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छँटनी के खिलाफ कानूनी लड़ाई भी मौजूद- कॉलिन गोंजलविस

नई दिल्ली। मीडिया में जारी छँटनी और पत्रकारों की समस्याओं को ध्यान में रखकर पत्रकार एकजुटता मंच (जर्नलिस्ट सोलिडेरिटी फोरम- जेएसएफ) ने अपने कदम एक कदम और आअगे बढ़ा दिये हैं। इस संदर्भ में जेएसएफ की आम सभा आज प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में सम्पन्न हुई। गौरतलब है कि बीती 21 अगस्त को जेएसएफ ने दो समाचार चैनलों सीएनएन-आईबीएन और आईबीएन-7 से एकमुश्त 320 पत्रकारों की हुई छँटनी के विरोध में फिल्म सिटी नोएडा में प्रदर्शन भी किया था। उसी के बाद इस बैठक की रूपरेखा तयार की गयी थी।

बैठक में मौजूद वरिष्ठ पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वरिष्ठ वकीलों ने मीडिया पर कॉर्पोरेट के बढ़ते प्रभाव और उससे पैदा हो रही समस्याओं पर सबका ध्यान आकर्षित किया। बैठक में मुख्यतः पत्रकार श्रमजीवी कानून-1955 और मजीठिया आयोग की माँगों को लागू करना, मीडिया इण्डस्ट्री में व्याप्त काँट्रैक्ट सिस्टम का विरोध करना, मीडिया क्रॉस होल्डिंग से उपज रहे खतरे, प्रेस कमीशन को मजबूत करना और पत्रकारों के लिए मौजूदा काम के हालात जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात हुयी।

बैठक की शुरुआत करते हुए जेएसएफ सदस्य और वरिष्ठ मीडिया आलोचक भूपेन सिंह ने कहा कि आज पत्रकारों के पास इतने अधिकार भी नहीं बचे हैं कि वे मालिकों के सामने नौकरी जाने कि हालत में भी किसी तरह का विरोध दर्ज करा सकें। एक तरफ जहाँ पत्रकारों की वर्किंग कंडीशन दिन पर दिन बदतर होती जा रही है वहीं इन मुद्दों से ध्यान हटाने के लिये पत्रकारों की योग्यता या अयोग्यता के लिये परीक्षा जैसे सुनियोजित किस्म की बातें की जा रहीं हैं।

बैठक में बतौर वक्ता भाग ले रहे वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश ने मीडिया में काम कर रहे सीनियर पत्रकारों की जमकर खबर ली। उर्मिलेश ने कहा कि छँटनी जैसे संवेदनशील मुद्दों पर ये सारे आइकोनिक पत्रकार ही सबसे पहले कन्नी काटते नज़र आते हैं। उर्मिलेश ने मीडिया संस्थानों में यूनियनों को फिर से बहाल करने को लेकर भी ज़ोर दिया।

उर्मिलेश ने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से संबद्ध पार्लियामेंट की स्टैंडिंग कमेटी की रिपोर्ट को भी पढ़ने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि यह एक संवैधानिक रिपोर्ट है और इसी को आधार बनाकर जेएसएफ पत्रकारों के हक़ की लड़ाई को आगे ले जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश नौटियाल ने भी अंबानी परिवार के नब्बे के बाद से मीडिया में बदते आ रहे दखल पर कई महत्वपूर्ण बातें की। उन्होंने ऑब्जर्वर समाचार पत्र की यूनियन का अध्यक्ष होने के अपने अनुभवों को भी साझा किया और इतिहास की गलतियों से सबक लेने को कहा।

भारतीय जन संचार संस्थान में अध्यापक वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रधान ने भी जेएसएफ की इस पहल की प्रसंशा करते हुये इस मुहिम से अपनी एकजुटता जाहिर की। उन्होनें श्रमजीवी पत्रकार कानून का दायरा बढ़ाने और इसमें संशोधनों की आवश्यकता पर ज़ोर दिया। अभियान से बाकी मीडिया संस्थानों और लोगों को जोड़ने की सलाह देते हुये आनंद प्रधान ने कहा कि कानून को लागू करने के बाबत राज्य सरकारों द्वारा बरती गयी उपेक्षा पर भी बात कर इस बारे में और जानकारियाँ जुटानी चाहिए।

