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जेटली के सामने इमरजेंसी की संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल की जोड़ी भी शरमाने लगे

पत्रकारिता का यह हाल उन जेटली साहब ने किया है जो इमरजेंसी की पैदाइश हैं
जेटली जी ने छह महीने के भीतर ही चौथे खंभे की ऐसी कमर तोड़ी है कि फिर से उठने में उसे सालों लग जाएंगे।

महेंद्र मिश्रा
वित्तमंत्री अरुण जेटली नये प्रयोगकर्ता के तौर पर सामने आए हैं। उन्होंने डीडीसीए में अगर ‘चारा मॉडल’ को आगे बढ़ाया है तो सूचना प्रसारण मंत्रालय के जरिये ‘लोकतंत्र में इमरजेंसी’ का नया माडल दिया है। जेटली जी ने छह महीने के भीतर ही चौथे खंभे की ऐसी कमर तोड़ी है कि फिर से उठने में उसे सालों लग जाएंगे। यह सब कुछ सरकारी कोड़े से संभव हुआ है।
पत्रकारिता का यह हाल उन जेटली साहब ने किया है जो इमरजेंसी की पैदाइश हैं।
जेटली की चाबुक क्या चली एक-एक कर सारे मीडिया घराने घुटने टेक दिए। विरोध जताने वाले सरकारी कहर का सामना कर रहे हैं। पत्रकारिता का यह हाल उन जेटली साहब ने किया है जो इमरजेंसी की पैदाइश हैं। सरकारी शिकंजा ऐसा है कि संजय गांधी और विद्याचरण शुक्ल की जोड़ी भी शरमाने लगे।
दरअसल प्रकाश जावड़ेकर जब मोदीजी के मंसूबों को परवान नहीं चढ़ा पाए, तो सूचना-प्रसारण मंत्रालय उनसे छीनकर जेटली को सौंप दिया गया। जेटली जी मीडिया प्रबंधन के शातिर बादशाह माने जाते हैं। उनके जीवन की राजनीतिक सफलता में मीडिया का बड़ा हाथ रहा है। हाथ आने के साथ ही उन्होंने देश के चौथे खंभे का ‘आपरेशन’ शुरू कर दिया। और ‘डॉक्टर’ जेटली उसमें पूरी तरह से कामयाब रहे। मजाल क्या कि मीडिया का कोई घराना आज उनके सामने सिर उठा सके।
इमरजेंसी के दौरान तो मंत्रालय से बाकायदा आदेश जारी करना पड़ता था। अघोषित इमरजेंसी में सब कुछ मैनेज्ड है। इस काम में उन्हें ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। दूरदर्शन समेत सभी सरकारी चैनल पहले से ही गुलाम थे, लेकिन पूरी गिरफ्त के लिए उसके ऊपर संघ प्रायोजित विवेकानंद फाउंडेशन के ए सूर्यप्रकाश को लाकर बैठा दिया गया। संघ का डंडा काम आया। दूरदर्शन भी संघी सुर में गाने लगा। दूरदर्शन की ‘निष्पक्षता’ का आलम यह है कि पिछले महीने उसने नेहरू की जयंती तक का प्रसारण नहीं किया। किसी और राजनीतिक खबर की बात तो दूर है। जबकि लोकसभा चैनल से लेकर सरकार के दूसरे चैनलों में दीन दयाल उपाध्याय की डाक्यूमेंट्री का कई-कई बार प्रसारण हुआ। किसान चैनेल तो हाफ पैंट पहनकर ही पैदा हुआ है और लोकसभा में सुमित्रा जी की जागीरदारी है, जिन्हें बीते संसद सत्र के आखिरी दिन विपक्ष के खिलाफ की गई अपनी ही टिप्पणी को संसद की कार्यवाही से निकालनी पड़ी थी।
निजी चैनलों की बात की जाए इंडिया और जी टीवी संघ के आनुषंगिक संगठनों के विस्तार हैं। भक्ति में एक दूसरे से आगे निकलने की दोनों में होड़ मची है। इंडिया टीवी चैनल के मालिक रजत शर्मा दिल्ली छात्रसंघ में जेटली जी के शागिर्द रहे हैं और अब सत्ता में आने के बाद दोनों एक दूसरे का पूरा ख्याल रख रहे हैं। अनायास नहीं इंडिया टीवी को दूसरा दूरदर्शन कहा रहा है। कई मामलों में तो वह दूरदर्शन का भी कान काट ले। मौके-मौके पर दोनों एक दूसरे को उपकृत करते रहते हैं। आईआईएमसी के निदेशक के लिए बनी सर्च कमेटी में मंत्रालय के सचिव और पत्रकार स्वपन दास गुप्ता के अलावा रजत शर्मा भी उसके तीसरे सदस्य थे। ज़ी टीवी का पूरे देश में बड़ा नेटवर्क है। उसके मालिक सुभाष चंद्रा पिछले हरियाणा चुनाव में टिकट की कतार में थे। हालांकि लाख कोशिशों के बाद भी वह कामयाब नहीं हुए। वफादारी दिखाने के लिए उन्होंने लोकसभा चुनाव में मोदी के साथ चुनावी मंच तक में हिस्सेदारी की। लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। भविष्य में कृपा की उम्मीद में उनकी चरण वंदना जारी है। चैनल उसी का पालन कर रहा है। चैनल हेड सुधीर चौधरी के बारे में क्या कहना। पूरा देश उनकी जेलयात्रा और धन उगाही की कहानी को देख-सुन चुका है। इसके बाद बड़े समूहों में आईबीएन-7 का नाम आता है। राजदीप के समय चैनल आंख दिखा रहा था। लिहाजा उसका भी इलाज ढूंढ लिया गया। और चैनल को अंबानी के हाथ में दिलावकर जेब में कर लिया गया। ईटीवी समेत बीसियों चैनल सरकार की अब मुट्ठी में हैं। एक समय ब्रांड माना जाने वाला यह चैनल अब भक्तों की भजन मंडली बन कर रह गया है।
अंग्रेजी चैनलों में चीखने, चिल्लाने और नाटकीयता के हर प्रदर्शन के बावजूद नेशन वांट्स टू नो को देखने लायक माना जाता था। लेकिन जेटली ने अर्णब गोस्वामी को ड्राइंग रूम में बिरयानी क्या खिलाई। जनाब जेटली के मुरीद हो गए। उनके खिलाफ अब टिकर पर भी खबर चलाने के लिए तैयार नहीं हैं। देखना होगा नमक का कर्ज कब तक उतरता है।
बचा आज तक तो वह बाजार का चैनल है। अरुण पुरी बाजार के रुख को अच्छी तरह से पहचानते हैं। उनके पास अंजना ओम कश्यप और राहुल कंवल जैसे भक्त हैं तो राजदीप सरदेसाई और पुण्य प्रसून जैसे खबर से खेलने वाले पत्रकार भी हैं। लेकिन आज तक के लिए अभी वक्त भक्ति का है। यहां तक कि राजीव शुक्ला का न्यूज-24 अनुराधा प्रसाद के चलते और वर्ल्ड न्यूज़ में तब्दील हो चुका फोकस जिंदल के मुकदमे के जरिये मैनेज कर लिया गया है। अकेला एनडीटीवी है जो रीढ़ दिखाने की हिम्मत कर रहा है। तो बदले में उसे ईडी और फेरा से लेकर फेमा तक की कार्रवाइयों का सामना करना पड़ रहा है। इतना ही नहीं आईआईएफटी में गजेंद्र चौहान, सेंसर बोर्ड में पहलाज निहलानी और आईआईएमसी में विवेकानंद फाउंडेशन के शिष्य के जी सुरेश की नियुक्ति के जरिये सारी संस्थाओं को सरकार और संघ की सेवा में लगा दिया गया है।

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महेंद्र मिश्रा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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