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जब धार्मिक ग्रंथों की खुराक व्यक्ति के सोचने की ताकत बन जाय

हाल ही में अमरीकी अन्तरिक्ष एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों ने 11.2 अरब वर्ष पुराने तारे को खोज निकाला, साथ ही अन्तरिक्ष में मौजूद वैज्ञानिकों ने पृथ्वी जैसे पांच और भी गृहों का भी पता लगाया. और ये पता लगा कि पृथ्वी के सामान ये गृह 13.8 अरब वर्ष में अपने पूर्ण रूप में आ सके। खुशी होती है जब हम ऐसी सूचनाओं से रूबरू होते हैं। वैज्ञानिकों से उम्मीदें और भी बढ़ जाती है। यह यकीन और पुख्ता होता है कि विज्ञान वो सब कुछ करने में सक्षम है, जो अभी हमारी कल्पना से भी परे है।

जब भारत के वैज्ञानिकों की खोज के बारे में सुनते हैं उत्सुकता का दायरा और बड़ा होता है। एक विश्वास विस्तार पाता है। मालूम पड़ा कि भारत के वैज्ञानिकों ने अपनी 5000 साल पुरानी की सभ्यताओं में प्रयोग हुए विमान (मिथक कथाओं में) और शस्त्रों की कल्पना को तर्क द्वारा सही सिद्ध किया। ढेरों प्रयत्नों से पुनः प्रेक्षण की प्रक्रिया में जाकर उसकी पुष्टि की..

यह देखकर विज्ञान की हमारी पहली धारणा और विश्वास को गहरी चोट पहुंचती है, गहरे तक बसा यकीन टूटता है। अनुभव होता है कि अगर लाखों वर्ष पूर्व की महान सभ्यताओं में विज्ञान के आधुनिक से आधुनिकतम प्रयोग आज से पहले हो चुके हैं। इस कल्पना मात्र से नये विचार बनने की उत्सुकताएं निरर्थक साबित होने लगती हैं, भविष्य में क्रांतिकारी वैज्ञानिक सोच और उम्मीदें झूठी लगने लगती हैं।

अगर वास्तव में सब कुछ हज़ारों हज़ार साल पूर्व घटित हो चुका है तो विश्व के तमाम देशों में चल रही आधुनिक विज्ञान की सारी संस्थाओं को दुनिया के हर धार्मिक ग्रन्थ से ही सबसे पहला सबक लेना चाहिए। अगर कोई खोज नई नहीं है, तो किसी भी वैज्ञानिक खोज को मौलिक न माना जाय। इस बात से वैज्ञानिक सहमत होंगे। या सहमति-असहमति का प्रश्न उठाना ही गलत है?

मौलिकता का प्रमाणपत्र जिन आधुनिक वैज्ञानिकों को दिया जाता रहा है। वैज्ञानिक खोजें करने में सफल हो रहे हैं, आगे भी होगा। तमाम वैज्ञानिक खोजें इससे पूर्व धर्मग्रन्थों में हो चुकी हैं अगर इसे साबित करते हुए, आधुनिक खोज को द्विज अनुसंधान, या खोज कहा जाय, तो क्या यह कहना ठीक नहीं है?

अगर कल्पना और मिथकीय सर्जना ही विज्ञान का पहला चरण है। तो यह स्पष्ट है कि भविष्य में होने वाली कल्पनाएँ भी पूर्व में हो चुकी होंगी। किसी न किसी मष्तिष्क में मौजूद रही होंगी और उनका प्रमाण किसी न किसी प्राचीन ग्रन्थ में भी मिलना बहुत हद तक अस्वाभाविक नहीं होना चाहिए।

ऐसे कई सवाल हैं। एक बात यह कि फिर नयी खोज (मिथककथा या आधुनिक विज्ञान) किसे माना जाय? और क्यों माना जाय?

