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ज़न-लोकपाल मसौदे पर जनता की राय भी ली जानी चाहिए..

श्रीराम तिवारी

अप्रैल के प्रथम सप्ताह में अन्ना और उनके साथियों द्वारा किये गए जन्तर-मंतर पर धरना और तत विषयक जन-लोकपाल विधेयक पर मेने ‘मात्र-जन-लोकपाल विधेयक से भृष्टाचार ख़त्म नहीं हो सकता’ शीर्षक से आलेख लिखा था जो प्रवक्ता. कॉम ,हस्तक्षेप.कॉम,जनवादी.ब्लागस्पाट.कॉम पर अभी भी उपलब्ध है.तब से लेकर अब तक विगत दो महीनो में जो कुछ भी भारत में तत विषयक घटनाक्रम घटित हुए उनका परिणाम कुल मिलकर देश के हित में और भृष्ट ताकतों के खिलाफ परिलक्षित होता हुआ लगता है.इस सम्बन्ध में यह नितांत जरुरी है कि जो लोग किसी खास व्यक्ति ,खास राजनैतिक दल और किसी खास खेमे से विलग केवल राष्ट्र के हितों को सर्वोपरि
मानते हैं उन्हें विना किसी भय-पक्षपात ,निंदा-स्तुति और प्रत्यक्ष व परोक्ष स्वार्थ के वगैर इस वर्तमान दौर के जनांदोलन  -जो देश के संगठित मजदूर वर्ग के द्वारा बहुत सालों से उठाया जाता
रहा है और अब अन्ना हजारे,बाबा रामदेव तथा कुछ-कुछ सत्तापक्ष-विपक्ष की कतारों में भी उसकी अनुगूंज सुनाई दे रही है -को अपनी मेधा शक्ति से परिष्कृत करना चाहिए.केवल नित नए हीरो गढ़ना या किसी खास व्यक्ति या दल की चापलूसी करना उनका काम है जो देश को दिशा देने का दावा नहीं करते किन्तु जिन्हें लोकतंत्रात्मक गणराज्य ,संविधान,कार्यपालिका,न्याय पालिका,व्यवस्थापिका और राष्ट्र की सांस्कृतिक,धार्मिक ,भाषिक,वेशज और क्षेत्रीय विविधता का ज्ञान है;वे और जिन्हें दुनिया के नक़्शे पर वास्तविक भारत की तस्वीर का भान है वे इस दौर में अपने गाम्भीर्य अन्वेषण से इतिहास के परिप्रेक्ष्य में ‘जन-लोकपाल’या किसी वैयक्तिक धरना-अनशन को सुव्य्विस्थित रूप और आकार प्रदान कराने में अपनी एतिहासिक भूमिका अदा करें.
यह सर्वविदित है कि ‘लोकपाल विधेयक मसौदा संयुक्त समिति’ की अभी तक सम्पन्न नौ अनौपचारिक मीटिंगों  के परिणाम स्वरूप सिविल सोसायटी और सरकार के बीच द्वंदात्मकता की स्थिति बनती जा रही है.एक ओर माननीय ‘ग्रुप ऑफ़ मिनिस्टर्स’ की अनुशंषाओं पर सत्तापक्ष का कहना है कि सिविल सोसायटी और केंद्र सरकार “असहमति के लिए सहमत” हो गई है.दूसरी ओर किसन वापट बाबूराव हजारे {अन्नाजी]  के नेत्रत्व में ‘सिविल सोसायटी’के आरोप हैं कि सरकार हमारे तमाम सुंझावों से इतर अपना अलग एक सरकारी  मसौदा पेश कर भृष्टाचार के खिलाफ
गाँधी दर्शन में  किसी शासक या अधिनायकवादी निजाम को झुकाने का अंतिम अस्त्र “अनशन”ही है.आप इस अस्त्र का इस्तेमाल रोज-रोज नहीं कर सकते.यदि अन्ना और उनकी टीम मानती है कि उनकी ८०%मांगेंमान ली गईं हैं. अर्थात लोकपाल विधेयक के अधिकांश हिस्से के  वांछित प्रारूप को सिविल सोसायटी के अनुरूप ड्राफ्टिंग किया जा रहा है तो प्रश्न क्यों नहीं उठेगा कि बार-बार अनशन की धौंस {खास तौर से १६ अगस्त से} क्यों दी जा रही है?क्या यह वैयक्तिक तानाशाही या ब्लेक मैलिंग नहीं है?माना कि अन्ना और उनके साथियों के सौभाग्य से केंद्र में एक निहायत ही अपराधबोध पीड़ित शाशन तंत्र है और सत्तापक्ष में अन्ना जैसों को सहज सम्मान प्राप्त है ,किन्तु जब सरकार ने उनके पहले वाले अनशन को सम्मान दिया ,उनकी बातें मानी और अब तो लोकपाल बिल भी लगभग अवतरित होने को ही है ,तो यदि अब अन्नाजी कहें कि  सरकर{पूरे देश की वैधानिक प्रतिनिधि}मेरी सब शर्तों को माने ;वर्ना में अनशन पर बैठ जाऊँगा ,क्या यह देश की जनता का अपमान नहीं?