दैनिक भास्कर से जबर्दस्ती निकाले गये पत्रकार जीतेन ने भी अपना अनुभव साझा करते हुये मीडिया में जारी भ्रष्टाचार पर बात करने की ज़रूरत को रेखांकित किया। भास्कर के जनसम्पर्क विभाग के हेड राज अग्रवाल की बतौर पत्रकार प्रधानमंत्री के साथ की गयी 11 यात्राओं पर भी उन्होंने ही सवाल उठाए हैं, साथ ही उस पर कानूनी कारवाई की मुहिम जीतेन ही आगे बढ़ा रहे हैं।

वरिष्ठ पत्रकार भाषा सिंह ने भी पूरी लड़ाई को सिर्फ छँटनी के विरोध पर केन्द्रित न रख उसे आगे अधिकारों की बहाली की लड़ाई में बदलने की उम्मीद जताई। उन्होंने मीडिया में आवाज़ उठाने वालों को निशाना बनाने जैसी घटनाओं के विरुद्ध भी एकजुट होकर आवाज़ उठाने की उम्मीद ज़ाहिर की। भाषा ने मीडिया में बढ़ रही राइटविंग कैपिटल के प्रति सचेत रहने की सलाह दी।

वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने भी विज्ञापन के बढ़ते प्रभाव और उपभोक्तावाद से प्रभावित मीडिया के असल सवालों से रूबरू होने के लिये पत्रकारों की एकजुटता को ज़रूरी बताया।

वरिष्ठ पत्रकार सुकुमार मुरलीधरन ने भी विज्ञापन इंडस्ट्री की ग्रोथ को आर्थिक वृद्धि की तरह एक बुलबुला बताया और इन छँटनियों के पीछे कि असल वजहों पर ध्यान देने कि बात कही। उन्होंने क़ानूनों को लागू करने और इसके लिये सरकार पर भी दबाव बढ़ाने के लिये जेएसएफ को प्रेरित किया।

वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने मीडिया के फाइनेंशियल स्वरूप पर सवाल उठाते हुये इसे बदले बिना बाकी बातों के व्यर्थ साबित होने पर ज़ोर दिया। प्रशांत ने वैकल्पिक मॉडल की तरफ ध्यान देने और कई को-ओपरेटिव मॉडलों का उदाहरण देते हुये संभावनाओं को तलाशने की बात भी कही।

वरिष्ठ पत्रकार परंजय गुहा ठाकुरता ने मुहिम से एकजुटता दिखाते हुए क्रॉस मीडिया ऑनरशिप के खिलाफ कड़े कानून बनाने की माँग पर ज़ोर दिया। उन्होने बिड़ला, अंबानी और ओसवाल के उदाहरण देते हुये साफ किया कि किस तरह ये सब अपने दूसरे व्यवसाओं को मीडिया ओनरशिप से फायदा पहुँचा रहे हैं। नीरा रडिया टेप और कोला घोटाले में इसकी बानगी देखी जा भी चुकी है।

वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजलविस ने अपने वक्तव्य में यह साफ किया कि कांट्रैक्ट पर काम करने वाले पत्रकार असल में कांट्रैक्ट पर काम करने वाले मजदूर ही हैं। लेकिन इसके बावजूद अगर कांट्रैक्ट वाले भी 100 से ज्यादा कर्मचारियों को निकाला जा रहा है तो इससे पहले सरकार से अनुमति लेना ज़रूरी है। यह आपका अधिकार है और जो इन चैनलों में हुआ यह सीधे-सीधे कानून का उल्लंघन है।

बैठक में बड़ी संख्या में छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बैठक में वरिष्ठ पत्रकार पंकज बिष्ट, अमित सेन गुप्ता, वरिष्ठ पत्रकार सत्येन्द्र रंजन, वरिष्ठ पत्रकार अजय सिंह, दिल्ली जर्नलिस्ट यूनियन की वरिष्ठ पत्रकार सुजाता माधोक, अतुल चौरसिया, यशवंत सिंह, सुधीर सुमन, बृजेश सिंह, प्रियंका दुबे, उमाकांत लखेड़ा, सुरेन्द्र ग्रोवर, मनीषा पांडे, मुकेश व्यास, अभिषेक पाराशर आदि लोग मौजूद रहे।

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