Home » तू, इस आँचल को परचम बना लेती तो अच्छा था…!

तू, इस आँचल को परचम बना लेती तो अच्छा था…!

जुलेखा ज़बीं
”यत्र नार्यस्ते पूज्यते, रमन्ते तत्र देवताः“ (जहां औरतों की पूजा होती है वहां देवता वास करते हैं) जैसे कथन को मानने वाले हिन्दू बहुल देश हिंदोस्तान की औरतें आज जानवरों से भी बदतर जिंदगी जीने को मजबूर हैं. जहां एक तरफ इंडिया शाइनिंग का नारा देने वाली बहुसंख्य आबादी है, तो दूसरी तरफ भारत और इंडिया के नाम से देश के विकास को बांटने वाली औरत की आजादी बिरोधी विचारधारा भी है. और इन दोनों विचारधाराओं के समर्थकों के सत्ताधीन होने के बावजूद हिंदोस्तान की बेटियां न सिर्फ आजाद नागरिक अधिकार प्राप्त कर पाई हैं और न ही उन्हें एक इंसान का सम्मान दिया जा रहा है. तेजी से विकसित होते भारत में भौतिक विकास तो चरम की तरफ है मगर नागरिक विकास में भारत लगातार पिछड़ता जा रहा है. विकास के नाम पर आदिवासियों/आम जनता खासकर औरतों की जमात को जिस तरह लाठी, गोली और फौज से दबाया जा रहा है, जिस तरह से औरतों/बच्चियों पर किए जा रहे उत्पीड़न, शोषण, हिंसा व अत्याचारों में नित नए आपराधिक (नौकरशाही, राजनीतिज्ञों) आयाम जुड़ रहे हैं, सरकारी हिंसा के खिलाफ़ उठने वाली हर आवाज को देशद्रोह के नाम पर जिस तरह खामोश किया जा रहा है, जिस तरह भू-गर्भीय संसाधनों की लूट खसोट मची है, खूनी अ-सामाजिक तत्वों की जो नस्ल पैदा की जा रही है उसे देखकर यही लगता है कि आने वाले कई दशक वंचित तबक़ों खासकर औरतों के खात्मे और अगली पीढ़ीयों के लिए संकट भरे होंगे. इक्का दुक्का राज्यों को छोड़ दें तो देश भर में औरतों के साथ पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व सांस्कृतिक रूप से जिस तरह का व्यवहार किया जा रहा है वह न सिर्फ डराने वाला है बल्कि चिंतनीय और शोचनीय भी है.
बेटियों का खात्मा- 2011 की जनगणना के मुताबिक जहां देश में औरतों का अनुपात प्रति 1000मर्दाें की तुलना में 940 है. वहीं छग का औसत 991 रहा. लेकिन राज्य के बड़े शहरों में यह जसं 956 हैं. 0-6बरस की उम्र का लिंगानुपात यहां 964 और 932 है. (रायपुर,बिलासपुर,दुर्ग कोरबा,रायगढ़ ). जबकि ग्रामीण इलाकों में 1000 पे 1004 औरतें हैं. तो वहीं 0-6 बरस उम्र की बच्चियों की संख्या आज भी 972 है.(बस्तर, दंतेवाड़ा, महासमुंद, राजनांदगांव, धमतरी, कांकेर, जशपुर). गुजरात को देखें तो यहां 0-6 बरस की लड़की,लड़के का लिंगानुपात 883 है, यानि एक हजार लड़कों में 117 लड़कियों की कमी.
गुमशुदा गुजराती बेटियां – दुनिया में गुजरात को विकास का माडल दिखाने वाले ये सच्चाई शायद नहीं जानते कि यहां बच्चों की कुल आबादी में 4,67,892 (चार लाख सड़सठ हजार आठ सौ बयानबे) लडकियां गायब हैं, मतलब साफ है कि लड़कों के मुकाबले में करीब 12 फीसद लडकियां गुजरात में कम हैं. कहां गुम हो गई गुजरात की बेटियां.? यह कोई छोटा मोटा आंकड़ा नहीं है. मगर आज के चुनाव में गुजरात की गुम कर दी गई बेटियों का मुददा नदारद है. यही नहीं यहां के कुछ प्रमुख शहरों की स्थिति पे भी नजर दौड़ाइये-मेहसाणा(801), गांधीनगर(813), अहमदाबाद(836), आनंद (849), राजकोट (854). इन शहरों में बेटियों के