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टीपू सुल्तान को गुस्सा क्यों आता है?

मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव के तेवर से मीडिया में हड़कम्प
जिनकी कलम नहीं चलती वह सिर्फ चरण वन्दना करके ही काम चलाते हैं
संजय शर्मा

प्रदेश के सुल्तान अखिलेश यादव को गुस्सा आ ही गया। सैफई महोत्सव की मीडिया कवरेज को लेकर मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव जिस तरह मीडिया पर भड़के उसने न सिर्फ राजनीतिक गलियारों बल्कि मीडिया हाउस में भी खलबली मचा दी। कुछ पत्रकारों ने मुख्यमन्त्री के इन तेवरों की आलोचना की तो कुछ ने कहा कि जब पत्रकार अपना मूल पेशा छोड़कर अगर मुख्यमन्त्री की चरण वंदना करेंगे और उनसे लाभ उठायेंगे तो एक न एक दिन यह तो होना ही था। बहरहाल अब चर्चा इस बात को लेकर हो रही है कि मुख्यमन्त्री के इस फैसले से उन्हें फायदा होगा या नुकसान।

सैफई महोत्सव के आखरी दिन सैफई में फिल्मी सितारों का जमावड़ा लगा हुआ था। आधा दर्जन से ज्यादा हवाई जहाज जब सैफई में फिल्मी कलाकारों को लेकर उतरे तो नजारा देखने लायक था। सलमान खान से लेकर माधुरी दीक्षित और आलिया भट्ट से लेकर कपिल शर्मा तक सबको देखने के लिये जनता का हुजूम उमड़ पड़ा।

मगर इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने मुख्यमन्त्री के सारे सपनों पर पानी फेर दिया। देश के लगभग सभी चैनलों ने इस कार्यक्रम की तीखी आलोचना की। न सिर्फ आलोचना बल्कि इसकी भर्त्सना भी की। सब ने इस कार्यक्रम को मुजफ्फरनगर के राहत शिविर से जोड़ कर दिखाया। सब चैनलों पर चलने लगा कि एक तरफ जहाँ राहत शिविर में लोग ठण्ड से कँपकँपा रहे हैं। ठण्ड के कारण वहाँ बच्चे मर रहे हैं मगर मुख्यमन्त्री इनकी चिन्ता की जगह सैफई में नाच-गाना कर रहे हैं। चैनल यहीं नहीं रुके, बल्कि उन्होंने फिल्मी सितारों की भी तीखी आलोचना करते हुये कहा कि उन्हें इस कार्यक्रम में नहीं आना चाहिए था। कुछ चैनल तो इससे भी आगे बढ़ गये और उन्होंने सीधे फिल्मी कलाकारों को ही फोन करके उनसे कहना शुरु किया कि उन्हें इस कार्यक्रम में नहीं आना चाहिए था।

फिल्मी सितारों को भी लगा कि अगर टीवी चैनलों पर इस तरह की खबरें चली तो यह उनके भविष्य के लिये अच्छा नहीं है। आलिया भट्ट के पिता महेश भट्ट ने तो अपनी बेटी के इस कार्यक्रम में जाने के लिये बाकायदा माफी भी माँगी। कार्यक्रम के अगले दिन माधुरी दीक्षित का डेढ़ इश्किया फिल्म का प्रीमियर था। मुख्यमन्त्री को उनके साथ फिल्म देखना था मगर इतने हंगामे के बाद मुख्यमन्त्री ने भी इस फिल्म को देखने का इरादा छोड़ दिया। यही नहीं जिस फिल्म बुलेट राजा को सरकार ने एक करोड़ रुपये की धनराशि दी थी उन्होंने भी इस धनराशि को यह कहते हुये मना कर दिया कि मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ितों की हालत को देखते हुये वह यह धनराशि स्वीकार कर पाने में खुद को सहज महसूस नहीं कर रहे हैं।

जाहिर है यह सारी बातें मुख्यमन्त्री को अपमानित करने सरीखी थीं। लिहाजा मुख्यमन्त्री ने सैफई से लौट कर अपने घर पर प्रेस काँफ्रेन्स बुलायी। किसी पत्रकार को सपने में भी अँदाजा नहीं था कि आज मुख्यमन्त्री उन लोगों पर ही हमला करने वाले हैं। तीखे तेवरों में बैठे मुख्यमन्त्री ने सबसे पहला हमला दैनिक जागरण पर बोला और कहा कि उनके मालिकों को एक बार राज्यसभा भेजा। दोबारा भी टिकट माँग रहे थे, नहीं दिया तो ऐसी झूठी खबर छाप दी। वह यहीं नहीं रुके बल्कि कहा कि पिछली सरकार में पुलिस वालों ने पीटा और जुए में पकड़े गये। सब चैनल वालों पर इसकी खबर है, यह कोई नहीं दिखाता। एक अँग्रेजी टीवी चैनल पर भी भड़कते हुये कहा कि उसके पत्रकार को दिन भर हैलीकॉप्टर में घुमाया मगर खबर नहीं दिखायी गयी बल्कि कहा गया कि सेल्स और मार्केटिंग वालों ने इसके लिये मना कर दिया। क्या ये ठीक है।

