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तो क्या भारत में अमीर भी आम आदमी है, कॉमरेडों की नजर में ?

वर्ग संघर्ष की विचारधारा छनछनाते विकास में निष्णात हो गयी है ?
संघी हिंदुत्व का विरोध करने को कटिबद्ध धर्मनिरपेक्ष कॉमरेडों को काँग्रेस के हिंदुत्व की तरह केजरीवाल के अमेरिकी हिंदुत्व से भी कोई परहेज है नहीं।
सांप्रदायिकता बड़ा खतरा है लेकिन जनसंहार की आर्थिक नीतियों का खतरा उससे कहीं ज्यादा है।
पलाश विश्वास

कॉमरेड प्रकाश कारत ने काँग्रेस और भाजपा दोनों के विरोध में तीसरे मोर्चे के गठन के सिलसिले में आम आदमी पार्टी को वामपंथी विरासत का होने का प्रमाणपत्र दे दिया है। दिल्ली में काँग्रेस को पराजित करने की आप की उपलब्धि के आधार पर उन्होंने तीसरे मोर्चे के गठन का संकल्प भी दोहराया है। जबकि दिल्ली विधानसभा में आस्था प्रस्ताव पर अपने जवाबी भाषण में अरविंद केजरीवाल ने बाकायदा आम आदमी की परिभाषा देते हुये अमीर और गरीब दोनों को आम आदमी बताया है। अर्थशास्त्र का कोई भी अधकचरा विद्यार्थी भी इसे उत्तर आधुनिक मुक्त बाजार के छनछनाते विकास की अवधारण मानेगा। तो क्या कॉमरेडों ने सर्वहारा के अधिनायकत्व और वर्ग विहीन शोषणविहीन समाज की स्थापना के सपने से किनारा कर लिया?

प्रकाश कारत का कहना है कि जो काम वामपंथियों को करना चाहिेए था, वह आम आदमी पार्टी कर रही है। सामाजिक शक्तियों की गोलबंदी और अस्मिता राजनीति तोड़ने में नायाब कामयाबी के लिये हमने भी आप की तारीफ की है और इसे अनुकरणीय भी मानते हैं जनपक्षधर मोर्चे के लिये। लेकिन हम कॉमरेड कारत की तरह आप को कोई जनपक्षधर विकल्प मानने के बजाय कॉरपोरेट कायाकल्प और कॉरपोरेट  राजनीति का एनजीओ करण मानते हैं। हमारी नजर से संघ परिवार और नरेंद्र मोदी की तुलना में प्रबंधकीय दक्षता की यह धर्मोन्मादी एनजीओ राजनीति का अन्तिम लक्ष्य महाविध्वंस है जो संघी राष्ट्रवाद के लिये भी हजम करना मुश्किल है। कम से कम खुदरा कारोबार में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का संघ परिवार समर्थन नहीं कर सकता और न ही रक्षा क्षेत्र में अबाध विदेशी पूँजी प्रवाह। जिसपर अमेरिकी युद्धक अर्थव्यवस्था और एकाधिकारवादी अमेरिकी राजनय का सबसे बड़ा दांव लगा है। जाहिर है कि नरेंद्र मोदी का प्रधानमंत्रित्व पूरी तरह अमेरिकी एजेंडे के माफिक है ही नहीं। इसी वजह से अमेरिका परस्त तमाम ताकतें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व के बजाय अरविंद केजरीवाल के ईश्वरत्व का गुणगाण और महिमामंडन में लगे हैं। अचरज तो इस पर है कि इस महिमामंडन में भारतीय वामपंथी आंदोलन के सबसे बड़े स्वयंभू झंडेवरदार भी पीछे नहीं है।

प्रकाश करात ने बुधवार को कहा था कि आप को हम गैर भाजपा और गैर काँग्रेस के विकल्प के रूप में देख रहे हैं। साथ ही उन्होंने आप को समर्थन देने पर विचार करने की बात भी कही थी। जाहिर है कि कुछ दिनों पहले तक मुलायम सिंह यादव के साथ मिल कर तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश में जुटी वामपंथी पार्टियाँ अब भाजपा और काँग्रेस के खिलाफ तीसरे विकल्प के लिये आम आदमी पार्टी की ओर उम्मीद भरी नजर से देख रही है। करात ने माना कि अगर इस पार्टी का प्रसार होता है तो वह गैर भाजपा, गैर काँग्रेस राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिये उनकी नजर भी इसके चुनावी प्रदर्शन पर होगी। उन्होंने यह भी माना कि राजनीति को लेकर उदासीन रहने वाले शहरी मध्य वर्ग को जोड़ने से लेकर सोशल मीडिया के उपयोग तक को ‘आप’ से सीखा जा सकता है। इससे पहले काँग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी कह चुके हैं कि इस पार्टी से सीखने की जरूरत है।