हत्यारे गरीब जन नहीं हैं बल्कि ये गुजरात के पैसे वाले धनाढ्य लोगों के करम हैं. मतलब साफ है राज्य के बड़े शहरों में तथाकथित विकास का उन्माद बेटियों का खात्मा करने पे उतारू है. मध्यप्रदेश और राजस्थान के हालात भी बहुत अच्छे नहीं हैं. बेटियों को भू्रण में मार डालने का सभ्य धंधा बड़े शहरों में पिछले एक दशक से खूब फलफूल रहा है यहां बंगाल और उड़िसा की बेटियांे के भू्रण भी चिंहाकित करके मार दिए जाते हैं. नालियों में मिलने वाले स्वस्थ्य मादा भ्रूणों की तादाद भी कुछ कम नहीं,.(सुबूतों के साथ शिकायतों के बावजूद)मजाल है जो सरकारों ने किसी डाक्टर या ऐसे किसी भी सेंटर पे आज तक कोई कड़ी कार्रवाई की हो. यहां गौरतलब बात ये है कि वे जो खुद को अहिंसक, शांतिप्रिय कहते हैं. औरतों को देवी का दर्जा देते हैं, उन्हें पूजने का दावा करते ह,ैं इन्हीं के (मप्र, छग, गुजरात, राजस्थान ) शासनकाल में औरतों के साथ होने वाले अत्याचार, नागरिक अधिकारों का हनन, उनके साथ की जाने वाली बेइंसाफियां, उनके गुनाहगारों को सम्मानित करने की नीति रीति पे नजर डालें तो हम पाएंगे कि ये मानुष भक्षी, अल्पसंख्यक विरोधी, गरीब,दलित,आदिवासी विरोधी, फासिस्ट जमात, जहां सत्ता में है वहां ये अल्पसंख्यकों, दलितों आदिवासियों के साथ तो हिंसा का तांडव करती ही है-जहां सत्ता में नहीं होती हैं वहां ये अपने जहरीली लताओं (अनुषंगी संगठनों) के जरिए औरतों के आत्मसम्मान, उनकी आजादी को कुचलती फिरती हैं. और इनका समर्थन करने के लिए इनके मंत्री, संत्री सभी एक पैर में तैयार खड़े होते हैं. इनकी जमात में शामिल औरतें भी दूसरी औरतों के लिए हिमायती नहीं होतीं बल्कि इन्हीं फासिस्ट जमातों की चरणवंदना करने वाली मात्र कठपुतलियां होती हैं.
दोस्तों, याद कीजिए राजस्थान की भंवरी देवी के साथ इस जमात और इनकी चारण अदालत ने जो किया है क्या उसे कोई भी भारतवासी भूल सकता है? सोनिया गांधी के खिलाफ बेल्लारी से चुनाव में उतरीं सुषमा स्वराज जी के शब्द, उमाभारती और साध्वी ऋतंभरा की जहरीली बोली. और पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल की उम्मीदवारी के दौरान इन महिला विरोधी तबकों का अश्लील स्यापा. जींस पैंट पहनने वाली युवतियों के लिए म.प्र के मंत्री का अशालीन बयान, बंगलोर की एक पब में धुसकर इनके संगठन के गंुडों द्वारा युवतियों को बेदम पीटना, ये सब याद रखने की न सिर्फ जरूरत है बल्कि साथ ही ये भी सोचने की जरूरत है कि राज्यों में रहते हुए ये धुर महिला विरोधी, फासिस्ट जमात पूरे देश में आतंक और मानवाधिकारों के हनन का जो तांडव करती है अगर ये देश की सर्वाेच्च सत्ता में आपके ही मतों से चुनकर आ जाएंगी तो औरतों का क्या हश्र करेंगी?
बहनों, हम औरतों को ये नहीं भूलना चाहिए कि कोई भी फासिस्ट कटटरपंथी सत्ता सबसे पहले औरतों/बच्चों को अपना निशाना बनाती है. उसके बाद उनके समर्थन और इन कटटरपंथी अमानवीय ताक़तों के खिलाफ उठने वाली हर आवाज़, हर गतिविधि का खात्मा करती है. हमें 2002 के दौरान गुजरात में किए गए जनसंहार को इसलिए याद रखना चाहिए कि मुस्लिम औरतों का सड़कों पे सार्वजनिक रूप से बलात्कार करने के लिए अपने मर्दो को उकसाने वाली हिंदू गुजराती औरतें आज अपने उन्हीं मर्दों (बेटों, भाइयों, पतियों और समाज के अपराधी) की बर्बरता का जिस तरह शिकार बनाई जा रही हैं. वह दिल दहला देने वाली है.