यह भी हो सकता है अभी तमाम धर्मग्रन्थ खोजे जाने बाकी हों। जिन्हें भविष्य में अतीत के गर्भगृह से निकाला जा सके। तो क्या यह संभव नहीं कि भविष्य में लिखे जाने वाले ग्रन्थ भी पूर्व में लिखे जा चुके हैं।

मतलब इस बात की खोज विज्ञान की खोज से कहीं ज्यादा जरूरी है। कहीं ऐसा न हो कि जिस वैज्ञानिक खोज को द्विज का दर्जा न देकर मौलिक खोज कहा जाएगा। वह भी किसी अतीत के गर्भगृह में दबे पड़े किसी अज्ञात ग्रन्थ में दर्ज हो। और वह मौलिक कल्पना भी पूर्व सभ्यता में किसी अज्ञात लेखक की रचना में किसी परिवर्तित रूप या रहस्यमय अंदाज में इस तरह मिले कि तत्काल में हो रहे वैज्ञानिक अनुसंधान की कल्पना पूर्व में मिले कुछ नवीन अज्ञात ग्रन्थों में मौजूद है जिन्हें प्रक्षिप्त मानने की बात भी होती रही है।

ऐसे में अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाला इतिहास भी पूर्व की सभ्याताओं में कहीं न कहीं खुद को दोहराता हुआ ही मिलेगा। यह संकल्पना ठीक साबित होगी। इतना ही नहीं, फिर तो साहित्य और उसके भीतर की तमाम कल्पनाएँ और उसमें मौजूद यथार्थ भी पूर्व में मिल ही जायेंगे। हर पल दिलोदिमाग से नयेपन की बेचैनी में जीना, जुनून से भरे रहना, खालिस उम्मीदें पालते रहना, इतनी मानसिक मेहनत करने से कहीं बेहतर होगा कि नये विचारों को पुराने मलबे में उलट-पलटकर पुनर्परीक्षण किया जाय। शायद यही तरीका अधिक ठीक होगा। सब कुछ को लिखने और नई वैज्ञानिक खोज करने से कहीं बेहतर काम है कि पुरानी सभ्यताओं को खोजते रहना हर क्षण। आखिर हर नये समय में कुछ नया करने से क्या हासिल होगा? होगा भी तो इसे सच मानने के लिए पुराने दस्तावेजों में ऐसा कुछ न हो। इस बात की आस्था में जीना किन संभावनाओं से भरा है। सब कुछ तो पुराने का ही दोहराव मात्र है। पुरा, आदिम, के भीतर ही भविष्य की सभी संकल्पनाओं की मौजूदगी है।

ऐसा विचार कौंधते ही लगता है हम किसी ऐसे युग में जी ही नहीं रहे। जहां कुछ भी नया हो। नये की संभावना से पहले, नये होने और उसे मौलिक होने की प्रामाणिकता के लिए हो सकता है पांडुलिपियों को सालों साल के लिए प्रमाणन कार्यालय भेज दिया जाय। जहां समय की कोई बाध्यता आड़े न आये। तब तक उसे प्रोवीजनल की मान्यता दी जाय। कहीं कोई पाबंदी नहीं और न ही किसी अनहोनी की कोई गुंजाइश। इस यकीन के साथ कि अगर कहीं किसी की कृति, खोज, पुरानी सभ्याताओं, पुरातत्वों में न पाई जा सकी तो वह मौलिक ही जानिये। इतनी मशक्कत के बाद मौलिकता का प्रमाण पाने का जो मजा है वह कितना आनंददायी होगा। यह सोचकर खुशी के लिए एक पल भी तलाश लेना कतई बुरा तो नहीं।

पर्यवेक्षण में जांचते हुए जरा भी चूक होने का मतलब है- पूर्व में हो चुके प्रयोग के साथ अन्याय। और मौलिक सिद्ध करने वाले नामित व्यक्ति के साथ पक्षपात। कहीं ऐसा न हो कि कहने के लिए इतना ही बचे, इतनी ही गुंजाइश हो कि इसकी पुष्टि के लिए प्राचीन सभ्यताओं में मिले फलाँ-फलाँ मौलिकग्रन्थ मौजूद हैं। इसलिए वर्तमान में प्रस्तुत की गई खोज या सृजन को मौलिक न कहा जाय। यहाँ तक कि वर्तमान में हर विधा के भीतर मौजूद तत्वों या सम्पूर्ण साहित्य, इतिहास, दर्शन के ग्रन्थ, मौलिक और ऐतिहासिक ग्रन्थों को प्रक्षेपित या मिथक तब तक न माना जाय जब तक उसके भीतर की चीजों को सही तरीके से वैज्ञानिक अनुसंधान से भविष्य में कोई खोज न हुई हो। अंतिम पड़ताल के पश्चात ही यह कहा जाय कि इस खोज की मौलिकता में अब कोई विलम्ब कोई बाधा नहीं है। इस खोज के पहले, पूर्व में, कोई प्रमाण मौजूद नहीं है। यहाँ किसी तर्क या विचार की जरा भी गुंजाइश नहीं है।