गौरतलब है कि प्रकाश करात ने कहा है कि लेफ्ट पार्टियों को ‘आप’ से सीखना चाहिए  कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर कैसे युवा लोगों से संवाद स्थापित किया जाये। गौरतलब है कि अरविंद केजरीवाल के तौर तरीकों को सिर्फ जनता ही नहीं बल्कि लालकृष्ण आडवाणी और राहुल गांधी की भी तारीफ मिल चुकी है और अब वामपंथी दल के नेता भी अपने कार्यकर्ताओं से आप से सीखने की नसीहत दे रहे हैं।

करात ने कहा कि जब केजरीवाल दिल्ली जल बोर्ड के निजीकरण का विरोध कर रहे थे, तब वह मुझसे आकर मिले थे। करात ने कहा कि यह अच्छा है कि केजरीवाल नीतियों के बारे में बात कर रहे हैं। हम उन्हें, उनकी राजनीति को गौर से और करीब से देख रहे हैं ।

गौरतलब है कि लोक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी) मंत्री मनीष सिसोदिया की ओर से पेश किये गये विश्वास मत प्रस्ताव पर विधानसभा में हुई करीब साढ़े चार घंटे की चर्चा के अंत में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सभी सदस्यों से यह फैसला करने की अपील की कि ‘वे किस तरफ हैं’। आम आदमी’ की परिभाषा बताते हुये केजरीवाल ने कहा कि आम आदमी वह है जो ईमानदारी और सच्चाई से रहना चाहता है चाहे वह अमीर हो या गरीब हो। उनमें से हरेक आदमी को आम आदमी कहा जा सकता है। हम कौन थे, हम सभी तो बाहरी थे, हम बगैर किसी काबिलियत के बहुत छोटे आदमी थे। उन्होंने कहा कि अपराधीकरण की वजह से राजनीति भ्रष्ट हो गयी है। भ्रष्ट राजनीति की वजह से शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़कों की हालत खराब है।

अरविंद केजरीवाल को राजनीति के आपराधिक और भ्रष्ट हो जाने का कष्ट है। राजनीति में कॉरपोरेट फंडिंग, कॉरपोरेट लाबिइंग से राजकाज, कॉरपोरेट नीति निर्धारण और अंततः कॉरपोरेट राजनीति से उन्हें कोई परहेज नहीं है। शायद यह भी वामपंथी विरासत है।

तो क्या भारत में अमीर भी आम आदमी है, कॉमरेडों की नजर में और वर्ग संघर्ष की विचारधारा छनछनाते विकास में निष्णात हो गयी है ? तो क्या छनछनाते विकास के पैरोकारों की तरह कॉमरेडों का मानना है कि अमीरों की बेहिसाब विकास से ही छनाछनाकर विकास की गंगा बाकी भारतीयों के घर-आँगन तक पहुँच जायेगी? वैसे भी आम आदमी पार्टी की कमान वाणिज्य प्रबंधकों, बाजार विशेषज्ञों और आईटी के रथी महारथियों के पास है। भर्ती अभियान में भी फोकस खास लोगों पर ज्यादा है। ये तमाम लोग जिनके हित साध रहे हैं, क्या वे वामपंथी विरासत के मुताबिक सर्वहारा या सर्वस्वहाराओं के हितों के समर्थक हैं, यह विचारणीय है।

अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुये कहा कि कर्म उनके हाथ में है, फल नहीं है। फल ईश्वर के हाथ में है। राजकाज के इस भागवत गीता आख्यान पर हालांकि कॉमरेड कारत ने वामपंथी विरासत की प्रासंगिकता की चर्चा नहीं की है। लेकिन यह भारतीय इतिहास के जानकार सारे लोग जानते हैं कि कर्मफल के सिद्धांत पर ही वर्ण विद्वेषी जाति व्यवस्था की नींव है, जो बहुसंख्य भारतीय जनगण के अर्थव्यवस्था समेत जीवन के हर क्षेत्र से बहिष्कार की बुनियाद है। भारत में वामपंथी आंदोलन और वाम नेतृत्व के इतिहास को देखें तो कॉमरेड कारत को न शपथ ग्रहण और न आस्थामत के दौरान धर्म और आस्था संक्रांत वक्तव्य से कोई ऐतराज है।

कॉमरेड कारत को तो आम आदमी के इस चामत्कारिक उत्थान में नया राजनीतिक विकल्प दिख रहा है और आम आदमी पार्टी की तारीफ करते हुये वे तीसरे मोर्चे का संकल्प भी एक ही सांस में दोहरा रहे हैं। क्या वामपंथी विचारधारा के रथी महारथियों को.जिन्हें जमीनी हकीकत और भारतीय यथार्थ के मुकाबले रंग-बिरंगे विमर्शों और बहुआयामी अकादमिक अवधारणाओं पर बहस करते रहने से फुरसत ही नहीं मिलती, उन्हें कोई गड़बड़ी नजर नहीं आ रही है?

वर्ग संघर्ष के वामपंथी सिद्धांत का बारह बजाते हुये जो सामाजिक दृष्टिकोण बता रहे हैं अरविंद केजरीवाल, लगता है कि कॉमरेडों को उसपर भी कोई ऐतराज नहीं है।

आस्था प्रस्ताव पर जवाबी भाषण में जो केजरीवाल ने कहा, वह भी कम गौरतलब नहीं है। केजरीवाल ने कहा कि राजनीति की सफाई के लिये हमें साथ आने की जरूरत है। हमें राजनीति में आने, चुनाव लड़ने और अपने कानून बनाने की चुनौती दी गयी थी। लड़ाई नामुमकिन थी। जीत की संभावना शून्य थी और तब हमने राजनीति में आकर इसे साफ करने का फैसला किया। बड़ी पार्टियों के नेताओं ने सबसे बड़ी भूल यह सोचकर की कि आम आदमी चुनाव कहाँ लड़ने जा रहा है। तब हमने चुनाव लड़ने का फैसला किया। लोग हमारा मजाक उड़ाते थे। चार और आठ दिसंबर को चमत्कार हुआ। मैं पहले एक नास्तिक था पर अब मैं भगवान पर यकीन करने लगा हूँ। दिल्ली की जनता ने साबित कर दिया है कि सच्चाई को मात नहीं दिया जा सकता।

राज्यतंत्र में बिना किसी बुनियादी परिवर्तन के टल्ली और मुलम्मा लगाकर मुक्त बाजार की जनसंहारी व्यवस्था को जारी रखने की कवायद अगर वामपंथी विरासत है कॉमरेड करात के नजरिेये से,तो किसी मंतव्य की जरुरत है ही नहीं। वैसे बंगाल में कॉमरेडों को धर्म-कर्म की इजाजत देकर जनता से सीधे जुड़कर सत्ता में वापसी की इजाजत देने वाले माकपाई नेतृत्व ने केरल में कॉमरेडों को धर्म कर्म की इजाजत नहीं दी है। धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद के मामले में संघपरिवार को हमेशा कटघरे में खड़ा करने वाले कॉमरेडों को कांग्रेसी धर्मोन्माद से कभी परहेज रहा हो, ऐसा उनके कट्टर दुश्मन भी नहीं कह सकते। तो जैसे केरल में धर्म अफीम है, लेकिन बंगाल में जनसंपर्क का अचूक हथियार, ठीक उसी तरह संघी हिंदुत्व का विरोध करने को कटिबद्ध धर्मनिरपेक्ष कॉमरेडों को काँग्रेस के हिंदुत्व की तरह केजरीवाल के अमेरिकी हिंदुत्व से भी कोई परहेज है नहीं।

इसी के मध्य मुक्त बाजार की कयामत बेरोकटोक जारी है और कॉमरेडों के विमर्श में मुक्त बाजार के जनसंहारी तौर तरीके नरमेध अभियान के प्रतिरोध का कोई विमर्श है ही नहीं।

