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जब हद से बढ़ जाए डर तो बन जाता है फोबिया

फोबिया-मानसिक विकार
डर तब तक फोबिया नहीं है जब तक वह बच्चों की सामाजिक गतिविधियों, स्कूल में उसके प्रदर्शन या नींद को नहीं प्रभावित कर रहा है।
डर, हंसने या रोने की ही तरह एक स्वाभाविक क्रिया है। डर सबको लगता है लेकिन यही डर अगर इतना गहरा जाए कि सामान्य जीवन क्रिया को प्रभावित करने लगे तो उसे फोबिया का नाम दिया जाता है। लेकिन यह कोई ऐसी समस्या नहीं है, जिसका समाधान ही न किया जा सके। फोबिया उस बात के प्रति जरूरत से ज्यादा भय है जो कि वास्तव में बहुत कम या बिल्कुल भी खतरा प्रस्तुत नहीं करता हो। सच तो यह है कि फोबिया किसी को और किसी भी बात से हो सकता है, लेकिन आम तौर पर यह बंद स्थानों, ऊंचाईयों, हाईवे ड्राइविंग, उड़ते हुए पक्षियों-कीड़े मकोड़ों, सांप, पानी या इंजेक्शन की सूई को लेकर हुआ करता है। अधिकतर फोबिया बचपन में होता है, लेकिन यह वयस्कों को भी हो सकता है।
नई दिल्ली के तुलसी मेडिकल सेंटर के मनोचिकित्सक डा. गौरव गुप्ता के अनुसार फोबिया के साथ समस्या यह है कि आम तौर पर इससे ग्रस्त व्यक्ति यह समझता है कि उसका डर उचित नहीं है, इसके बावजूद वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता। जैसे ही मन में वह वस्तु या परिस्थिति आती है, फोबिया गहराने लगता है। यह डर इतना गहरा होता है कि इससे ग्रस्त व्यक्ति इससे बचने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है।
कई लोगों को एलीवेटर पर चढ़ने से डर लगता है, तो उससे बचने के लिए वह किसी नौकरी का आकर्षक प्रस्ताव भी अस्वीकार करने से नहीं हिचकते। ऊंचाई से डरने वाले बहुत से फोबिया ग्रस्त लोग किसी ऊंचे पुल को पार करने की बजाय अतिरिक्त 20 किलोमीटर की यात्रा कर अपनी मंजिल पर पहुंचना बेहतर समझते हैं।
पहले समझें फोबिया को फिर करें इलाज
फोबिया का इलाज करने के लिए सबसे पहले उसे समझना जरूरी है। यह समझना जरूरी है कि फोबिया होने में कोई असामान्य जैसा कुछ नहीं है, यह पागलपन नहीं है। हम अपने डर और उत्तेजना को नियंत्रित कर सकते हैं, भले ही वे कितने भी नियंत्रण से बाहर क्यों नहीं प्रतीत होते हों। भय कोई असामान्य बात नहीं है और इससे हमारा शरीर आने वाले खतरे का मुकाबला करने को तैयार हो जाता है। लेकिन फोबिया के साथ समस्या यह होती है कि दिमाग इसे बहुत ही बढ़ा-चढ़ाकर देखता है और अक्सर ही उस खतरे से डरता है, जो कि वास्तव में होता ही नहीं है।
उदाहरण के लिए डॉबरमैन जैसे किसी कुत्ते से डरना स्वाभाविक है, लेकिन अगर कोई एक छोटे पप्पी से डरने लगे तो यह अस्वाभाविक ही होगा।
बहुत से बच्चों को अंधेरे से डर लगता है और उन्हें सोने के लिए हल्के प्रकाश की जरूरत होती है। यह कोई फोबिया नहीं है, क्योंकि बड़े होने के साथ-साथ यह अपने आप ही कम होता जाता है। डर तब तक फोबिया नहीं है जब तक वह बच्चों की सामाजिक गतिविधियों, स्कूल में उसके प्रदर्शन या नींद को नहीं प्रभावित कर रहा है।
सामान्य तौर पर चार तरह के फोबिया होते हैं-
1. जानवरों को लेकर फोबिया : इसके अंतर्गत सांप, छिपकली, मकड़ी और कुत्ते से डर आता है।
2. स्वाभाविक पर्यावरणीय फोबिया : इसके अंतर्गत ऊंचाई, तूफान, पानी और अंधेरे का डर शामिल है।
3. परिस्थितिकीय फोबिया : इसके अंतर्गत  बंद स्थानों, उडने, ड्राइविंग, सुरंग या पुल से डर लगाता है।
4. रक्त-इंजेक्शन-चोट फोबिया – इसके अंतर्गत खून बहने का डर, चोट लगने का डर और इंजेक्शन की सूई या अन्य मेडिकल उपकरणों से डर जैसे फोबिया शामिल हैं।
कुछ फोबिया ऐसे हैं जो कि इन तीनों ही श्रेणियों में नहीं आते। इनके अंतर्गत दम घुट जाने का डर, किसी रोग से ग्रस्त हो जाने का डर जैसी बातें शामिल हैं।
सामाजिक फोबिया को सामाजिक चिंता विकार कहा जाता है जिसके अंतर्गत उन सामाजिक स्थितियों से डर लगता है जिनमें आपको परखा जाना हो या आपके बारे में कोई निर्णय लिया जाना हो।
सामाजिक फोबिया से ग्रस्त व्यक्ति अपने को लेकर जरूरत से ज्यादा ही सचेत होता है और उसे इस बात का डर लगा रहता है कि कहीं दूसरों के सामने उसकी बेइज्जती न हो जाए। आप कैसे दिखेंगे या दूसरे आपके बारे में क्या सोचेंगे इसे लेकर चिंता आपको उन सामाजिक आयोजनों से दूर रखती है।
सार्वजनिक रूप से बोलने से डर एक सामान्य फोबिया है जो कि सामाजिक फोबिया का ही एक रूप है।
अन्य सामाजिक फोबिया के अंतर्गत सार्वजनिक रूप से खाने-पीने से परहेज करना, अनजाने लोगों से बात करने या पार्टी में हिलने-मिलने से हिचकना या कक्षा में अपना नाम पुकारे जाने पर डर जाना जैसे भय शामिल हैं।
बहुत से लोग जो पैनिक अटैक के शिकार हो चुके होते हैं उन्हें हमेशा ही यह डर सताता रहता है कि फिर कहीं वैसा ही न हो जाए। फोबिया के लक्षण या संकेत आशंका और चिंता की हल्की-फुल्की भावना से लेकर पैनिक अटैक तक के रूप में सामने आ सकते हैं। आप जिन बातों से डरते हैं उनके जितना ही करीब जाते हैं आपका डर बढ़ता जाता है। इसके अंतर्गत सांस लेने में कठिनाई, हदय की धड़कन का एकाएक बढ़ जाना, सीने में दबाव या दर्द,थरथराहट, उनींदापन, पसीना बहने की समस्या पैदा हो सकती है।
फोबिया के भावनात्मक संकेतों या लक्षणों के अंतर्गत हद से ज्यादा चिंता, बचकर निकल भागने की भावना, अपने से अलग-थलग महसूस करने की भावना, नियंत्रण से बाहर होने या पागल हो जाने का डर, मर जाने की आशंका जैसी भावनाएं आती हैं।
अक्सर व्यक्ति यह जानता है कि वह जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है, लेकिन वह अपने डर को नियंत्रित करने में असहाय पाता है।
हालांकि, फोबिया एक समान ही असरकारी होते हैं लेकिन कई बार इनकी वजह से हमारी जीवन क्रिया अलग-अलग से प्रभावित होती है। उदाहरण के लिए अगर किसी को सांप से फोबिया है। लेकिन अगर वह शहर में रहता है तो इस फोबिया की वजह से उसका दैनिक जीवन प्रभावित नहीं होता। लेकिन अगर किसी को भीड़ से फोबिया है तो उसका शहर में रहना दूभर हो जाएगा।
जाहिर तौर पर अगर किसी फोबिया की वजह से किसी का दैनिक जीवन प्रभावित नहीं हो रहा हो तो फिर चिंता की कोई बात नहीं होती।
क्या करें फोबिया के इलाज के लिए
फोबिया के इलाज के लिए आत्म-सहायता रणनीति और थेरैपी दोनों को ही एक साथ आजमाया जाता है। अपने फोबिया को हम खुद सबसे अच्छी तरह से नियंत्रित कर सकते हैं लेकिन अगर हालात हाथों में न रह जाएं या वह इतना गभीर हो कि पैनिक अटैक के  रूप में सामने आए या चिंता और बेचैनी नियंत्रण से बाहर हो जाए, तो अतिरिक्त समर्थन या थेरैपी की जरूरत पड़ती है।
सबसे बेहतर इलाज यह है कि हमें जिन चीजों से फोबिया हो उनका अधिक से अधिक सामना किया जाए। ऐसी बहुत सी तनावमुक्त होने की तकनीकें हैं जो फोबिया को दूर भगा सकती हैं।
अपने मन में आ रही नकारात्मक भावनाओं का सामना कीजिए। अगर आपको यह डर सताता हो कि अगर आप लिफ्ट पर चढ़ेंगे तो वह टूट जाएगी या फिर आप उसमें फंस जाएंगे तो आप अपने इस फोबिया का विश्लेषण कीजिए। सोचिए कि आपने कभी भी किसी लिफ्ट को टूटते हुए नहीं देखा है तो फिर वह लिफ्ट कैसे टूट जाएगी, जिस पर आप चढ़ेंगे। आप सोचिए कि आपने कभी भी यह नहीं सुना है लिफ्ट में फंसकर किसी की मौत हो गई हो, तो यह हादसा आपके साथ भला कैसे हो सकता है। लेकिन कई बार हालात इतने बुरे हो चुके होते हैं कि मरीज कुछ सोचने को तैयार ही नहीं होता, ऐसे में मनोचिकित्सक के पास जाना ही सबसे बेहतर विकल्प होता है।
उमेश कुमार सिंह

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