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टिटवाल का कुत्ता और पत्रकारिता की प्रीति जिंटा

एक दिन में पच्चीस हज़ार करोड़ स्वाहा हो गए …. स्वाहा हो जाने के बाद कौन सा वैदिक मन्त्र पढ़ा जाता है …. पता नहीं….. मुंह से एक बार जय हो ज़रूर निकला….. जब सभी चैनल सियारी मुद्रा में स्वाहा स्वाहा कर रहे थे तो रवीश कुमार कैमरामैन को साथ लेकर मज़दूर बस्ती की ओर निकल लिए ….. और अपने अंदाज़ में हड़ताली संगठनों, मज़दूर नेताओं और सरकार सबके कच्छा छोड़ सब कपड़े उतार लिए ….. इस शैली पर पत्रकारिता की प्रीति जिंटा कृपया ध्यान दें
रात आठ बजे ज़ी न्यूज़ पर घमासान मचा हुआ था बाली उमरिया की सुकन्या पुरानी दक्षिण भारतीय फिल्मों के विलेन सा दिखाई पड़ रहे एक सज्जन को कुछ इस अंदाज़ में हड़का रही…. चुप बैठ नासपीटे…. तेरे दांत तोड़ दूँगी कलमुँहे…. हर हड़काहट पर दांत फ़ाड़ रहा बेचारा पाक सेना का अवकाशग्रस्त अफसर था और अब सेना विशेषज्ञ….. कन्या उस पर हाथ पांव फेंक रही थी तो मज़ेदार बात यह कि एक भाजपाई और एक काँग्रेसी नेता बाकायदा गलबहियां डाले मज़ा ले रहे … और बीच बीच में यह भी जताते जा रहे कि अपनी आज़ादी को हम हरगिज़ मिटा सकते नहीं….. खैर इस तरह की चुहलबाजियां हर चैनल पर हर दिन देखने को मिल जाती हैं
अब आगे चलें ….. फैंटम देखने के बाद उसका एक डायलॉग याद आ गया …. सर हम कुछ करते क्यों नहीं….. बस क्रिकेट खेलना बंद कर देते हैं … इसी एक वाक्य ने फिल्म की दिशा तै कर दी थी
अब एक कहानी भी याद आ रही है …. टिटवाल का कुत्ता …. 1948 के कश्मीर युद्ध पर मंटो ने लिखी थी …. एक पहाड़ी पर पाकिस्तानी चौकी और दूसरी पहाड़ी पर हिन्दुस्तानी चौकी…… अचानक एक कुत्ता इस तरफ वाली चौकी में आ गया … भारतीय सैनिकों ने उसको चाय बिस्कुट खिलाये और उसका नाम रख दिया चपड़ चूँ चूँ …. यही नाम एक तख्ती पर लिख कर उसके गले में बाँध दिया …. भारतीय खेमे से ऊब कर वो पाक चौकी में घुस गया … उसको अपना कुत्ता साबित करने को पाक सैनिकों ने उसका नाम सपड़ सूं सूं रखा और गले में टांग दिया…. दोचार दिन में जब देख लिया कि कुत्ता दोनों का माल हजम कर रहा है …. दोनों तरफ से उस पर निशानेबाजी हुई और वो शहीद हो गया
लगता है उसकी आत्मा भारत में चपड़ चूँ चूँ और पाकिस्तान में सपड़ सूं सूं बन अब तक मंडरा रही है
पाकिस्तान का तो पता नहीं लेकिन अपने देश में जब से मुफ्ती की बिटिया को आतंकवादियों के बदले छुड़ा कर लाया गया है तब से केंद्र में कोई भी सरकार हो….. चैन से सोने नहीं देती …. अब परसों ही अपने रक्षामंत्री बेवजह टर्रा दिए…… हम कश्मीर का एक कण भी पाकिस्तान को छूने नहीं देंगे …… (अब कोई उनसे पूछे कि पाकिस्तान ने उनसे पूछा क्या) उसके बाद इससे मिलता जुलता वाक्य गृहमंत्री बोलेंगे …. तो भैया क्या वित्त मंत्री कोदो खा के पढ़े हैं …. वो भी कुछ न कुछ बोलेंगे …. फिर विपक्ष के नेता … मतलब कि सिलसिला जारी रहता है और ख़त्म तब होता है जब रात को थाने का सिपाही दरवाजा खटखटा खुलवा के गुर्राता है …. कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है …. समझे न
इधर दो आतंकवादी ज़िंदा पकड़े गए तो सारे चैनलों ने ऐसा हंगामा बरपा दिया कि मानों हमें लाहौर में घुसने का मौक़ा मिल गया…. ऐसे ही एक मौके पर तो अमेरिका में ओबामा तक घबरा गया कि ये कर क्या रहे हैं
और जहां तक हमारी रणनीति का हाल है वो थोड़ा कन्फ्यूज्ड है …. जब पाकिस्तान से कोई चिल्लाता है कि हम भारत को नेस्तनाबूद कर देंगे तो तुरंत एक उच्चस्तरीय मीटिंग बैठाई जाती है….. उसमें क्रिकेट पर अब कोई बात नहीं…. क्योंकि वो तो दूसरे मोहल्ले जब जाकर खेल लो… हाँ पान की सप्लाई रोकने पर गंभीर विचार होता है
मोसाद जैसे ऑपरेशन या बजरंगी मुस्टंडों को पाक सीमा में घुस कर मार करने की सलाह भी दी जाती है … पर सब इस विचार से सहमत हैं कि यह काम कबीर खान, सलमान खान, फैज़ अली खान या अक्षय कुमार जितने बढ़िया तरीके से कर सकते हैं उतना कोई एजेंसी या कमांडो नहीं …. और सबसे बड़ी बात यह कि अमेरिका भी बुरा नहीं मानता…. पाक में ऐसी फिल्म भले ही बैन हो जाती हों लेकिन उनको बजरंगी भाईजान से…. कोई गिला नहीं…… तो साल में एकाध ऐसी और एकाध वैसे फिल्म बनती रहनी चाहिए….
उसी मीटिंग में … इस नवाज शरीफ का क्या किया जाए …. ससुरा जब तब किसी की छठी में या पान की दूकान पे टकरा जाता है और गले मिल-मिल कर पैर छूता है…. जब मिलेगा यही कहेगा …. माँ कसम अबकी कश्मीर पर नहीं बोलूँगा …. लेकिन जैसे ही पाक सेना उसके कुश्ते की दवा बंद करती है … पलट जाता है कमबख्त …. इस बार हमारे साहेब न्यूयार्क में अपने साथ उसके लिए कुछ लेकर जाएंगे….. वन्दे मातरम
राजीव मित्तल

About the author

जबलपुर में ‘नई दुनिया’ के स्थानीय संपादक, और मेरठ में ‘हिंदुस्तान’ के स्थानीय संपादक रहे राजीव मित्तल वरिष्ठ पत्रकार हैं। ‘अमर उजाला’ और ‘दैनिक हिंदुस्तान’ होते हुए मित्तल जी नव भारत टाइम्स एवं ‘जनसत्ता’ (चंडीगढ़) में मुख्य उप सम्पादक भी रहे हैं।

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