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तीन-तीन बार वोट डालेंगे ये मतदाता !

मनोहर गौर
वोट डालना हमारा कानूनी अधिकार है और एक से अधिक वोट डालना गैरकानूनी माना जाता है। लेकिन महाराष्ट्र के चंद्रपुर जिले के जीवती तालुका के इन 12 गाँवों के मतदाता हर बार कम से कम दो बार तो वोट डालते ही रहे हैं। इस बार तो चुनाव में इन लोगों को तीन बार वोट डालने का अभूतपूर्व मौका मिलेगा। दो बार लोकसभा के लिये और एक बार आंध्रप्रदेश विधानसभा के लिये।
कहने को तो ये 12 विवादास्पद गाँव परमडोली, शंकरलोधी, महाराजगुडा, मुकदमगुडा, इंदिरानगर, कोटा, अंतापुर, इसापुर, लेंडीगुडा, तांडा, लेंडीजडा और पद्मावती महाराष्ट्र में स्थित हैं, लेकिन इन गाँवों पर आंध्र प्रदेश भी दावा करता रहा है और मामला बरसों से देश की सर्वोच्च अदालत में लम्बित है। दो पाटों के बीच पिसते ये लोग बेहद पिछड़े हैं और इन गाँवों पर दावा जताने वाले दोनों ही राज्य पिछले चार दशक से इनकी घोर उपेक्षा करते रहे हैं। हालांकि लोग दोनों राज्यों की योजनाओं का लाभ जरूर लेते हैं।
महाराष्ट्र में तीन चरणों में लोकसभा चुनाव होने हैं। विदर्भ की सभी 11 लोकसभा सीटों के लिये 10 अप्रैल को वोट डाले जायेंगे। इन गाँवों के करीब 3500 मतदाता पहले चंद्रपुर-वणी-आर्णी लोकसभा सीट के लिये राजुरा विधानसभा क्षेत्र में वोट डालेंगे। उसके बाद 30 अप्रैल को आंध्रप्रदेश की आदिलाबाद सीट के लिये वोट डाला जायेगा। उसके बाद विधानसभा के लिये भी ये मतदाता वोट डालेंगे। इन मतदाताओं के पास दोनों राज्यों के मतदाता परिचय पत्र हैं। 2004 और 2009 में इन लोगों ने मतदान के अधिकार का उपयोग किया था। हालाँकि वर्ष 2004 में एक ही दिन मतदान होने के कारण ये लोग दो बार वोट नहीं डाल पाये थे। इन्हें उस वक्त महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में से किसी एक राज्य को चुनने के लिये कहा गया था। हालाँकि दोनों राज्यों ने अपने-अपने मतदान केन्द्र जरूर बनाये थे। ये गाँव आंध्र के करमेरी मंडल में आते हैं और आदिलाबाद की खानापुर (एसटी) विधानसभा सीट का हिस्सा हैं। तेलंगाना राज्य के गठन के बाद ये गाँव तेलंगाना का हिस्सा बन जायेंगे।
दोनों राज्यों की सीमा पर स्थित इन गाँवों में दोनों राज्यों की ग्राम पंचायतें हैं और दोनों में चुनाव भी होते हैं। दोनों का राज-काज भी चलता है। गाँवों में दो राशन दुकानें, दो स्कूल हैं। दोनों राज्यों ने अपने-अपने राशन कार्ड भी इन्हें दिए हैं। मतदाता परिचय पत्र भी दो बनते हैं। इतना ही नहीं, 2011 की जनगणना में दोनों ही राज्यों ने इनके आँकड़े इकट्ठे किये थे। इन गाँवों में मराठी के अलावा तेलुगू बोलने वाले लोग भी हैं। आदिवासी बहुल और पहाड़ी क्षेत्रों में बसे ये गाँव विकास के मामलों में बहुत पिछड़े हैं। गर्मी के दिनों में जब पानी के लिये यहां त्राहि-त्राहि मचती है, तब दोनों में से कोई भी राज्य इनकी मदद को नहीं दौड़े आते।

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मनोहर गौर, लेखक नागपुर (महाराष्ट्र) स्थित वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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