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तन्त्र के शोर में गण मौन

एम. अफसर खां सागर
हर साल 26 जनवरी को मुल्क गणतन्त्र दिवस पूरी अकीदत और शान से मनाता है। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान को मंजूरी मिलने के बाद मुल्क के आम नागरिकों को खुली हवा में जीने का हक हासिल हुआ। आजाद भारत में लोकतन्त्र की स्थापना ने गणतन्त्र की भावना को प्रबल बनाया।  अगर देखा जाये तो 60 साल से ज्यादा का अरसा गुजर जाने के बाद भी हम आजतक गणतन्त्र की मूल भावना को समझ पाने में नाकाम रहे हैं! गणतन्त्र का असल मतलब शासन या सरकार में जनता की हिस्सेदार से है। मुल्क में लोकतन्त्र की स्थापना के बाद सत्ता में नागरिकों को भागीदारी तो मिली मगर आम आदमी को शासन में हिस्सेदारी मिली कि नहीं ये कह पाना बेमानी होगा। अगर गणतन्त्र में नागरिकों को कुछ अधिकार मिला है तो महज वोट देने का ना कि सत्ता में पूर्ण हिस्सेदारी का या यूँ कह लें कि गांधी जी के पूर्ण स्वराज की स्थापना का सपना आजादी के साठ साल के बाद भी किसी मृगमरीचिका से कम नहीं।
गणतन्त्र ने भारतीय लोकतन्त्र को हर पाँच साल में चुनावी त्यौहार का सौगात तो दिया मगर इस त्यौहार में गण को जो हासिल होना चाहिए शायद उस पर आज भी तन्त्र हावी दिखता है। संसद हो या विधानसभाऐं वहाँ पहुँचने वाले सदस्यों को गण की आवाज बुलन्द करनी चाहिए मगर आज हालात ये हैं कि तन्त्र की शोर में गण मौन नजर आता है। आखिर गण क्या करे पाँच साल तक उसे जो मौन रहना पड़ता है? संसद या विधनसभाओं में इस बात पर तो चर्चा होती है कि फलां की सरकार में भुखमरी, महंगाई व बेरोजगारी है मगर इस बात पर ईमानदार चर्चा कभी नहीं होती कि इन समस्याओं का निस्तारण कैसे किया जाये। इसका एक खास वजह है कि सदन में जाने के बाद ये लोग गण से माननीय हो जाते हैं तथा इन्हें आराम तलब व एश्वर्य भरे जीवन की लत लग जाती है। माननीय बनने के बाद इनका मकसद सिर्फ और सिर्फ एक हो जाता है कि किसी जुगत से अपना आगामी ज़िन्दगी को सुख-सुविधाओं के अम्बार से भर लिया जाये। यही भावना तन्त्र को गण से अलग कर देता है तथा ऐसे में गण बदहाल जिन्दगी जीने को बाध्य होता है। स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु राजनैतिक आजादी के साथ-साथ सामाजिक एवं आर्थिक आजादी का होना भी लाजमी है। आर्थिक आजादी का मूल मंत्र आर्थिक विकेन्द्रीकरण तथा आत्मनिर्भरता है। सरकारी आंकड़ेबाजी से हट कर देखें तो आज भी हमारे समाज में 70 प्रतिशत से ज्यादा लोग मूलभूत जरूरतों से वंचित है। अर्थव्यवस्था का विशाल भण्डार चन्द लोगों के हाथों में है, जिसकी वजह से अनेक गम्भीर समस्याओं मसलन गरीबी, बेकारी, बाल मजदूरी, वेश्यावृत्ति आदि बढ़ी है। इसलिये लोग गणतन्त्र के जश्न से ज्यादा भूख के ताण्डव से जूझने में मशगूल हैं।
सियासत का हालिया चेहरा लोगों के जख्मों पर मरहम की जगह नमक लगाता दिख रहा है। आमजन के विकास के लिये बनने वाली सैकड़ों, अरबों करोड़ों की योजनाओं में भ्रष्टाचार का पलीता यही नुमाइंदे लगाते नजर आ रहे हैं! एक तरफ जहाँ लोग भूख की आग में जल रहे हैं तो दूसरी तरफ कमीशन की काली कमाई से इन राजनेताओं के आलीशान महल और कोठियाँ आबाद हैं। गरीबी, भुखमारी का नारा देकर ये जनता को साल दर साल ठगते आ रहे हैं मगर विकास के नाम पर ढाक के तीन पात के सिवा आज तक कुछ नहीं नजर आता। जिस मुल्क में नागरिकों की हिस्सेदार चुनाव में सिर्फ वोट डालने तक महदूद हो, वहाँ गणतन्त्र के मायने व मतलब निकालना कितना अहम माना जायेगा? सफेदपोश राजनेताओं की राजसी ठाठ के बाद आज नौकरशाहों की हालत भी किसी रसूखदारों से कम नहीं। इनके दरबारों की चक्कर लगाकर देश का गण खुद को बौना समझने लगा है। ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में उन्हीं की सुनी जाती है जो आम नहीं खास माने जाते हैं! आम को तो यहाँ से तसल्लीकुन बातों से टरका दिया जाता है। सरकारी दफ्तरों की चक्कर लगाते- लगाते ये लोग घनचक्कर हो जाते हैं। इंसाफ के लिये सालों-साल दर-दर की ठोकरें खाकर गण मौन साधने पर मजबूर हो जाता है।
इस बात से कत्तई इंकार नहीं किया जा सकता कि संविधान के निर्माताओं ने मुल्क के आम नागरिकों को ऐसा लोकतांत्रिक संविधान दिया है, जिसमें सभी सम्प्रदाय, धर्म व समुदाय के लोगों को भेद-भाव रहित बराबरी का हक मिला है। मगर संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकारों से आम नागरिक आज भी महरूम नजर आता है। जबकि सफेदपोश सियासतदाँ संविधान के लचीलेपन का लाभ लेकर बड़े से बड़े कारनामे अंजाम दे जाते हैं। शायद यही वजह है की लोकतन्त्र में अपराधतन्त्र का बोलबाला होता जा रहा है। ऐसे लोग ही जनतन्त्र की पवित्र मन्दिर में जाकर गणतन्त्र का मखौल उड़ाते नजर आते हैं। गणतन्त्र की मूल भावना को सभी को समझना बेहद लाजमी है चाहे वो सियासतदाँ हों, नौकरशाह या आमजन। सर्वाजनिक स्थलों, सरकारी कार्यालयों या स्कूलों में तिरंगा फहराकर व बच्चों में मिठाईयाँ बाँटकर तथा जय हिन्द का नारा लगाने भर से गणतन्त्र का हक अदा नहीं हो सकता। ऐसा करके हम गणतन्त्र दिवस तो मना सकते हैं मगर गण को तन्त्र में शामिल किये बिना गणतन्त्र का कोई मतलब नहीं निकलने वाला। नहीं तो यूँ ही तन्त्र के शोर में गण मौन नजर आयेगा।

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एम. अफसर खां सागर, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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