”अवाग“ (अहमदाबाद वीमेंस एक्शन ग्रुप)और इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट के संयुक्त अध्ययन में यह बात निकलकर सामने आई है कि अहमदाबाद की 58 फीसदी औरतें गंभीर रूप से मानसिक तनाव की शिकार हैं. उनका अध्ययन बताता है कि 65 फीसद औरतें सरेआम पड़ोसियों के सामने बेइज्जत की जाती है. 35 फीसदी औरतों की बेटियां अपने पिता की हिंसा की शिकार हैं. यही नहीं 70 फीसदी औरतें गाली गलौच और धमकी झेलती हैं. 68 फीसदी औरतों ने थप्पड़ों से पिटाई की जाती है. ठोकर और धक्कामुक्की की शिकार 62 फीसदी औरतें हैं तो 53फीसदी लात-घूंसों से पीटी जाती हैं. यही नहीं 49 फीसदी को किसी ठोस या सख्त चीज से प्रहार किया गया जाता है. वहीं 37 फीसदी के जिस्मों पे दांत काटे के निशान पाए गए. 29 फीसद गला दबाकर पीटी गई हैं तो 22फीसदी औरतों को सिगरेट से जलाया गया है. यही नहीं गुजरात की ही एक गुजराती युवती का जिस तरह से वहां के मुख्यमंत्री ने अपने प्रशासन तंत्र से मुखबिरी करवा कर उसकी निजता की आजादी और मानवाधिकार का हनन किया है, उसे सही ठहराने के लिए अपनी पूरी हिंदूवादी पार्टी को झोंक दिया है, यह किसी से छुपा नहीं है. यह भी खुले तौर पे सामने आ चुका है कि औरतों/बच्चियों के कुपोषण के सवाल पे यहां के मुख्यमंत्री ने अपने सरकार की विफलता को ढांपने के लिए गुजरात की गरीब औरतों और बच्चियों को फिगर कांशेस होने के कारण दूध न पीने का कारण बताया था. यह भी आप सब नहीं भूले होंगे कि घरेलु हिंसा से प्रताड़ित एक धनाढ्य परिवार की युवती को अपने लिए इंसाफ मांगने अंडरगारमेंट( ब्रा पेंटी) में गुजरात की सड़कों पर निकलना पड़ा था, आज वह कहां है किसी को भी पता नहीं. अपनी पसंद से शादी करके अपने पति और बेटे के साथ सुखी जीवन जी रही अमी पटेल को उसके पति और बेटे से जबरदस्ती अलग करने वालों के खिलाफ बारहा गुहार लगाने के बावजूद कोई सुनवाई न होने से हताश अमी ने सुसाइड नोट में पुलिस प्रशासन और राज्य के मुख्यमंत्री को सीधे तौर पे जिम्मेदार बताकर आत्महत्या कर ली, अमी को आज तक इंसाफ नहीं मिला है उसके अपराधी क़ानूनी शह पाकर खुलेआम घूम रहे हैं.
औरतों के साथ हिंसा – यूनाइटेड नेशंस के मुताबिक दुनिया में औरतों के साथ की जाने वाली हिंसा में भारत 5वें नंबर पे है. पाकिस्तान जैसे देश से भी हम पीछे है. छग में बलात्कार की बढ़ती हिंसा पर नजर डालें तो 2010 में 1012 बलात्कार के प्रकरण विभिन्न थानों में दर्ज किए गए. (बावजूद इसके कि एफआईआर करवाना कितना मुश्किल है) जहां पीड़िताएं गुमनाम हो चुकी हैं या मौत को गले लगा चुकी है और उनके अपराधी आजाद घूम रहे हैं-ऐसे आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं. ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब एक होनहार महिला खिलाड़ी को उसके ही कोच की बदनीयती का शिकार बनना पड़ा. बात खुलने पर कोच पर अपराध दर्ज होना तो दूर उसे बचाने की सरकारी स्तर पर सरगर्मियां किसी से छुपी नहीं है. उच्च शिक्षा में महिलाओं के शोषण का आलम ये है कि इकलौती सेंटल यूनिवर्सिटी में एक महिला व्याख्याता कुलपति द्वारा शारीरिक, मानसिक शोषण किए जाने की गुहार पिछले दो वर्षों से लगातार लगा रही है मगर आज तक संबंधित थाने ने उनकी एफआईआर नहीं लिखी और न ही किसी तरह की जांच शुरू की गई. राष्ट्रपति तक मामला सुबूतों और गवाहों सहित पहुंचाया गया मगर राज्य के मुख्यमंत्री के प्रिय और केंद्र सरकार के चहेते कुलपति आज भी अपने पद में रौब के साथ बने हुए हैं. शोधार्थी छात्राओं के साथ होने वाले यौन शोषण में जिस तरह बढ़ोतरी हो रही है उससे तो लगता है कि बहुत जल्द राज्य महिला शिक्षार्थियों के यौन शोषण में भी अव्वल नंबर की श्रेणी में गिना जाने लगेगा. बलात्कार -नेशनल क्राइम रिसर्च ब्यूरो की 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक छग राज्य में हर दिन तीन औरतें बलात्कार का शिकार होती हैं. औरतों के साथ बलात्कार की घटनाओं की अपराधदर 8.41 फीसद से राज्य देश में सातवें स्थान पे चमक रहा है. 2013 के ताज़ा आंकड़ों पे नजर डालें तो राज्य 2012 में कुल 1034 औरतें बलात्कार की शिकार हुई हैं (350 औरतों के अपहरण के मामले और 980 घरेलू हिंसा में पति/रिश्तेदारों द्वारा प्रताड़ना के मामले दर्ज किए गए) जबकि 2011 में 1053 औरतें बलात्कार की शिकार दर्ज की गई. यहां भी एजुकेशन हब कहलाने वाले दुर्ग जिले (शहरी)में बलात्कार का क्राइम रेट 13.50 है तो राजधानी रायपुर में ये दर 11.76 है. शीलभंग की कोशिश में पिछले बरस 1601दर्ज मामलों के साथ यह राज्य देश में सातवें नंबर पे हैं. और इसका दुर्ग शहर पांचवे नंबर पे दर्ज है. हत्या-राज्य में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा का ये आलम है कि सालभर(2012) में हत्या के 320 से ज्यादा मामले दर्ज किए गए जिसमें महिलाओं की संख्या सबसे ज्यादा है अकेले रायपुर में 97 मामले थानों में दर्ज हुए जिसमें 34 महिलाओं का कत्लेआम किया गया।
आदिवासी बालाओं के साथ हिंसा- यद्यपि छग मातृपधान सत्ता वाला आदिवासी बहुल राज्य है यहां आदिवासी महिलाओं के साथ चिंहाकित अलग तरह की हिंसा चिंतित करने वाली है जैसे- ऽ बलात्कार उदाहरण स्वरूप छग के बस्तर संभाग (संपूर्ण आदिवासी )का कांकेर जिला के नरहरपुर ब्लाक के झालियामारी गांव के एक प्राइमरी आदिवावी कन्या आश्रम जहां 46 छात्राएं ( 5से 12 वर्ष की)रहती हैं- पिछले 2 बरस से यहां की 11 बच्चियों के साथ वहीं के शिक्षाकर्मी और चौकीदार बलात्कार, यौन शोषण करते हुए, मारपीट कर किसी से न बताने के लिए उन्हें धमकाते रहे हैं. औचक निरीक्षण में पहुंची स्थानीय कलेक्टर से आश्रम की पीड़ित बच्चियों ने अपने साथ की जा रही घिनौने अपराध की जानकारी दी तब मामला बाहर आया और आनन फानन में सिर्फ चौकीदर की गिरफतारी की गई और शिक्षा कर्मी फरार घोषित हो गया. अधिकारी स्तर पर कोई जवाबदेही, जिम्मेदारी या कार्रवाई अब तक निल है. इसके साथ ही आदिवासी औरतों के साथ यहां तैनात राज्य एवं केंद्र सरकार के सेना बल द्वारा वीभत्स यौन हिंसा व उत्पीड़न की घटनाएं अंजाम दी जाती है. साथ ही हिरासत में इन औरतों के साथ बलात्कार यौन उत्पीड़न, शोषण राज्य में कोई मुददा ही नहीं है. पुलिस हिरासत में, एसपी की मौजूदगी में सोनी सोरी के गुप्तांगों में कंकर पत्थर घुसेड़े गए जिसपर न महिला आयोग और न अदालतें सुनवाई करने को तैयार हैं.