सरकार ने कहा है कि सभी दलों से राय लेकर आपकी असहमतियों पर उचित कार्यवाही करेंगे.मैं {श्रीराम तिवारी} कहता हूँ कि सिर्फ राजनैतिक दलों से ही क्यों?पूरे देश से पूंछा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री ,चीफ जस्टिस आफ इंडिया और सांसदों को लोकपाल के दायरे में आना चाहिए कि नहीं?मैं नहीं कहता कि ये सब पवित्रतम हैं या पाप पंक से परे हैं ;किन्तु मैं इतना तो जानता हूँ कि देश के वर्तमान संविधान के अनुसार संसद ही सर्वोच्च है.क्या संसद से ऊँचा लोकपाल हो सकता है?संसद देश की जनता चुना करती है अतेव वह देश की जनता के प्रति जबाबदेह है .लोकपाल ,चुनाव कमीशन ,सुप्रीम कोर्ट और लेखा एवं महानियंत्रक समेत जितने भी स्वायत  शाशन प्रतिष्ठान हैं वे संसद के प्रति और प्रकारांतर से देश की जनता के प्रति उत्तरदायी है.
भृष्टाचार मिटाने के लिए सबको मिलकर उपाय करना चाहिए ,देश भृष्टाचार में आकंठ डूबा है,हम अपने-अपने तई लड़ भी रहे हैं लेकिन “भारत में भृष्टाचार पाकिस्तान से भी बड़ा खतरा है”कहकर अन्नाजी न केवल भारत की प्रतिष्ठा धूमिल कर रहें हैं बल्कि पाकिस्तान की जनता को भी उकसाने का  काम कर रहे हैं.
जब सिविल सोसायटी की ८०%शर्तें और सुझाव मान्य कर लिएगए हैं तो बाकी २०%के लिए देश की जनता को अपना पक्ष रखने का हक़ है या नहीं?अभी तक भारतीय संविधान में यही वर्णित है कि जनता का प्रतिनिधित्व लोक सभा करेगी .क्या अन्नाजी  या सिविल सोसायटी लोक सभा से भी बड़े हैं?यदि वर्तमान सरकार कि सदाशयता को जरुरत से ज्यादा परखोगे तो अन्नाजी १६ अगस्त को आप अनशन नहीं कर पायेंगे.सिर्फ सरकार ही क्यों जनता भी आपसे जानना चाहेगी कि आप एक ही मामले में इतनी जल्दी और बार-बार ‘अनशन’नामक गांधीवादी ब्रह्मास्त्र का इस्तमाल क्यों कर रहे हैं?क्या भृष्टाचार सिर्फ २-५ साल में ही बढ़ा है?क्या भारतीय संविधान ने देश को आगे  नहीं बढाया?क्या यह भारतीय  संविधान की महानता नहीं है कि आप एक मामूली से एन जी ओ संचालक आज इस देश की  सम्प्र्भुत्व सरकार को आँखें दिखा रहे हैं ,न केवल आँखें दिखा रहे हैं बल्कि ऐसे शो कर रहे हैं की आप ही एकमात्र गांधीवादी हैं .एक ही मामले को लेकर बार-बार अनशन उसके प्रभाव को भी भोंथरा बना देता है.गाँधी जी ने अकेले अनशन या सत्याग्रह से ब्रिटिश साम्राज्यवाद का मुकबला नहीं किया था.उन्होंने बमुश्किल दो या तीन बार ही इसका प्रयोग किया था .तभी जब सारे वैधानिक और लोकतान्त्रिक रास्ते बंद मिले.सारी दुनिया जानती है कि लाखों मजदूरों-किसानो ने ,मुबई नेवी की हड़ताल ने,युवा क्रांतिकारियों की शहादत ने देश को आजादी दिलाई थी .फिर भी देशकी जनता ने अपने परप्रिय अहिंसावादी ‘अनशन’सिध्धांत को सबसे ज्यादा सम्मान दिया.अन्नाजी गांधीवादी हैं तो इसका मतलब ये तो नहीं कि मनमोहनसिंह जी ब्रिटिश वायसराय है या सोनिया गाँधी कोई महारानी एलिजावेथ हैं जो अधिनायकवादी तौर तरीके से भारत पर काबिज थे.यह देश दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है क्योकि यहाँ दुनिया का अब तक का श्रेष्ठतम संविधान है यदि उसे बदलने की बात हो रही हो तो देश की जनता से भी पूंछा जाना चाहिए .यदि कपिल सिब्बल ,वीरप्पा मोइली ,सलमान खुर्शीद या प्रणव मुखर्जी यह जानते हैं तो ये तो उनकी काबिलियत में गिना जाना चाहिए और यदि अन्ना या उनके सलाहकार भले ही वे बड़े-बड़े वकील -वैरिस्टर हों यदि वे देश की जनता को इग्नोर करते हैं  तो भृष्टाचार का कोई भी बाल बांका नहीं कर सकेगा.