कॉमरेडों को यह चिंता भी नहीं सताती कि एक जनवरी से सरकार ने दिल्ली और मुंबई समेत 105 और जिलों में एलपीजी पर डायरेक्ट कैश ट्रासंफर स्कीम यानी डीबीटीएल शुरू कर दी है। लेकिन अभी भी काफी ग्राहकों को इस योजना को लेकर काफी कन्फ्यूजन है। मसलन एपीएल और बीपीएल कार्ड धारकों को क्या इस योजना में अलग-अलग फायदे हैं। अब डायरेक्ट कैश ट्रासंफर स्कीम के तहत नगद सब्सिडी ग्राहकों के बैंक खाते में सीधी भेजी जा रही है। सबके लिये डायरेक्ट कैश सब्सिडी एक समान है। एपीएल और बीपीएल कार्ड का कैश सब्सिडी से कोई लेना देना नहीं है। अब केवल आधार कार्ड वाले ग्राहकों को ही कैश सब्सिडी मिलेगी। इसके तहत सब्सिडी वाले केवल 9 सिलेंडरों के लिये पैसा मिलेगा। सब्सिडी मिलने पर बाजार रेट पर सिलेंडर खरीदना होगा। सब्सिडी वाला सिलेंडर बुक कराते ही बैंक खाते में पैसा आ जायेगा। नगद सब्सिडी के लिये ग्राहकों को आधार कार्ड बनवाना होगा। ग्राहकों को आधार कार्ड को अपने बैंक खाते से लिंक कराना होगा। आधार कार्ड को बैंक खाते से लिंक कराने के लिये बैंक की ब्रांच से संपर्क करना होगा या फिर एलपीजी डिस्ट्रीब्यूटर के पास ड्राप बॉक्स में फार्म जमा करना होगा। आखिर में अपने एलपीजी कनेक्शन से आधार कार्ड को लिंक कराना होगा।

मजे की बात है कि संयोग से प्रधानमंत्रित्व से रिटायर होने की घोषणा करते हुये छनछनाते विकास के मसीहा और मुक्त बाजार के अप्रतिम अर्थशास्त्री डा. मनमोहन सिंह भी दिल्ली में काँग्रेस की शिकस्त के बाद आप की सरकार को समर्थन देने की अभिज्ञता के आलोक में कॉमरेड कारत के वक्तव्य की प्रतिध्वनि करते नजर आये।दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के जबर्दस्त प्रदर्शन पर चुप्पी तोड़ते हुये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने आज कहा कि जनता के फैसले का सम्मान होना चाहिए लेकिन साथ ही कहा कि यह आकलन करना जल्दबाजी होगी कि आप के प्रयोग सफल होंगे या नहीं ।

गुजरात नरसंहार युद्ध अपराध है तो भोपाल गैस त्रासदी की रासायनिक आयुध प्रयोग और सिखों के जनसंहार के मामले में काँग्रेस को बरी करने का धर्म निरपेक्ष तेवर समझ से परे है। सांप्रदायिकता बड़ा खतरा है लेकिन जनसंहार की आर्थिक नीतियों का खतरा उससे कहीं ज्यादा है।

अपने बचाव में जो मनमोहन सिंह छनछनाते विकास का सब्जबाग दिखाते हुये जो कह रहे हैं, उससे अलग नहीं है वामपंथी पक्ष। अबाध पूँजी प्रवाह और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सवाल पर आप का कोई पक्ष नहीं है। भाजपा को रोकने के लिये यूपीए एक के तमाम पापों के सबसे सक्रिय साझेदार के नजरिये से आप की प्रबंधकीय राजनीति को नया विकल्प बताये जाने पर कायदे से ताज्जुब होना भी नहीं चाहिए।

About the author

पलाश विश्वास। लेखक वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आंदोलनकर्मी हैं । आजीवन संघर्षरत रहना और दुर्बलतम की आवाज बनना ही पलाश विश्वास का परिचय है। हिंदी में पत्रकारिता करते हैं, अंग्रेजी के लोकप्रिय ब्लॉगर हैं। “अमेरिका से सावधान “उपन्यास के लेखक। अमर उजाला समेत कई अखबारों से होते हुए अब जनसत्ता कोलकाता में ठिकाना ।

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