मानव तस्करी- 2008-2009 के आंकड़ों के मुताबिक 20 हजार आदिवासी लड़कियां सरगुजा और जशपुर जिलों से गायब हो चुकी हैं। राज्य से 3000 लड़कियांे की गुमशुदगी का इकरार खुद सरकार 2 बरस पहले ही विधानसभा में कर चुकी है लेकिन अभी तक इनमें से ज्यादातर अपने परिजनों तक नहीं पहुच पाई हैं। राज्य से मानव तस्करी व्यवस्थित तरीके से जारी है जिसमें बड़ी तादाद औरतों और नाबालिग बच्चियों की है मगऱ इन्हें रोकना तो दूर पिछले नौ बरसों में सरकार इनके ठेकेदारों और दलालों पर भी हाथ नहीं डाल पाई है क्योंकि इन गिरोंहों के सरगना छग और दिल्ली में बैठे रसूख वाले (गैर आदिवासी)मंत्री और राजनीतिज्ञ हैं. कुपोषण-कुपोषण के मामले में देश के पूर्वाेत्तर राज्यों के हालात छग से बेहतर है. बच्चों में खून की कमी का आंकड़ा 2012 में 70 फीसदी था. केंद्र सरकार के आंकड़े देखें तो छग में 38.47फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. जबकि देश में सबसे कम 2फीसद कुपोषण अरूणाचल प्रदेश में दर्ज की गई है.(जबकि इन राज्यों को गरीब/पिछड़ा माना जाता है) लेकिन कुपोषण और एनीमिया के मामलों छग उनसे पिछड़ा हुआ है.
स्वास्थ्य- एओआई की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में स्वास्थ्य सुविधाओं की बड़ी कमी है. रिपोर्ट में साफ लिखा है कि ग्रामीण इलाकों के वंचित तबकों में भी औरतों और बच्चियों के स्वास्थ्य के लिए सरकारी सुविधाओं की बड़ी कमी सामने आई है. दंतेवाड़ा जिले के सिर्फ 59 गांवों में ही प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. सरकारी अस्पतालों में बढती अव्यवस्था, भ्रष्टाचार, डाक्टरों की लापरवाही, स्वास्थ्य सुविधाओं और संसाधनों की कमी के चलते मरीजों की मौत के मामले बढ़े हैं. रायपुर के गरियाबंद में 36 मरीजों की मौत जिसमें आधी संख्या औरतों की है चिंता करने लायक है.
सरकारी नेत्र शिविरों में आए दिन गरीब बूढ़ों के अंधे होने की खबर अब किसी को नहीं चौंकाती हैं। पिछले बरस करीब 70 लोग अंधे हो गए और 4 की मौत हो गई.
नेशनल इंस्टीटयूट आफ न्यूट्रीशन के मुताबिक 18से 29 वर्ष के भारतीयों को 2,320 कैलोरी भोजन की रोज जरूरत पड़ती है, लेकिन छग में 1900 कैलोरी भोजन भी एक छत्तीसगढ़िया को मयस्सर नहीं है. यहां राज्य सरकार अपने नागरिकों को पर्याप्त कैलोरी युक्त भोजन भी नहीं दे पा रही है.जबकि मंत्रियों के बाहर निकलते हुए पेट फट पड़ने को बेताब हैं. ऐसे में पति को परमेश्वर मानने वाले समाज में जहां 80 फीसदी गरीबी है उस राज्य में औरतों को कितना कैलोरी में भोजन मिलता होगा इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है.
गए बरस राज्य के बस्तर जैसे (धुर आदिवासी) इलाकों में रेडक्रास जैसी संस्था पे सरकार ने रोक लगा दी है. इन इलाकों में सरकारी सुविधाओं की बेहद कमी की वजह से कुपोषण, एनीमिया, औरतों की स्वास्थ्य समस्याओं के कारण मौतों की संख्या बढ़ी है. यह इलाका माओवाद से प्रभावित है और सरकार जहां एक तरफ आपरेशन ग्रीनहंट जैसे कारà¥