जाहिर है मुख्यमन्त्री की मंशा साफ थी कि मीडिया के लोग उनसे फायदा भी उठायेंगे और उन पर हमला भी करेंगे। यह ठीक नहीं है। मुख्यमन्त्री के इन कड़े तेवरों का कोई भी पत्रकार विरोध नहीं कर सका।

इसके पिछले हफ्ते ऐसी ही एक भरी प्रेस काँफ्रेन्स में मुख्यमन्त्री एनडीटीवी के रिपोर्टर को हड़का चुके थे। मुख्यमन्त्री के इन तेवरों की भाजपा, कांग्रंस और बसपा ने तीखी आलोचना की। इन लोगों ने कहा कि सरकार सत्ता के नशे में डूब गयी है और इस तरह के तानाशाही रवैया अपना रही है।

मीडिया में भी मुख्यमन्त्री के इन तेवरों की मिलीजुली प्रतिक्रिया रही। अधिकाँश पत्रकारों का कहना था कि मुख्यमन्त्री कुछ चुनिन्दा टीवी पत्रकारों को ज्यादा महत्व दे रहे थे जिसका उन्हें नुकसान उठाना पड़ा। उनका यह भी कहना था कि मुख्यमन्त्री को सबको बदनाम करने की जगह उन सभी लोगों के नाम उजागर करना चाहिए थे जो उनसे लाभ की उम्मीद करते हैं। मीडिया कंसलटेन्ट जितेन्द्र कुमार खन्ना का कहना है कि सत्ता के चाटुकार पत्रकारों के काले कारनामे सबके सामने आना बहुत जरूरी था। वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार का कहना है कि इसमें अखिलेश यादव ने क्या गलत किया। जब हर प्रेस वार्ता के बाद पत्रकार तरह-तरह के प्रार्थना पत्र लेकर मुख्यमन्त्री के आगे पीछे मंडरायेंगे तो ऐसा ही होगा। वरिष्ठ पत्रकार अभिनव पाण्डे ने कहा कि जब भाई लोग अपने मुनाफे की बाते करेंगे तो गाली तो खानी ही पड़ेंगी। उन्होंने सवाल किया कि अपनी कोई यूनियन या एसोसिएशन ऐसी है जो इसका विरोध करे। वरिष्ठ पत्रकार प्रेम वर्मा ने कहा कि पत्रकारों को चाहिए कि वह अपना आचरण सुधारे और कोई ऐसा काम न करें जिससे उनके ऊपर ऊँगली उठे। पत्रकार प्रभात तिवारी ने कहा कि मुख्यमन्त्री ने जिस तरीके से प्रत्रकारों को नंगा किया वह एकदम सही है क्योंकि सफाई का अभियान सिर्फ राजनेताओं तक चले यह ठीक नहीं। पत्रकार मोहम्मद कामरान ने कहा कि यह चरण वन्दना जारी रहेगी क्योंकि जिनकी कलम नहीं चलती वह सिर्फ चरण वन्दना करके ही काम चलाते हैं। पत्रकार आसिफ अंसारी ने कहा कि मुख्यमन्त्री ने ही इनको सरकारी बंगले, सस्ते प्लॉट और फ्री इलाज दे कर इनके ही दिमाग खराब किये हैं। पत्रकार रूबी सिद्दीकी ने कहा कि मुख्यमन्त्री देर आये मगर दुरुस्त आये।

वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस का भी मानना है कि पत्रकारों को अपना काम सिर्फ पत्रकारिता तक रखना चाहिए। पत्रकार अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि गनीमत है कि हल्ला बोल नहीं हो रहा। पत्रकार प्रदीप उपध्याय ने कहा कि नेता पहले खिलायेगा फिर गरियायेगा। सोशल एक्टिविस्ट संदीप वर्मा ने कहा कि सोशल मीडिया की ताकत से पत्रकार अब लिखने लगे हैं नहीं संभले तो और नुकसान होगा। जाहिर है आने वाला समय मीडिया के लिये और मुसीबत भरा होने वाला है क्योंकि हर समय मुस्कुराने वाले टीपू सुल्तान को अब गुस्सा भी आने लगा है।

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संजय शर्मा, लेखक वीक एंड टाइम्स के सम्पादक हैं

 

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