अब धार्मिक ग्रन्थों में यदि आधुनिक शल्य चिकित्सा के आधुनिकतम उदाहरण हैं, आपरेशन करने की विधि और अंग प्रत्यारोपण मिलता है, हवाई जहाज की विधि धर्मशास्त्रों में पुष्पक विमान के रूप में विद्यमान थी, यह बताया जाय, तब उपर्युक्त बातों पर पुनर्विचार बेहद जरूरी होगा।

विज्ञान भवन में जिस तरह धर्म ग्रन्थों को सत्य मानकर, सनातन धर्म ग्रन्थ को आधुनिक युग में हुई वैज्ञानिक खोज का मुख्य दस्तावेज, वैज्ञानिक सत्य का पर्याय मान लिया गया और इसके आधार पर विज्ञान और आध्यात्म का मिश्रण तैयार किया किया गया। ऐसी तमाम बातें जो किसी ग्रन्थ रचयिता की कपोल कल्पना पर आधारित थीं। उन्हें प्रामाणिकता का दर्जा दे दिया गया। किसी सृजनात्मक मिथक को आदिम युग का वैज्ञानिक सत्य साबित किया गया। ऐसे में यह गंभीर रूप से सोचने की जरूरत है कि दूषित तरीके से मिथक और यथार्थ दो धरातलों को मिलाकर जो वैचारिक जमीन तैयार की जा रही है वह वर्तमान और भविष्य के लिए कितनी भ्रामक जहरीली और घातक होगी।

ऐसा मिथकीय साहित्य जिसमें काल्पनिकता का जितना भ्रामक, अतिश्योक्तिपूर्ण वैचारिक अतिरेक हो। उसे विज्ञान की मानक प्रयोगशाला में रखना जांचना कहाँ तक सार्थक होगा? यह बात दिलोदिमाग को मथती है। वहीं किसी एक पक्ष और अकाट्य तर्क के समकक्ष एक अडिग विश्वास तटस्थ खड़ा है। यदि विज्ञान भवन में मौजूद वैज्ञानिक इस बात को अपनी चिंतन शोध प्रक्रिया का हिस्सा बनाते हैं कि दुनिया की तमाम सभ्यताओं में हिन्दुस्तान का श्रेष्ठ धार्मिक साहित्य पहला वैज्ञानिक साहित्य है। इसे सुनकर यह मान लेना होगा कि साहित्य में रचना के भीतर आये नये संयंत्रों को बनाने की विधि भी साहित्यकार से विचार के रूप में ही ग्रहण करना उचित होगा? पूरी दुनिया के सबसे प्राचीन धर्मशास्त्र ही आधुनिक विज्ञान की खोज का भी साहित्य है।

यह सुनकर कि वैदिक साहित्य को विज्ञान का प्राथमिक अनुसंधानात्मक ग्रन्थ मानना होगा, इसे मानने में भला नुकसान ही क्या है? बिना एक लम्हा गवांये विज्ञान में समाहित कर लेना चाहिए। प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्। आखिर प्रत्यक्ष को प्रमाणित करने की आवश्यकता क्या है। वह तो इतिसिद्ध है। इस तरह वैज्ञानिकों और (ऐसे साहित्यकार जो कल्पना की उड़ानें भरने की कला में माहिर हों) साहित्यकारों के बीच जो नई बहस सामने आई है। उसे एकरूपता देते हुए एकसूत्र में पिरोना सही है? या कि एक नए सृजनात्मक चिन्तन का अनुसंधान होने के नाते नये वैज्ञानिक विचार पर विमर्श करना ठीक है।