देश जिन्दा है क्योंकि अभी भी अधिकांश लोग ईमानदार हैं.सभी राजनैतिक दलों में यदि बदमाश और भृष्ट भरे पड़े हैं किन्तु मुठ्ठी भर ईमानदार भी हैं जिन्हें अन्ना और रामदेव से ज्यादा फ़िक्र है.किस मंत्री ने इतना कमाया जितना रामदेव.आशाराम,या प्रशांति निलियम वाले चमत्कारी बाबा के गुप्त तहखानो से निकल रहा है?क्या लोकपाल में यह तथ्य शामिल किया गया है कि जितने भी धार्मिक स्थल हैं  {सभी धर्मों के }उनकी जांच लोकपाल करेगा.?संपदा के राष्ट्रीयकरण की कोई मांग सिविल सोसायटी ने उठाई है?
क्या जिन लोगों ने सरकारी नोकरियों की तिकड़मों से   देश की उपजाऊ जमीन के बड़े -बड़े कृषि फार्मों व्यापारिक प्रतिष्ठानों और शेयर बाज़ार में बेनामी संपदा जमा कर रखी है उन पर कोई अंकुश इस लोकपाल बिल ने तजबीज किया है?
इन सभी तथ्यों को नज़र अंदाज़ क्यों किया जा रहा है?क्या अन्ना और सिविल सोसायटी के स्वनामधन्य साथी-केजरीवाल ,शशिभूषण और जस्टिस संतोष हेगड़े बता पायेगे कि वे जो -जो मांगें सरकार के समक्ष रख रहे हैं उनकी पात्रता इनको है?यदि मान भी लें की अन्ना और सिविल सोसायटी  को ये सब मांगें रखने और मनवाने के लिए अनशन का अधिकार है तब प्रश्न  ये उठता है कि सरकार और ‘जी ओ एम् ‘को उनकी हर बात -हर मांग मान कर पूरा करने या कराने का अधिकार है?मैं कहता हूँ कि सरकार को इस तरह का कोई जनादेश नहीं दिया गया कि आप संविधान में आमूल चूल परिवर्तन कर डालें.
वेशक मजबूत लोकपाल विधेयक की दरकार इस देश को है.इस दिशा में जिन व्यक्तियों या संस्थाओं ने संघर्ष किये वे स्तुत्य हैं ‘असहमति के लिए सहमत हो जाना ‘भी देश में एक बड़ी उपलब्धी है.लोकपाल विधेयक मसौदा तैयार करने के लिए सिविल सोसायटी,सरकार दोनों ही अलग-अलग या एक साथ ड्राफ्टिंग करने के लिए आज़ाद हैं किन्तु न केवल संसद बल्कि देश की जनता
के अनुमोदन बिना इसको संवैधानिक दर्जा दे पाना नामुमकिन है .सरकार ने अब तक जो भी फैसले लिए हैं उसमें न केवल उसका सहयोग अन्ना  जी को मिला है बल्कि भृष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में भी यूपीए सरकार की  सदिक्षा प्रतिध्वनित हो रही है संविधान की रक्षा करना भी सरकार का ही दायित्व है और वर्तमान सरकार काफी हद तक इस बाबत सजग है.सर्वदलीय बैठक और उसके उपरान्त संसद के मानसून सत्र में ‘लोकपाल विधेयक’ पेश किये जाने की सरकार की मन्सा
पर संदेह करना उचित नहीं.अनशन की धमकी तो बिलकुल भी उचित नहीं .यह तो प्रकारांतर से अनशन और लोकशाही कि अवमानना है.आशा है अन्नाजी सब्र से काम लेंगे और देश की जनता को भी साथ लेकर चलेंगे.

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