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तो गृहमंत्री अब बदला लेंगे!!

लोकतन्त्र के नाम पर पूँजीतन्त्र हावी हो गया है…
माओवादी खुलेआम घोषणा करते हैं कि वे भारतीय संविधान को नहीं मानते हैं लेकिन शिंदे ऐसा कहते नहीं हैं लेकिन करते वही हैं…
सुनील कुमार
11 मार्च को माओवादी हमले में झीरम घाटी में 11 सीआरपीएफ व 4 राज्य पुलिस बलों सहित 16 की मृत्यु हो गयी। यह घटना देश की मीडिया में चर्चा का विषय बना। माओवादी इन 15 जवानों से 6 इंसास, 2 एसएलआर, 1 एलएमजी, 2 यूबीजीएल, 6 एक 47 व दो रेडियो सेट ले गये। प्रिंट मीडिया में 12 मार्च को ‘माओवादियों के मौत की घाटी झीरम’, ‘चुनाव से पहले नक्सली हमला’, ‘फिर लाल हुआ झीरम घाटी’ जैसे शब्दों से अखबार का प्रथम समाचार बना हुआ था। लेकिन यह घटना वह जगह नहीं ले पाई जब इसी झीरम घाटी में सलवा जुड़ूम के जनक महेन्द्र कर्मा व अन्य कांग्रेसी नेताओं के मारे जाने पर जिस तरह का शासक वर्ग में हो हल्ला मचा था। रातों-रात राहुल गांधी छत्तीसगढ़ पहुँच गये और पूरे जोर-शोर से इसे ‘लोकतन्त्र’ पर हमला बताया गया था। 11 मार्च, 2014 की घटना, 25 मई 2013 की घटना से भिन्न क्यों दिख रही है? 25 मई की घटना में सीधे तन्त्र पर हमला था जबकि 11 मार्च की घटना तन्त्र के रक्षकों पर था। शासक वर्ग को तन्त्र के मरने पर दुख होता है लेकिन तन्त्र के रक्षकों पर मरने से कोई उनको दुख नहीं होता क्योंकि तन्त्र के रक्षक शासक वर्ग के घर के नहीं होते। यही कारण है कि उनके मरने के बाद उनके लाशों को ट्रेन द्वारा उनके पैतृक स्थान भेजा गया जबकि तन्त्र के लोग मरते या घायल होते हैं तो उनके लिये स्पेशल व्यवस्था की जाती है। पुलिस, मिलिट्री में उसी शोषित-पीड़ित घर के लड़के जाते हैं जिनसे शासक वर्ग का कोई दूर दूर तक का रिश्ता नहीं होता है। शासक वर्ग उनको एक झूठी दिलाशा दिलाता है कि तुम ‘देशभक्त’ हो और तुम देश के लिये लड़ रहे हो। जब कि सच्चाई यह है कि वे दिन रात शासक वर्ग की रक्षा में लगे रहते हैं।

जो सिपाही मारे गये हैं वे सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगे हुये थे। मारे गये सिपाहियों को इस सड़क से कोई लाभ नहीं होने वाला था, वे जिस गाँव व शहर से हैं उनके गाँव में ऐसी सड़कें नहीं होंगी, उनके परिवारों को टूटी-फूटी रास्तों से ही इलाज कराने व स्कूल, कॉलेजों को जाना पड़ता होगा। लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्गम इलाकों में भी अच्छी सड़कों का निर्माण किया जा रहा है जिससे टाटा, एस्सार, जिन्दल, मित्तल व अन्य पूँजीपतियों (लुटेरों) द्वारा छत्तीसगढ़ की प्राकृतिक सम्पदा को लूट कर ले जाया जा सके। इन्हीं लूट में से कुछ टुकड़े पाकर शासक वर्ग लूट की रक्षा करने के लिये इन सिपाहियों को वहाँ भेजती है, जिसका विरोध वहाँ की जनता कर रही है।

दूसरे दिन भारत के गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे रायपुर पहुँचे और एयरपोर्ट पर ही राज्यपाल, मुख्यमंत्री व राज्य के गृहमंत्री के साथ मीटिंग की और वहीं से सभी जगदलपुर के लिये रवाना हो गये। शिंदे ने मृत सिपाहियों को श्रद्धांजलि दी और सामन्ती वाक्य में कहा कि इसका बदला लिया जायेगा। इसी तरह की बात तोंगपाल में सीआरपीएफ के डीजीपी दिलीप कुमार त्रिवेदी ने कहा कि हम दुगनी शक्ति से मुकाबला करेंगे। शिंदे भूल गये कि वे एक संवैधानिक पद पर बैठे हुये हैं जिसमें बदला लेने का वाक्य शामिल नहीं है और उनके संवैधानिक परिधि में भी नहीं आता है। शिंदे जिस संविधान की शपथ लेकर बैठे हैं उसमें दोषियों को कानूनी रूप से दण्डित व पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने की बात लिखी हुयी है। वह अपनी ही संवैधानिक मर्यादाओं को भूल जाते हैं तभी तो वो कभी तीन बेटियों की बाप होने का एहसास कराते हैं तो कभी बदला लेने की बात कर रहे हैं।

माओवादी खुलेआम घोषणा करते हैं कि वे भारतीय संविधान को नहीं मानते हैं लेकिन शिंदे ऐसा नहीं कहते हैं लेकिन करते वही हैं। भारत के संविधान में दर्ज है कि सभी को सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है। भारत का संविधान पुलिस वालों को भी तभी लाठी या गोलियों का इस्तेमाल करने की तभी इज्जात देता है जब जनता के बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो या जब अपने जान की खतरा हो। इस संविधान की धज्जियां शुरू से ही उड़ती आयी हैं, तभी तो संवैधानिक अधिकार के तहत प्रदर्शन कर रहे अभी तक 85 हजार प्रदर्शनकारियों को गोलियों से उड़ा दिया गया। पद और तगमे हासिल करने के लिये फर्जी मुठभेड़ के नाम पर लोगों को मार दिया जाता है। कुछ मुट्ठी भर लोगों को फायदा पहुँचाने के लिये लाखों लोगों को उनके घरों से उजाड़ दिया जाता है, उनके जीविका के साधन जल-जंगल-जमीन को छीन लिया जाता है। जैसा कि सरकार के ही योजना आयोग की एक कमेटी की रिपोर्ट है कि छत्तीसगढ़ में जमीन हड़पने के लिये सलवा जुड़ूम चलाया गया और सलवा जुड़ूम के कैम्प का खर्च टाटा और एस्सार कम्पनियों ने दिया है।

सलवा जुड़ूम में लगभग 650 गाँवों को जला दिया गया, कई गाँवों को तो 5-6 बार जलाया गया और 50 हजार लोगों को सलवा जुड़ूम कैम्पों में जानवरों की तरह रहने को मजबूर किया गया, महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। छत्तीसगढ़ के आदिवासी अपने जीविका के साधन को बचाने के लिये आत्मरक्षा में हमले कर रहे हैं जिससे कि वे जिन्दा रह सकें। इस हमले में आप का तन्त्र मारा जाये या तन्त्र के रक्षक क्या इसके जिम्मेदार वे आदिवासी (माओवादी) हैं या आप हैं?

भारत में लोकतन्त्र के नाम पर पूँजीतन्त्र हावी हो गया है। विकास के नाम पर लोगों के आजीविका के साधन छिनकर देशी-विदेशी लूटेरों को दिया जा रहा है। शिंदे साहब आपका विकास का पैमाना जीडीपी से आँका जाता है और गरीबों का विकास पेट की भूख से आँका जाता है। आप के लम्पट विकास का ही नतीजा था कि इस हमले में विक्रम निषाद की जान गयी। आज भी दुनिया के एक तिहाई गुलाम भारत में रहते हैं। नई आर्थिक नीति के कारण 5 लाख से अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं, शहरों में मजदूर बेहाल हैं वह परिवार के साथ कबूतरखाने जैसे कमरों में जिन्दगी जीने के लिये विवश हैं, मध्यम वर्ग व्यापारिक घाटे के साथ परिवार के साथ आत्महत्या कर रहा है। इसे लोकतन्त्र कहा जाये या कत्लतन्त्र?

आप आँख का ईलाज कराने के लिये अमेरिका जाते हैं, गरिबों की आँख का ऑपरेशन शिविरों में किया जाता है। जिस राज्य में आप जाकर बदला लेने की बात करते हैं उसी राज्य में महिलाओं की नशबंदी के ऑपरेशन के लिये बेहोशी का इंजेक्शन लगाकर डॉक्टर भाग जाते हैं क्योंकि उनके पास साधन नहीं होते हैं। शिंदे साहब आप किस तरह से बदला लेना चाहते हैं? क्या सेना और वायु सेना के द्वारा छत्तीसगढ़ में गोले और बम बरसायेंगे, शहरों में उनके कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद करवायेंगे या घंटी प्रसादम की तरह कातिल गिरोहों द्वारा कत्ल करवायेंगे? आपके पास असीमित साधन और अधिकार हैं समस्या के समाधान के लिये उसका प्रयोग आप लोकतांत्रिक तरीके अपनायेंगे या सामन्ती, पूँजीवादी तरीके? आपकी ही सरकार माओवादी समस्या को सामाजिक-आर्थिक समस्या मानती रही है जिसका इलाज आप बंदूक से करना चाहते हैं। समस्या की जगह मार्क्सवाद, लेनिनवाद, माओवाद की राजनीतिक भाषा में भी बदला शब्द नहीं है और न ही आपके संविधान में। इसलिये बदला की भावना छोड़ समस्या समाधान की बात करनी चाहिए।

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सुनील कुमार, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार व राजनैतिक सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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