हम जानते हैं यह स्वतः सिद्ध है, कि विचार प्रमुख है और विचारों में मौजूद तत्वों की जांच के लिए वैज्ञानिकों को नियुक्त करना सही दिशा में कदम रखना है। क्या यह सोचकर प्रधानमंत्री मोदी ने विज्ञान भवन में नई नियुक्तियों का आदेश भी किया है। ताकि ऐसे साहित्य का निर्माण हो सके जो इन बातों पर जोर देता हो कि सच्चा साहित्य वही है, जिसका कथातत्व अतिभ्रामक कल्पना और वैचारिक अतिरेकों को पैदा करने में सफल हो।

इसके बाद तो कहने को यही रह जाता है कि विज्ञान भवन की दीर्धा में मौजूद वैज्ञानिकों को तत्कालीन प्रधामंत्री मोदी से यह अपील करनी चाहिए कि एक ऎसा अनुसंधान संस्थान खोला जाय। जहां चयनित श्रेष्ठ साहित्यकारों को जिम्मेदारी दी जाय कि वह अपनी कल्पना से नये सयंत्रों की कल्पना करें। ताकि वैज्ञानिक उन्हें बनाने के तरीके खोज सके। इससे विज्ञान और साहित्य के बीच जो दूरी अब तक बनी हुई है वह भी खत्म हो सकेगी। और ऐसे साहित्य का निर्माण हो सकेगा जो आधुनिक विज्ञान में अपनी महत्पूर्ण वैचारिक भूमिका अदा कर सकेगा। और साहित्य को विज्ञान का प्राथमिक चरण मानकर वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा मिल सकेगा। भौतिकशास्त्र और रसायनशास्त्र की तरह पौराणिक कथाएं और धर्मशास्त्र भी विज्ञान का ही वैचारिक स्वरूप हैं आदिम विज्ञान का ही अंग हैं। इस विचार को सहज ही मान्यता मिल सकेगी। विज्ञान और साहित्य के बीच इस बात पर बहसें आयोजित की जाएँ कि किस आधुनिक या पौराणिक कृति में सर्वाधिक वैज्ञानिक अनुसंधान को ध्यान में रखकर कोई महान रचना की गई है। नई शोध प्राविधि तैयार की जाय। नये समाज के नवनिर्माण में, विकास में योगदान देने वाले ऐसे सृजनात्मक लेखकों को प्रोत्साहित किया जाय। जिनमें अनुसंधान की जिजीविषा हो। ऐसे सृजनात्मक लेखक जिनके तर्क और विचारों से संपृक्त कृति में काल्पनिक अनुसंधान के गुण निहित हों।

जाहिर है इसके लिए नये विश्वविद्यालय की नीवं भी रखनी होगी। विश्वविद्यालयों में नये विभाग खोले जाएँ जहां यह अध्ययन का विषय हो कि प्राचीन साहित्यिक इतिहास के भीतर मौजूद वैज्ञानिक उपकरणों जो ढांचा प्रस्तुत किया गया है उसको बनाने का माध्यम और मटीरियल क्या रहा होगा? अनुसंधान संस्थान में साहित्यकारों और वैज्ञानिकों (आदिम सभ्यता में हो सकता है कि वैज्ञानिकों के लिए किसी अन्य शब्द का प्रयोग किया जाता रहा हो।) के साथ संवाद होना चाहिए। बातचीत के जरिये आधुनिकता के उत्तर-पक्ष की खोज में “साहित्य और विज्ञान का सृजनात्मक वैज्ञानिक अनुसंधान” या इसी तरह का कोई बेहतरीन नामकरण किया जाय।

यकीनन तब कहीं बेहतर दुनिया का मानक माडल बनाया जा सकेगा। जिसमें दुनिया की तमाम प्राचीन सभ्यातों में लिखे गये धर्मग्रंथों और उसमें मौजूद तमाम सयंत्रों, संसाधनों, हथियारों, जिनका प्रयोग समाज और सैन्य युद्ध का वर्णन करते हुए किया गया हो। विश्व में मौजूद तमाम धर्मग्रन्थों का साहित्यिक इतिहास, खंगालते हुए उसमें निहित वैज्ञानिक खोजों का अनुसंधान-संग्रहालय बनाने की जरूरत होगी। ताकि आगे आने वाली पीढ़ी को यह मालूम हो सके कि दुनिया की पुरानी सभ्यताएं वैज्ञानिक खोज के मामले में कितनी आगे थीं। कितने सयंत्रों का अनुसंधान आधुनिक युग के पूर्व हो चुका था। और उन्हें क्या आज के विकसित विज्ञान की मौजूदा तकनीक के जरिये बनाया जा सकता है? अगर नहीं तो ऐसी तकनीक विकसित करने के लिए नये रचनात्मक वैज्ञानिकों को तलाशना होगा। जो प्राचीन सभ्यताओं की वैज्ञानिक खोज को पुख्ता तौर पर प्रमाणित करने में सक्षम हों। कोर्स के रूप में धर्मशास्त्रों और आधुनिक विज्ञान के सयंत्रों के मिलेजुले स्वरूप, क्रियाविधि आदि को विज्ञान की रचनात्मक कसौटी पर कसकर पाठ्यक्रम तैयार किया जाय।

इस बात पर भी विचार हो कि किस भौगोलिक सीमा में सबसे अधिक ऊर्जावान वैज्ञानिक साहित्य रचा गया। इसलिए आधुनिक भूगोल का भौगोलिक दर्शन (वायुमंडल में भौगोलिक परिवर्तन, ऋतु, परिस्थितियाँ, नक्षत्रों की दशा और दिशा) को शामिल किया जाय। अनुसंधान की दृष्टि से सबसे जरूरी रचना किस विशिष्ट खगोलीय चरण में रची गई। यह देखा जाना भी बेहद दिलचस्प होगा। क्योंकि विज्ञान विषय के अंतर्गत के अनुसंधान तो आधुनिक युग की देन है इसके पहले विज्ञान विषय की पूर्वपीठिका के भी साहित्य में वैज्ञानिक अनुसंधान के ब्योरे मिलते हैं। कितना दिलचस्प और मजेदार होगा जब यह सारी चीजें नये शोध का विषय बनें।

हर विश्वविद्यालय में इस तरह का विभाग बनाया जाना अब शायद अतिआवश्यक है, जहाँ तमाम आविष्कार जैसे धातु एवं खनिज, रसायन तथा धातु शास्त्र, तकनीकी मापदंडों का निर्माण आदि हो सके।। ताकि देशहित में साहित्य और विज्ञान के मिलेजुले तरीकों से आधुनिक युग का वैज्ञानिक अनुसंधान का महत्त्व पता लगे। लोगों को वैज्ञानिक साहित्य और साहित्यिक अनुसंधान विज्ञान के जरिये नई दुनिया के बारे में जानने का अवसर मिल सके। सभ्यता के विकास में यह नया चरण नई क्रान्ति लेकर आये, साहित्य जो धर्मग्रन्थों और पौराणिक कथाओं के रूप में अनेकों बोलियों में बिखरा पड़ा है। उसे समेटा जा सके और उसके भीतर मौजूद वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए जरूरी विचारों को दुनिया के सामने लाया जा सके। अनुसंधानात्मक साहित्य और वैज्ञानिक सोच में बढ़ोतरी हो सके। इस मेलजोल से नये साहित्यिक वैज्ञानिक सम्बन्ध बनेंगे। साहित्यकारों और वैज्ञानिकों को नए सामाजिक माहोल में नवीन विचारों का आदान प्रदान करने का स्वस्थ मौका होगा। नई दिशा मिलेगी।

जब धार्मिक ग्रंथों की खुराक व्यक्ति के सोचने की ताकत बन जाय, तब सोचना होगा कैसी आधुनिक और वैज्ञानिक समाज व्यवस्था और सभ्यता रची जायेगी। किसी भी युग का वर्तमान और भविष्य बहुत हद तक इस बात पर निर्भर है कि उसके आगे बढ़ने की खुराक का जरिया क्या रहा है? यह भी जानना होगा कि आदिम युग से आगे बढ़ने की खुराक वैज्ञानिक सोच थी या कुछ और। अब कहने को यही बचता है हरि अनंत, हरि कथा अनंता।

डॉ. अनिल पुष्कर

About the author

अनिल पुष्कर कवीन्द्र, प्रधान संपादक अरगला (इक्कीसवीं सदी की जनसंवेदना एवं हिन्दी साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका)

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