About हस्तक्षेप

Check Also

भारत में 25 साल में दोगुने हो गए पक्षाघात और दिल की बीमारियों के मरीज

25 वर्षों में 50 फीसदी बढ़ गईं पक्षाघात और दिल की बीमांरियां. कुल मौतों में से 17.8 प्रतिशत हृदय रोग और 7.1 प्रतिशत पक्षाघात के कारण. Cardiovascular diseases, paralysis, heart beams, heart disease,

Bharatendu Harishchandra

अपने समय से बहुत ही आगे थे भारतेंदु, साहित्य में भी और राजनीतिक विचार में भी

विशेष आलेख गुलामी की पीड़ा : भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रासंगिकता मनोज कुमार झा/वीणा भाटिया “आवहु …

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा: चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश

राष्ट्रीय संस्थाओं पर कब्जा : चिंतन प्रक्रिया पर हावी होने की साजिश Occupy national institutions : …

News Analysis and Expert opinion on issues related to India and abroad

अच्छे नहीं, अंधेरे दिनों की आहट

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही संघ परिवार बड़ी मुस्तैदी से अपने उन एजेंडों के साथ सामने आ रहा है, जो काफी विवादित रहे हैं, इनका सम्बन्ध इतिहास, संस्कृति, नृतत्वशास्त्र, धर्मनिरपेक्षता तथा अकादमिक जगत में खास विचारधारा से लैस लोगों की तैनाती से है।

National News

ऐसे हुई पहाड़ की एक नदी की मौत

शिप्रा नदी : पहाड़ के परम्परागत जलस्रोत ख़त्म हो रहे हैं और जंगल की कटाई के साथ अंधाधुंध निर्माण इसकी बड़ी वजह है। इस वजह से छोटी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है।

Ganga

गंगा-एक कारपोरेट एजेंडा

जल वस्तु है, तो फिर गंगा मां कैसे हो सकती है ? गंगा रही होगी कभी स्वर्ग में ले जाने वाली धारा, साझी संस्कृति, अस्मिता और समृद्धि की प्रतीक, भारतीय पानी-पर्यावरण की नियंता, मां, वगैरह, वगैरह। ये शब्द अब पुराने पड़ चुके। गंगा, अब सिर्फ बिजली पैदा करने और पानी सेवा उद्योग का कच्चा माल है। मैला ढोने वाली मालगाड़ी है। कॉमन कमोडिटी मात्र !!

Entertainment news

Veda BF (वेडा बीएफ) पूर्ण वीडियो | Prem Kahani – Full Video

प्रेम कहानी - पूर्ण वीडियो | वेदा BF | अल्ताफ शेख, सोनम कांबले, तनवीर पटेल और दत्ता धर्मे. Prem Kahani - Full Video | Veda BF | Altaf Shaikh, Sonam Kamble, Tanveer Patel & Datta Dharme

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: