Home » जहाँ साझा हिन्दुस्तानी संस्कृति धड़कती है- सांस्कृतिक लठैतों के हमलों के बावज़ूद

जहाँ साझा हिन्दुस्तानी संस्कृति धड़कती है- सांस्कृतिक लठैतों के हमलों के बावज़ूद

रायपुर इप्टा का 17वाँ ‘मुक्तिबोधी’ नाट्य समारोह
 संजय पराते
रायपुर। मुक्तिबोध हिन्दी और छत्तीसगढ़ के एक ऐसे कवि हैं, जो अपनी विशिष्ट काव्य-भाषा व वामपंथी काव्य-चेतना के लिये जाने जाते हैं। उनकी याद में रायपुर इप्टा द्वारा आयोजित नाट्य समारोह ने संस्कृति के क्षेत्र में एक ऐसे रंग-समारोह का रूप ले लिया है, जो अपने विशिष्ट रंग-हस्तक्षेप के लिये अब जाना जाता हैं। मुक्तिबोध और इप्टा का यह मिलन भाषा को रंग से जोड़ता है और एक नयी रंग-भाषा का सृजन करता है। इस बार 8-11 फरवरी, 2014 तक आयोजित इस 17वें समारोह में पूर्व-रंग भी शामिल था, जो मुक्तिबोध की कविताओं को संगीत में ढालकर भाषा को रंग से जोड़ रहा था और एक नयी रंग-चेतना पैदा कर रहा था। इस प्रकार रंग और भाषा मिलकर संस्कृति के क्षेत्र में एक सार्थक हस्तक्षेप कर रही थी।
रायपुर इप्टा के 17वें मुक्तिबोध राष्ट्रीय नाट्य समारोह की शुरूआत यदि विजय तेंदुलकर के मराठी नाटक ‘अशी पाखरे येती’ (हिन्दी अनुवाद ‘पंछी ऐसे आते हैं’- सरोजिनी वर्मा) से हुई है, तो यह इप्टा के व्यापक वैचारिक सरोकार को ही दिखाता है। तेंदुलकर ने यह नाटक काफी समय पहले 70 के दशक में लिखा था, लेकिन तब से सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों में और ज्यादा गिरावट आई है। स्त्री के प्रति सामन्ती सोच में आज भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। आज भी स्त्री प्रेम के लिये स्वतन्त्र नहीं है, उस पर ‘खाप’ पंचायतों और ‘काली टोपी, खाकी पैंट’ का जबरदस्त पहरा है। वेंलेन्टाइन-डे पर मोरल पुलिसिंग और इज्ज़त के नाम पर हत्याओं के वीभत्स रूप सामने आ रहे हैं और देश के गली-कूचों में ‘निर्भया’ प्रकरण हो रहे हैं। इसीलिये यह पुराना नाटक आज भी जिन्दा व सामयिक है।
        विजय तेंदुलकर का रंग-संसार बहुत व्यापक है और रंग-छवियों को गढ़ने में उन्हें महारत हासिल है। इन छवियों में हमारी अपनी ज़िन्दगी के सभी रंग घुले होते हैं। रंगों का ये समावेशन एक ऐसी दुनिया का सृजन करता है, जिससे रंग-दर्शक शीघ्र ही अपना तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। यह आत्मीयता धीरे से दर्शकों को बौद्धिक विमर्श की ओर धकेल देती है- इस विमर्श में समाज, राजनीति, संस्कृति सभी कुछ शामिल होते हैं और रंग-दर्शकों के अवचेतन पर प्रहार करते हैं। इस प्रहार से एक ऐसी सामाजिक-राजनैतिक चेतना का निर्माण होता है, जो समाज और जीवन को आगे बढ़ाता है और सामाजिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया को परिष्कृत करता है। तेंदुलकर सभ्यता और संस्कृति की खाल ओढ़े समाज की बेरहमी से चीर-फाड़ करते हैं और रंगमंच को प्रगतिशील सामाजिक परिवर्तन के लिये वैचारिक द्वंद्व का मंच बना देते हैं। वे समाज के साथ राजनीति के सम्बंधों को अनावृत्त करते हैं और इस मायने में वे महज़ नाटक रचते-गढ़ते नहीं हैं, बल्कि नाटकीय ढँग से समाज- संस्कृति के क्षेत्र में हस्तक्षेप करते हैं। इस प्रक्रिया को बाधित करने वाली दक्षिणपंथी-पुरातनपंथी सोच को यह हस्तक्षेप निश्चित ही रास नहीं आयेगा।
विजय तेंदुलकर का यह नाटक लगभग तीन घंटे का है और इसे सामयिक-सम्पादित कर डेढ़ घंटे का बनाने में निर्देशक मिनहाज़ असद की अथक मेहनत झलकती है। इसीलिये इस कसे हुये नाटक में झोल खोजना आसान नहीं है। रंगमंच पर सामाजिक अन्तर्सम्बंधों से उपजा वैचारिक द्वंद्व शुरू से अन्त तक बना रहा। इस रंग-तनाव ने रंग-दर्शकों की अन्तर्चेतना को सोने नहीं दिया और दर्शकों की पूरा सहानुभूति नायिका सरू के साथ खड़ी हो गयी। लेकिन सरू में जो अरूण आत्मविश्वास जगाता है, उसकी आन्तरिक सुन्दरता से उसे परीचित कराता है, स्त्री प्रेम के अधिकार की चेतना जगाता है और स्त्री-स्वतन्त्रता का उद्घोष करता है, वही अरूण पुरूषवादी मानसिकता से मुक्त नहीं है और सरू के जीवन से पलायन कर जाता है। सरू के जीवन में प्रेम के लिये फिर वही विश्वास राव बच जाता है, जिसे उसने ठुकरा दिया था और फिर से प्रेम माँ-बाप का एक थोपा हुआ बंधन बन जाता है।
        आज का सामाजिक यथार्थ भी लगभग यही है। जवान बेटी की शादी न हो पाने की माँ-बाप की चिन्ता और किसी भी तरह उसे घर से विदा करने का दबाव, सरू का विश्वास राव को नापसंद करना और अरूण के प्रति चाहत का इज़हार, फिर बाप-बेटा की प्रताड़ना और इस सबके बीच माँ की विवशता, अन्त में माँ-बाप का अरूण के लिये तैयार होना, लेकिन उसका पलायन- यह सब मिलकर एक ऐसी रंग-सृष्टि का निर्माण करते हैं, जिसके साथ दर्शक स्वयं को मंचस्थ पाता
है। इस सबके बीच बण्डा की यह एकाकी चिंता कि सरू की शादी के बिना उसकी शादी कैसे हो पायेगी और इस चिन्ता को वह अपनी तथाकथित हिन्दू संस्कृति के गुणगान के जरिये औचित्य प्रदान करता है। मिनहाज़ असद ने पूरे नाटक के एक-एक फ्रेम को बड़ी खूबसूरती से गढ़ा-कसा है और निर्देशकीय कौशल का परिचय दिया है। पात्रों के अभिनय और मिनहाज़ के निर्देशन ने एक ऐसे रंगानुशासन का प्रभाव पैदा किया है, जो विजय तेंदुलकर के इस नाटक का पुनर्पाठ करता है। तेंदुलकर और मिनहाज़ की फ्रिक्वेंसी यहाँ पूरी तरह मैच करती है।
        इस छह पात्रीय नाटक में हर पात्र महत्वपूर्ण था और किसी की भी अनुपस्थिति से नाटक पूरा नहीं किया जा सकता था। इस नाटक के चार पात्र सुनील तिवारी (अरूण), काशी नायक (अन्ना), संजय महानंद (बण्डा) तथा अंशु दास मानिकपुरी (सरू) तो सीधे छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े हैं और सिनेमाई पोस्टरों में छाये रहते हैं। इन पोस्टरों से इप्टा-जैसे सांस्कृतिक सरोकारों के लिये उनका रंगमंच पर उतरना एक सुखद अनुभूति है और निश्चय ही सिनेमा के जरिये जो छाप वे नहीं छोड़ पाते, इस रंगमंच पर अपने अभिनय के जरिये उन्होंने छोड़ा है। सांस्कृतिक लठैतधारी (बण्डा) के रूप में संजय महानंद ने अपने बेहतरीन अभिनय की छाप छोड़ी है। नवीन त्रिवेदी जनसंचार के छात्र रहे हैं और रंगकर्म को यदि वे संवाद-संचार का माध्यम बना रहे हैं, तो उनका स्वागत ही किया जाना चाहिए। विश्वास राव के रूप में अपने छोटे से रोल में उन्होंने अच्छा अभिनय किया है। विनीता पराते अपेक्षाकृत एक नयी अभिनेत्री हैं और यह उनका चौथा नाटक ही है, लेकिन अपने अभिनय को उन्होंने और निखारा है। माँ के चरित्र को उन्होंने सहज तरीके से जिया है। कुल मिलाकर, अभिनय और निर्देशन ने इस नाटक को यादगार बना दिया।
