखन भी आ रहा है। साथ ही फेसबुक पर बड़े पैमाने पर बेबकूफियाँ भी हो रही हैं।

Facebook is a serious medium

फेसबुक एक गम्भीर मीडियम है इसका समाज की बेहतरी के लिये, ज्ञान के आदान-प्रदान और सांस्कृतिक-राजनीतिकचेतना के निर्माण के लिये इस्तेमाल करना चाहिए। अभी हिन्दी का एक हिस्सा फेसबुक पर अपने सांस्कृतिक पिछड़ेपन की अभिव्यक्ति में लगा है। वे निजी भावों की अभिव्यक्ति से ज्यादा इस मीडियम की भूमिका को नहीं देख पा रहे हैं। एक पंक्ति के लेखन को वे गद्यलेखन के विकास की धुरी मानने के मुगालते में हैं।

Gossip does not make medium strong.

फेसबुक में कुछ भी लिखने की आजादी है, इसका कुछ बतखोर लाभ ले रहे हैं, यह वैसे ही है जैसे अखबार और पत्रिकाओं का गॉसिप लिखने वाले आनन्द लेते हैं। इससे अभिव्यक्ति की शक्ति का विकास नहीं होता।

बतखोरी और गॉसिप से मीडियम ताकतवर नहीं बनता। मीडियम ताकतवर तब बनता है जब उस पर आधुनिक विचारों का प्रचार-प्रसार हो।खबरें लिखी जाएं। सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों और समस्याओं के साथ मीडियम जुड़े।

हिन्दी में फेसबुक अभी हल्के-फुल्के विचारों और भावों की अभिव्यक्ति के साथ जुड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि यह पास टाइम मीडियम है। वे इसी रूप में उसका इस्तेमाल भी करते हैं। फेसबुक एक सीमा तक ही पास टाइम मीडियम है। लेकिन यह सामाजिक परिवर्तन का भी वाहक बन सकता है।

फेसबुक बेहद शक्तिशाली मीडियम है इसकी समग्र शक्ति का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। किसी भी मीडिया की शक्ति का आधुनिक युग में तब ही विकास हुआ है जब उसका राजनीतिक क्षेत्र में इस्तेमाल हुआ है। हिन्दी में ब्लॉगिंग से लेकर फेसबुक तक राजनीतिक विषयों पर कम लिखा जा रहा है।

ध्यान रहे प्रेस ने जब राजनीति की ओर रूख किया था तब ही उसे पहचान मिली थी। यही बात ब्लॉगिंग और फेसबुक पर भी लागू होती है।

जो लोग सिर्फ साहित्य, संस्कृति के सवालों पर लिख रहे हैं या सिर्फ कविता, कहानी आदि सर्जनात्मक साहित्य लिख रहे हैं उनकी सुंदर भूमिका है। लेकिन इस माध्यम को अपनी पहचान तब ही मिलेगी जब हिन्दी के श्रेष्ठ ब्लॉगर और फेसबुक लेखक गम्भीरता के साथ देश के आर्थिक-राजनीतिक सवालों पर लिखें, किसी न किसी जनांदोलन के साथ जोड़कर लिखें। खोजी खबरें दें।

हिन्दी में अभी जितने भी बड़े ब्लॉगर हैं उनमें से अधिकांश देश, राज्य और अपने शहर के राजनीतिक हालात पर लिखने से कन्नी काट रहे हैं या उनको राजनीति पर लिखना पसंद नहीं है।

फेसबुक रीयलटाइम मीडियम होने के कारण विकासमूलक और आंदोलनकारी या वैचारिक क्रांति में बड़ी भूमिका निभा सकता है। समस्या है फेसबुक का पेट भरने की। देखना होगा फेसबुक के मित्र- यूजर किन चीजों से पेट भर रहे हैं। खासकर हिन्दी के फेसबुक मित्र किस तरह की चीजों और विषयों के संचार के लिये इस माध्यम का इस्तेमाल कर रहे हैं ?

अभी एक बड़ा हिस्सा गली-चौराहों की पुरानी बातचीत की शैली और अनौपचारिकता को यहाँ ले आया है। इससे जहाँ एक ओर पुरानी निजता या प्राइवेसी खत्म हुयी है। वहीं दूसरी ओर वर्चुअल संचार में इजाफा हुआ है।

हमें फेसबुक को शक्तिशाली मीडियम बनाना है तो देश की राजनीति से जोड़ना होगा। राजनीति से जुड़ने के बाद ही फेसबुक को हिन्दी में अपनी निजी पहचान मिलेगी और फेसबुक की बतखोरी, गॉसिप और बाजारू संस्कृति से आगे जाकर क्या भूमिकाएं हो सकती हैं उनका भी रास्ता खुलेगा।

ब्लॉगिंग, फेसबुक आदि को प्रभावी बनाने के लिये इन माध्यमों का राजनीति से जुड़ना बेहद जरूरी है। कोई भी मीडिया टिप्पणियों, प्रशंसा, निजी मन की बातें, निजी जीवन की दैनंदिन डायरी, पत्रलेखन से बड़ा नहीं बना, इनसे मीडिया को पहचान नहीं मिलती।

आधुनिक काल की धुरी है राजनीति। आधुनिक साहित्य तब आया जब उसने राजनीति से सम्बंध जोड़ा।

प्रेस को पहचान तब मिली जब उसने राजनीति से सम्बंध जोड़ा। कोई भी माध्यम हो या जनमाध्यम हो, संचार हो या जनसंचार हो, साहित्य हो या कलाएं हों वे अपनी आधुनिक पहचान राजनीति से जुड़ने के बाद ही बना पायी हैं। फेसबुक आदि के यूजरों को राजनीति से जुड़ना होगा। इसके बिना यह सामाजिक परिवर्तन का मीडियम नहीं बन सकता।

जगदीश्वर चतुर्वेदी

About the author

जगदीश्वर चतुर्वेदी, लेखक जाने-माने आलोचक, मीडिया विमर्शकार हैं। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं। हस्तक्षेप.कॉम के सम्मानित स्तंभकार हैं।

About जगदीश्वर चतुर्वेदी

जगदीश्वर चतुर्वेदी। लेखक कोलकाता विश्वविद्यालय के अवकाशप्राप्त प्रोफेसर व जवाहर लाल नेहरूविश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। वे हस्तक्षेप के सम्मानित स्तंभकार हैं।

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