       असीम दत्ता और हरमीत सिंह जुनेजा ने नाटक के संगीत को तैयार किया था। सादगी भरे मंच को अरूण काठोटे ने तैयार किया था और युवा पात्रों को प्रौढ़ रुप देने का बेहतरीन काम सुभाष धनगर का था। प्रकाश व्यवस्था का काम बल्लू सिंह संधू ने बेहतरीन ढँग से संभाला।
        समारोह के तीसरे दिन ‘विवेचना’, जबलपुर ने भी तेंदुलकर के नाटक ‘खामोश! अदालत जारी है’ का मंचन किया। इस नाटक का मंचन कई टीमों द्वारा रायपुर में हो चुका है, लेकिन निर्देशक विवके पांडे इसमें अपना रंग भरने में सफल रहे और कई बार देखे-सराहे जा चुके इस नाटक को प्रस्तुत कर एक बार फिर से उन्होंने सराहना बटोरी। विजय तेंदुलकर कोई क्लासिक नहीं रचते, लेकिन इस नाटक में हिंसा-प्रतिहिंसा का एक ऐसा खेल जरूर खेलते हैं कि सभ्यता की खाल ओढ़े वकील सुखात्मे (आशुतोष द्विवेदी), नाट्य मंडली के मालिक काशीकर (नवीन चैबे), उसकी पत्नी (अर्पणा शर्मा), सेवक बालू, सावंत (अमित निमजे), कार्णिक (सूरज राय), रोकड़े (मनीष तिवारी) और पोंछे (रविन्द्र मुर्हार) आदि सभी की परतें धीरे-धीरे खुल जाती है और उनका ओछापन तथा लघुता सबके सामने आ जाती है। पूरी थीम नाटक के अन्दर नाटक की है। इस काल्पनिक नाटक में जिस मिस बेणारे (अलंकृति श्रीवास्तव) पर भ्रूण हत्या का आरोप लगाया जाता है, उसके खिलाफ फैसला दिया जाता है कि समाज व सभ्यता को कलंकित होने से बचाने के लिये वह अपने गर्भ में पल रहे भ्रूण को गिरा दे। इस प्रकार तेंदुलकर मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति को उजागर करते हैं।
       निर्देशन, संगीत, प्रकाश, अभिनय– सब मिलाकर नाटक को बेहतरीन तरीके से आगे बढ़ाते हैं और पूरा नाटक रंग-दर्शकों की चेतना को झकझोरने में कामयाब होता है। मिस बेणारे की भूमिका में अलंकृति श्रीवास्तव के अभिनय को अलग से रेखांकित अवश्य करना चाहिए कि उन्होंने चरित्र के अन्दर घुसकर अभिनय किया है और उनका अभिनय इतना बेहतरीन था कि नाटक समाप्त होने के बाद भी वे चारित्रिक अवस्था से बाहर नहीं आ पायी थीं। इतने संवेदनशील और विवादित विषय पर अभिनय के बल पर वे रंग-दर्शकों की सहानुभूति और समर्थन मिस बेणारे के लिये ले पायी। एक दूसरे दृष्टिकोण से यह नाटक स्त्री देह की स्वतन्त्रता, उसकी निजता और गरिमा तथा वर्तमान में साहित्य में चल रहे स्त्री विमर्श से भी जुड़ता है। अपने समय में तेंदुलकर ने भारतीय समाज में स्त्री की जिस स्थिति को रेखांकित किया था, ‘विवेचना’, जबलपुर ने उसे पुनः रेखांकित करने का सार्थक प्रयास किया।
        इस समारोह का दूसरा दिन प्रोवीर गुहा के नाम था, जो अपना ‘अल्टरनेटिव लीविंग थियेटर लेकर आये थे। इस नाट्य दल ने उनके निर्देशन में ‘विषदकाल’ पेश किया। यह नाटक गुरूदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचना ‘विसर्जन’ पर आधारित है। इस नाटक को टैगोर ने अपने उपन्यास ‘राजश्री’ के आधार पर लिखा था।
        मूल कहानी बहुत ही सरल व मर्मस्पर्शी है। गोमती के किनारे एक छोटा सा गाँव है त्रिपुरा। रघुपति इस गाँव का पण्डित है, जो लोगों को सुख-शांति के लिये पशु बलि व मानव बलि देने पर मजबूर करता है, अन्यथा गाँव में अशांति और दुखों का पहाड़ टूटने का भय दिखाता है। इस बलि से गोमती लाल नदी में बदल जाती है। इस बलि प्रथा पर राजा रोक लगा देता है, इससे रघुपति बौखला जाता है और राजा की बलि लेने के लिये षड़यन्त्र करता है। राजा का भाई अन्त में अपना राजरक्त देता है इस शर्त के साथ कि आगे से कोई बलि नहीं ली जायेगी। टैगोर की यह कथा जितनी सरल है, इसका मंचन उतना ही कठिन। बंगाल में शंभु मित्र जैसे दिग्गज की प्रस्तुति भी फ्लॉप हो गयी थी। लेकिन इस नाटक का आकर्षण इतना जबरदस्त है कि हर बांग्ला टीम इसे अवश्य ही खेलना चाहती है। प्रोवीर गुहा भी इस मोह को छोड़ नहीं पाये और ‘विषदकाल’ के रूप में इस नाटक को उन्होंने एक नयी रंग-सज्जा के साथ प्रस्तुत किया है। इप्टा के मंच पर यह उनकी 36वीं प्रस्तुति थी और निश्चित ही ‘विसर्जन’ को ‘विषदकाल’ के रूप में प्रस्तुत करने में वे बेहद सफल रहे। अपनी प्रस्तुति में उन्होंने प्रकाश, संगीत, नृत्य और देह भंगिमा का भरपूर उपयोग तो किया ही है, हिंसा के खिलाफ संदेश देते हुये उन्होंने इसे सामयिक बनाने की भी कोशिश की है। बंगाल में हो रहे खून-खराबे को भी उन्होंने स्लाइड के माध्यम से प्रस्तुत किया है, तो ‘हजार चौरासी की माँ’ का जिक्र भी उनकी रंगमंचीय राजनीति का स्पष्ट था। प्रकाश व तकनीक के सामञ्जस्य से दृश्यान्तरण को उन्होंने सहज सम्भव बनाया। अपनी प्रस्तुति में बंगाल के लोकरंग का उन्होंने बेहतरीन उपयोग किया। पात्रों के अभिनय में नुक्कड़ शैली स्पष्ट थी, जो प्रोवीर गुहा का स्वभाविक झुकाव है। मौन उन्हें बर्दाश्त नहीं है और रंगमंच शुरू से अन्त तक संगीत से भरा रहा। इससे शोरगुल का प्रभाव भी पैदा हुआ, जो नाटक के दृश्य के सहज संप्रेषण में बाधक बना।
  प्रोवीर गुहा बांग्ला रंगमंच के राजनैतिक रूप से जागरूक कार्यकर्ता हैं और उनका वामपंथी झुकाव स्पष्ट है। रंगमंच के क्षेत्र में वे उस रंगमंचीय सक्रियता में विश्वास करते हैं, जो दर्शकों के बीच मुद्दों को लाये और उन्हें उत्तेजित करे- इतना उत्तेजित करें कि वे दो ग्रुपों में बँट जायें और विवाद करें। इस विवाद के जरिये वे अपने रंग-दर्शकों से संवाद स्थापित करना चाहते हैं। रंगमंच पर यह उनका द्वंद्ववादी प्रयोग है। इस मायने में वे उस प्रायोगिक एवं व्यावहारिक रंगमंच में विश्वास करते हैं, जो समाज व समय के प्रति अपने को जिम्मेदार मानता है और खासकर हाशिये पर पड़े समुदायों, गाँवों को, झुग्गियों को, फुटपाथियों को, बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को सम्बोधित करने को अपनी रंगमंचीय प्राथमिकता मानते हैं। वे रंगमंच के समस्त औजारों का उपयोग इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिये करते हैं। उनके नाटकों में चरित्र महत्वपूर्ण नहीं होते जो मुद्दे उठाते हैं, बल्कि वे मुद्दों को उठाने के लिये चरित्रों का निर्माण करते हैं। इसलिये वे बने-बनाये नाटकीय विधान को नकारने का साहस भी जुटाते हैं। अतः वे नाटक को किसी उत्पाद के रुप में नहीं, प्रक्रिया के रुप में देखते हैं जो प्रतिरोधी चरित्रों को जन्म देते हैं। इस प्रकार, प्रोवीन गुहा प्रतिरोध के रंगमंच के अगुवा प्रतिनिधि हैं।
        12वें मुक्तिबोध नाट्य समारोह में दिवंगत हबीब तनवीर ने भी ‘विसर्जन’ को ‘राजरक्त’ के रूप में प्रस्तुत किया था। प्रोवीर ने अपनी प्रस्तुति में बांग्ला गीत-संगीत तथा हिन्दी-अंग्रेजी के संवादों का मिला-जुला उपयोग किया है, तो तनवीर साहब ने बांग्ला के गीतों तथा हिन्दी-छत्तीसगढ़ी के संवादों का खूबसूरती से प्रयोग किया था। तनवीर के हाथों छत्तीसगढ़ी लोकरंग में बंगाल की आत्मा पूरी तरह जीवित थी।
        टैगोर एक, उनका उपन्यास ‘राजश्री’ और नाटक ‘विसर्जन’ एक- लेकिन दो एकदम भिन्न प्रस्तुतियाँ ‘विषदकाल’ और ‘राजरक्त’ रंग-दर्शकों ने दोनों का मजा लिया, दोनों को सराहा। हिन्दुस्तानी रंगमंच की यही खासियत है, जो हमारी साझा संस्कृति से विकसित होती है- अंधविश्वास, कट्टरता, पोंगा पंथ व रूढ़िवाद के खिलाफ प्रगतिशील-जनवादी जीवन-मूल्यों को आगे बढ़ाती हुयी।         जिस छत्तीसगढ़ में सरकार बारिश के लिये यज्ञ करती है, जिसके मंत्री-संत्री अपने अंधविश्वासों के खुले प्रदर्शनों के लिये बलि देते हैं और कानून व्यवस्था की जर्जर स्थिति को ग्रहों का प्रकोप बताने से नहीं चूकते, वह छत्तीसगढ़ निश्चय ही ऐसे विषदकाल में है, जहाँ प्रोवीर गुहा की रंगमंचीय उपस्थिति बहुत जरूरी थी। इस कठिन राजनैतिक समय में इप्टा के इस सांस्कृतिक हस्तक्षेप को सराहा जाना चाहिए।
        वाद-विवाद-संवाद की द्वंद्वात्मक पद्धति का प्रयोग इप्टा भिलाई की तीसरे दिन की प्रस्तुति मंथन में भी देखने को मिला। दिवंगत शरीफ अहमद लिखित इस नाटक का निर्देशन किया था त्रिलोक तिवारी ने। इस दो पात्रीय नाटक में संजीव मुखर्जी ने केवट और राजेश श्रीवास्तव ने पण्डित की भूमिका अदा की थी। दोनों का अभिनय बेहतरीन था। मंच सज्जा साधारण थी और सुभाष धनगर की रूपसज्जा पात्रानुकूल। वस्त्र-विन्यास मणिमय मुखर्जी का था।
        हमारे शास्त्रीय ग्रन्थों में भी वाद-विवाद-संवाद की तार्किक पद्धति का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। अतः साहित्य और संस्कृति तथा इसकी एक शाखा रंगमंच भी इससे अछूती नहीं है। यह पद्धति हर चीज को नकारने, उस पर अविश्वास करने तथा वाद-विवाद के जरिये संवाद स्थापित करने और वर्गीय सत्य उद्घाटित करने पर जोर देती है। जो लोग आध्यात्मिकता की आड़ में अंधविश्वास और भाग्यवाद को अपना जीवनाधार बनाते हैं, वे इस पद्धति को पचा नहीं पाते। इसीलिये चार्वाक नकारने की हद तक उनके निशाने पर रहे हैं।
        लेकिन सच्चाई यही है कि सम्पूर्ण गति का सार द्वंद्व ही है, द्वंद्व से ही समय और समाज आगे बढ़ता है। द्वंद्व से ही किसी पुरानी चीज से नयी चीज निकलकर आती है। ‘मंथन’ में इस प्रक्रिया को बड़ी ही खूबसूरती से उभारा गया है। संवादों के जरिये इस द्वंद्व को उभारने में बस इतनी छोटी और सीधी

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: